पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३८ पञ्चदशी
'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' अद्वितीय ब्रह्म का प्रतिपादन
करने वाली इस श्रुति के 'इदं' शब्द का अर्थ इस श्लोक में बताया
गया है कि ग्यारह इन्द्रियों से, युक्तियों से, शास्त्रों से तथा अर्था-
पत्ति आदि प्रमाण ज्ञानों से, जितना भी कुछ जगत् जाना जाता
है, वह सब का सब इस श्रुतिवाक्य के 'इदं' शब्द का ही अर्थ है।
इदं सर्वं पुरा सृष्टेरेकमेवाद्वितीयकम् ।
सदेवासीन्नामरूपे नास्तामित्यारुणेर्वचः ॥१९॥
उद्दालक आरुणि ने (छा०२-१ में) यह बात कही है कि
सृष्टि के उत्पन्न होने से पहले यह सब जगत् जो दीख रहा है
इस रूप में नहीं था। किन्तु उस समय एक अद्वितीय सद्वस्तु ही
थी। उस समय नाम या रूप [आकार] कुछ भी नहीं था।
वृक्षस्य स्वगतो भेदः पत्रपुष्पफलादिभिः ।
वृक्षान्तरात् सजातीयो विजातीयः शिलादितः ॥२०॥
तथा सद्वस्तुनो भेदत्रयं प्राप्तं निवार्यते ।
ऐक्यावधारणद्वैतप्रतिषेधैस्त्रिभिः क्रमात् ॥२१॥
वृक्ष का 'स्वगतभेद' पत्र फूल फल आदि से होता है। दूसरे
वृक्षों से 'सजातीय भेद' रहता है। पत्थर आदि से 'विजातीय
भेद' होता है। उसी तरह सद्वस्तु में प्राप्त हुए सजातीय, विजा-
तीय तथा स्वगत भेद का निवारण क्रम से ऐक्य, अवधारण,
तथा द्वैत का प्रतिषेध करने वाले 'एकम्', 'एव', 'अद्वितीयम्'
ये तीनों पद कर रहे हैं।
इस श्रुति में जो 'एकम्' 'एव' 'अद्वितीयम्' ये तीन पद हैं
वे सद्वस्तु में के तीनों भेदों का निवारण करते हैं। लोक में तीन
प्रकार का भेद होता है एक 'स्वगत' दूसरा 'सजातीय' तीसरा