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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

About this granth

The Rigveda (ऋग्वेद) is the oldest of the four Vedas and the earliest surviving text of the Indian tradition. Its Samhita is arranged in ten mandalas containing more than a thousand hymns (suktas) addressed to Agni, Indra, Varuna, Mitra, Soma, Ushas, the Maruts, the Ribhus, the Vishvedevas and other deities, along with reflections on creation, generosity, marriage and society. Hymns such as the Nasadiya and the Purusha Sukta are often taken as the starting points of Indian philosophy.

This edition is by Dr. Ganga Sahay Sharma, a scholar with degrees in Hindi and Sanskrit and the title of Vyakaranacharya, published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, as part of a four-Veda set. Each hymn is headed by its number and deity, followed by the Sanskrit mantras and a simple Hindi rendering of their sense. A list of hymns, their subjects and the number of mantras is given at the front.

The Hindi is plain and close to everyday speech, which makes this edition a good first approach to the meaning of the mantras for readers not ready for a traditional commentary. The complete text, about 1,855 pages, can be read here page by page.

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प्रेरित करते हैं. (२५)
इन्दुः पुनानो अति गाहते मृधो विश्वानि कृण्वन्त्सुपथानि यज्यवे.
गाः कृण्वानो निर्णिजं हर्यतः कविरत्यो न क्रीळन्परि वारमर्षति.. (२६)
दीप्तिशाली सोम पवित्र होते समय यजमान के कल्याण के लिए सभी मार्ग सुगम बनाते
हुए शत्रुओं को हराकर कलश में जाते हैं. सुंदर एवं मेधावी सोम अश्व के समान क्रीड़ा करते
हुए एवं अपना रूप गोदुग्ध के समान बनाते हुए भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर जाते हैं.
(२६)
अस्रश्वतः शतधारा अभिश्रियो हरिं नवन्तेऽव ता उदन्युवः.
क्षिपो मृजन्ति परि गोभिरावृतं तृतीये पृष्ठे अधि रोचने दिवः.. (२७)
आपस में मिली हुई, सौ धाराओं वाली व सोम का सहारा लेने वाली सूर्यकिरणें हरे रंग
के सोम को प्राप्त करती हैं. उंगलियां किरणों से ढके हुए सोम एवं द्युलोक के दीप्त स्थान पर
स्थित सोम को मसलती हैं. (२७)
तवेमाः प्रजा दिव्यस्य रेतसस्त्वं विश्वस्य भुवनस्य राजसि.
अथेद् विश्वं पवमान ते वशे त्वमिन्दो प्रथमो धामधा असि.. (२८)
हे सोम! तुम्हारे दीप्त वीर्य से ये सब प्रजाएं उत्पन्न हुई हैं. तुम सारे संसार के स्वामी हो.
यह सारा विश्व तुम्हारे वश में है. तुम सबसे प्रमुख एवं तेजधारी हो. (२८)
त्वं समुद्रो असि विश्ववित्कवे तवेमाः पञ्च प्रदिशो विधर्मणि.
त्वं द्यां च पृथिवीं चाति जभ्रिषे तव ज्योतींषि पवमान सूर्यः.. (२९)
हे मेधावी सोम! तुम जलवर्षा के साधन एवं विश्व को जानने वाले हो. ये पांचों दिशाएं
तुम्हें ही आधार बनाती हैं. तुम द्युलोक एवं पृथ्वी को धारण करते हो एवं सूर्य तुम्हारी ज्योति
को विस्तृत करता है. (२९)
त्वं पवित्रे रजसो विधर्मणि देवेभ्यः सोम पवमान पूयसे.
त्वामुशिजः प्रथमा अगृभ्णत तुभ्येमा विश्वा भुवनानि येमिरे.. (३०)
हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम देवों के निमित्त रस धारण करने वाले दशापवित्र पर निचोड़े
जाते हो. अभिलाषा करने वाले प्रमुख पुरोहित तुम्हें ग्रहण करते हैं. सारे प्राणी तुम्हारे लिए
अपने-आपको अर्पित करते हैं. (३०)
प्र रेभ एत्यति वारमव्ययं वृषा वनेष्वव चक्रदद्धरिः.
सं धीतयो वावशाना अनूषत शिशुं रिहन्ति मतयः पनिप्रतम्.. (३१)
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शब्द करने वाले सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करते हैं. वर्षा करने वाले
एवं हरे रंग के सोम जल में क्रंदन करते हैं. ध्यान करने वाली एवं सोम की कामना करने वाली
स्तुतियां शिशु के समान संस्कारयोग्य एवं शब्द करते हुए सोम को अपना विषय बनाती हैं.
(३१)
स सूर्यस्य रश्मिभिः परि व्यत तन्तुं तन्वानस्त्रिवृतं यथा विदे.
नयन्नृतस्य प्रशिषो नवीयसीः पतिर्जनीनामप याति निष्कृतम्.. (३२)
सोम तीनों सवनों के द्वारा यज्ञ का विस्तार करते हुए अपने-आपको सूर्यकिरणों से घेरते
हैं एवं यज्ञ को जानते हैं. प्रजाओं के पालक सोम यजमान की नवीन स्तुतियों को प्राप्त करते
हुए शुद्ध पात्र में जाते हैं. (३२)
राजा सिन्धूनां पवते पतिर्दिव ऋतस्य याति पथिभिः कनिक्रदत्.
सहस्रधारः परि षिच्यते हरिः पुनानो वाचं जनयन्नुपावसुः.. (३३)
नदियों के ईश्वर एवं स्वर्ग के स्वामी सोम शुद्ध किए जाते हैं एवं शब्द करते हुए यज्ञ के
मार्ग से जाते हैं. असीम धाराओं वाले सोम ऋत्विजों द्वारा पात्रों में भरे जाते हैं. सोम हरे रंग
वाले, शब्द करते हुए, शुद्ध होने वाले एवं समीप जाने वाले हैं. (३३)
पवमान मह्यर्णो वि धावसि सूरो न चित्रो अव्ययानि पव्यया.
गभस्तिपूतो नृभिरद्रिभिः सुतो महे वाजाय धन्याय धन्वसि.. (३४)
हे पवमान सोम! तुम अधिक रस देते हो. हे सूर्य के समान पूज्य सोम! तुम भेड़ के
बालों से बने दशापवित्र पर जाते हो. हे बहुतों द्वारा पवित्र एवं ऋत्विजों द्वारा पत्थरों की
सहायता से निचोड़े गए सोम! तुम महान् युद्धों में धनप्राप्ति के लिए जाते हो. (३४)
इषमूर्जं पवमानाभ्यर्षसि श्येनो न वंसु कलशेषु सीदसि.
इन्द्राय मद्धा मद्यो मदः सुतो दिवो विष्टम्भ उपमो विचक्षणः.. (३५)
हे पवमान सोम! तुम अन्न और बल को प्राप्त करते हो. बाज जिस प्रकार अपने घोंसले
में जाता है, उसी प्रकार तुम कलशों में स्थित होते हो. हे सोम! तुम स्वर्ग के समान, स्वर्ग को
साधने वाले एवं विशेष द्रष्टा हो. तुम्हारा नशीला रस इंद्र के लिए निचोड़ा गया है. (३५)
सप्त स्वसारो अभि मातरः शिशुं नवं जज्ञानं जेन्यं विपश्चितम्.
अपां गन्धर्वं दिव्यं नृचक्षसं सोमं विश्वस्य भुवनस्य राजसे.. (३६)
माता जिस प्रकार बालक के पास जाती है, उसी प्रकार सात नदियां नवीन उत्पन्न,
जीतने वाले, विद्वान्, जलों को जन्म देने वाले, जलधारणकर्त्ता, स्वर्ग में उत्पन्न एवं मानवों को
देखने वाले सोम के पास जाती हैं. (३६)
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ईशान इमा भुवनानि वीयसे युजान इन्दो हरितः सुपर्ण्यः.
तास्ते क्षरन्तु मधुमद्घृतं पयस्तव व्रते सोम तिष्ठन्तु कृष्टयः.. (३७)
हे सबके स्वामी हरितवर्ण एवं घोड़ियों को रथ में जोड़ने वाले सोम! तुम सारे लोकों में
जाते हो. वे घोड़ियां तुम्हारे लिए मीठा एवं उज्ज्वल जल लावें तथा सभी लोग तुम्हारे व्रत में
रहें. (३७)
त्वं नृचक्षा असि सोम विश्वतः पवमान वृषभ ता वि धावसि.
स नः पवस्व वसुमध्दिरण्वद्वयं स्याम भुवनेषु जीवसे.. (३८)
हे सोम! तुम सभी लोकों को देखने वाले हो. हे जलवर्षक सोम! तुम विविध प्रकार से
गति करते हो. तुम हमें गायों एवं स्वर्ण से युक्त धन दो तथा हम संसार में जीवित रहने में
समर्थ हों. (३८)
गोवित्पवस्व वसुविद्धिरण्विद्रतोधा इन्दो भुवनेष्वर्पितः.
त्वं सुवीरो असि सोम विश्ववित्तं त्वा विप्रा उप गिरेम आसते.. (३९)
हे गाय! धन और सोना देने वाले तथा जल धारण करने वाले सोम! तुम रस टपकाओ.
तुम शोभन शक्ति वाले एवं सबको जानने वाले हो. ये स्तोता स्तुतियों द्वारा तुम्हारी उपासना
करते हैं. (३९)
उन्मध्व ऊर्मिर्वनना अतिष्ठिपदपो वसानो महिषो वि गाहते.
राजा पवित्ररथो वाजमारुहत्सहस्रभृष्टिर्जयति श्रवो बृहत्.. (४०)
मधुर सोम का रस स्तुतियों को उन्नत करता है. महान् सोम जल को ढकते हुए कलश में
जाते हैं. दशापवित्र राजा सोम का रथ है. अपरिमित गमन वाले सोम युद्ध में जाते हैं एवं
हमारे लिए बहुत सा अन्न जीतते हैं. (४०)
स भन्दना उदियर्ति प्रजावतीर्विश्वायुर्र्विश्वः सुभरा अहर्दिवि.
ब्रह्म प्रजावद्रयिमश्वपस्त्यं पीत इन्दविन्द्रमस्मभ्यं याचतात्.. (४१)
सबके पास जाने वाले सोम संतान देने वाली एवं शोभन भरण से युक्त स्तुतियों को
भली प्रकार प्रेरित करते हैं. हे सोम! जब इंद्र तुम्हें पी लें तो तुम उनसे हमारे लिए संतानसहित
अन्न एवं घर भरने वाला धन मांगो. (४१)
सो अग्रे अह्नां हरिर्हर्यतो मदः प्र चेतसा चेतयते अनु द्युभिः.
द्वा जना यातयन्नन्तरीयते नरा च शंसं दैव्यं च धर्तरि.. (४२)
सोम सब प्राणियों के चेतनायुक्त होने के साथ ही प्रातः के प्रकाश के साथ जाने जाते हैं.
हरे रंग वाले, सुंदर, नशीले, मानवों एवं देवों द्वारा प्रशंसित धन यजमान को देने वाले एवं
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धरती तथा स्वर्ग के जीवों को अपने-अपने काम में लगाने वाले सोम द्यावा-पृथिवी के मध्य
भाग में जाते हैं. (४२)
अञ्जते व्यञ्जते समञ्जते क्रतुं रिहन्ति मधुनाभ्यञ्जते.
सिन्धोरुच्छ्वासे पतयन्तमुक्षणं हिरण्यपावाः पशुमासु गृभ्णते.. (४३)
ऋत्विज् सोमरस को गाय के दूध-दही के साथ तरह-तरह से मिलाते हैं एवं उसका स्वाद
लेते हैं. वे सोम को मधु के साथ मिश्रित करते हैं. जल के ऊपर उठने पर नीचे की ओर
टपकने वाले व तृप्त करने वाले सोम को हिरण्य के द्वारा पवित्र करते हुए ऋत्विज् इस प्रकार
जल में जाते हैं, जिस प्रकार पशु स्नान आदि के लिए तालाब में जाते हैं. (४३)
विपश्चिते पवमानाय गायत मही न धारात्यन्धो अर्षति.
अहिर्न जूर्णामति सर्पति त्वचमत्यो न क्रीळन्नसरद्वृषा हरिः.. (४४)
हे ऋत्विजो! विद्वान् एवं शुद्ध होते हुए सोम के लिए स्तुतियां गाओ. जिस प्रकार वर्षा
की विशाल-धारा बाधा को पार करके आगे बढ़ती है, उसी प्रकार सोम रसरूपी अन्न को
लांघकर आगे बढ़ते हैं. सांप जिस प्रकार अपनी केंचुली छोड़ता है, उसी प्रकार सोम का रस
अपनी लता को छोड़ता है. वर्षा करने वाले व हरितवर्ण सोम घोड़े के समान क्रीड़ा करते हुए
दशापवित्र से द्रोणकलश में जाते हैं. (४४)
अग्रेगो राजाप्यस्तविष्यते विमानो अह्नां भुवनेष्वर्पितः.
हरिर्घृतस्नुः सुदृशीको अर्णवो ज्योतिरथः पवते राय ओक्यः.. (४५)
आगे चलने वाले, सुशोभित व जल में शुद्ध किए गए सोम की स्तुति की जाती है. दिनों
का निर्माण करने वाले, जलों में स्थित, हरे रंग वाले, जल उत्पन्न करने वाले, सुंदर, जल से
युक्त एवं ज्योतिपूर्ण रथ वाले सोम घर देते हैं. (४५)
असर्जि स्कम्भो दिव उद्यतो मदः परि त्रिधातुर्भुवनान्यर्षति.
अंशुं रिहन्ति मतयः पनिप्रतं गिरा यदि निर्णिजम्मृग्मिणो ययुः.. (४६)
स्वर्गलोक को धारण करने वाले, उन्नत एवं नशीले सोम निचोड़े जाते हैं. तीन धाराओं
वाले सोम सारे सवनों में घूमते हैं. जब स्तोता रूप वाले सोम की स्तुतियां करते हैं, तब
पुरोहित शब्दयुक्त सोम की कामना करते हैं. (४६)
प्र ते धारा अत्यण्वानि मेष्यः पुनानस्य संयतो यन्ति रंहयः.
यद् गोभिरिन्दो चम्वोः समज्यस आ सुवानः सोम कलशेषु सीदसि.. (४७)
हे सोम! छनते समय तुम्हारी चंचल धाराएं भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार
करके जाती हैं. जब तुम चमू नामक पात्रों के ऊपर जलों के साथ मिलाए जाते हो, उस समय
तुम निचोड़ते हुए कलशों में स्थित होते हो. (४७)

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पवस्व सोम क्रतुविन्न उक्थ्योऽव्यो वारे परि धाव मधु प्रियम्.
जहि विश्वान् रक्षस इन्दो अत्रिणो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (४८)
हे हमारी स्तुति के जानने वाले व उक्थमंत्रों द्वारा प्रशंसा करने योग्य सोम! तुम हमारे
यज्ञ के लिए टपको तथा भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर अपना मधुर रस गिराओ. हे
दीप्तिशाली सोम! तुम मानवों का भक्षण करने वाले सब राक्षसों को मारो. शोभन संतान वाले
हम महान् धन पाकर यज्ञों में तुम्हारी बहुत स्तुति करेंगे. (४८)
सूक्त—८७ देवता—पवमान सोम
प्र तु द्रव परि कोशं नि षीद नृभिः पुनानो अभि वाजमर्ष.
अश्वं न त्वा वाजिनं मर्य्यन्तोऽच्छा बर्ही रशनाभिर्नयन्ति.. (१)
हे सोम! दौड़कर आओ और द्रोणकलश में बैठो. तुम ऋत्विजों द्वारा पवित्र होते हुए
यजमान को अन्न दो. अध्वर्युजन यज्ञ में ले जाने के लिए सोम को जल द्वारा इस प्रकार साफ
करते हैं, जिस प्रकार शक्तिशाली घोड़े को नहलाया जाता है. (१)
स्वायुधः पवते देव इन्दुरशस्तिहा वृजनं रक्षमाणः.
पिता देवानां जनिता सुदक्षो विष्टम्भो दिवो धरुणः पृथिव्याः.. (२)
शोभन आयुध वाले, दीप्तिशाली, राक्षसों का नाश करने वाले, उपद्रव से रक्षा करने
वाले, देवों के पालनकर्त्ता, उत्पन्न करने वाले, शोभन शक्तियुक्त, स्वर्ग को सहारा देने वाले एवं
धरती के धारक सोम निचोड़ते हैं. (२)
ऋषिविप्रः पुरएता जनानामृभुर्धीर उशना काव्येन.
स चिद्विवेद निहितं यदासामपीच्यं १ गुह्यं नाम गोनाम्.. (३)
ऋषि, मेधावी, सबके आगे चलने वाले, दीप्तिशाली एवं धीर उशना अपने स्तोत्रों द्वारा
गायों में छिपे हुए एवं गोपनीय दूध को प्राप्त करते हैं. (३)
एष स्य ते मधुमाँ इन्द्र सोमो वृषा वृष्णे परि पवित्रे अक्षाः.
सहस्रसाः शतसा भूरिदावा शश्वत्तमं बर्हिरा वाज्यस्थात्.. (४)
हे वर्षा करने वाले इंद्र! तुम्हारे लिए मधुर एवं वर्षक सोम दशापवित्र में होकर छनते हैं.
सैकड़ों और हजारों धनों के देने वाले, अधिक धन के दाता, नित्य एवं शक्तिशाली सोम यज्ञ में
स्थित रहते हैं. (४)
एते सोमा अभि गव्या सहस्रा महे वाजायाऽमृताय श्रवांसि.
पवित्रेभिः पवमाना असृग्रञ्छ्रवस्यवो न पृतनाजो अत्याः.. (५)

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ये सोम गाय के दूध, दही व हजारों अन्नों को लक्ष्य करके दशापवित्र के छेदों से छनते
हुए महान् अन्न और अमृत के लिए इस प्रकार शुद्ध किए जाते हैं, जिस प्रकार सेना को
जीतने वाला घोड़ा नहलाया जाता है. (५)
परि हि ष्मा पुरुहूतो जनानां विश्वासरूद्धोजना पूयमानः.
अथा भर श्येनभृत प्रयांसि रयिं तुञ्जानो अभि वाजमर्ष.. (६)
बहुतों द्वारा बुलाए हुए एवं शुद्ध होते हुए सोम मनुष्यों को सभी भोज्य अन्न देते हैं. हे
बाज के द्वारा लाए हुए सोम! हमें अन्न एवं धन दो तथा अन्नरूपी रस की ओर जाओ. (६)
एष सुवानः परि सोमः पवित्रे सर्गो न सृष्टो अधावदर्वा.
तिग्मे शिशानो महिषो न शृङ्गे गा गव्यन्नभि शूरो न सत्वा.. (७)
ये निचुड़ते हुए एवं टपकने वाले सोम छोड़े हुए घोड़े के समान दशापवित्र की ओर
दौड़ते हैं. सोम अपने सींगों को तेज करने वाले भैंसे के समान एवं गाय चाहने वाले शूर के
समान दौड़ते हैं. (७)
एषा ययौ परमादन्तरद्रेः कूचित्सतीरूर्वे गा विवेद.
दिवो न विद्युत्स्तनयन्त्यभ्रैः सोमस्य ते पवत इन्द्र धारा.. (८)
सोमरस की यह धारा ऊंचे स्थान से पात्र की ओर जाती है. इसी धारा ने पणियों द्वारा
छिपाई हुई गायों को प्राप्त किया था. हे इंद्र! बिजली के समान शब्द करने वाली यह
सोमधारा तुम्हारे लिए ही गिरती है. (८)
उत स्म राशिं परि यासि गोनामिन्द्रेण सोम सरथं पुनानः.
पूर्वीरिषो बृहतीर्जीरदानो शिक्षा शचीवस्तव ता उपष्टुत्.. (९)
हे शुद्ध होते हुए सोम! तुमने इंद्र के साथ एक रथ पर बैठकर पणियों द्वारा चुराई हुई
गायों को प्राप्त किया था. हे शीघ्र फलदाता सोम! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमें विशाल
धन दो. हे अन्नयुक्त सोम! सारा अन्न तुम्हारा है. (९)
सूक्त—८८ देवता—पवमान सोम
अयं सोम इन्द्र तुभ्यं सुन्वे तुभ्यं पवते त्वमस्य पाहि.
त्वं ह यं चकृषे त्वं ववृष इन्दुं मदाय युज्याय सोमम्.. (१)
हे इंद्र! यह सोम तुम्हारे लिए निचोड़े और छाने जाते हैं. तुम इन्हें पिओ. तुम जिस सोम
को बनाते हो व वरण करते हो, उसीको मदप्राप्ति और सहायता के लिए पिओ. (१)
स ईं रथो न भुरिषाळयोजि महः पुरूणि सातये वसूनि.
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आदीं विश्वा नहुष्याणि जाता स्वर्षाता वन ऊर्ध्वा नवन्त.. (२)
लोग बहुत सा धन लाने के लिए रथ के समान भार ढोने वाले महान् सोम को रथ के
समान ही जीतते हैं. युद्ध के अभिलाषी मनुष्य महान् धन देने वाले सोम को संग्राम में ले जाते
हैं. (२)
वायुर्न यो नियुत्वाँ इष्टयामा नासत्येव हव आ शम्भूविष्ठः.
विश्ववारो द्रविणोदाइव त्मन्यूषेव धीजवनोऽसि सोम.. (३)
हे सोम! तुम वायु के समान अश्वों वाले तथा मनचाहे स्थान पर जाने वाले,
अश्विनीकुमारों के समान पुकार सुनते ही सबको सुख देने वाले, धन देने वाले के समान
सबके वरणीय एवं सूर्य के समान मनोवेग वाले हो. (३)
इन्द्रो न यो महा कर्माणि चक्रिर्हन्ता वृत्राणामसि सोम पूर्भित्.
पैद्वो न हि त्वमहिनाम्नां हन्ता विश्वस्यासि सोम दस्योः.. (४)
हे सोम! तुमने इंद्र के समान महान् कर्म किए हैं. तुम शत्रुओं के नाशक एवं उनके नगरों
को तोड़ने वाले हो. तुम अहिवंश के लोगों को घोड़े के समान जल्दी आकर मारते हो. तुम
सब शत्रुओं को मारने वाले हो. (४)
अग्निर्न यो वन आ सृज्यमानो वृथा पाजांसि कृणुते नदीषु.
जनो न युध्वा महत उपब्दिरियर्ति सोमः पवमान ऊर्मिम्.. (५)
जिस तरह अग्नि वन में उत्पन्न होकर अपनी शक्ति दिखाते हैं, उसी तरह सोम जल में
पैदा होकर अपना बल दिखाते हैं. सोम युद्ध करने वाले वीर के समान शत्रु के पास भयंकर
शब्द करते हुए अधिक रस को प्रेरित करते हैं. (५)
एते सोमा अति वाराण्यव्या दिव्या न कोशासो अभ्रवर्षाः.
वृथा समुद्रं सिन्धवो न नीचीः सुतासो अभि कलशाँ असृग्रन्.. (६)
जैसे अंतरिक्ष से बरसने वाली मेघवर्षा एवं नदियां अपने-आप नीचे की ओर जाती हैं,
उसी प्रकार यह छनते हुए सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करके द्रोणकलश की
ओर जाते हैं. (६)
शुष्मी शर्धो न मारुतं पवस्वानऽभिशस्ता दिव्या यथा विट्.
आपो न मक्षू सुमतिर्भवा नः सहस्राप्साः पृतनाषाण् यज्ञः.. (७)
हे शक्तिशाली सोम! तुम मरुतों की शक्ति के समान टपको. तुम स्वर्ग की प्रजाओं के
समान अनिद्रित रूप से बहो एवं जल के समान हमें शीघ्र मुक्ति दो. हे अनेक रूपों वाले
सोम! तुम सेना को जीतने वाले इंद्र के समान यज्ञ के पात्र हो. (७)
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सूक्त—८९ देवता—पवमान सोम

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राज्ञो नु ते वरुणस्य व्रतानि बृहद्गभीरं तव सोम धाम.
शुचिष्ट्वमसि प्रियो न मित्रो दक्षाय्यो अर्यमेवासि सोम.. (८)
हे सोम! मैं तुम्हारे यज्ञकर्मों को राजा वरुण के समान शीघ्र करता हूं. तुम्हारा तेज
विशाल एवं गंभीर है. तुम प्रिय मित्र के समान शुचि हो एवं अर्यमादेव के समान पूज्य हो. (८)
सूक्त—८९ देवता—पवमान सोम
प्रो स्य वह्निः पथ्याभिरस्यान्दिवो न वृष्टिः पवमानो अक्षाः.
सहस्रधारो असदन्य१स्मे मातुरुपस्थे वन आ च सोमः.. (१)
फल वहन करने वाले सोम यज्ञ के मार्गों से आकाश की वर्षा के समान बहते हैं. हजार
धाराओं वाले सोम हमारे पास या द्युलोक के पास बैठते हैं. (१)
राजा सिन्धूनामवसिष्ट वास ऋतस्य नावमारुहद्रजिष्ठाम्.
अप्सु द्रप्सो वावृधे श्येनजूतो दुह ईं पिता दुह ईं पितुर्जाम्.. (२)
गायों के राजा सोम दूध में मिलते हैं एवं यज्ञरूपी सरलगामिनी नाव में बढ़ते हैं. बाज
पक्षी द्वारा लाए गए सोम जलों में बढ़ते हैं. अध्वर्यु एवं अन्य लोक द्युलोक के पुत्र सोम को
दुहते हैं. (२)
सिंहं नसन्त मध्वो अयासं हरिमरुषं दिवो अस्य पतिम्.
शूरो युत्सु प्रथमः पृच्छते गा अस्य चक्षसा परि पात्युक्षा.. (३)
यजमान शत्रुनाशक, जलप्रेरक, हरे रंग वाले और द्युलोक के पालक सोम को व्याप्त
करते हैं. युद्धों में शूर एवं देवों में प्रमुख सोम पणियों द्वारा चुराई हुई गायों वाले स्थान का
मार्ग पूछते हैं. इंद्र सोम की सहायता से ही विश्व का पालन करते हैं. (३)
मधुपृष्ठं घोरमयासमश्वं रथे युञ्जन्त्युरुचक्र ऋषभम्.
स्वसार ईं जामयो मर्जयन्ति सनाभयो वाजिनमूर्जयन्ति.. (४)
मीठे पिछले भाग वाला, भयानक, गतिशील एवं सुंदर सोम यज्ञ में उसी प्रकार पकड़ा
जाता है, जैसे रथ में घोड़े को जोतते हैं. उंगलियां बहिनों और भाइयों के समान आपस में
मिलकर सोम को शुद्ध करती हैं एवं समान नियम पालन करने वाले अध्वर्यु सोम को
शक्तिशाली बनाते हैं. (४)
चतस्र ईं घृतदुहः सचन्ते समाने अन्तर्धरणे निषत्ताः.
ता ईमर्षन्ति नमसा पुनानास्ता ईं विश्वतः परि षन्ति पूर्वीः.. (५)
घी देने वाली चार गाएं इस सोम की सेवा करती हैं. वे गाएं सबको धारण करने वाले
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अंतरिक्ष में एक साथ बैठी हैं. अन्न के द्वारा पवित्र होने वाली वे अनेक विशाल गाएं सोम को
चारों ओर से व्याप्त करती हैं. (५)
विष्टम्भो दिवो धरुणः पृथिव्या विश्वा उत क्षितयो हस्ते अस्य.
असत्त उत्सो गृणते नियुत्वान्मध्वो अंशुः पवत इन्द्रियाय.. (६)
स्वर्ग को सहारा देने वाले एवं धरती के धारणकर्त्ता सोम के हाथ में सारी प्रजाएं हैं. सोम
स्तुति करते हैं. मधुर रसयुक्त एवं इंद्र के लिए निचुड़ने वाले सोम तुम्हारे लिए अश्वों से युक्त
हों. (६)
वन्वन्नवातो अभि देववीतिमिन्द्राय सोम वृत्रहा पवस्व.
शग्धि महः पुरुश्चन्द्रस्य रायः सुवीर्यस्य पतयः स्याम.. (७)
हे शक्तिशाली, महान् एवं शत्रुनाशक सोम! तुम देवों एवं इंद्र के पीने के निमित्त टपको.
हम तुम्हारी कृपा से अत्यंत सुखदायक एवं शोभन वीर्य वाले धन के स्वामी बनें. (७)
सूक्त—९० देवता—पवमान सोम
प्र हिन्वानो जनिता रोदस्यो रथो न वाजं सनिष्यन्नयासीत्.
इन्द्रं गच्छन्नायुधा संशिशानो विश्वा वसु हस्तयोरादधानः.. (१)
अध्वर्यु आदि के द्वारा प्रेरित व द्यावा-पृथिवी को उत्पन्न करने वाले सोम रथ के समान
अन्न प्रदान करते हुए जाते हैं. सोम इंद्र के पास जाकर अपने आयुध तेज करते हैं एवं हमें देने
के लिए सभी धन अपने हाथ में धारण करते हैं. (१)
अभि त्रिपृष्ठं वृषणं वयोधामाङ्गूषाणामवावशन्त वाणीः.
वना वसानो वरुणो न सिन्धून्वि रत्नधा दयते वार्याणि.. (२)
तीन सवनों वाले, वर्षाकारक एवं अन्न धारण करने वाले सोम को स्तोताओं के वचन
शब्दयुक्त करते हैं. सोम वरुण के समान जलों को ढकते हुए स्तोताओं को रत्न एवं धन देते
हैं. (२)
शूरग्रामः सर्ववीरः सहावाञ्जेता पवस्व सनिता धनानि.
तिग्मायुधः क्षिप्रधन्वा समत्स्वषाळ्हः साह्वान् पृतनासु शत्रून्.. (३)
हे शूर, समुदाय के स्वामी एवं वीरों से युक्त सोम! तुम सामर्थ्य वाले, विजयी धनों को
एकत्र करने वाले, तीखे आयुधों वाले, तीव्र गति वाले, धनुष के धारक, युद्धों में असहनीय एवं
शत्रुसेनाओं को हराने वाले हो. (३)
उरुगव्यूतिरभयानि कृण्वन्तसमीचीने आ पवस्वा पुरन्धी.
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अपः सिषासन्वृषसः स्वर्गाः सं चक्रदो महो अस्मभ्यं वाजान्.. (४)
हे विस्तृत मार्ग वाले सोम! तुम स्तोताओं को अभयदान देते हुए द्यावा-पृथिवी को
मिलाते हुए बरसो. तुम हमें महान् अन्न देने के लिए उषा, आदित्य एवं किरणों को प्राप्त करने
की इच्छा करते हुए शब्द करते हो. (४)
मत्सि सोम वरुणं मत्सि मित्रं मत्सीन्द्रमिन्दो पवमान विष्णुम्.
मत्सि शर्धो मारुतं मत्सि देवान्मत्सि महामिन्द्रमिन्दो मदाय.. (५)
हे दीप्तिशाली एवं शुद्ध होते हुए सोम! तुम वरुण, मित्र, विष्णु, शक्तिशाली मरुत्, इंद्र
एवं अन्य देवों को नशे के द्वारा तृप्त करो. (५)
एवा राजेव क्रतुमाँ अमेन विश्वा घनिघ्नद दुरिता पवस्व.
इन्दो सूक्ताय वचसे वयो धा यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
हे यज्ञयुक्त सोम! तुम राजा के समान शक्ति द्वारा सारे पापों को नष्ट करते हुए टपको. हे
दीप्तिशाली सोम! हमारा सुंदर स्तोत्र सुनकर हमें अन्न दो एवं हमें कल्याणप्रद साधनों द्वारा
रक्षित करो. (६)
सूक्त—९१ देवता—पवमान सोम
असर्जि वक्वा रथे यथाजौ धिया मनोता प्रथमो मनीषी.
दश स्वसारो अधि सानो अव्येऽजन्ति वह्निं सदनान्यच्छ.. (१)
युद्धभूमि में जैसे घोड़े की मालिश की जाती है, उसी प्रकार यज्ञ में शब्द करने वाले,
देवों के मनचाहे, देवों में श्रेष्ठ एवं स्तुतियों के स्वामी सोम स्तुतियों के साथ निर्मित किए जाते
हैं. सगी बहिनों के समान दस उंगलियां यज्ञशाला की ओर फल ढोने वाले सोम को भेड़ों के
बालों से बने दशापवित्र रूपी ऊंचे स्थान की ओर प्रेरित करती हैं. (१)
वीती जनस्य दिव्यस्य कव्यैरधि सुवानो नहुष्येभिरिन्दुः.
प्र यो नृभिर्मृतो मर्त्येभिर्मृजानोऽविभिर्गोभिरद्भिः.. (२)
नहुषवंशी स्तोताओं द्वारा निचोड़े हुए एवं देवों के समीप रहने वाले सोम यज्ञ में आते हैं.
मरणरहित सोम मरणधर्मा ऋत्विजों द्वारा भेड़ के बालों से बने दशापवित्र, गाय के चमड़े एवं
जल द्वारा शुद्ध होते हुए यज्ञ में जाते हैं. (२)
वृषा वृष्णे रोरुवदंशुरस्मै पवमानो रुशदीर्ते पयो गोः.
सहस्रमृक्वा पथिभिर्वचोविदध्वस्मभिः सूरो अण्वं वि याति.. (३)
अभिलाषापूरक, अधिक शब्द करने वाले एवं शुद्ध होने वाले सोम वर्षक इंद्र के पीने के
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लिए गाय के सफेद दूध के पास जाते हैं. स्तोत्रयुक्त, स्तुतियों के ज्ञाता एवं शोभन वीर्य वाले
सोम हिंसारहित हजारों मार्गों से सूक्ष्म छिद्रों वाले दशापवित्र को पार करके द्रोणकलश में
जाते हैं. (३)
रुजा दृळ्हा चिद्रक्षसः सदांसि पुनान इन्द ऊर्णुहि वि वाजान्.
वृश्चोपरिष्टात्तुजता वधेन ये अन्ति दूरादुपनायमेषाम्.. (४)
हे सोम! राक्षसों की दृढ़ नगरियों को नष्ट करो. हे दशापवित्र में शुद्ध होते हुए सोम!
हमारे लिए अन्न लाओ. तुम समीप या दूर से आने वाले राक्षसों के स्वामी को आयुध की
सहायता से काटो. (४)
स प्रत्न वन्नव्यसे विश्ववार सूक्ताय पथः कृणुहि प्राचः.
ये दुष्षहासो वनुषा बृहन्तस्ताँस्ते अश्याम पुरुकृत्पुरुक्षो.. (५)
हे सबके द्वारा वरण करने योग्य सोम! तुम प्राचीन काल के समान रहकर मुझ नवीन
सूत्रों और शोभन स्तुतियों वाले मार्गों को प्राचीन बनाओ. हे अनेक कर्मों वाले एवं अधिक
शब्द करने वाले सोम! तुम्हारे जो अंश राक्षसों के लिए असह्य, हिंसायुक्त एवं महान् हैं, उन्हें
हम यज्ञ में प्राप्त करें. (५)
एवा पुनानो अपः स्व१र्गा अस्मभ्यं तोका तनयानि भूरि.
शं नः क्षेत्रमुरु ज्योतिंषि सोम ज्योङ्नः सूर्य दृशये रिरीहि.. (६)
हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम हमें जल, स्वर्ग, गाएं एवं पुत्र-पौत्र दो एवं हमारे खेतों का
कल्याण करो. हे सोम! अंतरिक्ष में ज्योतियों को विस्तृत करो एवं हमें चिरकाल तक सूर्य को
देखने दो. (६)
सूक्त—९२ देवता—पवमान सोम
परि सुवानो हरिरंशुः पवित्रे रथो न सर्जि सनये हियानः.
आपच्छ्लोकमिन्द्रियं पूयमानः प्रति देवाँ अजुषत प्रयोभिः.. (१)
जिस प्रकार युद्ध में शत्रुवध के लिए रथ तैयार किया जाता है, उसी प्रकार ऋत्विजों
द्वारा प्रेरित व हरे रंग वाले सोम देवों के संतोष के लिए दशापवित्र पर जाते हैं. शुद्ध होते हुए
सोम इंद्र संबंधी स्तोत्रों को प्राप्त करते हैं एवं हव्य अन्नों से देवों की सेवा करते हैं. (१)
अच्छा नृचक्षा असरत्पवित्रे नाम दधानः कविरस्य योनौ.
सीदन् होतेव सदने चमूषूपेमग्मन्नृषयः सप्त विप्राः.. (२)
मनुष्यों को देखने वाले व बुद्धिमान् सोम जल को धारण करते हैं एवं अपने स्थान
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दशापवित्र में उसी प्रकार फैलते हैं, जिस प्रकार होता देवों की स्तुति करने के लिए यज्ञ में
प्रवेश करता है. इसके बाद सोम चमू नामक पात्रों में जाते हैं. सात मेधावी ऋषि स्तोत्रों द्वारा
सोम के पास जाते हैं. (२)
प्र सुमेधा गातुविद्विश्वदेवः सोमः पुनानः सद एति नित्यम्.
भुवद्विश्लेषु काव्येषु रन्ताऽनुजनान्यतते पञ्च धीरः.. (३)
शोभन बुद्धि वाले, मार्गों के ज्ञाता एवं सभी देवों के समीपवर्ती सोम शुद्ध होकर
विनाशरहित द्रोणकलश में जाते हैं. सब स्तोत्रों में रमण करने वाले तथा धीर सोम पांच जनों
का अनुगमन करने का प्रयत्न करते हैं. (३)
तव त्ये सोम पवमान निन्ये विश्वे देवास्त्रय एकादशासः.
दश स्वधाभिरधि सानो अव्ये मृजन्ति त्वा नद्यः सप्त यह्वीः.. (४)
हे शुद्ध होते हुए सोम! ये तेंतीस देव तुम्हारे हैं एवं स्वर्ग में रहते हैं. दस उंगलियां भेड़ के
बालों से बने तथा पर्वत शिखर के समान ऊंचे दशापवित्र में तुम्हें जल के द्वारा शुद्ध करती हैं
एवं सात महान् नदियां तुम्हें पवित्र बनाती हैं. (४)
तन्नु सत्यं पवमानस्यास्तु यत्र विश्वे कारवः संनसन्त.
ज्योतिर्यदह्ने अकृणोदु लोकं प्रावन्मनुं दस्यवे करभीकम्.. (५)
पवमान सोम का वह प्रसिद्ध स्थान हमें प्राप्त हो, जहां सभी स्तोता एकत्र होते हैं. सोम
की जो ज्योति दिन के लिए प्रकाश देती हैं, उसने मनु की भली-भांति रक्षा की. सोम ने अपना
तेज राक्षसों के लिए नष्ट करने वाला किया था. (५)
परि सद्मेव पशुमान्ति होता राजा न सत्यः समितिरीयानः.
सोमः पुनानः कलशाँ अयासीत्सीदन्मृगो न महिषो वनेषु.. (६)
देवों को बुलाने वाले जिस प्रकार बलि पशुओं वाली यज्ञशाला में जाते हैं. सच्चे कामों
वाला राजा जिस प्रकार युद्ध में जाता है, उसी प्रकार पवित्र होते हुए सोम भैंसे के समान जल
में रहकर द्रोणकलश में जाते हैं. (६)
सूक्त—९३ देवता—पवमान सोम
साकमुक्षो मर्जयन्त स्वसारो दश धीरस्य धीतयो धनुत्रीः.
हरिः पर्यद्रवज्जाः सूर्यस्य द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी.. (१)
एक साथ सींचने वाली एवं परस्पर बहिनों के समान दस उंगलियां सोम को शुद्ध करती
हैं. वे उंगलियां धीर सोम की प्रेरक हैं. हरे रंग वाले सोम सूर्य की पत्नी दिशाओं की ओर जाते
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हैं. सोम तेज चलने वाले घोड़े के समान द्रोणकलश में जाते हैं. (१)
सं मातृभिर्न शिशुर्वावशानो वृषा दधन्वे पुरुवारो अद्भिः.
मर्यो न योषामभि निष्कृतं यन्त्सं गच्छते कलश उसियाभिः.. (२)
जैसे माताएं बच्चे को धारण करती हैं, उसी प्रकार देवों की अभिलाषा करने वाले,
अभिलाषापूरक एवं बहुतों द्वारा वरण करने योग्य सोम जल द्वारा धारण किए जाते हैं. पुरुष
जिस प्रकार नारी के पास जाता है, उसी प्रकार सोम अपने संस्कृत स्थान में जाते हुए
द्रोणकलश में गाय के दूध-दही आदि से मिलते हैं. (२)
उत प्र पिप्य ऊधरघ्न्याया इन्दुर्घाराभिः सचते सुमेधाः.
मूर्धानं गावः पयसा चमूष्वभि श्रीणन्ति वसुभिर्न निक्तैः.. (३)
सोम गाय के थनों को दूध से भरते हैं. शोभन बुद्धि वाले सोम धाराओं के रूप में नीचे
गिरते हैं. जिस प्रकार धुले हुए कपड़े से कोई वस्तु ढक दी जाती है, उसी प्रकार गाएं अपने
श्वेत दूध से चमू नामक पात्र में रखे हुए सोम को ढकती हैं. (३)
स नो देवेभिः पवमान रदेन्दो रयिमश्विनं वावशानः.
रथिरायतामुशती पुरन्धिरस्मद्र्य१शा दावने वसूनाम्.. (४)
हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम देवों के साथ मिलकर हमें धन दो. हे सोम! तुम देवों की
अभिलाषा करते हुए हमें अश्व वाला धन दो. हम रथस्वामी लोगों की अभिलाषा करने वाली
सोम की बुद्धि अनेक प्रकार का धन देने के लिए हमारे सामने आवे. (४)
नू नो रयिमुप मास्व नृवन्तं पुनानो वाताप्यं विश्वश्चन्द्रम्.
प्र वन्दितुरिन्दो तार्यायुः प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात्.. (५)
हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम हमारे लिए शीघ्र संतानयुक्त धन दो, जल को सबका
आनंददाता बनाओ व स्तोता की आस्था बढ़ाओ. हे बुद्धि द्वारा धन प्राप्त करने वाले सोम!
जल्दी हमारे यज्ञ की ओर आओ. (५)
सूक्त—९४ देवता—पवमान सोम
अधि यदस्मिन्वाजिनीव शुभः स्पर्धन्ते धियः सूर्ये न विशः.
अपो वृणानः पवते कवीयन्व्रजं न पशुवर्धनाय मन्म.. (१)
जिस समय सोम को घोड़े के समान सजाया जाता है एवं सोम की किरणें सूर्य की
किरणों के समान उत्पन्न होती हैं, उस समय उंगलियां परस्पर होड़ लगाकर सोम का रस
निचोड़ती हैं. स्तोताओं की इच्छा करने वाले सोम जलों को ढकते हुए इस प्रकार पात्र में
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गिरते हैं, जिस प्रकार ग्वाला पशुओं को पुष्ट बनाने के लिए गोशाला में जाता है. (१)
द्विता व्यूर्णवन्नमृतस्य धाम स्वर्विदे भुवनानि प्रथन्त.
धियः पिन्वानाः स्वसरे न गाव ऋतायन्तीरभि वावश्र इन्दुम्.. (२)
सोम जल धारण करने वाले अंतरिक्ष को अपने तेज से दो भागों में बांटते हुए उनके
बीच से जाते हैं. सर्वज्ञ सोम के लिए भुवन विस्तृत हो जाते हैं. दूध देने वाली गाएं जिस प्रकार
गोशाला में रंभाती हैं, उसी प्रकार प्रसन्न करने वाली एवं यज्ञ की अभिलाषा करने वाली
स्तुतियां यज्ञ में सोम को पुकारती हैं. (२)
परि यत्कविः काव्या भरते शूरो न रथो भुवनानि विश्वा.
देवेषु यशो मर्ताय भूषन्कक्षाय रायः पुरुभूषु नव्यः.. (३)
बुद्धिमान् सोम जब स्तोत्रों की ओर जाते हैं, तब वे शूर के रथ के समान विविध प्रकार
का गमन करते हैं. सोम देवों का धन स्तोता को देते हैं. सोम अपने द्वारा दिए गए धन की
वृद्धि के लिए अनेक यज्ञशालाओं में स्तुति के विषय बनते हैं. (३)
श्रिये जातः श्रिय आ निरियाय श्रियं वयो जरितृभ्यो दधाति.
श्रियं वसाना अमृतत्वमायन्भवन्ति सत्या समिथा मितद्रौ.. (४)
सोम संपत्ति देने के लिए उत्पन्न होते हैं. सोम धन देने के लिए लताओं से निकलते हैं.
सोम स्तोताओं को अन्न एवं आयु देते हैं. सोम से संपत्ति प्राप्त करके स्तोतागण अमर बन गए
हैं. सोम के उत्पन्न होने पर युद्ध सफल होते हैं. (४)
इषमूर्जमभ्य१र्षाश्वं गामुरु ज्योतिः कृणुहि मत्सि देवान्.
विश्वानि हि सुषहा तानि तुभ्यं पवमान बाधसे सोम शत्रून्.. (५)
हे सोम! हमें अन्न, ओज, अश्व व गाय दो, हमारे लिए प्रकाश का विस्तार करो एवं देवों
को संतुष्ट करो. हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम्हारे लिए राक्षस पराजेय हैं. तुम सभी शत्रुओं को
नष्ट करो. (५)
सूक्त—९५ देवता—पवमान सोम
कनिक्रन्ति हरिरा सृज्यमानः सीदन्वनस्य जठरे पुनानः.
नृभिर्यतः कृणुते निर्णिजं गा अतो मतीर्जनयत स्वधाभिः.. (१)
भली प्रकार निचोड़े जाने वाले एवं हरे रंग के सोम बार-बार शब्द करते हैं तथा छानते
हुए द्रोणकलश के भीतर बैठकर शब्द करते हैं. ऋत्विजों द्वारा पकड़े गए सोम गाय के दूध
आदि को ढकते हुए अपना आकार प्रकट करते हैं. हे स्तोताओ! ऐसे सोम के लिए हव्यों के
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साथ स्तुतियां अर्पित करो. (१)
हरिः सृजानः पथ्यामृतस्येयर्ति वाचमरितेव नावम्.
देवो देवानां गुह्यानि नामाविष्कृणोति बर्हिषि प्रवाचे.. (२)
मल्लाह जिस प्रकार नाव को आगे बढ़ाता है, उसी प्रकार निर्मित होते हुए एवं हरे रंग
वाले सोम यज्ञ की उपयोगी वाणी को प्रेरित करते हैं. दीप्तिशाली सोम यज्ञ में स्तोता के
सामने देवों के छिपे हुए रूप को प्रकट करते हैं. (२)
अपामिवेोर्मयस्तर्तुराणाः प्र मनीषा ईरते सोममच्छ.
नमस्यन्तीरुप च यन्ति सं चा च विशन्त्युशतीरुशन्तम्.. (३)
जैसे पानी की लहरें जल्दी उठती हैं, उसी प्रकार देव स्तुति के लिए शीघ्रता करने वाले
स्तोता के मन की स्वामिनी स्तुतियों को सोम की ओर भेजते हैं. सोम को नमस्कार करने
वाली स्तुतियां सोम के पास जाती हैं. अभिलाषा करने वाली स्तुतियां अभिलाषा वाले सोम में
प्रविष्ट होती हैं. (३)
तं मर्मृजानं महिषं न सानावंशुं दुहन्त्युक्षणं गिरिष्ठाम्.
तं वावशानं मतयः सचन्ते त्रितो बिभर्ति वरुणं समुद्रे.. (४)
ऋत्विज् मसले जाते हुए, भैंसे के समान ऊंचे स्थान पर स्थित, अभिलाषापूरक एवं
निचुड़ने के लिए पत्थरों के बीच में रखे हुए सोम को दुहते हैं. स्तुतियां अभिलाषा करने वाले
सोम की सेवा करती हैं. तीन स्थानों में स्थित इंद्र शत्रुनिवारक सोम को शत्रुवध के लिए
अंतरिक्ष में धारण करते हैं. (४)
इषन्वाचमुपवक्तेव होतुः पुनान इन्‍दो वि ष्या मनीषाम्.
इन्द्रश्च यत्क्षयथः सौभगाय सुवीर्यस्य पतयः स्याम.. (५)
हे सोम! अध्वर्यु जिस प्रकार होता को प्रोत्साहित करता है, उसी प्रकार तुम शुद्ध होते
हुए अपनी बुद्धि को उन्हें धन देने की ओर लगाओ. जब तुम और सोम यज्ञ में साथ-साथ
रहो, तब हम सौभाग्य वाले हों एवं शोभन संतान वाले धन के अधिपति हों. (५)
सूक्त—९६ देवता—पवमान सोम
प्र सेनानीः शूरो अग्रे रथानां गव्यन्नेति हर्षते अस्य सेना.
भद्रान्कृण्वन्निन्द्रहवान्त्सखिभ्य आ सोमो वस्त्रा रभसानि दत्ते.. (१)
सेनापति एवं शूर सोम शत्रुओं की गाएं पाने की इच्छा करते हुए युद्ध में रथों के आगे
जाते हैं. इससे सोम की सेना प्रसन्न होती है. सोम इंद्र के आहवानों को अपने मित्र यजमानों
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के लिए कल्याणकारी बनाते हुए दूध आदि ग्रहण करते हैं. दूध आदि इंद्र के शीघ्र आगमन के
कारण हैं. (१)
समस्य हरिं हरयो मृजन्त्यश्वह्यैरनिशितं नमोभिः.
आ तिष्ठति रथमिन्द्रस्य सखा विद्वाँ एना सुमतिं यात्यच्छ.. (२)
उंगलियां हरे रंग वाले सोम का रस निचोड़ती हैं. सोम अपनी व्याप्त एवं नमित बनाने
वाली किरणों के साथ दशापवित्र रूप असंस्कृत रथ में बैठते हैं. इसके बाद इंद्र के मित्र एवं
विद्वान् सोम दशापवित्र से चलकर उत्तम स्तुतियों वाले स्तोता के पास पहुंचते हैं. (२)
स नो देव देवताते पवस्व महे सोम प्सरस इन्द्रपानः.
कृण्वन्नपो वर्षयन्द्यामुतेमामुरोरा नो वरिवस्या पुनानः.. (३)
हे दीप्तिशाली एवं इंद्र के पीने योग्य सोम! तुम देवों द्वारा विस्तृत हमारे यज्ञ में इंद्र के
उत्तम पान के लिए निचुड़ो. हे जल उत्पन्न करने वाले, द्यावा-पृथिवी को वर्षा से भिगाने वाले,
विस्तृत अंतरिक्ष से आते हुए एवं विशुद्ध होते हुए सोम! तुम धन आदि देकर हमारी सेवा
करो. (३)
अजीतयेऽहतये पवस्व स्वस्तये सर्वतातये बृहते.
तदुशन्ति विश्व इमे सखायस्तदहं वश्मि पवमान सोम.. (४)
हे सोम! हमारी विजय, अविनाश, अहिंसा एवं यज्ञ के लिए हमारे सामने आओ. मेरे
सब मित्र तुम्हारी रक्षा चाहते हैं. हे पवमान सोम! मैं भी तुम्हारी रक्षा चाहता हूं. (४)
सोमः पवते जनिता मतीनां जनिता दिवो जनिता पृथिव्याः.
जनिताग्नेर्जनिता सूर्यस्य जनितेन्द्रस्य जनितोत विष्णोः.. (५)
स्तुतियों, द्युलोक, पृथ्वी, अग्नि, सूर्य, इंद्र एवं विष्णु को उत्पन्न करने वाले सोम शुद्ध
होते हैं. (५)
ब्रह्मा देवानां पदवीः कवीनामृषिर्विप्राणां महिषो मृगाणाम्.
श्येनो गृध्राणां स्वधितिर्वनानां सोमः पवित्रमत्येति रेभन्.. (६)
ऋत्विजों के ब्रह्मा, कवियों की पदरचना करने वाले, बुद्धिमानों के ऋषि, जंगली
जानवरों के भैंसे, पक्षियों के बाज एवं अस्त्रों के स्वधिति सोम शब्द करते हुए दशापवित्र से
पार जाते हैं. (६)
प्रावीविपद्वाच ऊर्मिं न सिन्धुर्गिरः सोमः पवमानो मनीषाः.
अन्तः पश्यन्वूजनेमावराण्या तिष्ठति वृषभो गोषु जानन्.. (७)
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शुद्ध होते हुए सोम लहरों वाली नदी के समान मन से उत्पन्न स्तुतियों को प्रेरित करते हैं.
जल बरसाने वाले एवं गायों को जानने वाले सोम छिपी हुई वस्तुओं को देखते हुए दुर्बलों
द्वारा निवारण न करने योग्य बल का सहारा लेते हैं. (७)
स मत्सरः पृत्सु वन्वन्नवातः सहस्ररेता अभि वाजमर्ष.
इन्द्रायेन्दो पवमानो मनीषं१ शोरूर्मिमी Couch? -> wait, let me write exact Devanagari:
इन्द्रायेन्दो पवमानो मनीषं१ शोरूर्मिमी Couch -> No: इन्द्रायेन्दो पवमानो मनीषं१ शोरूर्मिमी Couch?
Let's transcribe line by line precisely:

शुद्ध होते हुए सोम लहरों वाली नदी के समान मन से उत्पन्न स्तुतियों को प्रेरित करते हैं.
जल बरसाने वाले एवं गायों को जानने वाले सोम छिपी हुई वस्तुओं को देखते हुए दुर्बलों
द्वारा निवारण न करने योग्य बल का सहारा लेते हैं. (७)
स मत्सरः पृत्सु वन्वन्नवातः सहस्ररेता अभि वाजमर्ष.
इन्द्रायेन्दो पवमानो मनीषं१ शोरूर्मिमी Couch? No: इन्द्रायेन्दो पवमानो मनीष

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अव द्रोणानि घृतवान्ति सीद मदिन्तमो मत्सर इन्द्रपानः.. (१३)
हे नशीले रस से युक्त एवं यज्ञस्वामी सोम! तुम जल में रहते हुए भेड़ के बालों से बने
दशापवित्ररूप ऊंचे स्थान पर छनो. हे अत्यंत मादक, इंद्र के पीने योग्य एवं नशीले सोम! तुम
जलों के साथ द्रोणकलश में ठहरो. (१३)
वृष्टिं दिवः शतधारः पवस्व सहस्रसा वाजयुर्देववीतौ.
सं सिन्धुभिः कलशे वावशानः समुस्रियाभिः प्रतिरन्न आयुः.. (१४)
हे अनेक धाराओं वाले, यज्ञ में यजमानों को हजारों धन देने वाले एवं यजमानों के अन्न
की अभिलाषा करने वाले सोम! तुम आकाश से वर्षा करो एवं हमारी आयु को बढ़ाते हुए
द्रोणकलश में जल एवं गोदुग्ध से मिलो. (१४)
एष स्य सोमो मतिभिः पुनानोऽत्यो न वाजी तरतीदरातीः.
पयो न दुग्धमदितेरिषिरमुर्विंव गातुः सुयमो न वोळ्हा.. (१५)
सोम स्तोत्रों के साथ शुद्ध किए जाते हैं एवं गतिशील अश्व के समान शत्रुओं को
लांघकर जाते हैं. वे गाय के दूध के समान शुद्ध, विस्तृत मार्ग के समान आश्रय योग्य एवं
बोझा ढोने वाले घोड़े के समान स्तोताओं के नियंत्रण में रहते हैं. (१५)
स्वायुधः सोतृभिः पूयमानोऽभ्यर्ष गुह्यं चारु नाम.
अभि वाजं सप्तिरिव श्रवस्याऽभि वायुमभि गा देव सोम.. (१६)
हे शोभन आयुध वाले एवं ऋत्विजो द्वारा शुद्ध किए जाते हुए सोम! तुम अपने छिपे हुए
एवं सुंदर रसात्मक रूप को धारण करो. हमें जब अन्न की अभिलाषा हो, तब तुम हमें अन्न
दो. हे सोमदेव! तुम हमें जीवन एवं गाएं दो. (१६)
शिशुं जज्ञानं हर्यतं मृजन्ति शुम्भन्ति वह्निं मरुतो गणेन.
कविर्गीर्भिः काव्येना कविः सन्त्सोमः पवित्रमत्येति रेभन्.. (१७)
मरुद्गण शिशु के समान स्थित, उत्पन्न एवं सबके द्वारा अभिलषित सोम को मसलते हैं
तथा फलवाहक सोम को अपने सात गणों द्वारा सुशोभित करते हैं. मेधावी एवं कविकर्म
द्वारा कवि कहलाने वाले सोम शब्द करते हुए एवं स्तुतियां सुनते हुए दशापवित्र को लांघकर
जाते हैं. (१७)
ऋषिमना य ऋषिकृत्स्वर्षाः सहस्रणीथः पदवीः कवीनाम्.
तृतीयं धाम महिषः सिषासन्त्सोमो विराजमनु राजति ष्टुप्.. (१८)
ऋषियों के समान मन से सब कुछ देखने वाले, सबके द्रष्टा, सबको प्राप्त होने वाले,
हजारों के द्वारा प्रशंसित, कवियों की शब्दरचना पूर्ण करने वाले एवं परमपूज्य सोम द्युलोक
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में रहने की अभिलाषा करते हैं तथा प्रशंसित होकर दीप्तिशाली इंद्र को प्रकाशित करते हैं.
(१८)
चमूषच्छ्येनः शकुनो विभृत्वा गोविन्दुर्द्रप्स आयुधानि बिभ्रत्.
अपामूर्मिं सचमानः समुद्रं तुरीयं धाम महिषो विवक्ति.. (१९)
चमू नामक पात्रों में वर्तमान, प्रशंसायोग्य, शक्तिशाली, पात्रों में विहार करने वाले,
यजमानों को गाय प्राप्त कराने वाले, आयुधधारणकर्त्ता, जल के प्रेरक, समुद्र की सेवा
स्वीकार करने वाले एवं महान् सोम चतुर्थ धाम अर्थात् चंद्रलोक का सेवन करते हैं. (१९)
मर्याे न शुभ्रस्तन्वं मृजानोऽत्यो न सृत्वा सनये धनानाम्.
वृषेव यूथा परि कोशमर्षन्कनिक्रदच्चम्वो३रा विवेश.. (२०)
अलंकृत शरीर वाले मनुष्य के समान अपने शरीर को शुद्ध करते हुए, धन पाने के लिए
गतिशील घोड़े के समान चलने वाले, गोसमूह से मिलने वाले बैल के समान शब्द करने वाले
एवं पात्र में जाते हुए सोम शब्द करते हुए बार-बार चमू नामक पात्रों पर बैठते हैं. (२०)
पवस्वेन्दो पवमानो महोभिः कनिक्रदत्परि वाराण्यर्ष.
क्रीळञ्चम्वो३रा विश पूयमान इन्द्रं ते रसो मदिरो ममत्तु.. (२१)
हे सोम! ऋत्विजों द्वारा शुद्ध होकर टपको एवं बार-बार शब्द करते हुए भेड़ के बालों से
बने दशापवित्र में जाओ. तुम क्रीड़ा करते हुए चमू नामक पात्रों में प्रवेश करो. तुम्हारा नशीला
रस इंद्र को प्रमुदित करे. (२१)
प्रास्य धारा बृहतीरसृग्रन्क्तो गोभिः कलशाँ आ विवेश.
साम कृण्वन्सामन्यो विपश्चित्क्रन्दन्नेत्यभि सख्युर्न जामिम्.. (२२)
सोम की बड़ी-बड़ी धाराएं निर्मित की जाती हैं. गाय के दूध, दही आदि से मिलकर सोम
द्रोणकलशों में प्रवेश करते हैं. सामगान में कुशल एवं सब जानने वाले सोम साममंत्रों को गाते
हुए इस प्रकार पात्रों में जाते हैं, जिस प्रकार लंपट मनुष्य अपने मित्र की पत्नी के पास जाता
है. (२२)
अपघ्नन्नेषि पवमान शत्रून्प्रियां न जारो अभिगीत इन्दुः.
सीदन्वनेषु शकुनो न पत्वा सोमः पुनानः कलशेषु सत्ता.. (२३)
हे शुद्ध होते हुए व स्तोताओं द्वारा प्रशंसित सोम! तुम शत्रुओं का नाश करते हुए इस
प्रकार आते हो, जिस प्रकार यार अपनी प्रेयसी के पास जाता है. जिस प्रकार उड़ने वाला
पक्षी वनवृक्षों पर बैठता है, उसी प्रकार सोम कलशों में स्थित होते हैं. (२३)
आ ते रुचः पवमानस्य सोम योषेव यन्ति सुदुघाः सुधाराः.
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सूक्त—९७ देवता—पवमान सोम

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हरिरानीतः पुरुवारो अप्स्वचिक्रदत्कलशे देवयूनाम्.. (२४)
हे शुद्ध होते हुए सोम! पुत्र के निमित्त दूध पिलाने वाली स्त्रियों के समान यजमानों के
लिए धन देने वाली एवं शोभन धाराओं वाली दीप्तियां पात्रों में जाती हैं. हरे रंग वाले,
ऋत्विजों द्वारा लाए गए एवं अनेक जनों द्वारा वरण करने योग्य सोम जल में एवं देवाभिलाषी
यजमानों के घर में बार-बार शब्द करते हैं. (२४)
सूक्त—९७ देवता—पवमान सोम
अस्य प्रैषा हेमना पूयमानो देवो देवेभिः समपृक्त रसम्.
सुतः पवित्रं पर्येति रैभन्मितेव सद्म पशुमान्ति होता.. (१)
प्रेरणा करने वाले, स्वर्ण द्वारा शुद्ध होते हुए एवं दीप्तिशाली सोम अपना रस देवों के
साथ संयुक्त करते हैं. निचोड़ते हुए सोम शब्द करके उसी प्रकार दशापवित्र की ओर जाते हैं.
जिस प्रकार ऋत्विज् यजमान के भली प्रकार बने हुए एवं पशुयुक्त यज्ञगृह में जाता है. (१)
भद्रा वस्त्रा समन्या३ वसानो महान्कविर्निवचनानि शंसन्.
आ वच्यस्व चम्वोः पूयमानो विचक्षणो जागृविर्देववीतौ.. (२)
हे सोम! तुम कल्याणकारक, संग्राम में हितकारी एवं आच्छादक तेज को धारण करने
वाले हो. तुम महान्, कवि, स्तोत्रों की प्रशंसा करने वाले, सबके विशेष द्रष्टा एवं जागरणशील
हो. तुम यज्ञ में चमू नामक पात्रों में प्रवेश करो. (२)
समु प्रियो मृज्यते सानो अव्ये यशस्तरो यशसां क्षैतो अस्मे.
अभि स्वर धन्वा पूयमानो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (३)
यश पाने वालों में परम यशस्वी, धरती पर उत्पन्न एवं प्रिय सोम ऊंचे तथा भेड़ के बालों
से बने दशापवित्र पर शुद्ध किए जाते हैं. हे सोम! शुद्ध होते हुए अंतरिक्ष में भली प्रकार शब्द
करो एवं कल्याणकारक साधनों से सदा हमारी रक्षा करो. (३)
प्र गायताभ्यर्चाम देवान्त्सोमं हिनोत महते धनाय.
स्वादुः पवाते अति वारमव्यमा सीदति कलशं देवयुर्नः.. (४)
हे स्तोताओ! सोम की भली-भांति स्तुति करो, देवों की पूजा करो एवं महान् धन पाने
के लिए सोम को प्रेरित करो. स्वादिष्ट सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर छनते हैं एवं
देवाभिलाषी बनकर द्रोणकलश में जाते हैं. (४)
इन्दुर्दैवानामुप सख्यमायन्त्सहस्रधारः पवते मदाय.
नृभिः स्तवानो अनु धाम पूर्वमगन्निन्द्रं महते सौभगाय.. (५)
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