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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1726 of 1855

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Page 1726

सोमो विश्वान्यतसा वनानि नार्वागिन्द्रं प्रतिमानानि देभुः.. (५)
पीने के पश्चात् ओज उत्पन्न करने वाले पत्थरों द्वारा शीघ्रता से कूटे गए शत्रुओं को
कंपाने वाले कर्मठ आयुधधारी एवं गतिशील सोम सभी वनों को बढ़ाते हैं. ये वन न तो इंद्र
की समानता कर सकते हैं, न उन्हें लघु बना सकते हैं. (५)
न यस्य द्यावापृथिवी न धन्व नान्तरिक्षं नाद्रयः सोमो अक्षाः.
यदस्य मन्युरधिनीयमानः शृणाति वीळु रुजति स्थिराणि.. (६)
द्यावा-पृथिवी, उदक, अंतरिक्ष एवं पर्वत जिन इंद्र की समानता नहीं कर सकते, उन्हीं के
लिए सोमरस निचोड़ा जाता है. इंद्र का क्रोध जब शत्रुओं पर होता है, उस समय ये
दृढ़तापूर्वक शत्रुओं को मारते हैं एवं उनके स्थिर पदार्थों को भी तोड़ डालते हैं. (६)
जघान वृत्रं स्वधितिर्वनेव रुरोज पुरो अरदन्न सिन्धून्.
बिभेद गिरिं नवमिन्न कुम्भमा गा इन्द्रो अकृणुत स्वयुग्भिः.. (७)
फरसा जिस प्रकार वृक्षों को काटता है, उसी प्रकार इंद्र शत्रुओं को मारते हैं. इंद्र ने
शत्रुनगरियों को तोड़ा, वर्षा के जल से नदियों को आकार दिया व पहाड़ों को कच्चे घड़े के
समान फोड़ा. इंद्र ने अपने साथी मरुतों के साथ जल को हमारे सामने प्रस्तुत किया. (७)
त्वं ह त्यदृणया इन्द्र धीरोऽसिर्न पर्व वृजिना शृणासि.
प्र ये मित्रस्य वरुणस्य धाम युजं न चना मिनन्ति मित्रम्.. (८)
हे धीर इंद्र! तुम स्तोताओं को ऋण से छुड़ाते हो. जिस प्रकार तलवार पशुओं की
बोटियां काटती है, उसी प्रकार तुम स्तोताओं के पापों को नष्ट करते हो. जो मूर्ख लोग वरुण
और मित्र को धारण करने वाले एवं मित्रतुल्य यज्ञकर्म का लोप करते हैं, उन्हें भी इंद्र नष्ट
करते हैं. (८)
प्र ये मित्रं प्रार्यमणं दुरेवाः प्र सङ्गिरः प्र वरुणं मिनन्ति.
न्य१मित्रेषु वधमिन्द्र तुम्रं वृषन्व्ऋषणमरुषं शिशीहि.. (९)
हे अभिलाषापूरक इंद्र! जो बुरे लोग मित्र, अर्यमा, मरुद्गण एवं वरुण से द्वेष करते हैं,
उन शत्रुओं के लिए तुम अपना गतिशील, कामवर्षक एवं दीप्तिशाली वज्र तेज करो. (९)
इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्या इन्द्रो अपामिन्द्र इत्पर्वतानाम्.
इन्द्रो वृधामिन्द्र इन्मेधिराणामिन्द्रः क्षेमे योगे हव्य इन्द्रः.. (१०)
इंद्र स्वर्ग, धरती, जल, पर्वतों, वृद्धों एवं ज्ञानियों के स्वामी हैं. योग और क्षेम के लिए इंद्र
को ही बुलाया जाता है. (१०)