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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1721 of 1855

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Page 1721

सकें. (१९)
त्वं नो अग्ने अधरादुदक्तात्त्वं पश्चादुत रक्षा पुरस्तात्.
प्रति ते ते अजरासस्तपिष्ठा अघशंसं शोशुचतो दहन्तु.. (२०)
हे अग्नि! तुम हमें दक्षिण, उत्तर, पश्चिम एवं पूर्व दिशाओं से बचाओ. तुम्हारी अतिशय
तप्त, जरारहित एवं ज्वलित किरणें पापी राक्षसों को भस्म कर दें. (२०)
पश्चात्पुरस्तादधरादुदक्तात्कविः काव्येन परि पाहि राजन्.
सखे सखायमजरो जरिम्णेऽग्ने मर्ताँ अमर्त्यस्त्वं नः.. (२१)
हे दीप्त एवं कार्यकुशल अग्नि! तुम अपने कौशल द्वारा हमें पश्चिम, पूर्व, दक्षिण एवं
उत्तर दिशाओं से बचाओ. हे जरामरणरहित एवं सखा अग्नि! मैं तुम्हारा मित्र हूं. तुम मुझे
जरा एवं मृत्यु को प्रदान न करो. (२१)
परि त्वाग्ने पुरं वयं विप्रं सहस्य धीमहि.
धृषद्वर्णं दिवेदिवे हन्तारं भङ्गुरावताम्.. (२२)
हे बल के पुत्र अग्नि! तुम पूरक मेधावी धर्षक एवं कुटिल राक्षसों का प्रतिदिन नाश
करने वाले हो. हम तुम्हारा ध्यान करते हैं. (२२)
विषेण भङ्गुरावतः प्रति ष्म रक्षसो दह.
अग्ने तिग्मेन शोचिषा तपुरग्राभिर्ऋष्टिभिः (२३)
हे अग्नि! तुम तोड़फोड़ करने वाले राक्षसों को अपने व्याप्त एवं तीखे तेज से जलाओ.
उन्हें ऐसे खड्गों से मारो, जिनका अगला भाग गरम है. (२३)
प्रत्यग्ने मिथुना दह यातुधाना किमीदिना.
सं त्वा शिशाभि जागृह्यदब्धं विप्र मन्मभिः.. (२४)
हे अग्नि! जो राक्षस पतिपत्नी के रूप में यह देखते हुए घूमते हैं कि कहां क्या हो रहा
है. उन्हें तुम जलाओ. हे अपराजेय एवं ज्ञानी अग्नि! मैं सुंदर स्तुतियों से तुम्हारी प्रशंसा करता
हूं. तुम जागो. (२४)
प्रत्यग्ने हरसा हरः शृणीहि विश्वतः प्रति.
यातुधानस्य रक्षसो बलं वि रुज वीर्यम्.. (२५)
हे अग्नि! तुम अपने तेज से राक्षसों का तेज चारों ओर नष्ट कर दो. तुम राक्षसों के बल
और तेज को नष्ट करो. (२५)
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