ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1502 of 1855
Read in contextये सोम गाय के दूध, दही व हजारों अन्नों को लक्ष्य करके दशापवित्र के छेदों से छनते
हुए महान् अन्न और अमृत के लिए इस प्रकार शुद्ध किए जाते हैं, जिस प्रकार सेना को
जीतने वाला घोड़ा नहलाया जाता है. (५)
परि हि ष्मा पुरुहूतो जनानां विश्वासरूद्धोजना पूयमानः.
अथा भर श्येनभृत प्रयांसि रयिं तुञ्जानो अभि वाजमर्ष.. (६)
बहुतों द्वारा बुलाए हुए एवं शुद्ध होते हुए सोम मनुष्यों को सभी भोज्य अन्न देते हैं. हे
बाज के द्वारा लाए हुए सोम! हमें अन्न एवं धन दो तथा अन्नरूपी रस की ओर जाओ. (६)
एष सुवानः परि सोमः पवित्रे सर्गो न सृष्टो अधावदर्वा.
तिग्मे शिशानो महिषो न शृङ्गे गा गव्यन्नभि शूरो न सत्वा.. (७)
ये निचुड़ते हुए एवं टपकने वाले सोम छोड़े हुए घोड़े के समान दशापवित्र की ओर
दौड़ते हैं. सोम अपने सींगों को तेज करने वाले भैंसे के समान एवं गाय चाहने वाले शूर के
समान दौड़ते हैं. (७)
एषा ययौ परमादन्तरद्रेः कूचित्सतीरूर्वे गा विवेद.
दिवो न विद्युत्स्तनयन्त्यभ्रैः सोमस्य ते पवत इन्द्र धारा.. (८)
सोमरस की यह धारा ऊंचे स्थान से पात्र की ओर जाती है. इसी धारा ने पणियों द्वारा
छिपाई हुई गायों को प्राप्त किया था. हे इंद्र! बिजली के समान शब्द करने वाली यह
सोमधारा तुम्हारे लिए ही गिरती है. (८)
उत स्म राशिं परि यासि गोनामिन्द्रेण सोम सरथं पुनानः.
पूर्वीरिषो बृहतीर्जीरदानो शिक्षा शचीवस्तव ता उपष्टुत्.. (९)
हे शुद्ध होते हुए सोम! तुमने इंद्र के साथ एक रथ पर बैठकर पणियों द्वारा चुराई हुई
गायों को प्राप्त किया था. हे शीघ्र फलदाता सोम! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमें विशाल
धन दो. हे अन्नयुक्त सोम! सारा अन्न तुम्हारा है. (९)
सूक्त—८८ देवता—पवमान सोम
अयं सोम इन्द्र तुभ्यं सुन्वे तुभ्यं पवते त्वमस्य पाहि.
त्वं ह यं चकृषे त्वं ववृष इन्दुं मदाय युज्याय सोमम्.. (१)
हे इंद्र! यह सोम तुम्हारे लिए निचोड़े और छाने जाते हैं. तुम इन्हें पिओ. तुम जिस सोम
को बनाते हो व वरण करते हो, उसीको मदप्राप्ति और सहायता के लिए पिओ. (१)
स ईं रथो न भुरिषाळयोजि महः पुरूणि सातये वसूनि.
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