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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 726 में से

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पृष्ठ 298

गीता में कहा है कि—पुरुप ज्ञानवान् भी हो, तो भी तो
वह अपनी प्रकृति के अनुरूप ही चेष्टा किया करता है [पहले
जन्मों में किए हुए धर्माधर्मों के जो संस्कार इस जन्म में
अभिव्यक्त हो जाते हैं, उन को ही 'प्रकृति' कहा जाता है। यह
तो अवस्था ज्ञानवान् लोगों की है। मूर्खों की तो बात ही मत
पूछो। इस कारण प्राणी तो अपनी अपनी प्रकृति की ओर को
ही दौड़ते हैं] भगवान् कहते हैं कि मैं या कोई और
आकर उन की प्रवृत्ति या निवृत्ति का निग्रह करने लगे तो भी
वह क्या कर सकेगा ? [ऐसा निग्रह करने से तो कुछ भी फल
नहीं होगा ।]
अवश्यंभाविभावानां प्रतीकारो भवेद् यदि ।
तदा दुःखैर्न लिप्येरन्नलरामयुधिष्ठिराः ॥१५६॥
अवश्यम्भावी जो दुःखादि भाव हैं, उन का यदि कोई
प्रतीकार हो सकता होता तो नल, राम, तथा युधिष्ठिर जैसे
महापुरुष उन विपत्तियों में कभी न फंसते ।
न चेश्वरत्वमीशस्य हीयते तावता यतः ।
अवश्यंभाविताप्येषाभीश्वरेणैव निर्मिता ॥१५७॥
प्रारब्ध को न हटा सकने से, ईश्वर का ईश्वरभाव नष्ट
नहीं हो जाता । क्योंकि इन दुःखों की आवश्यंभाविता भी तो
ईश्वर ने ही बनाई है। [इच्छा प्रारब्ध का वर्णन यहां तक
समाप्त हुआ]
प्रश्नोत्तराभ्यामेवैतद् गम्यतेऽर्जुनकृष्णयोः ।
अनिच्छापूर्वकं चास्ति प्रारब्धमिति तच्छृणु ॥१५८॥
अनिच्छापूर्वक प्रारब्ध भी होता है, यह बात तो अर्जुन