Skip to content
SarvaKosh
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1725 of 1855

Read in context
Page 1725

हे विद्वान् पितरो! मैं तुमसे स्पर्धा वाली बात नहीं कर रहा हूं. मैं केवल जानने के लिए
पूछ रहा हूं कि अग्नियां, सूर्य उषाएं एवं जल कितने हैं. (१८)
यावन्मात्रमुषसो न प्रतीकं सुपर्ण्यो३वसते मातरिश्वः.
तावद्दधात्युप यज्ञमायन्ब्राह्मणो होतुरवरो निषीदन्.. (१९)
हे वायु! जब तक रात्रियां उषा के मुख से परदा नहीं हटा देतीं, तब तक नीचे स्थित
होता और स्तोता पार्थिव अग्नि यज्ञ के समीप आकर बैठ जाते हैं. (१९)
सूक्त—८९ देवता—इंद्र
इन्द्रं स्तवा नृतमं यस्य मह्ना विबबाधे रोचना वि ज्मो अन्तान्.
आ यः पप्रौ चर्षणीधृद्वरोभिः प्र सिन्धुभ्यो रिरिचानो महित्वा.. (१)
हे स्तोता! नेताओं में श्रेष्ठ इंद्र की स्तुति करो. उनके महत्त्व से दूसरों के तेज हार जाते
हैं. उनकी महिमा सारी धरती को पराभूत करती है. वे मानव प्रजा को धारण करते हैं. उनका
महत्त्व सागर से भी बड़ा है तथा वे अपने तेज से द्यावा-पृथिवी को पूर्ण करते हैं. (१)
स सूर्यः पर्युरू वरांस्येन्द्रो ववृत्याद्रथ्येव चक्रा.
अतिष्ठन्तमपस्यं१न सर्गं कृष्णा तमांसि त्विष्या जघान.. (२)
सारथि जिस प्रकार रथ का पहिया घुमाता है, उसी प्रकार शोभन वीर्य वाले इंद्र अपने
अधिक तेज को चारों ओर घुमाते हैं. इंद्र अपने तेज से शीघ्र गति वाले एवं कार्यकुशल विश्व
के समान अंधकार को नष्ट करते हैं. (२)
समानमस्मा अनपावृहर्चं क्ष्मया दिवो असमं ब्रह्म नव्यम्.
वि यः पृष्ठेव जनिमान्यर्य इन्द्रश्चिकाय न सखायमीषे.. (३)
हे स्तोता! तुम मेरे साथ उन इंद्र के लिए निकृष्टता रहित द्यावा-पृथिवी में अद्वितीय एवं
नए स्तोत्र को बोलो जो यज्ञों में उत्पन्न स्तोत्रों को सुनने के लिए उतने ही इच्छुक हैं, जितने
कि शत्रुओं को देखने के लिए हैं. वे अपने मित्रों का बुरा नहीं चाहते. (३)
इन्द्राय गिरो अनिशितसर्गा अपः प्रेरयं सगरस्य बुध्नात्.
यो अक्षेणेव चक्रिया शचीभिर्विष्वक्तस्तम्भ पृथिवीमृत द्याम्.. (४)
मैंने इंद्र के लिए सर्वोच्च स्तुतियां की हैं. इन स्तुतियों द्वारा मैंने अंतरिक्ष के जल को
बरसने के लिए प्रेरित किया है. वे इंद्र अपने कर्मों द्वारा द्यावा और पृथ्वी को इस प्रकार धारण
करते हैं, जिस प्रकार धुरा पहियों को धारण करता है. (४)
आपान्तमन्युस्तृपलप्रभर्मा धुनिः शिमीवाञ्छुरुमाँ ऋजीषी.