पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
१० पञ्चदशी
सत्वशुद्ध्यविशुद्धिभ्यां मायाविद्ये च ते मते ।
मायाविम्बो वशीकृत्य तां स्यात् सर्वज्ञ ईश्वरः ॥१६॥
सत्व की शुद्धि से उस प्रकृति को 'माया'और सत्व की अशुद्धि
[ मलिनता ] से उस प्रकृति को 'अविद्या' मान लिया गया है ।
माया में पड़ा हुआ विम्ब उस माया को वश में कर रहा है और
इसी कारण से वह सर्वज्ञ ईश्वर बना बैठा है ।
प्रकाशात्मक सत्व गुण की शुद्धि से जब कि सत्व गुण दूसरे
गुणों से कलुषित नहीं हो जाता—तब वह प्रकृति 'माया' कही
जाती है । जब तो वह सत्व गुण दूसरे गुणों से कलुषित होकर
अशुद्ध हो जाता है तब वही प्रकृति 'अविद्या' कहाने लगती है ।
संक्षेप यह है कि विशुद्ध-सत्व-प्रधान प्रकृति को 'माया' तथा मलिन
सत्व-प्रधान प्रकृति को 'अविद्या'कहते हैं । माया में प्रतिफलित उस
आत्मा ने माया को अपने स्वाधीन कर रक्खा है और वही सर्व-
ज्ञता आदि गुणों वाला ईश्वर होगया है ।
अविद्यावशगस्त्वन्य स्तद्वैचित्र्यादनेकधा ।
सा कारण शरीरं स्यात् प्राज्ञस्तत्राभिमानवान् ॥१७॥
दूसरा तो अविद्या के वश में फँस गया है । अविद्या की
विचित्रता के कारण वह अनेक होजाता है । उस अविद्या को
'कारण शरीर' कहते हैं । उस कारण शरीर कहानेवाली अविद्या
में अभिमान करनेवाले को 'प्राज्ञ' मानते हैं ।
अविद्या में प्रतिबिम्बित होकर उसके पराधीन होजानेवाला
आत्मा तो जीव कहाने लगता है । वह जीव तो उस अविद्या
रूपी उपाधि की विचित्रता [ किंवा अशुद्धि की न्यूनाधिकता ]
के कारण अनेक प्रकार का हो जाता है । उसके देवता मनुष्य पशु
तत्त्वविवेकप्रकरणम् ११
पक्षी आदि अनेक भेद हो जाते हैं । वह अविद्या ही 'कारण शरीर'
कहाती है, क्योंकि स्थूल सूक्ष्म शरीर तथा स्थूल सूक्ष्म भूतों का
वही कारण मानी गयी है । उस कारण शरीर में अभिमान करने
वाले अथवा उसी में 'मैं' भावना करने वाले जीव को 'प्राज्ञ' नाम
से कहा जाता है ।
तमःप्रधानप्रकृते स्तद्भोगायेश्वराज्ञया ।
वियत्पवनतेजोऽम्बुभुवो भूतानि जज्ञिरे ॥१८॥
उन [प्राज्ञों] के भोग के लिये ईश्वर की आज्ञा से तमःप्रधान
प्रकृति में से आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा भूमि नाम के पांच
महाभूत उत्पन्न हुए।
उन प्राज्ञ नामक जीवों के सुख-दुःख-साक्षात्काररूपी भोग
के लिये उस प्रकृति में से [जिस में कि तमोगुण की प्रधानता है]
ईशान आदि शक्ति वाले जगत् के अधिष्ठाता की आज्ञा से
[ जिसको उसका ईक्षण भी कहा जाता है ] आकाश आदि पांच
भूत उत्पन्न होगये ।
सत्त्वांशैः पञ्चभिस्तेषां क्रमाद्धीन्द्रियपञ्चकम् ।
श्रोत्रत्वगक्षिरसनघ्राणाख्यमुपजायते ॥ १९ ॥
उन आकाश आदि पांच भूतों के पृथक् पृथक् पांच सत्त्व
भागों से क्रमानुसार श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना तथा घ्राण नाम
की पांच ज्ञानेन्द्रियां उत्पन्न हो जाती हैं। [अर्थात् एक एक भूत
के पृथक् पृथक् सत्त्वांश से एक एक इन्द्रिय की उत्पत्ति होती है]
तैरन्तःकरणं सर्वै र्वृत्तिभेदेन तद् द्विधा ।
मनो विमर्शरूपं स्याद् बुद्धिः स्यान्निश्चयात्मिका॥२०॥
उन पांचों भूतों के पांचों सत्त्वांशों से मिलकर एक अन्तः-
१२ पञ्चदशी
करण नाम का द्रव्य उत्पन्न हो जाता है । वह अन्तःकरण अपने
वृत्तिभेद के कारण दो प्रकार का होता है । जब वह विमर्श किंवा
संशयात्मिका वृत्ति करता है अथवा यों कहो कि जब वह विमर्श
रूप हो जाता है तब उसको 'मन' कहा जाता है । निश्चयस्वरूप
हो जाने पर उसी को 'बुद्धि' नाम से कहने लगते हैं ।
रजोंशैः पञ्चभिस्तेषां क्रमात् कर्मेन्द्रियाणि तु ।
वाक्पाणिपादपायूपस्थाभिधानानि जज्ञिरे ॥२१॥
उन आकाशादि पांच भूतों के पृथक्-पृथक् पांच रजो भागों से
क्रमानुसार वाक्, पाणि, पाद, पायु, तथा उपस्थ नाम की पांच
कर्मेन्द्रियां उत्पन्न हो जाती हैं।
तैः सर्वैः सहितैः प्राणो वृत्तिभेदात् स पंचधा ।
प्राणोऽपानः समानश्चोदानव्यानौ च ते पुनः ॥२२॥
उन पांचों भूतों के पांचों रजो भागों से मिलकर एक प्राण
का जन्म हो जाता है । वह प्राण वृत्तिभेद किंवा प्राणनादि व्यापारों
के भेद से, पांच प्रकार का होता है । वे पांच प्रकार ये हैं—प्राण,
अपान, समान, उदान तथा व्यान ।
बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपञ्चकै र्मनसा धिया ।
शरीरं सप्तदशभिः सूक्ष्मं तल्लिङ्गमुच्यते ॥२३॥
(पांच ज्ञानेन्द्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय, पांच प्राण, मन तथा बुद्धि
इन सतरह पदार्थों से मिलकर 'सूक्ष्म शरीर' बनता है । उसी को
वेदान्तों में 'लिंग शरीर' भी कहते हैं)
प्राज्ञस्तत्राभिमानेन तैजसत्वं प्रपद्यते ।
हिरण्यगर्भतामीश स्तयो र्व्यष्टिसमष्टिता ॥२४॥
(वह प्राज्ञ नाम का जीव उस लिंगशरीर में अभिमान करने
[Header: तत्त्वविवेकप्रकरणम् १३]
से 'तैजस' हो जाता है तथा जब वह ईश्वर उस लिंग देह में
अभिमान करता है तब वह 'हिरण्यगर्भ' हो जाता है । उन दोनों
में भेद केवल इतना ही है कि तैजस 'व्यष्टि' है और हिरण्यगर्भ
'समष्टि' है ) इसके अतिरिक्त और कोई भेद नहीं है ।
मलिनसत्वप्रधान अविद्यारूपी उपाधि वाला जीव जब लिंग
शरीर में अभिमान करता है, जब वह उसी को अपना आत्मा
मान लेता है तब उसे 'तैजस' कहने लगते हैं । विशुद्ध सत्व प्रधान
मायारूपी उपाधिवाला परमेश्वर उसी लिंग शरीर में जब 'मैंपने'
का अभिमान करता है तब उसका नाम 'हिरण्यगर्भ' हो जाता
है । तैजस और हिरण्यगर्भ दोनों ही यद्यपि लिंग शरीर पर अभि-
मान करने वाले हैं परन्तु उनमें से एक 'व्यष्टि' है दूसरा 'समष्टि'
है । इसी से दोनों में भेद हो गया है ।
समष्टीशः सर्वेषां स्वात्मतादात्म्यवेदनात् ।
तदभावात् ततोऽन्ये तु कथ्यन्ते व्यष्टिसंज्ञया ॥२५॥
वह ईश्वर–जिसे हिरण्यगर्भ कहा गया है–लिंगशरीर
उपाधि वाले सभी तैजसों के साथ अपने आत्मा की एकता को
समझता रहता है । वह समझता है कि ये सब मिलकर 'मैं' हूँ ।
इसी से वह 'समष्टि' होता है । उस ईश्वर से अन्य जो जीव हैं
वे तो उस तादात्म्यवेदन के अभाव से [उन सब के साथ
एकत्व ज्ञान के न होने से] 'व्यष्टि' नाम से कहे जाते हैं ।
तद्भोगाय पुनर्भोग्यभोगायतनजन्मने ।
पञ्चीकरोति भगवान् प्रत्येकं वियदादिकम् ॥२६॥
भगवान् परमेश्वर उसके बाद उन जीवों के भोग के लिये ही
भोग्य [ अन्नपानादि ] तथा भोगमन्दिरों
१६ पञ्चदशी
प्रकार के शरीरों की उत्पत्ति करने के लिये, आकाश आदि पांच
भूतों में से प्रत्येक भूत को [जो कि अभी तक अपंचात्मक ही थे]
पंचात्मक कर देता है [जिससे कि उनसे जीवों के भोग के लिये
भोग्य अन्नपानादि तथा भोग्य मन्दिर शरीरादि का निर्माण
हो सके]।
द्विधा विधाय चैकैकं चतुर्धा प्रथमं पुनः ।
स्वस्वेतरद्वितीयांशै योजनात् पञ्च पञ्च ते ॥५७॥
आकाशादि प्रत्येक भूत के पहले दो दो भाग किये जाँय ।
फिर उनमें के पहले एक भाग के तो चार चार भाग किये जाँय
[तथा दूसरे आधे भागों को पूरा ही रक्खा जाय] उसके पश्चात्
अपने अपने से भिन्न दूसरे दूसरे भागों के साथ योग करने से
ये पांचों भूत पंचीकृत हो जाते हैं।
पंचीकरण का चित्र
प्रत्येक भूत में आधा भाग अपना है तथा
आधे में शेष ४ भूत हैं
| आकाश | वायु | अग्नि | जल | पृथिवी |
|---|---|---|---|---|
| आकाश | वायु | अग्नि | जल | पृथिवी |
| वायु<br>अग्नि<br>जल<br>पृथिवी | आकाश<br>अग्नि<br>जल<br>पृथिवी | आकाश<br>वायु<br>जल<br>पृथिवी | आकाश<br>वायु<br>अग्नि<br>पृथिवी | आकाश<br>वायु<br>अग्नि<br>जल |
तत्त्वविवेकप्रकरणम् १५
तैरण्डस्तत्र भुवनं भोग्यभोगाश्रयोद्भवः ।
हिरण्यगर्भः स्थूलेऽस्मिन् देहे वैश्वानरो भवेत् ॥२८॥
उन पंचीकृत भूतों से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है। ब्रह्माण्ड
में भुवन, प्राणियों के भोगने योग्य भोग्यपदार्थ तथा उन उन
लोकों के अनुकूल शरीर [ईश्वर की आज्ञा से] उत्पन्न हो जाते
हैं। इस सम्पूर्ण स्थूल [विराट्] शरीर में अहंभाव से बैठने
वाला हिरण्यगर्भ 'वैश्वानर' कहाने लगता है ।
तैजसा विश्वतां याता देवतिर्यङ्नरादयः ।
ते पराग्दर्शिनः प्रत्यक्तत्वबोधविवर्जिता ॥२९॥
इस स्थूल शरीर में आते ही तैजस 'विश्व' हो जाते हैं,
जिनको देव तिर्यङ् तथा मनुष्यादि कहा जाने लगता है। वे
सभी बहिर्मुख हैं। इन किसी को भी आत्मतत्व का बोध
नहीं है।
इस स्थूल शरीर में अहंभाव से निवास करने वाले 'तैजस'
ही 'विश्व' कहाने लगते हैं। देवता पशु पक्षी तथा मनुष्यादि भेद
इन विश्वों के ही होते हैं। तैजसों में इस तरह का कोई भेद नहीं
होता। कारणशरीर तथा लिंगशरीर तो सब प्राणियों का एक
समान ही होता है। इनके केवल स्थूल शरीर ही भिन्न भिन्न
प्रकार के होते हैं। वे देवादि सभी पराग्दर्शी [बाह्यदर्शी] हैं। ये बाह्य
शब्दादि विषयों को ही देखा करते हैं। अपने दुर्भाग्य के कारण
ये प्रत्यगात्मा को नहीं देख पाते हैं। इन सभी को आत्मतत्व का
यथार्थ ज्ञान नहीं होता। यद्यपि तार्किक आदि लोग देह से भिन्न
आत्मा को पहचानते हैं परन्तु श्रुतिप्रतिपादित असंग आत्मरूप
का यथार्थ ज्ञान उन को भी नहीं हैं।
१६ पञ्चदशी
कुर्वते कर्म भोगाय कर्म कर्तुं च भुञ्जते ।
नद्यां कीटा इवावर्तादावर्तान्तरमाशु ते ॥
व्रजन्तो जन्मनो जन्म लभन्ते नैव निर्वृतिम् ॥३०॥
[सुखादि को] भोगने के लिये तो ये कर्म करते हैं [आगे
को] कर्म करने के लिये ये भोगों को भोगते हैं। ऐसे ये जीव
नदी के उन कीड़ों की तरह हैं जो एक आवर्त से निकलकर झट-
पट दूसरे आवर्त में जा फँसते हैं। ऐसे ही ये जीव भी जन्म
से जन्म को पाते रहते हैं। इन्हें कभी भी विश्राम किंवा सुख
नहीं मिलता।
क्योंकि उनको आत्मतत्व का यथार्थ ज्ञान तो होता ही नहीं
इस कारण वे लोग भोग [सुख आदि के अनुभव] के लिये
[मनुष्यादि शरीरों में वस कर उन उन शरीरों के अनुकूल] कर्म
किया करते हैं। फिर कर्म करने के लिये [मनुष्यादि शरीरों के
द्वारा] उन उन फलों को भोगा करते हैं। फल को भोगना इस-
लिये आवश्यक होता है कि, यदि कर्म करने के बाद उन को
फल का अनुभव न हुआ करे, तो फिर उन प्राणियों को उस तरह
की इच्छायें ही पैदा न हुआ करें और फिर वे प्राणी उन उन
साधनों के अनुष्ठान में भी न लगा करें। यों जब कोई प्राणी
किसी भोग को भोग लेता है तब फिर वह शतगुण उत्साह से
वैसे वैसे कर्मों में जुट जाता है और जब कर्म कर चुकता है
तब हज़ारों आशाओं से भोगों की बाट देखा करता है। यों यह
कर्म और भोग का अनन्त चक्कर कभी समाप्त होने में ही नहीं
आता। ऐसे जीवों की गति नदी के बहाव में बहने वाले कीड़ों
की सी होती है, जो कभी एक भंवर में से निकलते हैं तो
तत्त्वविवेकप्रकरणम् १७
तुरन्त ही दूसरे में जा पड़ते हैं और कभी भी विश्राम नहीं पाते
हैं। इसी प्रकार ये प्राणी कर्म और भोग के इस भँवर में फँस
कर जन्म से जन्म को पाते हैं। इन हतभागियों को सुख के
चिरस्थायी दर्शन कभी भी नहीं होते।
सत्कर्मपरिपाकात्ते करुणानिधिनोद्धृताः ।
प्राप्य तीरतरुच्छायां विश्राम्यन्ति यथासुखम् ॥ ३१ ॥
नदी के वे कीड़े अपने किसी पुण्य कर्म का परिपाक होने
पर किसी कृपालु के द्वारा नदी में से बाहर निकाले जाकर किसी
किनारे के पेड़ की छाया में सुखपूर्वक विश्राम पा लेते हैं।
उपदेशमवाप्यैवमाचार्यात् तत्वदर्शिनः ।
पञ्चकोशविवेकेन लभन्ते निर्वृतिं पराम् ॥ ३२ ॥
इसी प्रकार जब किन्हीं के पूर्वोपार्जित कोटि पुण्य कर्मों का
परिपाक होता है तब वे प्राणी किसी तत्वदर्शी आचार्य से उपदेश
[श्रवण] को पाकर [आगे बतायी विधि से] पांच कोशों का
विवेक कर लेने पर, परानिर्वृति [मोक्ष सुख] को पा लेते हैं।
अन्नं प्राणो मनो बुद्धिरानन्दश्चेति पञ्च ते ।
कोशास्तैरावृतः स्वात्मा विस्मृत्या संसृतिं व्रजेत् ॥ ३३ ॥
अन्न, प्राण, मन, बुद्धि [विज्ञान] तथा आनन्द ये पांच कोश
कहाते हैं। [इनको कोश कहने का कारण यह है कि] इन कोशों
से आच्छादित हुआ अपना आत्मा, अपने स्वरूप को भूल जाने
के कारण, जन्म मरण रूपी संसार में फँस जाता है।
कोश [चन्दा] जैसे कोश बनाने वाले कीड़े के क्लेश का
कारण होता है अथवा जैसे कोश [म्यान] के अन्दर रक्खी हुई
तलवार का रूप छिप जाता है इसी प्रकार इन अन्नादि कोशों ने,
२
१८ पञ्चदशी
अद्वयानन्द आत्मतत्व को ढक दिया है और आत्मा को क्लेश
पहुँचा रक्खा है इसी से इनको भी 'कोश' कहा जाता है।
स्यात् पंचीकृतभूतोत्थो देहः स्थूलोऽन्नसंज्ञकः ।
लिङ्गे तु राजसैः प्राणैः प्राणः कर्मेन्द्रियैः सह ॥ ३४ ॥
पंचीकृत भूतों से उत्पन्न हुआ यह स्थूल देह 'अन्नमय कोश'
कहाता है। लिङ्ग शरीर में के राजस [रजोगुण से बने हुए]
पांच प्राणों से तथा वागादि कर्मेन्द्रियों से मिलकर 'प्राणमय
कोश' हो जाता है।
सात्विकैर्धीन्द्रियैः साकं विमर्शात्मा मनोमयः ।
तैरेव साकं विज्ञानमयो धीर्निश्चयात्मिका ॥३५॥
विमर्शात्मा मन तथा सात्विक ज्ञानेन्द्रियां मिलकर 'मनोमय
कोश' कहाते हैं। उन्हीं ज्ञानेन्द्रियों के साथ मिली हुई निश्चया-
त्मिका बुद्धि 'विज्ञानमय कोश' कही जाती है।
कारणे सत्त्वमानन्दमयो मोदादिवृत्तिभिः ।
तत्तत्कोशैस्तु तादात्म्यादात्मा तत्तन्मयो भवेत् ॥३६॥
कारण शरीर में मोदादि वृत्तियों के साथ रहनेवाले [मलिन]
सत्व को 'आनन्दमय कोश' कहते हैं। यह हमारा आत्मा उन
उन कोशों के साथ तादात्म्य कर लेने पर तत्तन्मय [उन उन
के रूप का] सा हो जाता है।
कारण शरीर कहानेवाली अविद्या में जो कि मलिन सत्व
रहता है, वह जब उन उन प्रिय मोद तथा प्रमोद नाम की वृत्तियों
से युक्त हो जाता है [जो कि वृत्तियें क्रम से इष्ट पदार्थ के मिलने
की आशा से, इष्ट पदार्थ के मिलने से तथा इष्ट पदार्थ के भोगने
से, पैदा हुआ करती हैं] तब 'आनन्दमयकोश'कहाने लगता है।
तत्त्वविवेकप्रकरणम् १९
वह आत्मा उस उस कोश के साथ जब तादात्म्याभिमान कर
लेता है तब उस उस कोशमय सा हो जाता है । परन्तु असल में
तो वह उन उन कोशों से अत्यन्त विलक्षण ही रहता है ।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां पञ्चकोशविवेकतः ।
स्वात्मानं तत उद्धृत्य परं ब्रह्म प्रपद्यते ॥३७॥
अन्वयव्यतिरेक नाम की युक्ति से, या तो पांच कोशों को
आत्मा से पृथक् पहचान कर या आत्मा को उन पांच कोशों में
से पृथक् पहचान कर अपने आत्मा को उनमें से बाहर करके,
परब्रह्म ही हो जाता है ।
आगे बतायी हुई अन्वय-व्यतिरेक नामकी युक्तियों से पांचों
कोशों का विवेक कर लेने पर [ उनको आत्मा से पृथक् कर
लेने पर ] अथवा आत्मा को ही उनमें से पृथक् कर लेने पर,
बुद्धि की सहायता से अपने आत्मा को उन कोशों में से बाहर
निकालकर, अपने चिदानन्द स्वरूप का निश्चय करके अधिकारी
पुरुष परब्रह्म को प्राप्त हो जाता है, किंवा स्वयं परब्रह्म ही हो
जाता है ।
अभाने स्थूलदेहस्य स्वप्ने यद् भानमात्मनः ।
सोऽन्वयो व्यतिरेक स्तद्भानेऽन्यानवभासनम् ॥३८॥
स्वप्नावस्था में जब इस स्थूलदेह का तो भान नहीं रहता,किंतु
आत्मा का भान बना रहता है [उस समय स्वप्न के साक्षी के रूप
में जो आत्मा का स्फुरण होता है ] यह तो आत्मा का 'अन्वय'
[ अर्थात् अनुवृत्त होना ] कहाता है । तथा उसी स्वप्नावस्था में
उस आत्मा की स्फूर्ति होने पर, जब इस स्थूलदेह का भान नहीं
रह जाता है तब यही स्थूलदेह का 'व्यतिरेक'
२० पञ्चदशी
रहना अर्थात् छूट जाना ] कहाता है । [इस प्रकरण में अन्वय-
व्यतिरेक का अभिप्राय अनुवृत्ति और व्यावृत्ति से है ]
लिङ्गाभाने सुषुप्तौ स्यादात्मनो भानमन्वयः ।
व्यतिरेकस्तु तद्भाने लिङ्गस्याभानमुच्यते ॥३९॥
सुषुप्ति अवस्था आजाने पर लिङ्गदेह का तो अभान [ अप्र-
तीति ] हो जाता है और आत्मा का तब भी भान बना रहता है
यों [ सुषुप्ति अवस्था के साक्षी के रूप में ] आत्मा का स्फुरण होते
रहना ही आत्मा का 'अन्वय' [ अर्थात् अनुवृत्त रहना ] कहाता
है । तथा उस समय आत्मा का भान होते रहने पर भी लिङ्गदेह
की प्रतीति न होना, लिंगदेह का 'व्यतिरेक [ अर्थात् अनुवृत्त न
रहना ] कहाता है ।
तद्विवेकविविक्ताः स्युः कोशाः प्राणमनोधियः ।
ते हि तत्र गुणावस्थाभेदमात्रात् पृथक् कृताः ॥४०॥
लिंगदेह का विवेक कर लेने से ही प्राणमय, मनोमय और
विज्ञानमय ये तीनों ही कोश विविक्त हो जाते हैं। क्योंकि वे तो
गुणों की अवस्था की भिन्नता के कारण ही उस लिङ्गदेह से पृथक्
से हो रहे हैं।
लिङ्गदेह का विवेचन इसलिये किया है कि 'प्राणमय' 'मनो
मय' तथा 'विज्ञानमय' कोश इसीमें अन्तर्भूत हो रहे हैं। इस
लिङ्गदेह का विवेक कर लेने पर प्राण, मन तथा विज्ञानमय नाम के
तीनों कोश स्वयमेव विविक्त किंवा आत्मा से पृथक् हो जाते हैं।
क्योंकि वे प्राणमय आदि कोश उस लिंग शरीर में सत्व और रज
नामक गुणों की केवल अवस्था की भिन्नता से [ उनके गुण-
प्रधानभाव के कारण प्राप्त हुई विशेष अवस्था के कारण ही ] भेद
तत्वविवेकप्रकरणम् २१
से कह दिये गये हैं। असल में वे उससे पृथक् कुछ नहीं हैं। वे
सब लिंग देह की अवस्था विशेष ही हैं।
सुषुप्त्यभाने भानं तु समाधावात्मनोऽन्वयः ।
व्यतिरेकस्त्वात्मभाने सुषुप्त्यनवभासनम् ॥४१॥
समाधि के समय सुषुप्ति का अभान हो जाने पर भी आत्मा
का भाने होते रहना, आत्मा का 'अन्वय' कहाता है। तथा उस
समय आत्मा का भान होते रहने पर भी सुषुप्ति का भास न होना
सुषुप्ति का 'व्यतिरेक' कहाता है।
समाधि में [जिसका कि वर्णन आगे किया जायगा] सुषुप्ति
[ कारणदेह नामक अज्ञान ] का तो अभान [ अप्रतीति ] रहता
है, परन्तु आत्मा का भान अथवा स्फुरण होता रहता है। यही
आत्मा का 'अन्वय' कहाता है। यों आत्मा का भान होने पर
सुषुप्ति किंवा अज्ञान की प्रतीति न होना ही, सुषुप्ति का 'व्यतिरेक'
कहाता है। जिसका सारांश यह होता है कि, यह आत्मा अन्न-
मयादि कोषों से भिन्न है। क्योंकि उन अन्नमयादि के व्यावृत्त
हो जाने पर भी वह आत्मा कभी व्यावृत्त नहीं होता है। वह तो
सब में अनुवृत्त हो रहा है। जो जिसके हट जाने पर भी न हट
जाता हो, वह उन [ हटने वालों] से भिन्न होता है। जैसे कि
माला के फूलों से माला का सूत्र भिन्न होता है अथवा जैसे काली
पीली गायों से गोत्वजाति भिन्न होती है।
यथामुञ्जादिषीकैवमात्मा युक्त्या समुद्धृतः ।
शरीरत्रितयाद्धीरैः परं ब्रह्मैव जायते ॥४२॥
मूँज में से सींक की तरह जब धीर लोग तीनों शरीरों में से
अपने आत्मा का उद्धार [ ऊपर ही अन्वय व्यतिरेक नाम की]
२२ पञ्चदशी
युक्ति से कर लेते हैं तब उस समय उनका आत्मा परब्रह्म ही हो
जाता है।
जैसे मूंज में से सींक को युक्ति से बाहर निकाल लेते हैं
इसी प्रकार आत्मा को भी अन्वयव्यतिरेक नामक युक्ति के सहारे
से धीर [ब्रह्मचर्यादिसाधनसम्पन्न अधिकारी] लोग यदि प्रथम
कहे हुए तीनों शरीरों में से पृथक् कर लें तो उनका वह आत्मा
परब्रह्म ही हो जाता है। फिर तो चिदानन्दरूपी लक्षण उन
दोनों में समान ही हो जाता है, फिर उसके ब्रह्म होने में संशय
नहीं रहता।
परापरात्मनोरेवं युक्त्या संभावितैकता ।
तत्त्वमस्यादिवाक्यैः सा भागत्यागेन लक्ष्यते ॥४३॥
इस प्रकार 'पर' और 'अपर' आत्मा की एकता को युक्ति
से अंगीकार किया गया। उसी एकता को 'तत्त्वमसि' आदि
वाक्य भागत्याग लक्षणा से लक्षित कर रहे हैं।
यहां तक पर और अपर आत्मा की [जिनको 'परमात्मा'
और 'जीवात्मा' भी कहा जाता है] एकता की संभावना [लक्षण
की समानता आदि उपायों से ] की गयी है। उसी एकता को
'तत्त्वमसि' आदि महावाक्य भागत्याग लक्षणा [विरोधी भाग
को छोड़कर अविरोधी भाग को लेने वाली लक्षणा ] से स्पष्ट ही
लक्षित कर रहे हैं।
जगतो यदुपादानं मायामादाय तामसीम् ।
निमित्तं शुद्धसत्त्वां तामुच्यते ब्रह्म तद्गिरा ॥४४॥
तमःप्रधान माया को लेकर जो जगत् का उपादान हो जाता
है, तथा जो शुद्धसत्त्वप्रधान माया को लेकर जगत् का निमित्त
तत्त्वविवेकप्रकरणम् २३
बन जाता है उस ब्रह्म को ही तत्त्वमसि के 'तत्' शब्द से कहा
जाता है ।
सच्चिदानन्दस्वरूप जो ब्रह्म तमोगुण प्रधान माया को लेकर
[ उसको उपाधि भाव से स्वीकार करके ] तो इस चराचरात्मक
जगत् का उपादान [ अथवा अध्यास का अधिष्ठान ] हो जाता
है, तथा विशुद्धसत्त्वप्रधान उसी माया को लेकर [ उसको अपनी
उपाधि मानकर ] निमित्त [ किंवा उपादानादि को जाननेवाला
कर्त्ता ] हो जाता है, वह निमित्त तथा उपादान उभयरूपी 'ब्रह्म'
ही 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों के 'तत्' पद से कहा गया है । घट
आदि पदार्थों के जैसे निमित्त और उपादान कारण अलग अलग
होते हैं, वैसे जगत् का निमित्त और उपादान पृथक् पृथक् नहीं है ।
यदा मलिनसत्त्वां तां कामकर्मादिदूषिताम् ।
आदत्ते तत्परं ब्रह्म त्वंपदेन तदोच्यते ॥४५॥
वही ब्रह्म जिस अवस्था में मलिनसत्त्वप्रधान होने के कारण
ही कामकर्मादि से दूषित उस अविद्या नामवाली माया को
उपाधिभाव से स्वीकार कर बैठता है तब उसी ब्रह्म को 'त्वं' पद
से कहा जाने लगता है ।
त्रितयीमपि तां मुक्त्वा परस्परविरोधिनीम् ।
अखण्डं सच्चिदानन्दं महावाक्येन लक्ष्यते ॥४६॥
परस्पर विरुद्ध उस तीन प्रकार की माया को छोड़ देने पर
तो तत्त्वमसि आदि महावाक्य अखण्ड सच्चिदानन्द ब्रह्म को
लक्षित कर देते हैं ।
तमःप्रधान, विशुद्धसत्त्वप्रधान और मलिनसत्त्वप्रधान इन
तीनों प्रकार की परस्परविरोधिनी उस पूर्वोक्त माया का जब
२४ पञ्चदशी
परित्याग कर दिया जाता है, उस समय तत्त्वमसि आदि महा-
वाक्य आते हैं और अधिकारी के सामने भेदरहित सच्चिदानन्द
ब्रह्म को लक्षित करके चले जाते हैं। अनधिकारी लोग उस समय
पागलों की तरह देखते ही रह जाते हैं।
सोयमित्यादिवाक्येषु विरोधात्तदिदन्तयोः ।
त्यागेन भागयोरेक आश्रयो लक्ष्यते यथा ॥४७॥
'सोयंदेवदत्तः' इत्यादि वाक्यों में 'तत्ता' और 'इदन्ता' का
विरोध होने से इन दोनों विरोधी भागों का त्याग करके, इनके
आश्रय, एक देवदत्त की लक्षणा जैसे हो जाती है—
'यह वह देवदत्त है' इस वाक्य में 'यह' का मतलब है, इस
देश और इस काल का देवदत्त तथा 'वह' का मतलब होता है
उस देश तथा उस काल का देवदत्त । यों 'यहपन' और 'वहपन'
नाम के धर्मों का विरोध होने से, जब देवदत्त की एकता नहीं
हो सकती, तब इन दोनों विरोधी भागों का त्याग करके, देवदत्त
रूपी एक आश्रय का बोध जैसे लक्षणा से हो जाता है—
मायाविद्ये विहायैवमुपाधी परजीवयोः ।
अखण्डं सच्चिदानन्दं परं ब्रह्मैव लक्ष्यते ॥४८॥
ठीक इसी प्रकार 'पर' और 'जीव' की जो उपर्युक्त 'माया'
तथा 'अविद्या' नाम की उपाधि हैं उन दोनों को छोड़ देने पर
अखण्ड [अर्थात् भेदरहित] सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म ही महा-
वाक्यों से लक्षित हो जाता है।
संविकल्पस्य लक्ष्यत्वे लक्ष्यस्य स्यादवस्तुता ।
निर्विकल्पस्य लक्ष्यत्वं न दृष्टं न च संभवि ॥४९॥
प्रश्न—जिस तत्व को तुम महावाक्य का लक्ष्य बताते हो, वह
तत्त्वविवेकप्रकरणम् २५
सविकल्प है अथवा निर्विकल्प है ? सविकल्प को लक्ष्य मानने
में महावाक्य का लक्ष्य ब्रह्म अवस्तु [मिथ्या] हो जायगा [क्यों-
कि वेदान्त मत में सविकल्प वस्तु मिथ्या हुआ करती है] अब
यदि निर्विकल्प को लक्ष्य कहें सो तो कहीं देखा नहीं गया और
न ऐसा सम्भव ही है। [क्योंकि लक्ष्य पदार्थ में रहनेवाला
'लक्ष्यत्व' भी तो एक विकल्प ही है]।
विकल्पो निर्विकल्पस्य सविकल्पस्य वा भवेत्।
आद्ये व्याहति रन्यत्रानवस्थात्माश्रयादयः ॥५०॥
उत्तर—अच्छा बताओ तुम्हारा यह विकल्प निर्विकल्प के
विषय में है ? या सविकल्प के विषय में है ? प्रथम पक्ष में
व्याघात दोष आता है [निर्विकल्प पर विकल्प कैसा ?] दूसरे
पक्ष में अनवस्था और आत्माश्रय आदि दोष आते हैं।
सिद्धान्ती प्रतिबन्दी से उत्तर देता है कि तेरे मत में सविकल्प
शब्द का क्या अर्थ है ? 'विकल्पेन सह वर्तते इति सविकल्पः' इस
विवरण से दो पदार्थ प्रतीत होते हैं एक तो आधेयविकल्प तथा
दूसरा उसका आधार विकल्प। इसमें यह प्रश्न होता है कि
तुम्हारे इस विकल्प का जो आधार है वह निर्विकल्प है या सवि-
कल्प है ? प्रथमपक्ष तो असम्भव ही है। क्योंकि विकल्प का
आधार होते हुए निर्विकल्प तो हो ही नहीं सकता। द्वितीय पक्ष
में यह बताओ कि वह किस विकल्प से सविकल्प है, तृतीयान्त
पदवाच्य जो प्रथम विकल्प है उसीसे सविकल्प है अथवा किसी
दूसरे विकल्प से ? प्रथम पक्ष में आत्माश्रय दोष है। क्योंकि
विकल्प का आधार सविकल्प पदार्थ है, विशिष्ट की आधारता
विशेषण में भी हुआ करती है। जैसे कि आसन वाले भूतल पर
३६ पञ्चदशी
बैठा हुआ पुरुष आसन पर भी बैठा होता है, इसलिये सविकल्प
का आधेय जो विकल्प है वह विकल्प का भी आधेय हुआ, तो
प्रथम विकल्प और द्वितीय विकल्प दोनों का अभेद होने से अपने
में अपने की स्थिति हो गयी और यों आत्माश्रय दोष आगया।
इस दोष की निवृत्ति के लिये आधार के विशेषण विकल्प को
यदि विकल्पान्तर मानें तो उस पर भी यह प्रश्न हो सकता है
कि उस विकल्प का आधार निर्विकल्प है कि सविकल्प है ?
प्रथम पक्ष तो असम्भव ही है। द्वितीयपक्ष में द्वितीय विकल्प
के आधार का विशेषण विकल्प प्रथम विकल्प है अथवा द्वितीय
विकल्प है ? प्रथम पक्ष में अन्योन्याश्रय दोष है क्योंकि, प्रथम
विकल्प का आधार द्वितीय विकल्प और द्वितीय का तृतीय और
वह तृतीय प्रथम विकल्पस्वरूप है तो अर्थात् यह सिद्ध होगया
कि प्रथम विकल्प का आधार द्वितीय विकल्प तथा द्वितीय विक-
ल्प का प्रथम विकल्प इसलिये अन्योन्याश्रय दोष है। द्वितीय
विकल्प स्वरूप मानें तो आत्माश्रय दोष है। इस दोष की निवृत्ति
के लिये तृतीयविकल्प को यदि विकल्पान्तर मानें तो उस पर
भी यही प्रश्न हो सकता है कि तृतीय विकल्प का आधार निर्वि-
कल्प है अथवा सविकल्प है ? प्रथम पक्ष तो असम्भव ही है।
द्वितीय पक्ष में फिर प्रश्न हो सकता है कि चतुर्थ विकल्प प्रथम
विकल्पस्वरूप है या विकल्पान्तर है। प्रथम पक्ष में चक्रक दोष है
क्योंकि प्रथम विकल्प का आधार द्वितीय विकल्प, द्वितीय का
तृतीय, तृतीय का चतुर्थ, चतुर्थ प्रथम स्वरूप है। यों अर्थात्
सिद्ध हो गया कि प्रथम का आधार द्वितीय, द्वितीय का तृतीय,
तृतीय का प्रथम। इस दोष की निवृत्ति के लिये चतुर्थ विकल्प
को यदि विकल्पान्तर मानें तो अनवस्था दोष होगा क्योंकि
तत्त्वविवेकप्रकरणम् २७
चतुर्थ विकल्प के आधार का विशेषण विकल्प यदि विकल्पान्तर
है तो उसमें भी इन दोषों का प्रसंग होने से उसके आधार का
विशेषण विकल्प भी विकल्पान्तर ही मानना होगा। इस प्रकार
अनेक विकल्पों के होने से अनवस्था होगी। कहीं भी जाकर
स्थिति नहीं हो सकेगी।
इदं गुणक्रियाजातिद्रव्यसम्बन्धवस्तुषु ।
समं, तेन स्वरूपस्य सर्वमेतदितीष्यताम् ॥५१॥
गुण, क्रिया, जाति, द्रव्य तथा सम्बन्धादि सभी वस्तुओं में
यह दोष तुल्य ही है। इसलिये [ऐसे निरर्थक प्रश्न न करके] यही
मान लेना चाहिये, कि ये गुण आदि सब स्वरूप में ही रहते हैं।
विकल्पतदभावाभ्यामसंस्पृष्टात्मवस्तुनि ।
विकल्पतत्वलक्ष्यत्वसम्बन्धाद्यास्तु कल्पिताः ॥५२॥
जो आत्मवस्तु विकल्प और विकल्पाभाव दोनों के ही
सम्बन्ध से रहित रहती है, उसी आत्मवस्तु में 'सविकल्पकत्व'
'लक्ष्यत्व' 'निर्विकल्पकत्व आदि सब धर्म [उसी तरह] कल्पित
कर लिये गये हैं [जैसे कि आकाश आदि सब जगत् उसमें
कल्पित कर लिया गया है]।
इत्थं वाक्यैस्तदर्थानुसन्धानं श्रवणं भवेत् ।
युक्त्या सम्भावितत्वानुसन्धानं मननं तु तत् ॥५३॥
इस प्रकार वाक्यों के द्वारा उनके अर्थों का ज्ञान 'श्रवण'
कहाता है। युक्ति से उसी अर्थ की सम्भावना का ज्ञान
'मनन' कहा जाता है।
'जगतो यदुपादानम्' [४४] इत्यादि श्लोकों से प्रतिपादित
रीति से 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों की सहायता से, इन वाक्यों
का जो जीव ब्रह्म की एकता रूपी अर्थ है उसका अनुसन्धान
[अन्वेषण] करना ही 'श्रवण' कहाता है। 'शब्दस्पर्शादयो वेद्या'
[ तत्त्वविवेक ३ ] इत्यादि से लेकर 'पराग्रात्मनोरैवं युक्त्या
संभावितैकता [ तत्त्वविवेक ४३ ] पर्यन्त श्लोकों के कहे प्रकार
से श्रवण किये हुए इसी अर्थ के संभावितपने का अनुसन्धान
[किंवा श्रवण किये हुए अर्थ की संभावना का मन में बैठाना]
'मनन' कहाता है ।
ताभ्यां निर्विचिकित्सेऽर्थे चेतसः स्थापितस्य यत् ।
एकतानत्वमेतद्धि निदिध्यासन मुच्यते ॥५४॥
श्रवण और मनन से जो अर्थ निःसंशय हो चुका है, उसी
अर्थ [विषय] में धारण किया हुआ चित्त, जब एकतान हो जाय
[जब उस चित्त में उसी विषय की एकाकार वृत्ति का प्रवाह बहने
लग पड़े] तब इसी को [योगशास्त्र में] 'निदिध्यासन' नाम से
कहा जाता है।
ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद् ध्येयैकगोचरम् ।
निवातदीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते ॥५५॥
क्रम से 'ध्याता' और 'ध्यान' को छोड़ कर, जब चित्त केवल
'ध्येय' को ही विषय कर लेता है, जब चित्त निवात स्थान में रखे
हुए दीपक की प्रभा के समान निश्चल हो जाता है तब यही
अवस्था 'समाधि' कहाती है।
'निदिध्यासन' में तो 'ध्याता' 'ध्यान' तथा 'ध्येय' ये तीनों
ही प्रतीत होते रहते हैं। परन्तु जब अभ्यास के प्रभाव से वही
चित्त क्रम से पहले तो 'ध्याता' और पीछे से 'ध्यान' को छोड़
देता है और 'ध्येयैकगोचर' हो जाता है
विषय करने लगता है] और वायुरहित प्रदेश में रक्खे हुए दीपक
के प्रकाश के समान निश्चल हो जाता है, तब कहा जाता है कि
'समाधि' हो गयी ।
वृत्तयस्तु तदानीमज्ञाता अप्यात्मगोचराः ।
स्मरणादनुमीयन्ते व्युत्थितस्य समुत्थितात् ॥ ५६ ॥
समाधि से उठे हुए पुरुष को जो स्मरण आता है उससे इस
बात का अनुमान किया जाता है कि उस समय वृत्तियां ज्ञात तो
नहीं होतीं, परन्तु वे आत्मा को विषय किया करती हैं।
समाधि अवस्था में जब कि वृत्तियों की उपलब्धि नहीं होती
तब 'वह चित्त ध्येयैकगोचर हो रहा है' ऐसा निश्चय होने का
कारण तो यह है कि उस समय की आत्मा को विषय करने वाली
वृत्तियां यद्यपि समाधि काल में अज्ञात ही रहती हैं, परन्तु जब
वह समाधि से उठता है और उसे स्मरण आता है कि 'मैं इतने
समय तक समाधि में डूबा रहा' तब इस स्मरण से उन वृत्तियों
का अनुमान हो जाता है ।
वृत्तीनामनुवृत्तिस्तु प्रयत्नात् प्रथमादपि ।
अदृष्टासकृदभ्याससंस्कारसचिवाद् भवेत् ॥ ५७ ॥
समाधि के समय वृत्तियों की जो अनुवृत्ति होती रहती हैं,
वह योगी के समाधि से पहले किये हुए प्रयत्न से, उस के अदृष्ट
से तथा उस के बार-बार के समाधि के अभ्यास के संस्कारों से
होती रहती है ।
यद्यपि समाधि के समय वृत्तियों को पैदा करने के लिये
कोई प्रयत्न नहीं किया जाता, फिर भी जो ध्येयैकगोचर वृत्तियों
का तांता बंधा रहता है, वृत्तियों का वह तांता, समाधि से पूर्वकाल