सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 308

३८८ पञ्चदशी
ही नहीं होती ] फिर ऐसी अवस्था में विद्वान् को भोग कैसे
होगा ? इस प्रश्न का उत्तर भी सुन लो—
सुषुप्तिविषया मुक्तिविषया वा श्रुतिस्त्विति ।
उक्तं स्वाप्ययसंपत्योरिति सूत्रे ह्यतिस्फुटम् ॥१८३॥
'स्वाप्ययसंपत्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि' * इस व्याससूत्र में यह
बात बहुत ही स्पष्ट करके समझायी गयी है कि 'यत्रत्वस्य'
(बृ. ४-५-१५) यह श्रुति या तो सुषुप्ति अवस्था का वर्णन कर
रही है, या फिर मुक्ति अवस्था को बता रही है [ विद्या (ज्ञान)
से जगत् के अपह्नव हो जाने की बात को यह श्रुति नहीं कह
रही है । ]
अन्यथा याज्ञवल्क्यादे राचार्यत्वं न संभवेत् ।
द्वैतदृष्टावविद्वत्ता द्वैतादृष्टौ न वाग्वदेत् ॥१८४॥
यदि इस श्रुति को सुषुप्ति आदि विषयक न मानें, तो
याज्ञवल्क्यादि ब्रह्मविद्या के आचार्य ही न हो सकेंगे । क्योंकि
यदि वे द्वैत को देख रहे हैं तो कहना होगा कि उनको अद्वैत
का ज्ञान नहीं हो रहा है । फिर वे आचार्य या ब्रह्मवेत्ता कैसे
होंगे ? [यदि वे द्वैत को नहीं देख रहे हैं तो शिष्यादि के न
दीखने से आचार्य की वाणी ही न निकलेगी । यों विद्यासंप्र-
दाय का उच्छेद ही हो जायगा ] ।
निर्विकल्पसमाधौ तु द्वैतादर्शनहेतुतः ।
सैवापरोक्षविद्येति चेत् सुषुप्तिस्तथा न किम् ॥१८५॥
*-वेदान्त ४-४-१६ क्योंकि यह बात प्रकरण से आविष्कृत है
इसलिये सुषुप्ति में और परममुक्ति में एक दूसरे की अपेक्षा से यह
विशेष ज्ञान का अभाव बताया है ।