पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ४३
को ही अपनी आंख बना लिया है [ अनुमान से जो बात सिद्ध
हो जाती है उसे ही ये मानते हैं ]
शून्यमासीदिति ब्रूषे सद्योगं वा सदात्मताम् ।
शून्यस्य न तु तद्युक्तमुभयं व्याहतत्वतः ॥३२॥
हे असद्वादी ! अच्छा तू यह बता कि जब तू 'शून्य था' यह
कहता है तब क्या तू शून्य के साथ सत्ता [ होने ] का योग
मानता है ? या शून्य को सदात्मा ही मान लेता है ? परन्तु
व्याघात होने से शून्य में तो ये दोनों ही बातें युक्त नहीं हैं [ न तो
शून्य के साथ सत्ता का सम्बन्ध ही हो सकता है और न शून्य
कभी सद्रूप ही हो सकता है ]
न युक्तस्तमसा सूर्यो नापि चासौ तमोमयः ।
सच्छून्ययो विरोधिस्वा च्छून्यमासीत् कथं वद ॥३३॥
जैसे अन्धकार से न तो सूर्य युक्त ही हो सकता है और न
वह सूर्य कभी तमोमय ही हो सकता है। इसी प्रकार सत् और
शून्य का विरोध होने से शून्यवादी यह बताये कि 'शून्य-था'
यह असंगत बात संगत कैसे होगी ?
वियदादे र्नामरूपे मायया सुविकल्पिते ।
शून्यस्य नामरूपे च तथा चेज्जीव्यतां चिरम् ॥३४॥
[ यदि शून्यवादी यह कहता हो कि ] आकाशादि के नाम-
रूप जैसे माया से [ निर्विकल्प ब्रह्म में ] कल्पित कर लिये गये
हैं, इसी प्रकार शून्य के भी नाम और रूप [सद्वस्तु में ही] कल्पित
कर लिये गये हैं, तो हम कहेंगे कि ऐसा कहने वाला बौद्ध जुग
जुग जिये । क्योंकि वह तो अपने भ्रामक सिद्धान्त से गिर गया
है और उसे तत्त्व का परिज्ञान हो गया है ।]