सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७७

[Header]
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७७

स्वयमेवानुभूतित्वाद् विद्यते नानुभाव्यता ।
ज्ञातृज्ञानान्तराभावादज्ञेयो न त्वसत्तया ॥१३॥
स्वयं अनुभूतिरूप होने से वह तत्त्व किसी का अनुभाव्य
नहीं होता है । उस से भिन्न ज्ञाता और उस से भिन्न ज्ञान
दूसरा न होने से वह अज्ञेय रहता है। उस के अज्ञेय होने का
कारण असत्ता नहीं होती ।
इन आनन्दमयादियों का जो साक्षी है वह क्योंकि अनु-
भव रूप है इसी से वह अनुभाव्य कभी नहीं होता है । उस
के 'अज्ञेय' होने का कारण उसकी असत्ता नहीं है । किन्तु
उस से भिन्न ज्ञाता और उस से भिन्न ज्ञान कोई होता ही नहीं
है इस कारण से वह अज्ञेय बना हुआ है। ऐसी अवस्था में
केवल अनुपलब्ध होने से ही उसे असत् नहीं मान बैठना
चाहिये । उपलब्ध तो विषय हुआ करते हैं । वह किसी का
विषय नहीं है । इसी से वह किसी को उपलब्ध नहीं होता
है । वह तो उपलब्ध करने वालों का स्वयं आत्मा [आपा] ही
होता है ।
माधुर्यादिखभावानामन्यत्र स्वगुणार्पिणाम् ।
स्वस्मिंस्तदर्पणापेक्षा नो, न चास्त्यन्यदर्पकम् ॥१४॥
माधुर्य आदि स्वभाव वाले [गुडादि पदार्थ] जौ चने आदि
में, अपने माधुर्य आदि गुणों को डाल देते हैं, वे अपने आप
में तो उन मधुरता आदि की ज़रूरत ही नहीं रखते [वे गुडादि
यह कभी नहीं चाहते कि कोई हमको आकर मीठा कर दे ]
इसके अतिरिक्त गुडादि में मधुरता को उत्पन्न करने वाली
कोई वस्तु भी तो नहीं है ।

७८ पंचदशी
अर्पकान्तरराहित्येऽप्यस्त्येषां तत्स्वभावता ।
माभूत्तथाऽनुभाव्यत्वं बोधात्मा तु न हीयते ॥१५॥
उनमें माधुर्यादि पैदा करने वाले किसी दूसरे पदार्थ के
न होने पर भी इन गुडादियों में माधुर्यादिस्वभावता है ही ।
इसी प्रकार आत्मा भले ही [किसी के] अनुभव का विषय न
होता हो, परन्तु उसकी अनुभवरूपता तो रहती ही है । उसे
कौन हटा सकता है ?
स्वयंज्योतिर्भवत्येष पुरोऽस्माद् भासतेऽखिलात् ।
तमेव भान्तमन्वेति तद्भासा भास्यते जगत् ॥१६॥
“अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिर्भवति, अस्मादखिलात्पुरतः भासते,
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति”'काठ २-३-१५)
इत्यादि श्रुतियें आत्मा को स्वप्रकाश बता रही हैं ।
येनेदं जानते सर्वं तत् केनान्येन जानताम् ।
विज्ञातारं केन विन्द्याच्छक्तं वेद्ये तु साधनम् ॥१७॥
जिस से इस सब [पसारे] को जान रहे हैं, उस [ज्ञाता]
को दूसरे किस से जानें ? जानने वालों को किस से पहचानें ?
क्योंकि जानने के साधन भी तो वेद्य पदार्थ को ही जानने में शक्त हैं।
जिस साक्षिचैतन्य रूप आत्मा से, प्राणी इस समस्त दृश्य
जगत् को जानते हैं, उस साक्षी आत्मा को किस साक्ष्य जड
पदार्थ से जानें ? तात्पर्य यह है कि—इस दृश्य जगत् के
ज्ञाता को किस दृश्य से जाना जाय ? अर्थात् वह किसी से
भी नहीं जाना जा सकता । ज्ञान का साधन यह बिचारा मन
भी तो वेद्य पदार्थ में ही समर्थ है । ज्ञाता आत्मा में तो उस से
भी कुछ नहीं होता । देखो बृहदारण्यक ४–५–१५ ।

पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७९

पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७९
स वेत्ति वेद्यं तत्सर्वं नान्यस्तस्यास्ति वेदिता।
विदिताविदिताभ्यां तत् पृथग्बोधस्वरूपकम् ॥१८॥
आत्मा को स्वप्रकाश सिद्ध करने के लिये ‘स वेत्ति वेद्यं न
च तस्यास्ति वेत्ता’(श्वे० ३–१९)‘अन्यदेव तद्विदितादयो अविदितादधि’
(केन–१–३) इन दोनों वाक्यों के अर्थ का उल्लेख इस श्लोक
में किया गया है—वह आत्मा, जो भी कुछ वेद्य पदार्थ हैं,
उन सभी को जाना करता है। परन्तु उस आत्मा का ज्ञाता
और कोई भी नहीं है। ज्ञानस्वरूप वह ब्रह्म विदित् [ज्ञान से
विषय किये हुए] तथा अविदित [अज्ञान से ढके हुए] दोनों
से ही विलक्षण है। क्योंकि वह तो साक्षात् बोधस्वरूप ही
ठहरा। [विदित तो इसलिये नहीं कि वह बुद्धिवृत्ति का
विषय नहीं होता। अविदित इसलिये नहीं कि उस से भिन्न
और कोई जानने वाला ही नहीं है।]
बोधे ऽप्यनुभवो यस्य न कथंचन जायते।
तं कथं बोधयेच्छास्त्रं लोष्टं नरसमाकृतिम् ॥१९॥
जिस मूर्ख को तो [घटादि की प्रतीति रूपी] बोध का
अनुभव [साक्षात्कार] किसी प्रकार भी नहीं होता है, उस
मनुष्याकार ढेले को विचारा शास्त्र भी कैसे समझायेगा ?
[तात्पर्य यह है कि “ज्ञात और अज्ञात पदार्थ ही अनुभव में
आते हैं। ज्ञान किंवा बोध तो कहीं भी दीखता नहीं है” ऐसी
यदि कोई शंका करे तो उस को कहना चाहिये कि, ज्ञात किंवा
विदित का विशेषण जो ज्ञान तथा वेदन है वही तो बोध है।
उस बोध का अनुभव जिस मूर्ख को न होगा, उस को
तो ज्ञात या विदित का भी अनुभव नहीं हो सकेगा।

८० पंचदशी
इस कारण बोध के अनुभव को तो अवश्य ही मानना
पड़ता है]।
जिह्वा मेऽस्ति न वेत्युक्ति र्लज्जायै केवलं यथा।
न बुध्यते मया बोधो बोद्धव्य इति तादृशी ॥२०॥
("मेरे जिह्वा है या नहीं" यह कहना जैसे केवल लज्जा के
लिये ही होता है [ऐसा कहने वाला मूर्ख समझा जाता है।
उस को कोई भी बुद्धिमान् नहीं मान सकता] क्योंकि जिह्वा
के बिना तो भाषण ही नहीं हो सकता। ठीक इसी प्रकार 'मैं
बोध को अब तक नहीं जानता, उस बोध को तो मुझे अभी
जानना है' (यह कथन भी वैसा ही) लज्जाजनक है।) क्योंकि
बोध के बिना तो यह बात भी नहीं कही जा सकती है।
यस्मिन्यस्मिन्नस्ति लोके बोधस्तत्तदुपेक्षणे।
यद् बोधमात्रं तद्ब्रह्मेत्येवंधीर्ब्रह्म निश्चयः ॥२१॥
लोक में जिन घटादि नाम वाले विषयों का ज्ञान होता
है, उन उन विषयों की उपेक्षा किंवा अनादर कर देने पर
[घटादि सभी पदार्थों में अनुस्यूत] जो केवल ज्ञानरूप एक
स्फूर्ति [शान्त भाव से विराजती हुई] दीखने लगती है वही
ब्रह्म तत्व है, ऐसा यदि किसी की बुद्धि को पता चल जाय, तो
हम इसी को 'ब्रह्मनिश्चय' कहते हैं [हम समझते हैं कि ऐसा
निश्चय कर लेने वाले को ब्रह्मज्ञान हो चुका है]।
पञ्चकोशपरित्यागे साक्षिबोधावशेषतः।
स्वस्वरूपं स एव स्याच्छून्यत्वं तस्य दुर्घटम् ॥२२॥
अन्नमयादि पांचों कोशों का परित्याग जब हम कर देते
हैं,

[Header] पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८१

[Header] पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८१

में से निकल बाहर होना जान जाते हैं] किंवा बुद्ध से उन
[पांचों कोशों] को अनात्मा समझ लेते हैं, तब इन कोशों का
साक्षी जो बोध शेष रह जाता है, वह साक्षिरूपी बोध ही तो
'निज रूप' अथवा 'ब्रह्म' है । उस साक्षिरूपी बोध को शून्य
[अर्थात् कुछ नहीं] कह देना हँसी खेल नहीं है । यह एक
बड़ा ही दुर्घट काम है ।
अस्ति तावत् स्वयं नाम विवादाविषयत्वतः ।
स्वस्मिन्नपि विवादश्चेत् प्रतिवाद्यत्र को भवेत् ॥२३॥
स्वयं [अपना आपा] नाम की कोई चीज तो, क्या लौकिक
और क्या वैदिक सभी के मत में है ही । क्योंकि वह कभी
विवाद का विषय ही नहीं होती है । अपने आपे में कभी
किसी को विप्रतिपत्ति नहीं होती कि मैं हूँ या नहीं हूँ ? यदि
किसी को अपने आपे में भी विप्रतिपत्ति होती हो, तो बताओ
कि इस विप्रतिपत्ति का प्रतिवादी कौन होगा ?
स्वासत्त्वं तु न कस्मैचिद्रोचते विभ्रमं विना ।
अतएव श्रुतिर्बाधं ब्रूते चासत्त्ववादिनः ॥२४॥
भ्रान्ति [पागलपन] को छोड़कर और किसी भी दशा में
अपना अभाव किसी को भी अच्छा नहीं लग सकता । यही
कारण है कि अगले श्लोक में उद्धृत श्रुति असत्त्ववादी का
बाध कह रही है ।
असद्ब्रह्मेति चेद्वेद स्वयमेव भवेदसत् ।
अतोऽस्य मा भूद्बोध्यत्वं स्वसत्त्वं त्वभ्युपेयताम् ॥२५॥
यदि कोई यह समझता है कि 'ब्रह्म असत् है' तो वह
[ ब्रह्म को असत् जानने वाला ] स्वयं भी असत् ही हो जाता

८२ पंचदशी

है [ क्योंकि वह स्वयं भी तो ब्रह्मरूप ही है। उसके 'ब्रह्म नहीं
है' इसे कहने का यही अभिप्राय होता है कि मैं स्वयं ही नहीं
हूँ।] इसलिये यह वेद्य तत्व भले ही न हो परन्तु अपनी सत्ता
तो तुम्हें मान ही लेनी चाहिये [ कि तुम्हीं ब्रह्म हो ] ।
कीदृक्तर्हीति चेत्पृच्छेदीदृक्ता नास्ति तत्र हि ।
यदनीदृगतादृक् च तत् स्वरूपं विनिश्चिनु ॥२६॥
जब यह आत्मा वेद्य भी नहीं है तब फिर वह कैसा है ?
ऐसा एक प्रश्न स्वभाव से उठ सकता है। इसका उत्तर यह है
कि उस आत्म तत्व में 'ईदृक्ता' अर्थात् 'ऐसापन' तो है ही
नहीं। [ यदि उसमें 'ऐसापन, मान लेंगे तो फिर उसे वेद्य
होने से कौन रोक सकेगा ? ] जो ऐसा भी नहीं और वैसा
भी नहीं उसी को आत्मा का [अपना] स्वरूप समझ लो ।
अक्षाणां विषयस्त्वीदृक् परोक्षस्तादृगुच्यते ।
विषयी नाक्षविषय स्वत्वान्नास्य परोक्षता ॥२७॥
जिसको इन्द्रियाँ विषय करती हैं, उसे तो 'ईदृक्' कहा
जाता है। जो तो परोक्ष अर्थात् इन्द्रियों की गति से बाहर
रह जाता है, उसे 'तादृक्' कहते हैं। विषयी अर्थात् ज्ञाता या
द्रष्टा आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं होता [इससे वह 'ईदृक्'
अर्थात् 'ऐसा' नहीं कहाता है ] तथा स्वयं वही होने से वह
परोक्ष भी नहीं होता, [ इससे उसे 'तादृक्' अर्थात् 'वैसा'
कहते भी नहीं बनता । इसी कारण से पहले श्लोक में आत्मा
के 'ऐसा' 'वैसा' होने का निषेध किया है । ]
अवेद्योप्यपरोक्षोतः स्वप्रकाशो भवत्ययम् ।
सत्यं ज्ञानमनन्तं चेत्यस्तीह ब्रह्मलक्षणम् ॥२८॥

पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८३

पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८३
वह आत्मा अवेद्य होकर भी [अर्थात् इन्द्रियजन्यज्ञान का
विषय न होकर भी] अपरोक्ष रहता है इसी से वह स्वयं-
प्रकाश माना जाता है। श्रुति ने ब्रह्म का जो कि सत्य ज्ञान
तथा अनन्त लक्षण बताया है वह लक्षण इस आत्मा में
भी है। इस कारण उस स्वयंप्रकाश तत्व को ब्रह्म मान लेना
चाहिये।
सत्यत्वं बाधराहित्यं, जगद्बाधैकसाक्षिणः ।
बाधः किंसाक्षिको ब्रूहि, नत्वसाक्षिक इष्यते ॥२९॥
[सत्य और अबाध्य, मिथ्या और बाध्य ये सब पर्याय-
वाची शब्द हैं] सत्य उसी को कहते हैं जिसकी बाधा न होती
हो। [जिस के मिथ्यापन का निश्चय कभी न होता हो] इस
सकल जगत् की बाधा का जो एक मात्र साक्षी है, उस के
बाध का साक्षी कौन होगा उसे हमें बताओ ? क्योंकि विना
साक्षी का तो कोई बाध माना ही नहीं जाता।
तात्पर्य यह है कि सुषुप्ति, मूर्छा तथा समाधि के समय,
जब यह स्थूल सूक्ष्म शरीरादि नाम का जगत् नहीं रहता, उस
जगत् के न रहने को जो जानता है अथवा शास्त्रीय शब्दों में
यों कहो कि जो आत्मा इस बाध का साक्षी है, उस आत्मा
के बाध का साक्षी [उस आत्मा के न रहने को जानने वाला]
कौन होगा ? उसका तो कोई भी साक्षी नहीं हो सकता । बिना
साक्षी के ही आत्मबाध मान लेना ठीक नहीं है। अतिप्रसक्ति के
डर से साक्षिरहित बाध को कोई भी नहीं मानता है।
अपनीतेषु मूर्तेषु ह्यमूर्तं शिष्यते वियत् ।
शक्येषु बाधितेष्वन्ते शिष्यते यत्तदेव तत् ॥३०॥

८४ पञ्चदशी

मूर्त पदार्थों के हटा दिये जाने पर जैसे अमूर्त आकाश
शेष रह जाता है, इसी प्रकार वाधा करने योग्य पदार्थों की
बाधा कर देने पर पीछे से जो अबाध्य तत्व शेष रह जाता है,
वही ब्रह्म है ।
घर में रक्खे हुए घटादि मूर्त पदार्थ, जब उसमें से बाहर
निकाल दिये जाते हैं, तब जैसे हटाया न जा सकने वाला एक
आकाश ही घर में शेष रह जाता है । इसी प्रकार आत्मा से
भिन्न देहेन्द्रियादि मूर्त और अमूर्त पदार्थों के—जिनका कि
निराकरण हो सकता है—'नेति नेति' श्रुति से हटा दिये
जाने पर, पीछे से सम्पूर्ण निराकरणों [निषेधों] का साक्षी
जो भी बोध शेष रह जाता है, बाधरहित वही तत्व 'आत्मा'
कहाता है ।
सर्वबाधे न किञ्चिच्चेद्यन्न किंचित्तदेव तत् ।
भाषा एवात्र भिद्यन्ते निर्बाधं तावदस्ति हि ॥३१॥
'तुम्हारी कही विधि से सब की बाधा कर देने पर तो,
कुछ भी नहीं रहता है' ऐसा यदि कोई कहने लगे, तो उस से
कहो कि जो 'कुछ भी नहीं है' उसी को ब्रह्म जान लो । 'न
किंचित्' इस शब्द से जिस चैतन्य का उल्लेख किया जाता है
उसी को ब्रह्म मान लेना चाहिये ।
तात्पर्य यह है कि जो मनुष्य यह कहता है कि 'कुछ भी
शेष नहीं रहता' उस को सकलाभाव विषय का [सब कुछ
न होने का] ज्ञान तो अवश्य ही मानना होगा । बस तब हम
कहेंगे कि यह ज्ञान ही हमारे आत्मा का स्वरूप है । अरे भाई,
इस बाधसाक्षी प्रत्यगात्मा के विषय में 'न किंचित्' आदि

पञ्चकोशविवेकप्रकरणम् ८५

पञ्चकोशविवेकप्रकरणम् ८५
भाषा ही भिन्न भिन्न हो गई हैं। बाधरहित साक्षिचैतन्य तो
एक ही है। यह और बात है कि उस चैतन्य का वर्णन हम
भले ही 'न किंचित्' इस अभाववाचक शब्द से कर डालें।
बाध का साक्षी तो हमें प्रत्येक अवस्था में मानना ही पड़ेगा।
उस के वाचक शब्दों में झगड़ा हो सकता है। वाच्य आत्मतत्व
में तो किसी प्रकार की भी विप्रतिपत्ति नहीं हो सकती।
अत एव श्रुतिर्बाध्यं बाधित्वा शेषयत्यदः ।
स एष नेति नेत्यात्मेत्यतद्व्यावृत्तिरूपतः ॥३२॥
क्योंकि यह साक्षिचैतन्य एक अबाध्य वस्तु है इसलिये
'स एष नेति नेत्यात्मा' (बृ० ३-९-२६) इस श्रुति ने, अनात्म
पदार्थों का निषेध करते करते, निषेध करने योग्य सब अनात्म
पदार्थों की बाधा करके, निराकरण के अयोग्य, इस प्रत्यक्
स्वरूप को शेष रख लिया है।
इदं रूपं तु यद्यावत् त्यक्तुं शक्यतेऽखिलम् ।
अशक्यो ह्यनिदंरूपः स आत्मा बाधवर्जितः ॥३३॥
जो 'इदं' है [जो दृश्य रूप से हमारे अनुभव में आता
है] वह जितना भी [देहेन्द्रियादि सम्पूर्ण दृश्य जगत्] है वह
तो सब का सब ही त्याग किया जा सकता है। परन्तु प्रत्यग्रूप
होने से जिस को 'इदं' नहीं कह सकते, उस साक्षी आत्मा
का त्याग तो हो ही नहीं सकता [क्योंकि वह तो त्याग करने
वाले का अपना स्वरूप ही है, फिर उस का त्याग कैसे किया
जा सकता है ?] निष्कर्ष यही निकलता है कि वह बाधरहित
[सत्य] साक्षी ही आत्मा है [अहंकारादि दृश्य पदार्थ आत्मा
नहीं हैं]।

८६ पंचदशी
सिद्धं ब्रह्मणि सत्यत्वं, ज्ञानत्वं तु पुरेरितम् ।
स्वयमेवानुभूतित्वादित्यादिवचनै स्फुटम् ॥३४॥
ब्रह्म के लक्षण में जिस सत्यता का वर्णन आया है वही
सत्यता आत्मा में भी है यह यहां तक सिद्ध हो गया । इसी
प्रकरण के 'स्वयमेवानुभूतित्वाद्विद्यते नानुभाव्यता' इत्यादि तेरहवें
श्लोक में आत्मा की ज्ञानरूपता भी पहले भले प्रकार कही जा
चुकी है ।
न व्यापित्वाद्देशतोऽन्तो नित्यत्वान्नापि कालतः ।
न वस्तुतोऽपि सर्वात्म्या दानन्त्यं ब्रह्मणि त्रिधा ॥३५॥
व्यापक होने से देशकृत अन्त नहीं, नित्य होने से काल-
कृत अन्त नहीं, सर्वात्मा होने से वस्तुकृत अन्त नहीं, यों
ब्रह्म में तीन प्रकार की अनन्तता होती है ।
'नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मम्' (मुण्ड० १-१-६) 'आकाशवत्
सर्वगतश्च नित्यः' 'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्' (कठ०
२-४-१३) 'इदं सर्वं यदयमात्मा' (बृ० २-४-६) 'सर्वं ह्येतद् ब्रह्म'
(माण्डू० २) 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' इत्यादि श्रुतियों में ब्रह्म की
व्यापकता नित्यता और सर्वात्मकता का उल्लेख किया गया है ।
इस से ब्रह्म में तीन प्रकार की अनन्तता माननी चाहिये कि
यह ब्रह्म देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है ।
व्यापक होने के कारण उस का देशकृत अन्त कहीं नहीं
होता---'कि यहां वा यहां ब्रह्म नहीं है' । नित्य होने के कारण
उस का कालकृत अन्त कभी नहीं होता कि—'तब ब्रह्म नहीं
था, अब ब्रह्म नहीं है, तब ब्रह्म नहीं रहेगा इत्यादि' । सब
का आत्मा होने के कारण उस का वस्तुकृत अन्त भी नहीं

पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८७

पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८७
होता। जैसे यह कहा जाता है कि घट पट नहीं है तो यह
घट का वस्तुकृत अन्त हो गया। ऐसे ब्रह्म को यह नहीं कह
सकते कि ब्रह्म घट नहीं है ब्रह्म पट नहीं है। वह तो सर्वात्मा
होने से घट भी है और पट भी है। यों ब्रह्म में तीन प्रकार
की अनन्तता रहती है।
देशकालान्यवस्तूनां कल्पितत्वाच्च मायया।
न देशादिकृतोऽन्तोस्ति ब्रह्मानन्त्यं स्फुटं ततः ॥३६॥
देश काल तथा अन्य वस्तुओं की कल्पना माया ही ने तो
कर डाली है। इससे ब्रह्म में उन [ देश कालादि ] का किया
हुआ अन्त नहीं हो सकता। यों ब्रह्म की अनन्तता समझ में
आ सकती है।
परिच्छेद कर डालने वाले देश, काल तथा अन्य पदार्थ
सब माया ही ने तो कल्पित कर लिये हैं। सो जैसे गन्धर्व
नगर से आकाश में जब देशादिकृत अन्त प्रतीत होने लगता
है; वह अन्त जैसे पारमार्थिक नहीं होता, इसी प्रकार माया
के बनाये देशादि का किया हुआ परिच्छेद [ खण्ड ] ब्रह्म में
नहीं होता। इससे ब्रह्म की अनन्तता सब को स्पष्ट हो जाती
है। उस ब्रह्म तथा आत्मा को 'अयमात्मा ब्रह्म' [बृ० २-५-१९]
इत्यादि श्रुतियें एक बता रही हैं, इस कारण आत्मा की अनन्तता
तो स्वतः ही सिद्ध हो जाती है।
सत्यं ज्ञानमनन्तं यद् ब्रह्म तद्वस्तु, तस्य तत्।
ईश्वरत्वं च जीवत्व मुपाधिद्वयकल्पितम् ॥३७॥
जो ब्रह्म नाम की वस्तु सत्य, ज्ञान तथा अनन्त है, वही
एक पारमार्थिक वस्तु इस संसार में है। उस ब्रह्म को जब

८८ पञ्चदशी
'ईश्वर' वा 'जीव' कहा जाता है, वह आगे कही दो उपाधियों
से कल्पित किया हुआ होता है [ कल्पित होने से ही ये जीवे-
श्वर भी उस ब्रह्म के परिच्छेदक नहीं बन सकते हैं ]
शक्तिरस्त्यैश्वरी काचित् सर्ववस्तुनियामिका ।
आनन्दमयमारभ्य गूढा सर्वेषु वस्तुषु ॥३८॥
ऐश्वरी अर्थात् ईश्वर से सम्बन्ध रखने वाली [ ईश्वर की
उपाधि बनी हुई] कोई एक ऐसी शक्ति है [जिसका सत् या असत्
किसी भी रूप से निर्वचन नहीं हो सकता] जो [पृथिवी आदि]
सम्पूर्ण नियम्य वस्तुओं को नियम में रख रही है। वह शक्ति
आनन्दमय से लेकर [ब्रह्माण्ड पर्यन्त] सभी वस्तुओं में गूढ भाव
से छिपी बैठी है [यही कारण है कि वह दीख नहीं पड़ रही है]।
वस्तुधर्मा नियम्येरन् शक्त्या नैव यदा तदा ।
अन्योऽन्यधर्मसांकर्याद् विप्लवेत जगत् खलु ॥३९॥
यदि यह शक्ति, पृथिवी आदि वस्तुओं के [काठिन्य द्रवत्व
आदि ] धर्मों को नियम में न रखती होती तो अन्योऽन्य धर्म
की संकरता किंवा मिश्रण हो जाने से [ किसी एक जगह
नियत भाव से न रहने से ] जगत् में विप्लव मच जाता ।
चिच्छायावेशतः शक्तिश्चेतनेव विभाति सा।
तच्छक्त्युपाधिसंयोगाद् ब्रह्मैवेश्वरतां व्रजेत् ॥४०॥
चिच्छायावेश [ किंवा चिदाभासके प्रवेश ] से यह शक्ति
चेतन सी प्रतीत हुआ करती है [ इसी से वह नियामक हो
सकती है ] उस शक्ति रूपी उपाधि के सम्बन्ध से [ सत्यादि
रूप ] ब्रह्म ही ईश्वरभाव को प्राप्त हो जाता है [किंवा सर्वज्ञत्व
आदि धर्मों से युक्त हो जाता है ]।

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ८९

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ८९
कोशोपाधिविवक्षायां याति ब्रह्मैव जीवताम् ।
पिता पितामहश्चैकः पुत्रपौत्रौ यथा प्रति ॥४१॥
कोश रूपी उपाधि की पर्यालोचना जब की जाती है, तब
सत्यादिलक्षण 'ब्रह्म' ही 'जीव' बन जाता है । जैसे कि एक
ही देवदत्त एक ही समय पुत्र के प्रति तो पिता तथा पौत्र के
प्रति पितामह हो जाता है [ इसी प्रकार ब्रह्म भी कोशरूपी
उपाधि की विवक्षा में तो 'जीव' होजाता है तथा उसी समय
शक्तिरूपी उपाधि की विवक्षा में 'ईश्वर' बन जाता है ] ।
पुत्रादेरविवक्षायां न पिता न पितामहः ।
तद्वन्नेशो नापि जीवः शक्तिकोशाविवक्षणे ॥४२॥
पुत्रादि की जब विवक्षा नहीं रहती, तब न तो यह देवदत्त
पिता ही होता है और न पितामह ही कहाता है । ठीक इसी
प्रकार जब शक्ति और कोश की विवक्षा किसी चतुर साधक
को नहीं रह जाती [ जब वह इन उपाधियों की ओर को दृष्टि
ही नहीं डालता ] तब वह ब्रह्म, 'ईश्वर' या 'जीव' कुछ भी
नहीं रहता ।
य एवं ब्रह्म वेदैष ब्रह्मैव भवति स्वयम् ।
ब्रह्मणो नास्ति जन्मातः पुनरेष न जायते ॥४३॥
जो ब्रह्म को इस तरह जान लेता है वह स्वयं ब्रह्म ही
हो जाता है । ब्रह्म का जन्म नहीं होता इससे फिर वह भी
उत्पन्न नहीं होता । चारों साधनों से युक्त जो कोई महा-
पुरुष इस प्रकार पांचों कोशों का विवेक करलेने के पश्चात्
सत्यादिस्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है, वह स्वयं ब्रह्म
ही हो जाता है । 'स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति'(मु० ३-
६

९० पञ्चदशी
२–९) ब्रह्मविदाप्नोति परम् (तै० २–१) ये श्रुतियां भी इसी
अर्थ को कह रही हैं। 'न जायते म्रियते वा विपश्चित्' (कां० १–
२–१८) यह श्रुति कह रही है कि ब्रह्म का जन्म नहीं होता।
यही कारण है कि विद्वान् पुरुष भी अपने आत्मा को ब्रह्मरूप
समझ लेने से फिर कभी जन्मता नहीं। यही बात 'न स पुनरा-
वर्तते' (छा० ८–१५–१) इस श्रुति ने भी कही है।
इति श्री मद्विद्यारण्यमुनिविरचितं पंचकोशविवेकप्रकरणं समाप्तम्।

4. Dvaita Viveka

ओम्
द्वैतविवेकप्रकरणम्
ईश्वरेणापि जीवेन सृष्टं द्वैतं विविच्यते ।
विवेके सति जीवेन हेयो बन्धः स्फुटीभवेत् ॥१॥
[कारणोपाधि] ईश्वर तथा [कार्योपाधि] जीव के बनाये
हुए द्वैत को अब पृथक् पृथक् कर के दिखाया जाता है [कि
कौन सा द्वैत ईश्वरकृत है तथा कौन सा जीव का बनाया हुआ
है] । जीव और ईश्वर के बनाये हुए द्वैत का विवेक हो जाने
पर यह मालूम हो जायगा कि जीव को इस बन्ध [ किंवा
बन्धहेतु द्वैत ] को छोड़ देना चाहिये । [ तब यह निश्चय हो
सकेगा कि जीव को इतना द्वैत तो छोड़ देना चाहिये और
इतने द्वैत को छोड़ना नहीं चाहिये । इस द्वैत को हटाना हमारे
बस का नहीं है क्योंकि वह द्वैत ईश्वर के संकल्प से बना है ।
हमें तो अपना द्वैत हटाना है । ]
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।
स मायी सृजतीत्याहुः श्वेताश्वतरशाखिनः ॥२॥
प्रकृति को तो 'माया' समझना चाहिये तथा महेश्वर को
'मायी' ( माया का मालिक ) जानना चाहिये । वह मायी ही
इस जगत् का सर्जन किया करता है, ऐसा श्वेताश्वतर शाखा
वाले कहते हैं [ इस प्रमाण के रहते हुए जीवों के अदृष्टादि
किसी को भी जगत् का कारण मानना ठीक नहीं है ] ।

आत्मा वा इदमग्रे ऽभूत् स ईक्षत सृजा इति ।
संकल्पानासृजल्लोकान् स एतानिति बह्वृचाः ॥३॥
'आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत्किंचन मिषत् स ईक्षत
लोकान्नु सृजा इति स इमांल्लोकानसृजत' (ऐतरेय २-१-१) इस
श्रुति के द्वारा बह्वृच शाखा वालों ने कहा है कि यह सब
पहले आत्मा ही आत्मा था । उस ने ईक्षण किया कि जगत्
का सर्जन करूँ। बस उस ने संकल्प से ही इन लोकों को
उत्पन्न कर डाला ।
खं वाय्वग्निजलोर्व्योषध्यन्नदेहाः क्रमादमी ।
संभूता ब्रह्मणस्तस्मादेतस्मादात्मनोऽखिलाः ॥४॥
तैत्तिरीय में कहा गया है कि उस इस ब्रह्म नाम के आत्मा
से ही ये सब आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, ओषधि,
अन्न, तथा देह क्रमानुसार उत्पन्न हो गये हैं ।
बहु स्यामहमेवातः प्रजायेयेति कामतः ।
तपस्तप्त्वासृजत् सर्वं जगदित्याह तित्तिरिः ॥५॥
'सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय' (तै० २-६) मैं बहुत हो जाऊं-
प्रजा रूप से उत्पन्न हो जाऊं—इस कामना से तप को तप कर
[ विचार करके ] इस सब जगत् को उत्पन्न कर डाला । यों
"जगत् के सर्जन की इच्छा और विचारात्मक तप से जगत्
का स्रष्टृत्व ब्रह्म में है" यह बात तित्तिरि ने कही है । [उसका
तप 'यस्य ज्ञानमयं तपः' के अनुसार विचार रूप में ही होता है ।
साधारण पुरुष जिस काम को शरीरबल से करते हैं महापुरुष
उसको विचाररूप में किया करते हैं । महापुरुषों के संकल्प
में ही कर्म का बल रहता है । ज्यों ज्यों बहिर्मुखता बढ़ती

[Page Header: द्वैतविवेकप्रकरणम् ९३]

[Page Header: द्वैतविवेकप्रकरणम् ९३]

जाती है त्यों त्यों संकल्प का बल घटने लगता है और
अगत्या कर्म बल से कार्य चलाना पड़ता है। परमेश्वर में वह
संकल्प बल अत्यधिक मात्रा में रहता है इस कारण वे विचार-
मात्र से सब कुछ बना लेते हैं।
इदमग्रे सदेवासीद् बहुत्याय तदैक्षत ।
तेजोऽबन्नाण्डजादीनि ससर्जेति च सामगाः॥६॥
'सदेव सोम्येदमग्र आसी देकमेवाद्वितीयम्' (छा० ६–२–१)
में सद्रूप ब्रह्म का उल्लेख करके सामगों ने कहा है कि उसने
बहुभाव का विचार किया और फिर तेज, जल, पृथिवी, अन्न
तथा अण्डजादि प्राणियों को उत्पन्न करडाला।
विस्फुलिङ्गा यथा वन्हे र्जायन्तेऽक्षरतस्तथा ।
विविधाश्चिज्जडा भावा इत्याथर्वणिका श्रुतिः ॥७॥
'तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते
सरूपाः तथाऽक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति'
(मुण्ड० २–१–१) इस आथर्वण श्रुति में कहा गया है कि
जैसे वह्नि से चिनगारी निकल पड़ती है, इसी प्रकार अक्षर
तत्व से विविध प्रकार के चेतन और जड पदार्थ उत्पन्न हो
जाते हैं।
जगदव्याकृतं पूर्व मासीद् व्याक्रियताधुना ।
दृश्याभ्यां नामरूपाभ्यां विराडादिषु ते स्फुटे ॥८॥
विराणमनुर्नरा गावः खराश्वाजावयस्तथा ।
पिपीलिकावधि द्वन्द्वमिति वाजसनेयिनः ॥९॥
'तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतासौनामा-

यमिदंरूप इति' [बृ० १-४-७] इस प्रकरण में वाजसनेयियों

यमिदंरूप इति' [बृ० १-४-७] इस प्रकरण में वाजसनेयियों
ने यह कहा है कि यह जगत् पहले अव्याकृत था अब [उस
में केवल उतना ही परिवर्तन और हुआ है कि] वह दृश्य
नाम तथा दृश्य रूप से व्याकृत होगया है। वे नाम और रूप
विराद् आदि स्थूल कार्यों में स्पष्ट ही दीखते हैं। विराद्,
मनु, मनुष्य, गाय, गधा, घोड़ा, बकरी, भेड़ तथा पिपीलिका
पर्यन्त जितने भी मिथुन [जोड़े-दम्पति] हैं वे सब विराडादि
कहे जाते हैं।
कृत्वा रूपान्तरं जैवं देहे प्राविशदीश्वरः।
इति ताः श्रुतयः प्राहु र्जीवत्वं प्राणधारणात् ॥१०॥
उन्हीं श्रुतियों ने यह बात भी कही है कि वही ईश्वर
अपना रूपान्तर कर के अर्थात् जीव रूप को धारण कर के
देहों में प्रवेश कर गया है अर्थात् जीव बन गया है। प्राणों
को धारण करने किंवा स्वामी होकर उन का प्रेरक होने से ही
जीवभाव आजाता है [इसी से कहा है कि जैव रूप करके
प्रविष्ट होगया है]।
चैतन्यं यदधिष्ठानं लिङ्गदेहश्च यः पुनः।
चिच्छाया लिङ्गदेहस्था तत्संघो जीव उच्यते ॥११॥
लिङ्ग देह की कल्पना का आधार जो कि अधिष्ठान चैतन्य
है एक तो वह, दूसरे उस में कल्पित जो कि लिङ्गदेह है,
तीसरे उस लिङ्गदेह में जो चिदाभास पड़ा हुआ है, इन तीनों
का संघ ही 'जीव' कहा जाता है।
माहेश्वरी तु माया या तस्या निर्माणशक्तिवत्।
विद्यते मोहशक्तिश्च तं जीवं मोहयत्यसौ ॥१२॥

द्वैतविवेकप्रकरणम् ९५

द्वैतविवेकप्रकरणम् ९५
महेश्वर की जो माया है, उस में जैसे जगत् के सर्जन
का सामर्थ्य है, इसी प्रकार उस में मोहन का सामर्थ्य भी
रहता है। उस माया की वह मोहन शक्ति उस विचारे जीव
को मोहित कर देती है। [उस के मोहन प्रभाव में आकर
उसे अपने चिदानन्दादिस्वरूप का ज्ञान ही नहीं रह जाता है।
मोहादनीशतां प्राप्य मग्नो वपुषि शोचति ।
ईशसृष्टमिदं द्वैतं सर्वमुक्तं समासतः ॥१३॥
मोह में फंसकर अनीश बनकर [इष्टकी प्राप्ति में और
अनिष्ट के परित्याग में बेबस (असमर्थ) होकर] शरीर में
ही अहंभाव से डूबकर, शोक किया करता है किंवा [इसकी
टूट फूट और इसकी आवश्यकताओं से] अपने आपको दुःखी
मान बैठता है। यही बात 'समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति
मुह्यमानः' [मु० ३-२-१] इस श्रुति में कही गयी है। ईश्वर
के बनाये हुए द्वैतको यहाँ तक संक्षेप से कह दिया गया है।
सप्तान्नब्राह्मणे द्वैतं जीवसृष्टं प्रपञ्चितम् ।
अन्नानि सप्त ज्ञानेन कर्मणाऽजनयत् पिता ॥१४॥
'यत् सप्तान्नानि मेधया तपसाऽजनयत् पिता' (बृ० १-५-१) इस
श्रुति वाले सप्तान्न ब्राह्मण में जीव के बनाये हुए द्वैत का प्रपंच
किया है कि पिता [अर्थात् अदृष्ट रूपी भाग (अपना हिस्सा)
देकर उसके द्वारा इस जगत् को उत्पन्न करके सकल लोक के
पालने वाले इस जीव] ने ज्ञान और अपने कर्म के द्वारा सात
अन्नों को उत्पन्न किया।
मर्त्यान्नमेकं देवान्ने द्वे पश्वन्नं चतुर्थकम् ।
अन्यत्त्रितयमात्मार्थ मन्नानां विनियोजनम् ॥१५॥

९६ पञ्चदशी
'एकमस्य साधारणं द्वे देवानभाजयत् त्रीण्यात्मनेऽकुरुत पशुभ्य
एकं प्रायच्छत्' ( बृ० १-५-२ ) इस वाक्य में उन सातों अन्नों
का विनियोग यों किया गया है कि—उनमें से एक तो मर्त्यान्न
है। दो देवताओं के अन्न हैं। एक पशुओं का अन्न है। शेष
तीन को उसने केवल आत्मा के लिये रख लिया है।
व्रीह्यादिकं दर्शपूर्णमासौ क्षीरं तथा मनः।
वाक् प्राणश्चेति सप्तत्व मन्नाना मवगम्यताम् ॥१६॥
व्रीह्यादिक, दर्श, पूर्णमास, दुग्ध, मन, वाक् तथा प्राण ये
सात अन्न कहाते हैं।
ईशेन यद्यप्येतानि निर्मितानि स्वरूपतः।
तथापि ज्ञानकर्मभ्यां जीवोऽकार्षीत्तदन्नताम् ॥१७॥
ईश्वर ने यद्यपि इनका स्वरूप ही बनाया था। परन्तु
इनका अन्नपन अर्थात् भोग्याकार तो जीव ने ही बना लिया
है। उसने ज्ञान और कर्म के सहारे से इन व्रीही आदि प्राणान्त
पदार्थों को अपना अन्न किंवा भोग्य बना डाला है।
जब उस जीव को देवताध्यान आदि विहित ज्ञान तथा
परस्त्रीध्यानादि प्रतिषिद्ध ज्ञान होता है, जब यह जीव यज्ञादि
विहित कर्म और हिंसा आदि प्रतिषिद्ध कर्म कर बैठता है तब
ईश्वर की बनाई ये सब वस्तुयें उसके भोग के साधन बन जाती
हैं। फिर ये चीजें भोग्य बन कर उसके काम में आने लगती
हैं। यदि उस जीव को वैसा ज्ञान न हो और उस ज्ञान से वह
जीव वैसे-वैसे कर्म न करे तो ये वस्तुयें उसकी भोग्य किंवा
उस के अन्न कदापि न बनें। इसी से कहा गया है कि
ईश्वर ने तो इनका केवल स्वरूप ही बनाया था। अपने