पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 39, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्वविवेकप्रकरणम् २१
से कह दिये गये हैं। असल में वे उससे पृथक् कुछ नहीं हैं। वे
सब लिंग देह की अवस्था विशेष ही हैं।
सुषुप्त्यभाने भानं तु समाधावात्मनोऽन्वयः ।
व्यतिरेकस्त्वात्मभाने सुषुप्त्यनवभासनम् ॥४१॥
समाधि के समय सुषुप्ति का अभान हो जाने पर भी आत्मा
का भाने होते रहना, आत्मा का 'अन्वय' कहाता है। तथा उस
समय आत्मा का भान होते रहने पर भी सुषुप्ति का भास न होना
सुषुप्ति का 'व्यतिरेक' कहाता है।
समाधि में [जिसका कि वर्णन आगे किया जायगा] सुषुप्ति
[ कारणदेह नामक अज्ञान ] का तो अभान [ अप्रतीति ] रहता
है, परन्तु आत्मा का भान अथवा स्फुरण होता रहता है। यही
आत्मा का 'अन्वय' कहाता है। यों आत्मा का भान होने पर
सुषुप्ति किंवा अज्ञान की प्रतीति न होना ही, सुषुप्ति का 'व्यतिरेक'
कहाता है। जिसका सारांश यह होता है कि, यह आत्मा अन्न-
मयादि कोषों से भिन्न है। क्योंकि उन अन्नमयादि के व्यावृत्त
हो जाने पर भी वह आत्मा कभी व्यावृत्त नहीं होता है। वह तो
सब में अनुवृत्त हो रहा है। जो जिसके हट जाने पर भी न हट
जाता हो, वह उन [ हटने वालों] से भिन्न होता है। जैसे कि
माला के फूलों से माला का सूत्र भिन्न होता है अथवा जैसे काली
पीली गायों से गोत्वजाति भिन्न होती है।
यथामुञ्जादिषीकैवमात्मा युक्त्या समुद्धृतः ।
शरीरत्रितयाद्धीरैः परं ब्रह्मैव जायते ॥४२॥
मूँज में से सींक की तरह जब धीर लोग तीनों शरीरों में से
अपने आत्मा का उद्धार [ ऊपर ही अन्वय व्यतिरेक नाम की]