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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 726 में से

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पृष्ठ 109

ओम्
द्वैतविवेकप्रकरणम्
ईश्वरेणापि जीवेन सृष्टं द्वैतं विविच्यते ।
विवेके सति जीवेन हेयो बन्धः स्फुटीभवेत् ॥१॥
[कारणोपाधि] ईश्वर तथा [कार्योपाधि] जीव के बनाये
हुए द्वैत को अब पृथक् पृथक् कर के दिखाया जाता है [कि
कौन सा द्वैत ईश्वरकृत है तथा कौन सा जीव का बनाया हुआ
है] । जीव और ईश्वर के बनाये हुए द्वैत का विवेक हो जाने
पर यह मालूम हो जायगा कि जीव को इस बन्ध [ किंवा
बन्धहेतु द्वैत ] को छोड़ देना चाहिये । [ तब यह निश्चय हो
सकेगा कि जीव को इतना द्वैत तो छोड़ देना चाहिये और
इतने द्वैत को छोड़ना नहीं चाहिये । इस द्वैत को हटाना हमारे
बस का नहीं है क्योंकि वह द्वैत ईश्वर के संकल्प से बना है ।
हमें तो अपना द्वैत हटाना है । ]
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।
स मायी सृजतीत्याहुः श्वेताश्वतरशाखिनः ॥२॥
प्रकृति को तो 'माया' समझना चाहिये तथा महेश्वर को
'मायी' ( माया का मालिक ) जानना चाहिये । वह मायी ही
इस जगत् का सर्जन किया करता है, ऐसा श्वेताश्वतर शाखा
वाले कहते हैं [ इस प्रमाण के रहते हुए जीवों के अदृष्टादि
किसी को भी जगत् का कारण मानना ठीक नहीं है ] ।