पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 297, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृप्तिदीपप्रकरणम् २७७
इच्छा का विघात करने वाला विवेकज्ञान तो भोगेच्छा को
उत्पन्न ही नहीं होने देगा] ऐसा कहना ठीक नहीं क्योंकि [दोष
दीखने पर भी इच्छाएँ पैदा होती हुई पाई जाती हैं] प्रारब्ध
कर्म अनेक प्रकार के पाये जाते हैं । एक इच्छा को पैदा करके
भोग देने वाला प्रारब्ध । दूसरा अनिच्छा के रहने पर भी भोग
देने वाला प्रारब्ध । तीसरा परेच्छा से भोग देने वाला प्रारब्ध ।
यों तीन प्रकार का प्रारब्ध माना जाता है । [ विवेक के पहरे
में भी भोगेच्छा कैसे हो जाती है ? इस प्रश्न को समझने के
लिए प्रारब्ध के इन तीन भेदों को समझ लेना आवश्यक है ] ।
अपथ्यसेविनश्चोरा राजदाररता अपि ।
जानन्त एव स्वानर्थ मिच्छन्त्यारब्धकर्मतः ॥१५३॥
अपथ्यसेवी,रोगी,चोर, तथा राजा की स्त्री से रमण करने
वाले, ये सभी अपने भावी अनर्थों को जानते हुए भी, आर-
ब्धकर्म के शासन [ प्रभाव ] में आकर वैसी वैसी उलटी
इच्छायें किया करते हैं ।
न चात्रैतद् वारयितु मीश्वरेणापि शक्यते ।
यत ईश्वर एवाह गीतायामर्जुनं प्रति ॥१५४॥
ईश्वर भी आये तो इन अपथ्यसेवन आदि की इच्छाओं
को रोक नहीं सकता । [ ये इच्छायें अपरिहार्य होती हैं । इसी
कारण इन इच्छाओं को प्रारब्ध का फल माना गया है ] ईश्वर
ने स्वयं अपने मुख से गीता में अर्जुन के प्रति यही बात कही
है कि ये इच्छायें अपरिहार्य होती हैं ।
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृते र्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥१५५॥