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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

'यह तो झूठी है' इस प्रकार हँस कर उसे छोड़ देना चाहता
है [इस दृष्टान्त से यह समझ लो कि—जब काम्य पदार्थ नहीं
रहता तब कामना भी नहीं होती] ।
आपातरमणीयेषु भोगेष्वेवं विचारवान् ।
नानुरज्यति, किन्त्वेतान् दोषदृष्ट्या जिहासति ॥१३८॥
ऊपर के दृष्टान्त के अनुसार जो माला, चन्दन, स्त्री आदि
भोग केवल देखने में ही रमणीक मालूम होते हैं, उनको आपात-
रमणीक समझ लेने वाला पुरुष, उनमें आसक्ति नहीं करता ।
किन्तु वह तो दोषों को देख कर इनको छोड़ देना ही चाहता है ।
अर्थानामर्जने क्लेशस्तथैव परिपालने ।
नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थान् क्लेशकारिणः ॥१३९॥
[विषयों के दोष तो ये हैं जिनको कि ज्ञानी देखा करता
है] सम्पत्ति के उपार्जन में साधारण कष्ट नहीं होता । उसकी
रक्षा करने में तो उससे भी अधिक दुःख भोगना पड़ जाता
है । वह सम्पत्ति जब अपनी आंखों के सामने नष्ट होती है या
व्यय होने लगती है तब उस दुःख को भी सभी जानते हैं ।
प्रत्येक अवस्था में दुःख देने वाले इन भोगों को धिक्कार ही है।
मांसपाञ्चालिकायास्तु यन्त्रलोलेऽङ्गपंजरे ।
स्नाय्वस्थिग्रन्थिशालिन्याः स्त्रियाः किमिव शोभनम् ॥१४०॥
नाड़ियों, हड्डियों और मांस के मोटे मोटे लोथड़ों वाली,
मांस की पुतली इस स्त्री के, यन्त्र की तरह के इस चंचल
शरीर रूपी पींजरे में खूबसूरत चीज़ ही क्या है ? [यही बात
विवेकी की समझ में नहीं आती] ।

तृप्तिदीपप्रकरणम् २७३

तृप्तिदीपप्रकरणम् २७३
एवमादिषु शास्त्रेषु दोषाः सम्यक् प्रपंचिताः ।
विमृशन्ननिशं तानि कथं दुःखेषु मज्जति ॥१४१॥
इत्यादि शास्त्रों में विषयों के दोषों को भले प्रकार सम-
झाया गया है । उन दोषों का विमर्श दिन रात करता हुआ
साधक, दुःखों में फँस ही कैसे सकता है ?
क्षुधया पीड्यमानोऽपि न विषं ह्यत्तुमिच्छति ।
मिष्टान्नध्वस्ततृड् जानन्नामूढस्तज्जिघत्सति ॥१४२॥
मूर्ख लोगों की बात हम नहीं कहते, किन्तु जो अमूढ हैं,
जिनकी तृष्णा एक बार मिष्टान्न भोजन से नष्ट हो चुकी है, वे
भूख से व्याकुल होने पर भी, 'यह विष है' यह जान लेने पर
उस विष को खाना नहीं चाहते ।
प्रारब्धकर्मप्राबल्याद्द्भोगेपिच्छा भवेद्यदि ।
क्लिश्यन्नेव तदाप्येष भुङ्क्ते विष्टिगृहीतवत् ॥१४३॥
प्रारब्ध कर्मों की प्रबलता से यदि ज्ञानी को भोगों की
इच्छा हो जाती है तो भी यह बेगार में पकड़े हुए मजदूरों की
तरह दुःखी होता हुआ ही, उन विषयों को भोगा करता है ।
[इच्छा होने पर भी वह कुछ चाव के साथ उन्हें नहीं भोगता]।
भुञ्जाना वा अपि बुधाः श्रद्धावन्तः कुटुम्बिनः ।
नाद्यापि कर्म नश्छिन्नमिति क्लिश्यन्ति सन्ततम् ॥१४४॥
लोक में देखते हैं कि—जो श्रद्धाशील गृहस्थी ज्ञानी होते
हैं, वे भोगों को भोगते हुए भी, सदा यही दुःख माना करते हैं,
कि ओहो ! अभी तक भी हमारे कर्म क्षीण नहीं हो पाये ।

है उसका चलते रहना उन्हें पसन्द नहीं रहता। वे अपनी विवेक

२७४ पञ्चदशी
है उसका चलते रहना उन्हें पसन्द नहीं रहता। वे अपनी विवेक
की आंख से उसको बन्द हुआ देखना चाहते हैं ]
नायं क्लेशोऽत्र संसारतापः किन्तु विरक्तता ।
भ्रान्तिज्ञाननिदानो हि तापः सांसारिकःस्मृतः ॥१४५॥
उनके इस अनुताप रूप क्लेश को सांसारिक दुःख नहीं
समझना चाहिए। क्योंकि यह तो उनकी विरक्तता है [संसार
की अनासक्ति के कारण वे ऐसा अनुताप किया करते हैं ] सांसा-
रिक ताप को तो आचार्यों ने भ्रान्ति ज्ञान से उत्पन्न होने वाला
कहा है [यह ताप तो विवेक ज्ञान से उत्पन्न हुआ करता है।
इस कारण यह वैसा हेय नहीं है]।
विवेकेन परिक्लिश्यन्नल्पभोगेन तृप्यति ।
अन्यथानन्तभोगेऽपि नैव तृप्यति कर्हिचित् ॥१४६॥
[ सांसारिक ताप और विरक्तता का भेद भी सुन लो ]
विवेक से परिक्लिष्ट होता हुआ [ज्ञानी] थोड़े से भोग से ही तृप्त
हो जाता है। [उन भोगों को दूर से ही नमस्कार कर लेता है]
विवेक के न होने पर तो अनन्त भोगों के भोग लेने पर भी
कभी तृप्त नहीं हो पाता [यों कामनाओं का निवर्तक होने से,
यह क्लेश तो विवेकमूलक ही है]।
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥१४७॥
यह कामना कभी भी कामों के भोग से शान्त नहीं होती।
यह [कामना] तो घी से आग की तरह विषयाहुति से उत्तरोत्तर
बढ़ती ही जाती है। [भाव यह है कि—विवेकी की तरह,
अविवेकी लोग भोगों से तृप्त नहीं हो सकते। ऐसी अवस्था में

तृप्तिदीपप्रकरणम् २७५

तृप्तिदीपप्रकरणम् २७५
विवेक को बेकार न समझना चाहिए। विवेकी लोगों में यह
विशेषता होती है कि वे शरीरयात्रा के लिए तो थोड़ा बहुत
भोगसंग्रह कर लेते हैं परन्तु व्यर्थ मनोरथों का जाल कभी
नहीं फैलाते। वे जब किसी भोग को भोगते हैं उस समय भी
उस भोग्य के अन्दर के आत्मतत्व को याद रखते हुए भोगते
हैं। यों वे भोगों को भोगते हुए भी भोगों में नहीं उलझते।
प्रत्युत भोगों को भोगर्तँ हुए भी उनका आत्मसाधन चलता है
और वे भोगों को भोगते हुए भी मुक्ति का मार्ग साफ़ करते
रहते हैं। यों उनकी भोगभूमि ही समाधि का अंग बन
जाती है।]
परिज्ञायोपभुक्तो हि भोगो भवति तृप्तये ।
विज्ञाय सेवितश्चोरो मैत्रीमेति न चोरताम् ॥१४८॥
[जो भोग विवेकमूलक होता है, उससे तृप्ति हो जाती है,
यह अनुभव से भी सिद्ध होता है। देखो कि] जान कर भोगा
हुआ भोग तृप्ति कर देता है। यह चोर है ऐसा जानकर सेवित
किया हुआ चोर, उसके लिए चोर नहीं रहता। वह तो उसका
मित्र बन जाता है।
यह भोग 'इतना है' 'इसकी सत्यता इतनी है' 'इतनी
कठिनाइयों से यह हमें मिलना है' यह सब समझ कर जब
किसी भोग को भोगा जाता है तब उससे तुरन्त ही तृप्ति हो
जाती है-उसे दूर से ही नमस्कार करने को जी चाहता है। लोक
में भी देखते हैं कि-यह चोर है ऐसा जान लेने पर, जब उस
चोर के साथ रहा जाता है तब वह चोर उस पुरुष के लिए
चोर नहीं रहता। किन्तु वह तो उसका मित्र बन जाता है।

२७६ पञ्चदशी
यों यद्यपि भोगों से तृष्णा की वृद्धि होती है परन्तु जब विवेक
नाम का साथी मिल जाता है तब उन भोगों से ही तृप्ति भी
होने लग जाती है ] ।
मनसो निगृहीतस्य लीलाभोगोऽल्पकोऽपि यः ।
तमेवालब्धविस्तारं क्लिष्टत्वाद् बहु मन्यते ॥१४९॥
[योगाभ्यास से] जिस मन का निग्रह कर लिया जाता है,
उस मन को जो थोड़ा सा भी लीलाभोग मिल जाता है, वह
मन, भोगों के दोषयुक्त होने के कारण, उसी संक्षिप्त (थोड़े से)
भोग को अधिक मान लेता है । अर्थात् थोड़े से ही तृप्ति मान
बैठता है ।
बद्धमुक्तो महीपालो ग्राममात्रेण तुष्यति ।
परैर्न बद्धो नाक्रान्तो न राष्ट्रं बहु मन्यते ॥१५०॥
देखते हैं कि—जिस राजा को कोई शत्रु क़ैद करके छोड़
देता है, तो फिर वह एकाध गांव को अपनी जीविका के लिए
लेकर ही सन्तुष्ट हो जाता है । परन्तु जिस राजा पर न तो
किसी ने कभी आक्रमण किया हो और न जो कभी किसी से
बांध लिया गया हो, वह तो समूचे राष्ट्र को भी कुछ नहीं
समझता ।
विवेके जाग्रति सति दोषदर्शनलक्षणे ।
कथमारब्धकर्मापि भोगेच्छां जनयिष्यति ॥१५१॥
नैष दोषो यतोऽनेकविधं प्रारब्धमीक्ष्यते ।
इच्छानिच्छा परेच्छा च प्रारब्धं त्रिविधं स्मृतम् ॥१५२॥
दोषदर्शन रूपी विवेक जब कि जाग रहा हो तब प्रारब्ध
कर्म भी भोग की इच्छा को कैसे उत्पन्न कर सकेगा ?

तृप्तिदीपप्रकरणम् २७७

तृप्तिदीपप्रकरणम् २७७
इच्छा का विघात करने वाला विवेकज्ञान तो भोगेच्छा को
उत्पन्न ही नहीं होने देगा] ऐसा कहना ठीक नहीं क्योंकि [दोष
दीखने पर भी इच्छाएँ पैदा होती हुई पाई जाती हैं] प्रारब्ध
कर्म अनेक प्रकार के पाये जाते हैं । एक इच्छा को पैदा करके
भोग देने वाला प्रारब्ध । दूसरा अनिच्छा के रहने पर भी भोग
देने वाला प्रारब्ध । तीसरा परेच्छा से भोग देने वाला प्रारब्ध ।
यों तीन प्रकार का प्रारब्ध माना जाता है । [ विवेक के पहरे
में भी भोगेच्छा कैसे हो जाती है ? इस प्रश्न को समझने के
लिए प्रारब्ध के इन तीन भेदों को समझ लेना आवश्यक है ] ।
अपथ्यसेविनश्चोरा राजदाररता अपि ।
जानन्त एव स्वानर्थ मिच्छन्त्यारब्धकर्मतः ॥१५३॥
अपथ्यसेवी,रोगी,चोर, तथा राजा की स्त्री से रमण करने
वाले, ये सभी अपने भावी अनर्थों को जानते हुए भी, आर-
ब्धकर्म के शासन [ प्रभाव ] में आकर वैसी वैसी उलटी
इच्छायें किया करते हैं ।
न चात्रैतद् वारयितु मीश्वरेणापि शक्यते ।
यत ईश्वर एवाह गीतायामर्जुनं प्रति ॥१५४॥
ईश्वर भी आये तो इन अपथ्यसेवन आदि की इच्छाओं
को रोक नहीं सकता । [ ये इच्छायें अपरिहार्य होती हैं । इसी
कारण इन इच्छाओं को प्रारब्ध का फल माना गया है ] ईश्वर
ने स्वयं अपने मुख से गीता में अर्जुन के प्रति यही बात कही
है कि ये इच्छायें अपरिहार्य होती हैं ।
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृते र्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥१५५॥

गीता में कहा है कि—पुरुप ज्ञानवान् भी हो, तो भी तो
वह अपनी प्रकृति के अनुरूप ही चेष्टा किया करता है [पहले
जन्मों में किए हुए धर्माधर्मों के जो संस्कार इस जन्म में
अभिव्यक्त हो जाते हैं, उन को ही 'प्रकृति' कहा जाता है। यह
तो अवस्था ज्ञानवान् लोगों की है। मूर्खों की तो बात ही मत
पूछो। इस कारण प्राणी तो अपनी अपनी प्रकृति की ओर को
ही दौड़ते हैं] भगवान् कहते हैं कि मैं या कोई और
आकर उन की प्रवृत्ति या निवृत्ति का निग्रह करने लगे तो भी
वह क्या कर सकेगा ? [ऐसा निग्रह करने से तो कुछ भी फल
नहीं होगा ।]
अवश्यंभाविभावानां प्रतीकारो भवेद् यदि ।
तदा दुःखैर्न लिप्येरन्नलरामयुधिष्ठिराः ॥१५६॥
अवश्यम्भावी जो दुःखादि भाव हैं, उन का यदि कोई
प्रतीकार हो सकता होता तो नल, राम, तथा युधिष्ठिर जैसे
महापुरुष उन विपत्तियों में कभी न फंसते ।
न चेश्वरत्वमीशस्य हीयते तावता यतः ।
अवश्यंभाविताप्येषाभीश्वरेणैव निर्मिता ॥१५७॥
प्रारब्ध को न हटा सकने से, ईश्वर का ईश्वरभाव नष्ट
नहीं हो जाता । क्योंकि इन दुःखों की आवश्यंभाविता भी तो
ईश्वर ने ही बनाई है। [इच्छा प्रारब्ध का वर्णन यहां तक
समाप्त हुआ]
प्रश्नोत्तराभ्यामेवैतद् गम्यतेऽर्जुनकृष्णयोः ।
अनिच्छापूर्वकं चास्ति प्रारब्धमिति तच्छृणु ॥१५८॥
अनिच्छापूर्वक प्रारब्ध भी होता है, यह बात तो अर्जुन

तृप्तिदीपप्रकरणम् २७९

तृप्तिदीपप्रकरणम् २७९
और कृष्ण के प्रश्नोत्तर से ही ज्ञात हो जाती है । अब आगे
इसी "अनिच्छाप्रारब्ध" का वर्णन सुन लो ।
अथ केन प्रयुक्तोयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वाष्र्णेय बलादिव नियोजितः ॥१५९॥
अर्जुन का प्रश्न यह है कि—हे श्रीकृष्ण ! यह पुरुष न
चाहने पर भी किस की प्रेरणा से पाप कर बैठता है ? मानों
किसी ने उस को ज़बरदस्ती उस पाप में लगाया हो ।
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥१६०॥
श्रीकृष्ण ने यह उत्तर दिया कि—यह जो कोई पदार्थ
पुरुष को प्रवृत्त करने वाला है वह रजोगुण से उत्पन्न हुआ
'काम' है। यही 'काम' कभी 'क्रोध' का रूप भी धारण कर लेता
है । यह काम 'महाशन' है [ इस की मांग बहुत ही बड़ी है ]
यही बड़े बड़े पापों की जननी है । इस कारण इस 'काम' को
अपना बैरी जानो । [ भाव यह है कि—प्रारब्ध के वश से
बढ़े हुए रजोगुण से, जब काम या क्रोध उत्पन्न हो जाते
हैं, तब ये ही पुरुष की प्रवृत्ति के कारण होते हैं। ऐसे स्थलों
पर प्रवृत्ति का मूल कारण इच्छा नहीं होती । स्वस्थ होने पर
जिस काम को करने की इच्छा तक नहीं होती काम और
क्रोध के वेग से वही काम प्राणी कर बैठता है । इसी से अनि-
च्छा प्रारब्ध सिद्ध होता है ]
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥१६१॥
हे कौन्तेय ! अपने स्वभावजकर्म से

२८० पञ्चदशी
कि अपने प्रारब्ध कर्म से ] जकड़ा हुआ तू जो कुछ करना
नहीं भी चाहता है उसे भी मोह के कारण बेबस होकर
करेगा [ इससे यही सिद्ध होता है कि अनिच्छा प्रारब्ध
भी मानना ही चाहिये । ]
नानिच्छन्तो न चेच्छन्तः परदाक्षिण्यसंयुताः ।
सुखदुःख्वे मजन्त्येतत् परेच्छापूर्वकर्म हि ॥१६२॥
न तो चाहते ही हैं, और न न चाहते ही हैं, किन्तु दूसरे
को खुश करने के विचार में फंस कर दूसरे की प्रीति के लिये
ही सुख दुःख भोगा करते हैं। यों सुखादि भोग देने वाला
'परेच्छाप्रारब्ध' होता है । दोष देख लेने पर भी ऐसे प्रारब्ध
का परिहार हो नहीं सकता । उस प्रारब्ध में जो कि इच्छा को
उत्पन्न करने का सामर्थ्य है उस को कोई हटा नहीं सकता । ]
कथं तर्हि किमिच्छन्नित्येवमिच्छा निषिध्यते ।
नेच्छानिषेधः किन्त्विच्छाबाधो भर्जितबीजवत् ॥१६३॥
उक्त रीति से जब तत्त्वज्ञानी लोग भी इच्छा करते हैं तब
फिर "आत्मानं चेद्विजानीयात्"(बृ०४-४।२)इस श्रुति में किमिच्छन्
किस वस्तु की इच्छा से— इस पद से इच्छा का अभाव क्यों
कहते हो ? इसका समाधान यह है कि—यह इच्छा का निषेध
नहीं है। किन्तु यह तो भुने हुए बीज की तरह इच्छा के बाध
का वर्णन है [ उसका तात्पर्य यही है कि—ज्ञानी में इच्छा
रहती तो है । परन्तु वह निर्वीर्य होती है । भुने हुए बीज में
जैसे उत्पादन का सामर्थ्य नहीं रहता,इसी प्रकार ज्ञानी की इच्छा
से समर्थ प्रवृत्ति पैदा नहीं होती ] ।

तृप्तिदीपप्रकरणम् २८१

तृप्तिदीपप्रकरणम् २८१
भर्जितानि तु बीजानि सन्त्यकार्यकराणि च ।
विद्वदिच्छा तथेष्टव्याऽसत्वबोधान्न कार्यकृत् ॥१६४॥
जैसे भुने हुए बीज,स्वरूप से बने तो रहते हैं,परन्तु वे अङ्कुर
आदि कार्यों को उत्पन्न नहीं कर सकते । इसी प्रकार विद्वान् की
इच्छा को मान लो—स्वयं चाहे विद्यमान् भी रहती हो, परन्तु
जिन पदार्थों की इच्छा वह करता है, असत् समझ लेने से,
उन पदार्थों की तो बाधा हो चुकी है, फिर ज्ञानी की वह इच्छा
व्यसन आदि कार्यों को उत्पन्न नहीं कर सकती । [उसकी वह
इच्छा मरी हुई होती है] ।
दग्धबीजमरोहेऽपि भक्षणायोपयुज्यते ।
विद्वदिच्छाप्यल्पभोगं कुर्यान्न व्यसनं बहु ॥१६५॥
भुना हुआ बीज यद्यपि उगता तो नहीं, परन्तु खाने के
काम तो आता ही है । इसी प्रकार विद्वान् की निर्वीर्य इच्छा
भी उसको थोड़ा सा भोग तो दे ही सकती है। बहुत से व्यसन
को उत्पन्न नहीं कर सकती। [तत्त्वज्ञानी लोग प्रारब्ध को भोगते
समय मनोरथों के क़िले नहीं बनाते हैं] ।
भोगेन चरितार्थत्वात् प्रारब्धं कर्म हीयते ।
भोक्तव्यसत्यताभ्रान्त्या व्यसनं तत्र जायते ॥१६६॥
भोग देकर चरितार्थ हो चुकने के कारण, प्रारब्ध कर्म तो
भोग देते ही नष्ट हो जाता है । [वह व्यसन को उत्पन्न नहीं
करता] । जब तो किसी को भोक्तव्य पदार्थों के सत्य होने का
भ्रम हो जाता है तब ही उस विषय में आगे को व्यसन उत्पन्न
होता है [भोगते समय जो सुख दुःख मिलते हैं वे तो पूर्व कर्मों
के किंवा प्रारब्ध के फल हैं। भोगते समय उन पदार्थों को सत्य
१८

१८२ पंचदशी
समझ कर उनके विषय में जो अनकें संकल्प उठते हैं, उनको
अपने पास बहुत दिनों तक ठहराने की जो इच्छा होती है, उससे
आगे के लिए हमारे मन में संस्कार रह जाते हैं। इन संस्कारों
से प्रभावित होकर फिर फिर भोगों को जुटाने के लिए कर्म
करते हैं और फिर फिर भोग आते हैं। यों शुद्ध भोग हमको
भोगना नहीं आता किन्तु भोगते समय ही उन भोगों को आगे
के लिए नौता दे देकर हम अज्ञानी लोग भोग और कर्म का
अनन्त चक्कर घुमा रहे हैं।]
मा विनश्यत्वयं भोगो वर्धतामुत्तरोत्तरम् ।
मा विघ्नाः प्रतिबध्नन्तु धन्योऽस्म्यस्मादिति भ्रमः ॥१६७॥
यह मुझे मिला हुआ भोग, कभी भी नष्ट न हो, यह तो
उत्तरोत्तर चढ़ता ही जाय, भगवान् करे कि—कोई भी विघ्न
इस भोग में रुकावट न डाल दे, मैं तो इस भोग के कारण
कृतार्थ हो रहा हूँ। बस इसी तरह की निरर्थक और अनहोनी
बातें 'भ्रम'कहाती हैं [ऐसे विचारों से व्यसन की उत्पत्ति हुआ
करती है। लौकिक लोग प्रारब्ध फल को भोगते समय जब कि
लाख मुद्रा देने वाला कर्म आता है तब बड़े प्रसन्न होते हैं
परन्तु प्रारब्ध के समाप्त हो जाने पर जब वे मुद्रायें नष्ट हो
जाती हैं तब वे प्रारब्ध कर्म को तो पहचानते नहीं कि यह कर्म
इतना ही था और दहाड़ मार कर रोते हैं कि हाय ! मैं बर-
बाद हो गया ] ।
यदभावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा ।
इति चिन्ताविषघ्नोऽयं बोधो भ्रमनिवर्तकः ॥१६८॥
'जो होना नहीं है, वह तो कभी होगा ही नहीं। जो होना

तृप्तिदीपप्रकरणम् २८१
है वह कभी टलता नहीं, ['यह मेरा काम कब बन जायगा,
यह आपत्ति मेरी कब टलेगी'] इत्यादि चिन्ता रूपी विष को
मार भगाने वाला यह उपर्युक्त [पूर्वोक्त] बोध ही भ्रम को निवृत्त
कर सकता है। [भ्रम को निवृत्त करने वाला दूसरा कोई भी
इससे अच्छा उपाय नहीं है] इसके प्रताप से सैकड़ों चिन्ताओं
का विषैला प्रभाव नष्ट हो जाता है।
समेऽपि भोगे व्यसनं भ्रान्तो गच्छेन्न बुद्धवान् ।
अशक्यार्थस्य संकल्पाद् भ्रान्तस्य व्यसनं बहु ॥१६९॥
ज्ञानी और अज्ञानी इन दोनों को भोग तो समान ही होता
है। परन्तु भ्रान्त पुरुष व्यसन में फँस जाता है। बुद्धवान्
अर्थात् ज्ञानी को व्यसन नहीं होता। भ्रान्त पुरुष, जो बात
हो ही नहीं सकती, उसी का संकल्प कर बैठता है। इस कारण
भ्रान्त को ही बहुत सा व्यसन होता है [तत्वज्ञानी को अकेला
भोग होता है और अज्ञानी को भोग के साथ ही आगे को उस
भोग का व्यसन भी पड़ जाता है]।
मायामयत्वं भोगस्य बुद्ध्वास्थामुपसंहरन् ।
भुञ्जानोऽपि न संकल्पं कुरुते व्यसनं कुतः ॥१७०॥
विवेकी पुरुष तो भोगों को मायामय जान कर, उनमें से
अपनी आस्था (श्रद्धा, भरोसा) को हटा लेता है, उन्हें भोगता
हुआ भी वह जब कि संकल्प ही नहीं करता तब उस ज्ञानी
को व्यसन कैसे हो ?
स्वप्नेन्द्रजालसदृश मचिन्त्यरचनात्मकम् ।
दृष्टनष्टं जगत् पश्यन् कथं तत्रानुरज्यति ॥१७१॥
जिस विवेकी ने इस जगत् को सुपने या इन्द्रजाल के समान

विवेकी भला बताओ इसमें अनुराग [प्रेम का नाता] कैसे कर

समझ लिया है, जिसने इसे अचिन्त्यरचनारूप जान लिया
है, जिसे यह दृष्टनष्ट रूप में दीखने लगा है, वह दोषदर्शी
विवेकी भला बताओ इसमें अनुराग [प्रेम का नाता] कैसे कर
लेगा ?
स्वस्वप्नमापरोक्ष्येण दृष्ट्वा पश्यन् स्वजागरम् ।
चिन्तयेदप्रमत्तः सन्नुभावप्यनुदिनं मुहुः ॥१७२॥
चिरं तयोः सर्वसाम्य मनुसन्धाय जागरे ।
सत्यत्वबुद्धिं सन्त्यज्य नानुरज्यति पूर्ववत् ॥१७३॥
अपने स्वप्न को अपरोक्ष देख कर, उसके पीछे अपने जाग-
रण को भी अनुभव करके, फिर इन बातों को ही, सावधान
होकर, प्रतिदिन, और प्रतिक्षण सोचा करे [कि यह जागरण
तो स्वप्नतुल्य ही है] ॥१७२॥ इन स्वप्न और जागरण की पूरी
समता को चिरकाल तक अपने जी में बैठाकर कि जैसे सुपने
के पदार्थ तात्कालिक भोग देते हैं, जैसे वे परिणाम में नीरस
हैं, जैसे वे विनाशी हैं, वैसे ही ये जागरण के पदार्थ भी हैं।
जागरण को सत्य समझना छोड़ देने पर, फिर पहले की तरह
[अज्ञानी अवस्था की तरह] अनुरक्त नहीं होता ।
इन्द्रजालमिदं द्वैतमचिन्त्यरचनात्वतः ।
इत्यविस्मरतो हानिः का वा प्रारब्धभोगतः ॥१७४॥
अचिन्त्य रचनावाले होने से ये सम्पूर्ण भोग्य पदार्थ तो
इन्द्रजाल के समान मिथ्या हैं [युक्ति से इस बात को विचार
लेने पर] जब यह बात किसी विद्वान् को कभी भूलती ही नहीं,
जब कोई विद्वान् प्रत्येक समय इस बात को याद रखने लगता
है, तब फिर वह भले ही अपने प्रारब्ध कर्मों के सुख दुःख रूपी

तृप्तिदीपप्रकरणम् २८५

तृप्तिदीपप्रकरणम् २८५
फलों को भोगा करे, उससे जगत् के मिथ्या होने के विचार
को चोट नहीं लगती [ अथवा उनको मिथ्या समझ लेने से
प्रारब्ध भोग में कुछ भी रुकावट नहीं पड़ती ] ।
निर्बन्धस्तत्त्वविद्याया इन्द्रजालत्वसंस्मृतौ ।
प्रारब्धस्याग्रहो भोगे जीवस्य सुखदुःखयोः ॥१७५॥
तत्त्वविद्या का निर्बन्ध अथवा उद्देश्य तो बस इतना ही है
कि—इस जगत् को इन्द्रजाल के समान मिथ्या समझ लिया
जाय [ भोगों का अपलाप करना उसका उद्देश्य कदापि नहीं है ]
प्रारब्ध का आग्रह भी केवल इतना ही है कि जीव को सुख या
दुःख पहुँचा दिये जांय। भोगों को सत्य सिद्ध करने में उसका
आग्रह कदापि नहीं है [ यों प्रारब्ध और ज्ञान दोनों ही भिन्न
विषय वाले हैं ] ।
विद्यारब्धे विरुध्येते न भिन्नविषयत्वतः ।
ज्ञानद्भिरप्यैन्द्रजालविनोदो दृश्यते खलु ॥१७६॥
ऊपर वर्णित रीति से भिन्न विषयवाले होने के कारण, ज्ञान
और प्रारब्ध में आपस में विरोध नहीं होता। लोक में भी
देखते हैं कि—जो लोग इन्द्रजाल को इन्द्रजाल जान लेते हैं, वे
भी इन्द्रजाल के चमत्कारों को तो देखा ही करते हैं [ इस दृष्टान्त
से जान पड़ता है कि ज्ञान और प्रारब्ध भोग में कोई लड़ाई
नहीं है ] ।
जगत्सत्यत्वमापाद्य प्रारब्धं भोजयेद् यदि ।
तदा विरोधि विद्याया, भोगमात्रान्न सत्यता ॥१७७॥
यदि तो प्रारब्ध कर्म, इस जगत् को सत्य बनाकर ही, जीव
को सुख दुःख दिया करता होता, तो [ अवश्य ही ] यह विद्या

२४६ पञ्चदशी
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का विरोधी होता। क्योंकि तब यह विद्या के विषय मिथ्यात्व को
स्वयं ही नष्ट कर डालता। परन्तु यह प्रारब्ध ऐसा तो कुछ भी
नहीं करता। यह तो केवल भोग ही भोग देता है। इसी कारण
कहते हैं कि प्रारब्ध, विद्या का विरोधी नहीं होता। केवल भोग
दे देने मात्र से ही कोई पदार्थ सत्य नहीं हो जाता है। [कैसे सो
अगले श्लोक में कहेंगे ]।
अनूनो जायते भोगः कल्पितैः स्वप्नवस्तुभिः ।
जाग्रद्वस्तुभिरप्येव मसत्यैर्भोग इष्यताम् ॥१७८॥
देख लो कि—स्वप्न की भी जो मिथ्यावस्तुयें होती हैं, उन
से जो भोग होता है, वह जाग्रत् के पदार्थों से किसी बात में
भी कम नहीं होता। इस दृष्टान्त से यह समझ लो कि—
जाग्रत्काल के मिथ्या पदार्थों से भी भोग मिल ही सकता है।
[सुपने के मिथ्यापदार्थों से जैसे भोग होता है, ऐसे ही मिथ्या
होने पर भी जाग्रत् के पदार्थों से भोग हो सकता है। भोग देने
के कारण से ही जाग्रत् के पदार्थों को 'सत्य कहना ठीक नहीं है।
यदि विद्यापह्नुवीत जगत् प्रारब्धघातिनी ।
तदा स्यान्नतु मायात्वबोधेन तदपह्नवः ॥१७९॥
यदि ज्ञान, जगत् का अपह्नव कर देता तो वह प्रारब्ध का
घातक हो जाता, किसी को माया समझ लेने से ही उसका
अपह्नव नहीं हो जाता।
यदि तो यह ज्ञान जगत् के भोग्य पदार्थों का अपह्नव कर
देता—दीखने वाले भोग्य पदार्थों के स्वरूप को विलीन कर देता
[जैसे कि 'नेदं रजतम्'='यह रजत नहीं' इस ज्ञान से कल्पित
रजत का स्वरूप विलीन हो जाता है] तो यह प्रारब्ध का

घातक हो जाता। क्योंकि यह उस अवस्था में प्रारब्ध भोग के
साधनों को ही नष्ट कर डालता। परन्तु यह ऐसा नहीं करता
है। किन्तु उसको केवल मिथ्या ही बताता है। इसी से कहते
हैं कि—यह ज्ञान प्रारब्ध कर्म का विरोधी नहीं है। किसी को
माया समझ लेने से ही उसका अपह्नव नहीं हो जाता है। इन्द्र-
जाल आदि में देखते हैं कि—स्वरूप का विलय किये बिना भी
लोग उसको मिथ्या समझ ही लेते हैं।
अनपह्नुत्य लोकास्तदिन्द्रजालमिदं त्विति।
जानन्त्येदानपह्नुत्य भोगं मायात्वधीस्तथा ॥१८०॥
देखते हैं कि—मनुष्य उस इन्द्रजाल के स्वरूप को न हटा
कर भी, यह जान लेते हैं, कि यह तो इन्द्रजाल है। ठीक इसी
प्रकार भोग्यपदार्थ को विलय किए विना भी, जगत् के मिथ्या-
पन का भान हो ही सकता है।
यत्र त्वस्य जगत् स्वात्मा पश्येत् कस्तत्र केन कम्।
किं जिघ्रेत् किं वदेद्वेति श्रुतौ तु बहु घोषितम् ॥१८१॥
तेन द्वैतमपह्नुत्य विद्योदेति न चान्यथा।
तथा च विदुषो भोगः कथं स्यादिति चेच्छृणु ॥१८२॥
जिस विद्यावस्था के आजाने पर, यह सकल जगत्, उस विद्वान्
का आत्मा अथवा स्वरूप ही हो जाता है, उस दशा में, कौन
देखने वाला ? किस साधन से ? किस पदार्थ को देखे ? किस फूल
आदि को सूंघे ? क्या कुछ बोले ? सुने ? स्पर्श करे ? यह बात श्रुति
में अनेक जगह कही गयी है। १८१॥ इस सबसे यही निश्चय होता
है कि विद्या तो द्वैत का अपह्नव करके ही उत्पन्न होती है—[वह
विद्या जब तक द्वैत का उपमर्द नहीं कर लेतीतब तक वह उत्पन्न

उक्तं स्वाप्ययसंपत्योरिति सूत्रे ह्यतिस्फुटम् ॥१८३॥

३८८ पञ्चदशी
ही नहीं होती ] फिर ऐसी अवस्था में विद्वान् को भोग कैसे
होगा ? इस प्रश्न का उत्तर भी सुन लो—
सुषुप्तिविषया मुक्तिविषया वा श्रुतिस्त्विति ।
उक्तं स्वाप्ययसंपत्योरिति सूत्रे ह्यतिस्फुटम् ॥१८३॥
'स्वाप्ययसंपत्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि' * इस व्याससूत्र में यह
बात बहुत ही स्पष्ट करके समझायी गयी है कि 'यत्रत्वस्य'
(बृ. ४-५-१५) यह श्रुति या तो सुषुप्ति अवस्था का वर्णन कर
रही है, या फिर मुक्ति अवस्था को बता रही है [ विद्या (ज्ञान)
से जगत् के अपह्नव हो जाने की बात को यह श्रुति नहीं कह
रही है । ]
अन्यथा याज्ञवल्क्यादे राचार्यत्वं न संभवेत् ।
द्वैतदृष्टावविद्वत्ता द्वैतादृष्टौ न वाग्वदेत् ॥१८४॥
यदि इस श्रुति को सुषुप्ति आदि विषयक न मानें, तो
याज्ञवल्क्यादि ब्रह्मविद्या के आचार्य ही न हो सकेंगे । क्योंकि
यदि वे द्वैत को देख रहे हैं तो कहना होगा कि उनको अद्वैत
का ज्ञान नहीं हो रहा है । फिर वे आचार्य या ब्रह्मवेत्ता कैसे
होंगे ? [यदि वे द्वैत को नहीं देख रहे हैं तो शिष्यादि के न
दीखने से आचार्य की वाणी ही न निकलेगी । यों विद्यासंप्र-
दाय का उच्छेद ही हो जायगा ] ।
निर्विकल्पसमाधौ तु द्वैतादर्शनहेतुतः ।
सैवापरोक्षविद्येति चेत् सुषुप्तिस्तथा न किम् ॥१८५॥
*-वेदान्त ४-४-१६ क्योंकि यह बात प्रकरण से आविष्कृत है
इसलिये सुषुप्ति में और परममुक्ति में एक दूसरे की अपेक्षा से यह
विशेष ज्ञान का अभाव बताया है ।

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'निर्विकल्प समाधि में क्योंकि द्वैत का दर्शन नहीं होता,
इससे केवल उसे ही अपरोक्ष विद्या समझ बैठना ठीक नहीं।
क्योंकि फिर ऐसे तो सुषुप्ति को भी 'अपरोक्ष विद्या' क्यों नहीं
कहते हो [उस सुषुप्ति में भी तो द्वैत की प्रतीति नहीं होती है]।
आत्मतत्त्वं न जानाति सुप्तो यदि तदा त्वया।
आत्मधीरेव विद्येति वाच्यं न द्वैतविस्मृतिः ॥१८६॥
यदि यह कहा जाय कि—सुषुप्त पुरुष [द्वैत का दर्शन तो
नहीं करता, परन्तु वह तो] आत्मतत्व को भी नहीं जानता।
इससे उसे विद्यावान् नहीं माना जाता। तब तो फिर स्पष्ट
शब्दों में आत्मज्ञान को ही विद्या कहना चाहिए, [द्वैत के
विस्मरण को आत्मज्ञान कहना ठीक नहीं है]।
उभयं मिलितं विद्या यदि तर्हि घटादयः ।
अर्धविद्याभाजिनः स्युः सकलद्वैतविस्मृतेः ॥१८७॥
यदि तो 'द्वैत का अदर्शन' और 'आत्मज्ञान' इन दोनों
को मिला कर 'विद्या' कहा जाय तो यह मानना पड़ेगा कि
घटादियों को आधा ज्ञान तो प्राप्त हो ही गया है। क्योंकि ये
सम्पूर्ण द्वैत को तो भूले हुए ही हैं। [विद्या के दो भाग हैं एक
द्वैत का अदर्शन दूसरा आत्मदर्शन ऐसा यदि मानें तो विद्या
का एक भाग घटादि में भी पाया जाता है तो क्या वे भी
विद्यावान् हैं ?]
मशकध्वनिमुख्यानां विक्षेपाणां बहुत्वतः ।
तव विद्या तथा न स्याद् घटादीनां यथा दृढा ॥१८८॥
मच्छर की ध्वनि आदि बहुत से विक्षेप होने के कारण
तेरी विद्या तो उतनी दृढ भी नहीं है, जितनी कि घटादि की

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है [घटादि जैसे द्वैत को भूल गये हैं वैसे तो तुम भूल भी नहीं
सकते हो] ।
आत्मधीरेव विद्येति यदि तर्हि सुखी भव ।
दुष्टचित्तं निरुन्ध्याच्चेन्निरुन्धि त्वं यथासुखम् ॥१८९॥
[यों नाकेबन्दी कर देने पर जब तुम बेबस होकर यह कह
उठोगे कि] फिर ऐसे तो आत्मज्ञान ही 'विद्या' है । तो [हमारा
आशीर्वाद लो और] सुखी रहो । यदि [आत्मज्ञान की रक्षा के
लिए] दुष्ट चित्त को रोकना चाहो तो तुम सुभीते के अनुसार
चित्त को रोका करो ।
तदिष्ट मेष्टव्यमायामयत्वस्य समीक्षणात् ।
इच्छन्नप्यज्ञवन्नेच्छेत् किमिच्छन्निति हि श्रुतम् ॥१९०॥
उस दुष्ट चित्त को रोकना तो हमें भी इष्ट ही है । क्योंकि
[चित्त के दोषों के नष्ट हो जाने पर ही अद्वितीय आत्मा का
ज्ञान होने के लिए] आवश्यक जो जगत् की मायामयता है
उसका भले प्रकार ईक्षण तभी (दुष्ट चित्त के रुकने पर ही) किया
जा सकता है [इसीलिए चित्तनिरोध हमें इष्ट है] सो भाई !
यह ज्ञानी चाहता तो है परन्तु अब यह अज्ञानी की तरह नहीं
चाहता है । अब यह भोगों की खुशामद नहीं करता है, भोग
मिलो या मत मिलो इसे इसकी परवा नहीं होती । इसी सब
अभिप्राय को लेकर हमारी व्याख्येय श्रुति में 'किमिच्छन्' यह
शब्द कहा गया है ।
रागो लिङ्गमबोधस्य, सन्तु रागादयो बुधे ।
इति शास्त्रद्वयं सार्थमेवं सत्याविरोधतः ॥१९१॥
'रागो लिंगमबोधस्य चित्तव्यायामभूमिषु । कुतः शांदूलता तस्य

तृप्तिदीपप्रकरणम् २९१

तृप्तिदीपप्रकरणम् २९१
यस्याग्निः कोटरे तरोः' यह शास्त्र तो कहता है कि 'राग अज्ञान की
निशानी है' अर्थात् तत्वज्ञानी में राग नहीं होना चाहिये ।
'शास्त्रार्थस्य समाप्तत्वान्मुक्तिः स्यात्तावता मितेः। रागादयः सन्तु कामं न
तद्भावोऽपराध्यते' यह दूसरा शास्त्र कहता है कि 'ज्ञानी में रागादि
हैं तो हुआ करें । उनके होने से ज्ञानी के ज्ञान को आँच नहीं
लगती । तत्वज्ञानी का राग दृढ राग नहीं होता है' ऐसा मान
लेने पर ही अंविरोध होजाने के कारण ये दोनों शास्त्र सार्थक
हो जाते हैं । इन दोनों शास्त्रों की संगति लग जाती है ।
जो शास्त्र ज्ञानी में राग का निषेध करता है उसका अभि-
प्राय यही है कि—ज्ञानी में दृढराग नहीं होता । जो शास्त्र यह
कहता है कि—ज्ञानी में राग हुआ करो उसका कुछ बिगड़ता
नहीं । उसका अभिप्राय यही है कि ज्ञानी में दिखावटी राग
हुआ करो उसका होना कुछ बुराई नहीं है ।
जगन्मिथ्यात्ववत् स्वात्मासङ्गत्वस्य समीक्षणात् ।
कस्य कामायेति वचो भोक्त्रभावविवक्षया ॥१९२॥
जगत् को मिथ्या समझ लेने के कारण सच्चा काम्य पदार्थ
कोई भी नहीं है, यह बात जैसे 'किमिच्छन्' इस पद से कही
गयी है, इसी प्रकार जब आत्मा को असंग रूप में पहचान
लिया जाता है, तब तो वास्तव भोक्ता भी कोई नहीं रह जाता।
इसी भाव को श्रुति ने 'कस्य कामाय' किसके लिये इस वाक्य
से व्यक्त किया है ।
पतिजायादिकं सर्वं तत्तद्भोगाय नेच्छति ।
किन्त्वात्मभोगार्थमिति श्रुतावुद्घोषितं बहु ॥१९३॥
यह प्राणी पति, पत्नी आदि जिस किसी को भी चाहता है,