पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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में से निकल बाहर होना जान जाते हैं] किंवा बुद्ध से उन
[पांचों कोशों] को अनात्मा समझ लेते हैं, तब इन कोशों का
साक्षी जो बोध शेष रह जाता है, वह साक्षिरूपी बोध ही तो
'निज रूप' अथवा 'ब्रह्म' है । उस साक्षिरूपी बोध को शून्य
[अर्थात् कुछ नहीं] कह देना हँसी खेल नहीं है । यह एक
बड़ा ही दुर्घट काम है ।
अस्ति तावत् स्वयं नाम विवादाविषयत्वतः ।
स्वस्मिन्नपि विवादश्चेत् प्रतिवाद्यत्र को भवेत् ॥२३॥
स्वयं [अपना आपा] नाम की कोई चीज तो, क्या लौकिक
और क्या वैदिक सभी के मत में है ही । क्योंकि वह कभी
विवाद का विषय ही नहीं होती है । अपने आपे में कभी
किसी को विप्रतिपत्ति नहीं होती कि मैं हूँ या नहीं हूँ ? यदि
किसी को अपने आपे में भी विप्रतिपत्ति होती हो, तो बताओ
कि इस विप्रतिपत्ति का प्रतिवादी कौन होगा ?
स्वासत्त्वं तु न कस्मैचिद्रोचते विभ्रमं विना ।
अतएव श्रुतिर्बाधं ब्रूते चासत्त्ववादिनः ॥२४॥
भ्रान्ति [पागलपन] को छोड़कर और किसी भी दशा में
अपना अभाव किसी को भी अच्छा नहीं लग सकता । यही
कारण है कि अगले श्लोक में उद्धृत श्रुति असत्त्ववादी का
बाध कह रही है ।
असद्ब्रह्मेति चेद्वेद स्वयमेव भवेदसत् ।
अतोऽस्य मा भूद्बोध्यत्वं स्वसत्त्वं त्वभ्युपेयताम् ॥२५॥
यदि कोई यह समझता है कि 'ब्रह्म असत् है' तो वह
[ ब्रह्म को असत् जानने वाला ] स्वयं भी असत् ही हो जाता