पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 110, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंआत्मा वा इदमग्रे ऽभूत् स ईक्षत सृजा इति ।
संकल्पानासृजल्लोकान् स एतानिति बह्वृचाः ॥३॥
'आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत्किंचन मिषत् स ईक्षत
लोकान्नु सृजा इति स इमांल्लोकानसृजत' (ऐतरेय २-१-१) इस
श्रुति के द्वारा बह्वृच शाखा वालों ने कहा है कि यह सब
पहले आत्मा ही आत्मा था । उस ने ईक्षण किया कि जगत्
का सर्जन करूँ। बस उस ने संकल्प से ही इन लोकों को
उत्पन्न कर डाला ।
खं वाय्वग्निजलोर्व्योषध्यन्नदेहाः क्रमादमी ।
संभूता ब्रह्मणस्तस्मादेतस्मादात्मनोऽखिलाः ॥४॥
तैत्तिरीय में कहा गया है कि उस इस ब्रह्म नाम के आत्मा
से ही ये सब आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, ओषधि,
अन्न, तथा देह क्रमानुसार उत्पन्न हो गये हैं ।
बहु स्यामहमेवातः प्रजायेयेति कामतः ।
तपस्तप्त्वासृजत् सर्वं जगदित्याह तित्तिरिः ॥५॥
'सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय' (तै० २-६) मैं बहुत हो जाऊं-
प्रजा रूप से उत्पन्न हो जाऊं—इस कामना से तप को तप कर
[ विचार करके ] इस सब जगत् को उत्पन्न कर डाला । यों
"जगत् के सर्जन की इच्छा और विचारात्मक तप से जगत्
का स्रष्टृत्व ब्रह्म में है" यह बात तित्तिरि ने कही है । [उसका
तप 'यस्य ज्ञानमयं तपः' के अनुसार विचार रूप में ही होता है ।
साधारण पुरुष जिस काम को शरीरबल से करते हैं महापुरुष
उसको विचाररूप में किया करते हैं । महापुरुषों के संकल्प
में ही कर्म का बल रहता है । ज्यों ज्यों बहिर्मुखता बढ़ती