पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
३४ पञ्चदशी
शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध ये आकाशादि पाँचों भूतों
के गुण हैं । इन आकाशादियों में क्रम से एक दो तीन चार तथा
पाँच गुण हैं ।
प्रतिध्वनिर्वियच्छब्दो वायौ वीसीति शब्दनम् ।
अनुष्णाशीतसंस्पर्शो वह्नौ भुगुभुगुध्वनिः ॥३॥
उष्णः स्पर्शः प्रभारूपं जले बुलबुलध्वनिः ।
शीतः स्पर्शः शुक्लरूपं रसो माधुर्यमीरितम् ॥४॥
भूमौ कडकडाशब्दः काठिन्यं स्पर्श इष्यते ।
नीलादिकं चित्ररूपं मधुराम्लादिको रसः ॥५॥
सुरभीतरगन्धौ द्वौ गुणाः सम्यग्विवेचिताः ।
आकाश में प्रतिध्वनि नाम का शब्द ही एक गुण है । वायु
में 'वी सी' ऐसा शब्द तथा अनुष्णाशीत [ न गरम न ठण्डा ]
स्पर्श ये दो गुण हैं । वह्नि में 'भुगुभुगु' शब्द, उष्ण स्पर्श तथा
भास्वर रूप ये तीन गुण हैं । जल में 'बुलबुल' शब्द, शीतस्पर्श,
शुक्लरूप, तथा मधुर रस, ये चार गुण हैं । पृथिवी में 'कडकडा'
शब्द, कठिन स्पर्श, नीलादि चित्ररूप, मधुराम्लादि रस, तथा
सुरभि असुरभि गन्ध, ये पाँच गुण हैं। यहाँ तक गुणों का विवे-
चन समाप्त हुआ ।
श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा घ्राणं चेन्द्रियपंचकम् ॥६॥
कर्णादिगोलकस्थं तच्छब्दादिग्राहकं क्रमात् ।
सौक्ष्म्यात् कार्यानुमेयं तत् प्रायो धावेद्बहिर्मुखम् ॥७॥
श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा तथा घ्राण ये पाँच इन्द्रियाँ क्रम
से कान आदि छिद्रों में रहती हैं । और शब्दादि गुणों को ग्रहण
किया करती हैं। [क्योंकि] वे इन्द्रियाँ
[header] पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ३५ [/header]
बनी हैं इसलिये ] इतनी सूक्ष्म हैं कि दिखाई नहीं पड़तीं ।
केवल [ उनके ] कार्य से ही इन का अनुमान किया जा सकता
है। ये इन्द्रियाँ प्रायः करके बहिर्मुख हो जाती हैं और बाह्य विषय
समूह में ही दौड़ लगाया करती हैं।
कदाचित् पिहिते कर्णे श्रूयते शब्द आन्तरः ।
प्राणवायौ जाठराग्नौ जलपानेऽन्नभक्षणे ॥८॥
व्यज्यन्ते ह्यान्तराः स्पर्शा मीलने चान्तरं तमः ।
उद्गारे रसगन्धौ चेत्यक्षाणामान्तरग्रहः ॥९॥
[ पहले श्लोक में जो कि इन्द्रियों को प्रायः बहिर्मुख बताया
गया है उस प्रायः का तात्पर्य यह है कि ] कभी कान को बन्द
कर लेने पर प्राणवायु तथा पेट की अग्नि का आन्तर शब्द भी
सुनाई पड़ा करता है ॥८॥ जल पीते समय तथा अन्न खाते
समय अन्दर के स्पर्श भी प्रतीत हुआ करते हैं। उद्गार [ डकार ]
आने पर तो अन्दर के रस तथा गन्ध दोनों ही ग्रहण में आते
हैं। इस प्रकार इन्द्रियाँ अन्दर के विषयों का ग्रहण भी किया
करती हैं।
पञ्चोक्त्यादानगमनविसर्गानन्दकाः क्रियाः ।
कृषिवाणिज्यसेवाद्याः पञ्चस्खन्तर्भवन्ति ते ॥१०॥
वचन, आदान, गमन, विसर्ग तथा आनन्द ये पाँच क्रिया
प्रसिद्ध ही हैं। खेती, वाणिज्य तथा सेवा आदि दूसरी क्रियायें भी
इन्हीं पाँच क्रियाओं में अन्तर्भूत हो जाती हैं। [इसलिये मुख्य
क्रिया पाँच ही हैं ]
वाक्पाणिपादपायूपस्थैरक्षैस्तत्तत्क्रियाजनिः ।
मुखादिगोलकेष्वास्ते तत् कर्मेंन्द्रियपंचकम् ॥११॥
३६ पञ्चदशी
वाक्, पाणि, पाद, पायु तथा उपस्थ नाम की इन्द्रियों से उन
उन क्रियाओं की उत्पत्ति होती हैं। इन क्रियाओं के द्वारा ही इन
कर्मेन्द्रियों का अनुमान होता है। मुख, कर, चरण, गुदा तथा उपस्थ
नाम के गोलकों में ये पाँचों कर्मेन्द्रियाँ निवास किये रहती हैं।
मनो दशेन्द्रियाध्यक्षं हृत्पद्मगोलके स्थितम् ।
तच्चान्तःकरणं, बाह्येष्वस्वातन्त्र्याद्दिनेन्द्रियैः ॥१२॥
अक्षैश्चार्थापिंतेष्वेतद् गुणदोषविचारकम् ।
सत्वंरजस्तमश्चास्य गुणा, विक्रियतं हि तैः ॥१३॥
इन दसों इन्द्रियों का प्रेरक मन तो हृदय के पद्माकार गोलक
में रहता है। उसको अन्तःकरण अर्थात् अन्दर की इन्द्रिय कहते
हैं। क्योंकि वह इन्द्रियों के बिना बाह्य विषयों में स्वतन्त्र नहीं
होता ॥१२॥ इन्द्रियों को जब विषयों में भेज दिया जाता है तब
यह मन उन विषयों के गुण दोष का विचार किया करता है [कि
यह विषय अच्छा है या बुरा] सत्व, रज तथा तम ये तीनों इस
मन के गुण हैं। क्योंकि इन गुणों के कारण यह मन विकार को
प्राप्त होता [बदलता] रहता है। [इन तीनों गुणों के कारण वैराग्य
काम तथा निद्रा आदि अनेक वृत्तियां उत्पन्न हो जाती हैं और
मन को विकृत कर देती हैं]
वैराग्यं क्षान्तिरौदार्यमित्याद्याः सत्वसंभवाः ।
कामक्रोधौ लोभयत्नावित्याद्या रजसोत्थिताः ॥१५॥
आलस्यभ्रान्तितन्द्राद्या विकारास्तमसोत्थिताः ।
सात्विकैः पुण्यनिष्पत्तिः पापोत्पत्तिश्च राजसैः ॥१६॥
तामसैर्नोभयं किन्तु वृथायुः क्षपणं भवेत् ।
अत्राहंप्रत्ययी कर्तेत्येवं लोकव्यवस्थितिः ॥१७॥
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ३७
वैराग्य, क्षमा, उदारता इत्यादि मनोविकार सत्व गुण के
हैं। काम, क्रोध, लोभ, तथा यत्न आदि विकार रजोगुण से उत्पन्न
हो जाते हैं ॥१४॥ आलस्य, भ्रान्ति तथा तन्द्रा आदि विकार
तमोगुण से उठा करते हैं। सात्विक विकारों से पुण्य की निष्पत्ति
होती है। राजस विकारों से पाप की उत्पत्ति होती है ॥१५॥
तामस विकारों से पुण्य या पाप कुछ भी नहीं होता। किन्तु व्यर्थ
ही आयु के दिन कट जाते हैं। इन सब [ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों,
प्राणों तथा अन्तःकरणों] में से 'मैं' भाव करने वाले को 'कर्ता'
अर्थात् प्रभु [मालिक] कहा जाता है। क्योंकि लोक में भी कार्य
करने वाले को ही प्रभु कहा जाता है।
स्पष्टशब्दादियुक्तेषु भौतिकत्वमतिस्फुटम् ।
अक्षादावपि तच्छास्त्रयुक्तिभ्यामवधार्यताम् ॥१७॥
जिन वस्तुओं में शब्दस्पर्शादि गुण स्पष्ट ही दीख रहे हैं वे तो
स्पष्ट ही भौतिक हैं। जो इन्द्रियां दृष्टिगोचर नहीं होती हैं, उनके
भौतिक होने का निश्चय शास्त्र तथा युक्ति से कर लेना चाहिये।
'अन्नमयं हि सोम्य मनः आपोमयः प्राणः तेजोमयी वाक्'
मन अन्न से बना है, प्राण जलमय है, वाणी अग्निमयी है इत्यादि
शास्त्र से इन्द्रियों का भौतिक होना सिद्ध होता है। जब हम बहुत
दिनों तक नहीं खाते तब मन आदि सभी इन्द्रियां अपना अपना
कार्य करने में असमर्थ हो जाती हैं, जब फिर खाने लगते हैं तब
फिर हरी-भरी हो जाती हैं, इस युक्ति से भी मन आदि इन्द्रियों
का भौतिक होना सिद्ध होता है।
एकादशेन्द्रियैर्युक्त्या शास्त्रेणाप्यवगम्यते ।
यावत्किञ्चिद्भवेदेतदिदंशब्दोदितं जगत् ॥१८॥
३८ पञ्चदशी
'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' अद्वितीय ब्रह्म का प्रतिपादन
करने वाली इस श्रुति के 'इदं' शब्द का अर्थ इस श्लोक में बताया
गया है कि ग्यारह इन्द्रियों से, युक्तियों से, शास्त्रों से तथा अर्था-
पत्ति आदि प्रमाण ज्ञानों से, जितना भी कुछ जगत् जाना जाता
है, वह सब का सब इस श्रुतिवाक्य के 'इदं' शब्द का ही अर्थ है।
इदं सर्वं पुरा सृष्टेरेकमेवाद्वितीयकम् ।
सदेवासीन्नामरूपे नास्तामित्यारुणेर्वचः ॥१९॥
उद्दालक आरुणि ने (छा०२-१ में) यह बात कही है कि
सृष्टि के उत्पन्न होने से पहले यह सब जगत् जो दीख रहा है
इस रूप में नहीं था। किन्तु उस समय एक अद्वितीय सद्वस्तु ही
थी। उस समय नाम या रूप [आकार] कुछ भी नहीं था।
वृक्षस्य स्वगतो भेदः पत्रपुष्पफलादिभिः ।
वृक्षान्तरात् सजातीयो विजातीयः शिलादितः ॥२०॥
तथा सद्वस्तुनो भेदत्रयं प्राप्तं निवार्यते ।
ऐक्यावधारणद्वैतप्रतिषेधैस्त्रिभिः क्रमात् ॥२१॥
वृक्ष का 'स्वगतभेद' पत्र फूल फल आदि से होता है। दूसरे
वृक्षों से 'सजातीय भेद' रहता है। पत्थर आदि से 'विजातीय
भेद' होता है। उसी तरह सद्वस्तु में प्राप्त हुए सजातीय, विजा-
तीय तथा स्वगत भेद का निवारण क्रम से ऐक्य, अवधारण,
तथा द्वैत का प्रतिषेध करने वाले 'एकम्', 'एव', 'अद्वितीयम्'
ये तीनों पद कर रहे हैं।
इस श्रुति में जो 'एकम्' 'एव' 'अद्वितीयम्' ये तीन पद हैं
वे सद्वस्तु में के तीनों भेदों का निवारण करते हैं। लोक में तीन
प्रकार का भेद होता है एक 'स्वगत' दूसरा 'सजातीय' तीसरा
‘विजातीय’। वृक्ष का स्वगत भेद अपने ही पत्ते फूल फल आदियों
से होता है। आम्र वृक्ष का सजातीय भेद अपने सजातीय
शिंशपा वृक्ष से होता है तथा उसी का विजातीय भेद पत्थर
आदि से होता है ॥२०॥ अन्यान्य पदार्थों में पाया जाने वाला
इस तरह का एक भी भेद इस सद्वस्तु में नहीं है। इन तीनों
तरह के भेद को हटाने के लिये ही इस श्रुति ने ये तीन पद कहे
हैं। वस्तुत्व रूपी समानता को देख कर अन्यान्य पदार्थों के
समान ही सद्रूप आत्मवस्तु में भी जब स्वगतादि तीनों भेदों की
प्रसक्ति होती है तब स्वगत भेद को ‘एकम्’ यह पद हटाता है,
सजातीय भेद को ‘एव’ यह पद दूर कर देता है, तथा विजातीय
भेद को ‘अद्वितीयम्’ यह तीसरा पद रहने नहीं देता।
सतो नावयवाः शङ्क्यास्तदंशस्यानिरूपणात् ।
नामरूपे न तस्यांशौ तयो रद्याप्यनुद्भवात् ॥२१॥
सद्वस्तु के भी अवयव होते हों, ऐसी शंका मत करना
क्योंकि उसके अंश का निरूपण हो ही नहीं सकता। नाम
और रूप [आकार] भी उसके अंश नहीं हैं। क्योंकि अभी तक
अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति के प्रथम तक, वे नाम रूप उत्पन्न
नहीं हो पाये हैं।
स्वगत-भेद मान सकने के लिये जिन अवयवों की आवश्य-
कता होती है वे अवयव तो सद्वस्तु में होते ही नहीं। क्योंकि उसके
अवयवों के स्वरूप का निरूपण—कि वे कैसे हैं—आज तक नहीं
हो सका है। यदि नाम रूप को उसके अंश मानो तो जब कि
अभी तक सृष्टि ही उत्पन्न नहीं हुई है तब ये सृष्टिकाल में होने
वाले नामरूप उस समय की शुद्ध सद्वस्तु के अंश कैसे हो ज़ायेंगे ?
४० पञ्चदशी
नामरूपोद्भवस्यैव सृष्टित्वात् सृष्टितः पुरा ।
न तयोरुद्भवस्तस्मान्निर्शं सद्यथा वियत् ॥२३॥
नाम तथा रूप का उद्भव हो जाना यही तो 'सृष्टि' कहाती
है। बस इसी से समझ लो कि सृष्टि से प्रथम नाम और रूप
की उत्पत्ति नहीं हुई थी। इस से यही निष्कर्ष निकलता है कि
सद्धस्तु आकाश के समान निरवयव पदार्थ ही है -- अर्थात् उसके
अन्दर 'स्वगतभेद' को गुंजाइश है ही नहीं।
सदन्तरं सजातीयं न वैलक्ष्ण्यवर्जनात् ।
नामरूपोपाधिभेदं विना नैव सतो भिदा ॥२४॥
विलक्षणता न होने से इस सत् की जाति का दूसरा कोई
सत् पदार्थ होता होगा यह भी नहीं माना जाता। नामरूप नाम
की उपाधि के भेद के विना सत् पदार्थ में तो भेद है ही नहीं।
सत् की जाति का ही दूसरा कोई सत् पदार्थ होता होगा
इस बात को कैसे मान लिया जाय ? क्योंकि इस दूसरे सत्
पदार्थ में इस सत् पदार्थ से कुछ विलक्षणता तो होती ही नहीं।
इस में स्वयं भी कुछ विलक्षणता नहीं होती । जो भी कुछ
विलक्षणता देख पड़ती है वह सब नामरूप की उपाधियों के
भिन्न भिन्न होने से ही है। सद्धस्तु में स्वभाव से आकाश के
समान कोई भी भेद नहीं है । जैसे कि आकाश में स्वतः तो
कोई भी भेद नहीं है परन्तु घट मथरूम उपाधियों के भेद से
उसमें भेद की भ्रान्त प्रतीति होने लगती है ।
विजातीयमसत् तच्च न खल्वस्तीति गम्यते ।
नास्यातः प्रतियोगित्वं विजातीयाद्भिदा कुतः ॥२५॥
सत् का विजातीय जो कोई पदार्थ होगा वह तो असत्
[Header] पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ४१
ही होगा। असत् शब्द ही से यह प्रतीत होता है कि वह पदार्थ
है ही नहीं। इस कारण यह असत् पदार्थ तो उसका प्रतियोगी
[सम्बन्धी] हो ही नहीं सकता। फिर बताओ कि विजातीय
वस्तु से भी सद्वस्तु में भेद कैसे आयेगा ?
एकमेवाद्वितीयं सत् सिद्धमत्र तु केचन ।
विह्वला असदेवेदं पुरासीदित्यवर्णयन् ॥२६॥
इस प्रकार यहां तक यह सिद्ध हो गया कि सत् एक ही
अद्वितीय वस्तु है- [उस में स्वगत, सजातीय तथा विजातीय
किसी प्रकार का भी भेद नहीं है] परन्तु इस सद्वस्तु के विषय
में भी किन्हीं विह्वल [उन्मार्गगामी] पुरुषों ने यह कहा है कि
यह सब पहले असत् ही था अर्थात् था ही नहीं।
मग्नस्याब्धौ यथाक्षाणि विह्वलानि तथास्य धीः ।
अखण्डैकरसं श्रुत्वा निःप्रचारा बिभेत्यतः ॥२७॥
समुद्र में डूबे हुए पुरुष की इन्द्रियां जैसे व्याकुल हो
(घबरा) जाती हैं, इसी प्रकार इस अविचारशील असद्वादी का
मन, अखण्डैकरस वस्तु को सुन कर, निःप्रचार [गतिरहित]
होकर डरा करता है। [साकार वस्तु में जैसे मन चक्कर लगाया
करता है, समुद्र के समान अखण्ड एकरस वस्तु में वैसा विच-
रण करना नहीं मिलता। यही कारण है कि अपनी दुर्वासनावश
वे लोग इस सद्वस्तु को सुन कर चौंक उठते हैं।]
गौडाचार्या निर्विकल्पे समाधावन्ययोगिनाम् ।
साकारब्रह्मनिष्ठाना मत्यन्तं भयमूचिरे ॥२८॥
गौडाचार्य ने यह बात कही है कि इस निर्विकल्प समाधि में दूसरे
साकार ब्रह्म के उपासक योगियों को बहुत ही भय लगा करता है।
४२ पञ्चदशी
निर्जन वन में भय का कोई भी कारण न होने पर, वहां
की सुनसान परिस्थिति से, जैसे अबोध बालक डरा करता है,
इसी प्रकार निर्विकल्प समाधि के शान्त वायुमण्डल से ही दूसरे
योगियों को भय मालूम होने लगता है। उनका उस में जी नहीं
लगता।
अस्पर्शयोगो नामैष दुर्दर्शः सर्वयोगिभिः ।
योगिनो बिभ्यति ह्यस्मादभये भयदर्शिनः ॥२९॥
गौडपादाचार्य के शब्द ये हैं कि—यह जो अस्पर्श योग नाम
की निर्विकल्पसमाधि है, साकार ब्रह्म का ध्यान करने वाले किसी
भी योगी को इस के दर्शन नहीं हो पाते। क्योंकि वे सभी प्रकार
के भेददर्शी योगी लोग [निर्जन वन में बालकों की तरह] इस
भयशून्य समाधि में भय को देखते हैं [किंवा भय के कारण की
कल्पना कर लेते हैं] और इस अस्पर्श योग से डरा करते हैं।
भगवत्पूज्यपादाश्च शुष्कतर्कपटूनमून् ।
आहुर्माध्यमिकान् भ्रान्तानचिन्त्येऽस्मिन् सदात्मनि ॥३०॥
भगवत्पूज्यपाद शंकराचार्य जी ने तो इन सूखे तर्ककुशल
माध्यमिक बौद्धों के विषय में यह कहा है कि ये लोग अचिन्त्य
सदात्मा के विषय में सदा ही भ्रान्त बने रहते हैं। [इन्हें यह
तत्व कभी भी समझ नहीं पड़ेगा।]
अनादृत्य श्रुतिं मौर्थ्यादिमे बौद्धास्तमस्विनः ।
आपेदिरे निरात्मत्व मनुमानैकचक्षुषः ॥३१॥
भगवत्पूज्यपाद के शब्द ये हैं कि—ये तमोगुणी बौद्ध लोग
अपनी बेसमझी से, श्रुति की परवाह न कर के, निरात्मवाद को
मान बैठे हैं। क्योंकि उन्होंने शास्त्र को छोड़कर, अनुमान
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ४३
को ही अपनी आंख बना लिया है [ अनुमान से जो बात सिद्ध
हो जाती है उसे ही ये मानते हैं ]
शून्यमासीदिति ब्रूषे सद्योगं वा सदात्मताम् ।
शून्यस्य न तु तद्युक्तमुभयं व्याहतत्वतः ॥३२॥
हे असद्वादी ! अच्छा तू यह बता कि जब तू 'शून्य था' यह
कहता है तब क्या तू शून्य के साथ सत्ता [ होने ] का योग
मानता है ? या शून्य को सदात्मा ही मान लेता है ? परन्तु
व्याघात होने से शून्य में तो ये दोनों ही बातें युक्त नहीं हैं [ न तो
शून्य के साथ सत्ता का सम्बन्ध ही हो सकता है और न शून्य
कभी सद्रूप ही हो सकता है ]
न युक्तस्तमसा सूर्यो नापि चासौ तमोमयः ।
सच्छून्ययो विरोधिस्वा च्छून्यमासीत् कथं वद ॥३३॥
जैसे अन्धकार से न तो सूर्य युक्त ही हो सकता है और न
वह सूर्य कभी तमोमय ही हो सकता है। इसी प्रकार सत् और
शून्य का विरोध होने से शून्यवादी यह बताये कि 'शून्य-था'
यह असंगत बात संगत कैसे होगी ?
वियदादे र्नामरूपे मायया सुविकल्पिते ।
शून्यस्य नामरूपे च तथा चेज्जीव्यतां चिरम् ॥३४॥
[ यदि शून्यवादी यह कहता हो कि ] आकाशादि के नाम-
रूप जैसे माया से [ निर्विकल्प ब्रह्म में ] कल्पित कर लिये गये
हैं, इसी प्रकार शून्य के भी नाम और रूप [सद्वस्तु में ही] कल्पित
कर लिये गये हैं, तो हम कहेंगे कि ऐसा कहने वाला बौद्ध जुग
जुग जिये । क्योंकि वह तो अपने भ्रामक सिद्धान्त से गिर गया
है और उसे तत्त्व का परिज्ञान हो गया है ।]
वेदान्त मत में जब आकाश आदि सभी जगत् मिथ्या है फिर
'आकाश है' इत्यादि रूप में उसमें सत्ता कहां से आयी ? इस प्रश्न का
उत्तर यह है कि अधिष्ठान का धर्म अध्यस्त पदार्थों में प्रतीत हुआ
करता है, रस्सी की सत्ता सांप में प्रतीत हो जाती है, यदि उसी तरह
की शून्य की भी सत्ता मानते हो तो हमें कुछ कहना नहीं है ।
सतोऽपि नामरूपे द्वे कल्पिते चेत्तदा वद ।
कुत्रेति निरधिष्ठानो न भ्रमः क्वचिदीक्ष्यते ॥३५॥
यदि शून्यवादी यह कहता हो कि ऐसे तो सत् के भी नाम
और रूप दोनों ही कल्पित हैं, तो वह बताये कि सत् के नाम
रूप किस में कल्पित हैं ? क्योंकि बिना अधिष्ठान का भ्रम
तो कहीं भी नहीं देखा जाता ।
सदासीदिति शब्दार्थभेदे द्वैगुण्यमापतेत् ।
अभेदे पुनरुक्तिः स्यान्मैवं लोके तथेक्षणात् ॥३६॥
'असदेवेदमग्र आसीत्' इस में जैसे शून्यावादी के पक्ष में
व्याघात दोष बताया गया है इसी प्रकार 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्'
इस वाक्य में भी तो यह एक बड़ा दोष है। क्योंकि जब कहा
जाता है कि 'सत् आसीत्=सत् था' तब हम पूछते हैं कि 'सत्
आसीत्' इन दोनों शब्दों का अर्थ भिन्न भिन्न है या नहीं ? यदि
कहो कि अर्थ भिन्न है तब तो विगुणता आजाती है [अथवा यों
कहो कि अद्वैतवाद फिर कहाँ ठहरता है !] यदि अर्थ को अभिन्न
[एक] ही माना जाय तो पुनरुक्ति दोष आता है । पूर्वपक्षी का
यह सब कथन ठीक नहीं है । क्योंकि ऐसे वाक्यों में कभी भी
पुनरुक्ति दोष नहीं माना जाता । लोक में ऐसे [समानार्थक] शब्दों
का प्रयोग बार बार देखा ही जाता है ।
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ४५
कर्तव्यं कुरुते, वाक्यं ब्रूते, धार्यस्य धारणम् ।
इत्यादिवासनाविष्टं प्रत्यासीत् सदितीरणम् ॥३७॥
देखो, 'कर्तव्य को करता है' 'वाक्य को बोलता है,' 'धार्य
को धारण करता है' इत्यादि समानार्थक दो दो शब्दों का
प्रयोग करने की वासना जिन [अधिकारियों] के मन में बैठी
हुई है उनसे [उनके ही मुहावरे में] श्रुति ने यह कह दिया है कि
उस समय सत् ही था ।
कालाभावे पुरेत्युक्तिः कालवासनया युतम् ।
शिष्यं प्रत्येव, तेनात्र द्वितीयं नहि शंक्यते ॥३८॥
[आसीत् का मतलब है भूतकाल में विद्यमान होना] जब
कि काल नाम का कोई सत्य पदार्थ नहीं है, फिर 'अग्रेआसीत्=
पहले था' यह कथन काल की वासना से युक्त शिष्य के लिये
किया गया है [द्वैत वासनाओं से दबे हुए श्रोताओं को समझाना
ही तो श्रुति का अभिप्राय है। वे श्रोता जैसी टूटी फूटी अधूरी
भाषा में बोलने के आदी हैं, उसी भाषा में श्रुति ने उनके हित
की बात उनसे कह दी है।] इस मुहावरे के कारण द्वितीय के
होने की शंका नहीं की जा सकती ।
चोद्यं वा परिहारो वा क्रियतां द्वैतभाषया ।
अद्वैतभाषया चोद्यं नास्ति नापि तदुत्तरम् ॥३९॥
आक्षेप या परिहार द्वैत की बोली में ही तो किया जा
सकता है। [व्यवहार दशा के रहते रहते ही 'चोद्य' या 'परिहार'
आदि करना चाहिये] । अद्वैत [की नीरव भाषा] में तो
न कुछ आक्षेप ही बनता है और न उसका कुछ उत्तर ही
होता है ।
४६ पञ्चदशी
तदा स्तिमितगम्भीरं न तेजो न तमस्ततम् ।
अनाख्यमनभिव्यक्तं सत् किंचिदवशिष्यते ॥४०॥
तब स्तिमित और गम्भीर तेज और तम से भिन्न, व्यापक
अकथनीय और अप्रकट सत् नाम का कुछ पदार्थ शेष रह
जाता है।
स्मृति में भी कहा है कि तब स्तिमित [निश्चल] तथा गम्भीर
[अज्ञेय] जिसको मन से भी नहीं जान सकते, जिसको न तेज
ही कह सकते हैं और न तम ही कहते बनता है, किन्तु जो इन
दोनों ही से विलक्षण सर्वत्र व्यापक तत्त्व है; वह अनाख्य
और अनभिव्यक्त तत्त्व है। उसका न तो शब्दों से कथन हो
सकता है और न वह चक्षु आदि इन्द्रियों से व्यक्त ही
होता है। वह सत् अर्थात् शून्य से विलक्षण है। इसी से कहते
हैं कि ऐसा ही कुछ तत्त्व—जिसके विषय में कुछ भी शब्द
कहा नहीं जा सकता—शेष रह जाता है। तात्पर्य यह है कि
सम्पूर्ण द्वैत का निषेध करते करते, निषेध की अवधि के रूप
में जो तत्त्व शेष रह जाता है—जिसका निषेध हो ही नहीं
सकता—जिसका निषेध करने का साहस करते ही निषेध
भी नहीं रहता—उस समय शेष रहे, हुए ऐसे तत्त्व को
जान लो।
ननु भूम्यादिकं माभूत् परमाण्वन्तनाशतः ।
कथं ते वियतोऽसत्त्वं बुद्धिमारोहतीति चेत् ॥४१॥
अब पूर्वपक्षी यह प्रश्न करता है कि—परमाणुपर्यन्त पदार्थों
का नाश हो जाने से भूमि, जल, अग्नि और वायु न रहें, यह
तो हम मान सकते हैं। किन्तु नित्य आकाश का असत्त्व (न
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ४७
रहना) तुम्हारी समझ में कैसे आ जाता है ? यह तो हमारी
समझ में नहीं आता ।
अत्यन्तं निर्जगद्व्योम यथा ते बुद्धिमाश्रितम् ।
तथैव सन्निराकाशं कुतो नाश्रयते मतिम् ॥४२॥
सिद्धान्ती दृष्टान्त देकर उत्तर देता है कि-जैसे तेरी बुद्धि
को यह समझ पड़ता है कि कभी यह आकाश सम्पूर्ण जगत्
से रहित हो सकता है [जगत् न रह कर आकाश ही आकाश
रह जाता है] इसी प्रकार तू ज़रा और ऊपर क्यों नहीं चढ़ जाता ?
यह बात तेरी समझ में क्यों नहीं आ जाती कि इस सद्वस्तु
में तो आकाश तत्व भी नहीं है ? निराकाश सत् पदार्थ को तू
क्यों नहीं समझ लेता है। [जैसे बिना जगत् का आकाश हो
सकता है, इसी प्रकार बिना आकाश की सद्वस्तु भी हो सकती है।]
निर्जगद्व्योम दृष्टं चेत् प्रकाशतमसी विना ।
क्व दृष्टं किंच ते पक्षे न प्रत्यक्षं वियत् खलु ॥४३॥
यदि तू कहे कि मैंने बिना जगत् का आकाश देखा है इसी
से मैं आकाश को निर्जगत् मान लेता हूं, तो हम पूछते हैं कि
प्रकाश या अन्धकार के बिना तुम ने अकेले आकाश को कहां
देखा है ? इनके बिना तो आकाश कभी रहता ही नहीं। एक
और भी बात है कि तुम्हारे मत में तो आकाश का प्रत्यक्ष दर्शन
होता ही नहीं है । ऐसा कहते हुए तुम तो अपसिद्धान्ती हो
जाते हो।
सद्वस्तु शुद्धं त्वस्माभि र्निश्चितैरनुभूयते ।
तूष्णीं स्थितौ, न शून्यत्वं शून्यबुद्धेश्च वर्जनात् ॥४४॥
का भी तो दर्शन आकाश के समान ही नहीं होता है क्योंकि] हम
राजयोगी लोग चुपचाप बैठकर जब निश्चिन्त हो गये होते हैं
तब उस शुद्ध सद्वस्तु का अनुभव किया ही करते हैं। मौन हो
जाने के समय, और किसी की प्रतीति न होने से शून्य ही रह
गया है, ऐसा मानना ठीक नहीं। क्योंकि शून्य को भी तो शून्य
की प्रतीति नहीं हो सकती ? इस कारण वह प्रतीत होने वाला
जो पदार्थ है वह शून्य नहीं हो सकता। वह तो सद्वस्तु ही है।
'निश्चिन्तैः' के स्थान पर “निश्चिन्तैः” पाठ प्रतीत होता है।
इस में ध्यान देने की बात यह है कि सम्पूर्ण दृश्यों को
छोड़ चुकने के बाद गम्भीर विचार करें तो शून्यावस्था की प्रतीति
होने लगती है और इस शून्य अवस्था से प्रायः साधक लोग
घबरा जाते हैं। इस में उन का जी नहीं लगता। परन्तु ऐसे समय
अत्यन्त सावधान हो कर इस शून्य अवस्था का ज्ञान कराने वाले
ज्ञानरूप साक्षी आत्मा तक पहुँचना चाहिये। इस शून्य में ही
नहीं रुक जाना चाहिये। इस शून्य तथा इस शून्य को पहचानने
वाले साक्षी में राजहँस की तरह विवेक कर लेना चाहिये। इस
साक्षी को यदि आप भुला डालेंगे तो अवश्य ही शून्य ही शून्य
दिखाई देगा। जो आत्मा नहीं है वह शून्य तो है ही। परन्तु आप
ध्यान रक्खें कि शून्य को तो शून्य का ज्ञान हो ही नहीं सकता।
इस शून्य का ज्ञान जिस को हो रहा है, वही तो हम राज-
योगियों की प्यारी सद्वस्तु है।
सद्बुद्धिरपि चेन्नास्ति मास्त्वस्य खप्रभत्वतः ।
निर्मनस्कत्वसाक्षित्वात् सन्मात्रं सुगमं नृणाम् ॥४५॥
यदि कहो कि समाधि अवस्था में तो सद्बुद्धि भी नहीं रह
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ४९
जाती है [उस समय तो यह भी खयाल नहीं रहता है कि सत्
नाम की भी कोई वस्तु इस संसार में है] तो इसका समाधान
यह है कि यदि उस समय सद्बुद्धि नहीं रहती है तो भले ही न
रहे। यह सत् तत्व तो एक स्वयंप्रकाश पदार्थ है। उस के विषय
की बुद्धि न रहने पर भी उस का ज्ञान होने की रीति यह है कि]
वह सद्वस्तु तो उस समय [समाधि अवस्था] की निर्मनस्कस्थिति
का साक्षी है। इस कारण सन्मात्र वस्तु का परिज्ञान होना मनुष्यों
को बड़ा ही, सुगम है। निर्मनस्क अवस्था को जो जानता रहता
है वही सद्वस्तु है।
मनोजृम्भणराहित्ये यथा साक्षी निराकुलः ।
मायाजृम्भणतः पूर्वं सत्तथैव निराकुलम् ॥४६॥
मनोव्यापार जब नहीं होते, तब जैसे साक्षी [आत्मा]
निराकुल होता है, इसी प्रकार [सृष्टि की उत्पत्ति से पहले] जब
माया का जृम्भण ही नहीं हो पाया था—यह सद्वस्तु भी निरा-
कुल ही थी यह बात जानी जा सकती है।
निस्तत्त्वा कार्यगम्यास्य शक्तिर्मायाग्निशक्तिवत् ।
न हि शक्तिः क्वचित् कैश्चिद् बुध्यते कार्यतः पुरा ॥४७॥
पृथक् तत्व रहित तथा कार्यों को देखकर ही पहचानने योग्य
जो इस सद्वस्तु की शक्ति किंवा सामर्थ्य है उस को ही 'माया'
कहते हैं। वह माया ऐसी है जैसी अग्नि की शक्ति। क्योंकि कहीं
भी कोई शक्ति को कार्य की उत्पत्ति से प्रथम नहीं जान सकता।
[अब माया का लक्षण बताया जाता है कि जगत् के कारण
सद्वस्तु से पृथक् जो कोई भी तत्व नहीं होती है तथा आकाशादि
कार्यों को देखकर ही जिस का अनुमान कर सकते हैं, आकाशादि
५० पञ्चदशी
कार्यों को उत्पन्न करने वाली सद्वस्तु की ऐसी शक्ति किंवा ऐसे
सामर्थ्य को ही तो 'माया' कहते हैं। अग्नि की शक्ति जैसे अग्नि
से पृथक् कोई तत्व नहीं होती है, अग्नि की शक्ति को जैसे उस
के दाहादि कार्यों को देखकर ही जान सकते हैं ऐसी ही यह माया
भी है । कार्यों के उत्पन्न हो जाने से पहले कोई भी कभी शक्ति
को पहचान नहीं सकता है । ]
न सद्वस्तु सतः शक्ति र्न हि वन्हेः स्वशक्तिता ।
सद्विलक्षणतायां तु शक्तेः किं तत्त्व मुच्यताम् ॥४८॥
वह सत् की शक्ति, सद्वस्तु ही हो, यह नहीं हो सकता देखते
हैं कि वह्नि स्वयं अपनी शक्ति नहीं होती। उसको सत् से विल-
क्षण किसी तरह की मानने पर तो शक्ति का स्वरूप बताना चाहिये
कि वह कैसा होगा ?
[ वह शक्ति यद्यपि कार्यरूपी लिंग से जानी जाती है, परन्तु
वह असल में निस्तत्त्वरूप ही है । यह बात इन दो श्लोकों में सिद्ध
की गई है । वह शक्ति भी कोई दूसरी सद्वस्तु ही हो, तब तो सत् से
भिन्न हो जाने के कारण, उस की शक्ति नहीं हो सकती, क्योंकि
देखते हैं कि अग्नि ही अग्नि की शक्ति नहीं होती है । यदि उसको
सत् से विलक्षण तत्त्व मानोगे तो शक्ति का स्वरूप बताना चाहिये
कि वह कैसा होगा ? ]
शून्यत्वमिति चेच्छून्यं मायाकार्यमितीरितम् ।
न शून्यं नापि सद्यादृक् तादृक् तत्वमिहेष्यताम् ॥४९॥
यदि उस शक्ति का रूप शून्य को बताया जाय तो शून्य तो
माया का कार्य ही है । यह बात इसी प्रकरण के चौंतीसवें श्लोक
में कही गयी है । इस कारण यही कहना पड़ता है कि वह माया
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५१
न तो शून्य ही है और न सत् ही है। ऐसा कोई सदसद्विलक्षण
तत्व अगर तुम समझ सकते हो तो वैसा तत्व ही माया को समझ
लो। उस माया का निर्वचन सत् और असत् इन दो शब्दों से
नहीं हो सकता है।
नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं किंत्वभूत्तमः।
सद्योगात्तमसः सत्वं न स्वत स्तन्निषेधनात् ॥५०॥
'तम आसीत्तमसा गूढमग्रे' इस श्रुति ने भी इस बात का अनु-
मोदन किया है। वह कहती है कि 'उस समय न तो सत् ही
था' और 'न असत् ही था'। किन्तु बस तम ही तम था। इस
सत् का योग हो जाने से ही तो उस तम में सत्ता आ गयी थी।
उस तम में स्वतः सत्ता नहीं थी। उसके सत् होने का तो इस
श्रुति ने अपने मुख से ही स्पष्ट निषेध कर डाला है।
अत एव द्वितीयत्वं शून्यवन्नहि गण्यते।
न लोके चैत्रतच्छक्त्यो र्जीवितं लिख्यते पृथक् ॥५१॥
इस सब का फलित यही हुआ कि क्योंकि माया की स्वतः
सत्ता [स्वतन्त्र सत्ता] मानी ही नहीं जाती है, इसलिये जैसे शून्य
को दूसरा पदार्थ नहीं माना जाता इसी प्रकार माया को भी
कोई दूसरा पदार्थ नहीं गिना जाता है। लोक में भी देखते हैं
कि चैत्र तथा उसकी शक्ति का पृथक् पृथक् उल्लेख कहीं नहीं
किया जाता। [चैत्र और चैत्र की शक्ति को कोई भी दो पदार्थ
नहीं गिनता है।]
शक्त्याधिक्ये जीवितं चेद् वर्धते तत्र वृद्धिकृत्।
न शक्तिः, किन्तु तत्कार्यं युद्धकृष्यादिकं तथा ॥५२॥
शक्ति की अधिकता होती है तो जीवन की वृद्धि पायी जाती
५२ पंचदशी
है। इस दृष्टान्त से शक्ति का जीवित [सत्ता] पृथक् मान लेना
ठीक नहीं है। क्योंकि शक्ति से किसी के जीवित की वृद्धि नहीं
होती है। किन्तु शक्ति के कार्य जो कुश्ती तथा खेती आदि हैं
उन से जीवन की वृद्धि हो जाती है। [इसी प्रकार प्रकृत में भी
समझ लेना चाहिये कि उस ब्रह्म में उसकी शक्ति के कारण
से द्वितीयपन (द्वैतभाव) नहीं आ जाता है।]
सर्वथा शक्तिमात्रस्य न पृथग्गणना क्वचित् ।
शक्तिकार्यं तु नैवास्ति द्वितीयं शङ्क्येत कथम् ॥५३॥
केवल शक्ति की तो पृथक् गणना [गिनती] कहीं होती ही नहीं।
यदि यह कहो कि शक्ति के कार्यों से ही उस ब्रह्म में सद्वितीयता
[द्वैतभाव] आ जायगी तो उसका उत्तर यह है कि उस समय
[सृष्टि की उत्पत्ति से प्रथम] तो शक्ति का कार्य भी कुछ नहीं था।
'फिर [उस समय] द्वितीय [दूसरे] के होने की शंका क्यों करते हो ?
प्रलय काल में ब्रह्म और उसकी शक्ति दोनों होते तो हैं,
परन्तु किसी की भी शक्ति की गिनती उससे पृथक् नहीं की
जाती है। सृष्टि बनने के बाद शक्ति के नाना कार्य हो तो जाते
हैं, परन्तु सृष्टि बनने के पीछे के कार्यों से, सृष्टि बनने से
प्रथम काल में, द्वितीयपन कैसे आ सकेगा ?
न कृत्स्नब्रह्मवृत्तिः सा शक्तिः किन्त्वेकदेशभाक् ।
घटशक्तिर्यथा भूमौ स्निग्धमृद्येव वर्तते ॥५४॥
ब्रह्म की वह शक्ति सम्पूर्ण ब्रह्म में नहीं रहती है। किन्तु
उस ब्रह्म के एक देश में ही रहती है। जिस प्रकार घड़ा मिट्टी
से बनता है, परन्तु घट को उत्पन्न करने की शक्ति केवल चिकनी
मिट्टी में ही रहती है।
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५३
पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्ति स्वयंप्रभः ।
इत्येकदेशवृत्तित्वं मायाया वदति श्रुतिः ॥५५॥
'पादोस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि' [यजुर्वेद ३१] ये सम्पूर्ण
भूत इसके एक चतुर्थांश में ही हैं। इसका तीन चौथाई भाग
तो अभी भी अमर और स्वयं प्रकाश ही है। यह श्रुति कह रही
है कि ब्रह्म की माया ब्रह्म के किसी एक देश में रहती है, सम्पूर्ण
में नहीं रहती।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ।
इति कृष्णोऽर्जुनायाह जगतस्त्वेकदेशताम् ॥५६॥
'विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्' [गीता १०-४२] मैं
इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंश से धारण किये हुए हूँ
यों कृष्ण भगवान ने भी अर्जुन के प्रति जगत् की एकदेशता .
का ही वर्णन किया है।
स भूमिं विश्वतो वृत्वा ह्यत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम् ।
विकारावर्ति चान्त्रास्ति श्रुतिसूत्रकृतोर्वचः ॥५७॥
'स भूमिं विश्वतो वृत्वा' [श्वे० ३-१४] यह मन्त्र तथा विकारावर्ति
यह वेदान्तसूत्र ब्रह्म के निर्माय स्वरूपको बता रहे हैं।
ब्रह्म का निर्माय स्वरूप भी है, इसमें प्रमाण की दर्कार हो तो
'स भूमिं विश्वतो वृत्वा ह्यत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्' उसने समस्त लोक
लोकान्तरों को चारों तरफ से लपेट लिया है, फिर भी वह उसके बाहर
दशाङ्गुल रह ही गया है' इस श्रुति ने तथा 'विकारावर्ति च तथा हि
स्थितिमाह' (ब्रह्मसूत्र ४-४-१९) विकारों में न रहनेवाला नित्य
मुक्त भी परमेश्वररूप है। केवल विकारों में रहनेवाला ही
परमेश्वररूप नहीं है। क्योंकि वेद ने स्वयं अपने श्रीमुख से