पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८७
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८७
होता। जैसे यह कहा जाता है कि घट पट नहीं है तो यह
घट का वस्तुकृत अन्त हो गया। ऐसे ब्रह्म को यह नहीं कह
सकते कि ब्रह्म घट नहीं है ब्रह्म पट नहीं है। वह तो सर्वात्मा
होने से घट भी है और पट भी है। यों ब्रह्म में तीन प्रकार
की अनन्तता रहती है।
देशकालान्यवस्तूनां कल्पितत्वाच्च मायया।
न देशादिकृतोऽन्तोस्ति ब्रह्मानन्त्यं स्फुटं ततः ॥३६॥
देश काल तथा अन्य वस्तुओं की कल्पना माया ही ने तो
कर डाली है। इससे ब्रह्म में उन [ देश कालादि ] का किया
हुआ अन्त नहीं हो सकता। यों ब्रह्म की अनन्तता समझ में
आ सकती है।
परिच्छेद कर डालने वाले देश, काल तथा अन्य पदार्थ
सब माया ही ने तो कल्पित कर लिये हैं। सो जैसे गन्धर्व
नगर से आकाश में जब देशादिकृत अन्त प्रतीत होने लगता
है; वह अन्त जैसे पारमार्थिक नहीं होता, इसी प्रकार माया
के बनाये देशादि का किया हुआ परिच्छेद [ खण्ड ] ब्रह्म में
नहीं होता। इससे ब्रह्म की अनन्तता सब को स्पष्ट हो जाती
है। उस ब्रह्म तथा आत्मा को 'अयमात्मा ब्रह्म' [बृ० २-५-१९]
इत्यादि श्रुतियें एक बता रही हैं, इस कारण आत्मा की अनन्तता
तो स्वतः ही सिद्ध हो जाती है।
सत्यं ज्ञानमनन्तं यद् ब्रह्म तद्वस्तु, तस्य तत्।
ईश्वरत्वं च जीवत्व मुपाधिद्वयकल्पितम् ॥३७॥
जो ब्रह्म नाम की वस्तु सत्य, ज्ञान तथा अनन्त है, वही
एक पारमार्थिक वस्तु इस संसार में है। उस ब्रह्म को जब
८८ पञ्चदशी
'ईश्वर' वा 'जीव' कहा जाता है, वह आगे कही दो उपाधियों
से कल्पित किया हुआ होता है [ कल्पित होने से ही ये जीवे-
श्वर भी उस ब्रह्म के परिच्छेदक नहीं बन सकते हैं ]
शक्तिरस्त्यैश्वरी काचित् सर्ववस्तुनियामिका ।
आनन्दमयमारभ्य गूढा सर्वेषु वस्तुषु ॥३८॥
ऐश्वरी अर्थात् ईश्वर से सम्बन्ध रखने वाली [ ईश्वर की
उपाधि बनी हुई] कोई एक ऐसी शक्ति है [जिसका सत् या असत्
किसी भी रूप से निर्वचन नहीं हो सकता] जो [पृथिवी आदि]
सम्पूर्ण नियम्य वस्तुओं को नियम में रख रही है। वह शक्ति
आनन्दमय से लेकर [ब्रह्माण्ड पर्यन्त] सभी वस्तुओं में गूढ भाव
से छिपी बैठी है [यही कारण है कि वह दीख नहीं पड़ रही है]।
वस्तुधर्मा नियम्येरन् शक्त्या नैव यदा तदा ।
अन्योऽन्यधर्मसांकर्याद् विप्लवेत जगत् खलु ॥३९॥
यदि यह शक्ति, पृथिवी आदि वस्तुओं के [काठिन्य द्रवत्व
आदि ] धर्मों को नियम में न रखती होती तो अन्योऽन्य धर्म
की संकरता किंवा मिश्रण हो जाने से [ किसी एक जगह
नियत भाव से न रहने से ] जगत् में विप्लव मच जाता ।
चिच्छायावेशतः शक्तिश्चेतनेव विभाति सा।
तच्छक्त्युपाधिसंयोगाद् ब्रह्मैवेश्वरतां व्रजेत् ॥४०॥
चिच्छायावेश [ किंवा चिदाभासके प्रवेश ] से यह शक्ति
चेतन सी प्रतीत हुआ करती है [ इसी से वह नियामक हो
सकती है ] उस शक्ति रूपी उपाधि के सम्बन्ध से [ सत्यादि
रूप ] ब्रह्म ही ईश्वरभाव को प्राप्त हो जाता है [किंवा सर्वज्ञत्व
आदि धर्मों से युक्त हो जाता है ]।
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ८९
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ८९
कोशोपाधिविवक्षायां याति ब्रह्मैव जीवताम् ।
पिता पितामहश्चैकः पुत्रपौत्रौ यथा प्रति ॥४१॥
कोश रूपी उपाधि की पर्यालोचना जब की जाती है, तब
सत्यादिलक्षण 'ब्रह्म' ही 'जीव' बन जाता है । जैसे कि एक
ही देवदत्त एक ही समय पुत्र के प्रति तो पिता तथा पौत्र के
प्रति पितामह हो जाता है [ इसी प्रकार ब्रह्म भी कोशरूपी
उपाधि की विवक्षा में तो 'जीव' होजाता है तथा उसी समय
शक्तिरूपी उपाधि की विवक्षा में 'ईश्वर' बन जाता है ] ।
पुत्रादेरविवक्षायां न पिता न पितामहः ।
तद्वन्नेशो नापि जीवः शक्तिकोशाविवक्षणे ॥४२॥
पुत्रादि की जब विवक्षा नहीं रहती, तब न तो यह देवदत्त
पिता ही होता है और न पितामह ही कहाता है । ठीक इसी
प्रकार जब शक्ति और कोश की विवक्षा किसी चतुर साधक
को नहीं रह जाती [ जब वह इन उपाधियों की ओर को दृष्टि
ही नहीं डालता ] तब वह ब्रह्म, 'ईश्वर' या 'जीव' कुछ भी
नहीं रहता ।
य एवं ब्रह्म वेदैष ब्रह्मैव भवति स्वयम् ।
ब्रह्मणो नास्ति जन्मातः पुनरेष न जायते ॥४३॥
जो ब्रह्म को इस तरह जान लेता है वह स्वयं ब्रह्म ही
हो जाता है । ब्रह्म का जन्म नहीं होता इससे फिर वह भी
उत्पन्न नहीं होता । चारों साधनों से युक्त जो कोई महा-
पुरुष इस प्रकार पांचों कोशों का विवेक करलेने के पश्चात्
सत्यादिस्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है, वह स्वयं ब्रह्म
ही हो जाता है । 'स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति'(मु० ३-
६
९० पञ्चदशी
२–९) ब्रह्मविदाप्नोति परम् (तै० २–१) ये श्रुतियां भी इसी
अर्थ को कह रही हैं। 'न जायते म्रियते वा विपश्चित्' (कां० १–
२–१८) यह श्रुति कह रही है कि ब्रह्म का जन्म नहीं होता।
यही कारण है कि विद्वान् पुरुष भी अपने आत्मा को ब्रह्मरूप
समझ लेने से फिर कभी जन्मता नहीं। यही बात 'न स पुनरा-
वर्तते' (छा० ८–१५–१) इस श्रुति ने भी कही है।
इति श्री मद्विद्यारण्यमुनिविरचितं पंचकोशविवेकप्रकरणं समाप्तम्।
4. Dvaita Viveka
ओम्
द्वैतविवेकप्रकरणम्
ईश्वरेणापि जीवेन सृष्टं द्वैतं विविच्यते ।
विवेके सति जीवेन हेयो बन्धः स्फुटीभवेत् ॥१॥
[कारणोपाधि] ईश्वर तथा [कार्योपाधि] जीव के बनाये
हुए द्वैत को अब पृथक् पृथक् कर के दिखाया जाता है [कि
कौन सा द्वैत ईश्वरकृत है तथा कौन सा जीव का बनाया हुआ
है] । जीव और ईश्वर के बनाये हुए द्वैत का विवेक हो जाने
पर यह मालूम हो जायगा कि जीव को इस बन्ध [ किंवा
बन्धहेतु द्वैत ] को छोड़ देना चाहिये । [ तब यह निश्चय हो
सकेगा कि जीव को इतना द्वैत तो छोड़ देना चाहिये और
इतने द्वैत को छोड़ना नहीं चाहिये । इस द्वैत को हटाना हमारे
बस का नहीं है क्योंकि वह द्वैत ईश्वर के संकल्प से बना है ।
हमें तो अपना द्वैत हटाना है । ]
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।
स मायी सृजतीत्याहुः श्वेताश्वतरशाखिनः ॥२॥
प्रकृति को तो 'माया' समझना चाहिये तथा महेश्वर को
'मायी' ( माया का मालिक ) जानना चाहिये । वह मायी ही
इस जगत् का सर्जन किया करता है, ऐसा श्वेताश्वतर शाखा
वाले कहते हैं [ इस प्रमाण के रहते हुए जीवों के अदृष्टादि
किसी को भी जगत् का कारण मानना ठीक नहीं है ] ।
आत्मा वा इदमग्रे ऽभूत् स ईक्षत सृजा इति ।
संकल्पानासृजल्लोकान् स एतानिति बह्वृचाः ॥३॥
'आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत्किंचन मिषत् स ईक्षत
लोकान्नु सृजा इति स इमांल्लोकानसृजत' (ऐतरेय २-१-१) इस
श्रुति के द्वारा बह्वृच शाखा वालों ने कहा है कि यह सब
पहले आत्मा ही आत्मा था । उस ने ईक्षण किया कि जगत्
का सर्जन करूँ। बस उस ने संकल्प से ही इन लोकों को
उत्पन्न कर डाला ।
खं वाय्वग्निजलोर्व्योषध्यन्नदेहाः क्रमादमी ।
संभूता ब्रह्मणस्तस्मादेतस्मादात्मनोऽखिलाः ॥४॥
तैत्तिरीय में कहा गया है कि उस इस ब्रह्म नाम के आत्मा
से ही ये सब आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, ओषधि,
अन्न, तथा देह क्रमानुसार उत्पन्न हो गये हैं ।
बहु स्यामहमेवातः प्रजायेयेति कामतः ।
तपस्तप्त्वासृजत् सर्वं जगदित्याह तित्तिरिः ॥५॥
'सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय' (तै० २-६) मैं बहुत हो जाऊं-
प्रजा रूप से उत्पन्न हो जाऊं—इस कामना से तप को तप कर
[ विचार करके ] इस सब जगत् को उत्पन्न कर डाला । यों
"जगत् के सर्जन की इच्छा और विचारात्मक तप से जगत्
का स्रष्टृत्व ब्रह्म में है" यह बात तित्तिरि ने कही है । [उसका
तप 'यस्य ज्ञानमयं तपः' के अनुसार विचार रूप में ही होता है ।
साधारण पुरुष जिस काम को शरीरबल से करते हैं महापुरुष
उसको विचाररूप में किया करते हैं । महापुरुषों के संकल्प
में ही कर्म का बल रहता है । ज्यों ज्यों बहिर्मुखता बढ़ती
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जाती है त्यों त्यों संकल्प का बल घटने लगता है और
अगत्या कर्म बल से कार्य चलाना पड़ता है। परमेश्वर में वह
संकल्प बल अत्यधिक मात्रा में रहता है इस कारण वे विचार-
मात्र से सब कुछ बना लेते हैं।
इदमग्रे सदेवासीद् बहुत्याय तदैक्षत ।
तेजोऽबन्नाण्डजादीनि ससर्जेति च सामगाः॥६॥
'सदेव सोम्येदमग्र आसी देकमेवाद्वितीयम्' (छा० ६–२–१)
में सद्रूप ब्रह्म का उल्लेख करके सामगों ने कहा है कि उसने
बहुभाव का विचार किया और फिर तेज, जल, पृथिवी, अन्न
तथा अण्डजादि प्राणियों को उत्पन्न करडाला।
विस्फुलिङ्गा यथा वन्हे र्जायन्तेऽक्षरतस्तथा ।
विविधाश्चिज्जडा भावा इत्याथर्वणिका श्रुतिः ॥७॥
'तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते
सरूपाः तथाऽक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति'
(मुण्ड० २–१–१) इस आथर्वण श्रुति में कहा गया है कि
जैसे वह्नि से चिनगारी निकल पड़ती है, इसी प्रकार अक्षर
तत्व से विविध प्रकार के चेतन और जड पदार्थ उत्पन्न हो
जाते हैं।
जगदव्याकृतं पूर्व मासीद् व्याक्रियताधुना ।
दृश्याभ्यां नामरूपाभ्यां विराडादिषु ते स्फुटे ॥८॥
विराणमनुर्नरा गावः खराश्वाजावयस्तथा ।
पिपीलिकावधि द्वन्द्वमिति वाजसनेयिनः ॥९॥
'तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतासौनामा-
यमिदंरूप इति' [बृ० १-४-७] इस प्रकरण में वाजसनेयियों
यमिदंरूप इति' [बृ० १-४-७] इस प्रकरण में वाजसनेयियों
ने यह कहा है कि यह जगत् पहले अव्याकृत था अब [उस
में केवल उतना ही परिवर्तन और हुआ है कि] वह दृश्य
नाम तथा दृश्य रूप से व्याकृत होगया है। वे नाम और रूप
विराद् आदि स्थूल कार्यों में स्पष्ट ही दीखते हैं। विराद्,
मनु, मनुष्य, गाय, गधा, घोड़ा, बकरी, भेड़ तथा पिपीलिका
पर्यन्त जितने भी मिथुन [जोड़े-दम्पति] हैं वे सब विराडादि
कहे जाते हैं।
कृत्वा रूपान्तरं जैवं देहे प्राविशदीश्वरः।
इति ताः श्रुतयः प्राहु र्जीवत्वं प्राणधारणात् ॥१०॥
उन्हीं श्रुतियों ने यह बात भी कही है कि वही ईश्वर
अपना रूपान्तर कर के अर्थात् जीव रूप को धारण कर के
देहों में प्रवेश कर गया है अर्थात् जीव बन गया है। प्राणों
को धारण करने किंवा स्वामी होकर उन का प्रेरक होने से ही
जीवभाव आजाता है [इसी से कहा है कि जैव रूप करके
प्रविष्ट होगया है]।
चैतन्यं यदधिष्ठानं लिङ्गदेहश्च यः पुनः।
चिच्छाया लिङ्गदेहस्था तत्संघो जीव उच्यते ॥११॥
लिङ्ग देह की कल्पना का आधार जो कि अधिष्ठान चैतन्य
है एक तो वह, दूसरे उस में कल्पित जो कि लिङ्गदेह है,
तीसरे उस लिङ्गदेह में जो चिदाभास पड़ा हुआ है, इन तीनों
का संघ ही 'जीव' कहा जाता है।
माहेश्वरी तु माया या तस्या निर्माणशक्तिवत्।
विद्यते मोहशक्तिश्च तं जीवं मोहयत्यसौ ॥१२॥
द्वैतविवेकप्रकरणम् ९५
द्वैतविवेकप्रकरणम् ९५
महेश्वर की जो माया है, उस में जैसे जगत् के सर्जन
का सामर्थ्य है, इसी प्रकार उस में मोहन का सामर्थ्य भी
रहता है। उस माया की वह मोहन शक्ति उस विचारे जीव
को मोहित कर देती है। [उस के मोहन प्रभाव में आकर
उसे अपने चिदानन्दादिस्वरूप का ज्ञान ही नहीं रह जाता है।
मोहादनीशतां प्राप्य मग्नो वपुषि शोचति ।
ईशसृष्टमिदं द्वैतं सर्वमुक्तं समासतः ॥१३॥
मोह में फंसकर अनीश बनकर [इष्टकी प्राप्ति में और
अनिष्ट के परित्याग में बेबस (असमर्थ) होकर] शरीर में
ही अहंभाव से डूबकर, शोक किया करता है किंवा [इसकी
टूट फूट और इसकी आवश्यकताओं से] अपने आपको दुःखी
मान बैठता है। यही बात 'समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति
मुह्यमानः' [मु० ३-२-१] इस श्रुति में कही गयी है। ईश्वर
के बनाये हुए द्वैतको यहाँ तक संक्षेप से कह दिया गया है।
सप्तान्नब्राह्मणे द्वैतं जीवसृष्टं प्रपञ्चितम् ।
अन्नानि सप्त ज्ञानेन कर्मणाऽजनयत् पिता ॥१४॥
'यत् सप्तान्नानि मेधया तपसाऽजनयत् पिता' (बृ० १-५-१) इस
श्रुति वाले सप्तान्न ब्राह्मण में जीव के बनाये हुए द्वैत का प्रपंच
किया है कि पिता [अर्थात् अदृष्ट रूपी भाग (अपना हिस्सा)
देकर उसके द्वारा इस जगत् को उत्पन्न करके सकल लोक के
पालने वाले इस जीव] ने ज्ञान और अपने कर्म के द्वारा सात
अन्नों को उत्पन्न किया।
मर्त्यान्नमेकं देवान्ने द्वे पश्वन्नं चतुर्थकम् ।
अन्यत्त्रितयमात्मार्थ मन्नानां विनियोजनम् ॥१५॥
९६ पञ्चदशी
'एकमस्य साधारणं द्वे देवानभाजयत् त्रीण्यात्मनेऽकुरुत पशुभ्य
एकं प्रायच्छत्' ( बृ० १-५-२ ) इस वाक्य में उन सातों अन्नों
का विनियोग यों किया गया है कि—उनमें से एक तो मर्त्यान्न
है। दो देवताओं के अन्न हैं। एक पशुओं का अन्न है। शेष
तीन को उसने केवल आत्मा के लिये रख लिया है।
व्रीह्यादिकं दर्शपूर्णमासौ क्षीरं तथा मनः।
वाक् प्राणश्चेति सप्तत्व मन्नाना मवगम्यताम् ॥१६॥
व्रीह्यादिक, दर्श, पूर्णमास, दुग्ध, मन, वाक् तथा प्राण ये
सात अन्न कहाते हैं।
ईशेन यद्यप्येतानि निर्मितानि स्वरूपतः।
तथापि ज्ञानकर्मभ्यां जीवोऽकार्षीत्तदन्नताम् ॥१७॥
ईश्वर ने यद्यपि इनका स्वरूप ही बनाया था। परन्तु
इनका अन्नपन अर्थात् भोग्याकार तो जीव ने ही बना लिया
है। उसने ज्ञान और कर्म के सहारे से इन व्रीही आदि प्राणान्त
पदार्थों को अपना अन्न किंवा भोग्य बना डाला है।
जब उस जीव को देवताध्यान आदि विहित ज्ञान तथा
परस्त्रीध्यानादि प्रतिषिद्ध ज्ञान होता है, जब यह जीव यज्ञादि
विहित कर्म और हिंसा आदि प्रतिषिद्ध कर्म कर बैठता है तब
ईश्वर की बनाई ये सब वस्तुयें उसके भोग के साधन बन जाती
हैं। फिर ये चीजें भोग्य बन कर उसके काम में आने लगती
हैं। यदि उस जीव को वैसा ज्ञान न हो और उस ज्ञान से वह
जीव वैसे-वैसे कर्म न करे तो ये वस्तुयें उसकी भोग्य किंवा
उस के अन्न कदापि न बनें। इसी से कहा गया है कि
ईश्वर ने तो इनका केवल स्वरूप ही बनाया था। अपने
[Header] द्वैतविवेकप्रकरणम् ९७
[Header] द्वैतविवेकप्रकरणम् ९७
ज्ञानों से और अपने कर्मों से जीव ने इन को अपना अन्न बना
लिया है।
ईशकार्यं जीवभोग्यं जगद् द्वाभ्यां समन्वितम् ।
पितृजन्या भर्तृभोग्या यथा योषित् तथेष्यताम् ॥१८॥
[ समानरूप में वर्णन किया हुआ ] जगत् ईश्वर का
उत्पन्न किया हुआ है और जीव का भोग्य है । यों यह जगत्
ईश्वर और जीव दो से सम्बद्ध है । एक तो इस जगत् का
बनाने वाला है और दूसरा इसको भोगने वाला है [ एक चीज़
दो से सम्बद्ध रहती है इसके लिये दृष्टान्त यह है कि ] जैसे
स्त्री अपने पिता से तो उत्पन्न होती है और पति की भोग्य
होती है । इसी तरह इस जगत् को भी दो से सम्बद्ध समझ
लेना चाहिये ।
मायावृत्त्यात्मको हीशसंकल्पः साधनं जनौ ।
मनोवृत्त्यात्मको जीवसंकल्पो भोगसाधनम् ॥१९॥
जब ईश्वर मायावृत्त्यात्मक संकल्प करता है, तब तो यह
जगत् उत्पन्न हुआ करता है । जब यह जीव मनोवृत्ति नाम
का संकल्प करता है, तब यह जगत् उस का भोग्य बन जाता
है [ यों ईश्वर और जीव के संकल्प से ही इस जगत् का
सर्जन और भोग होता है । अज्ञान से यह जगत् बनता है
और मन से यह जगत् भोगा जाता है ] ।
ईशनिर्मितमण्यादौ वस्तुन्येकविधे स्थिते ।
भोक्तृधीवृत्तिनानात्वात् तद्भोगो बहुधेष्यते ॥२०॥
हृष्यत्येको मणिं लब्ध्वा क्रुध्यत्यन्यो ह्यलाभतः ।
पश्यत्येव विरक्तोऽत्र न हृष्यति न कुप्यति ॥२१॥
९८ पञ्चदशी
[ईश्वर के बनाये हुए वस्तुस्वरूप से भिन्न भी कोई भोग्यत्व
आकार होता है इसे निश्चय करना हो तो यों समझना
चाहिये कि ] जभी तो ईश्वर की बनायी हुई मणि आदि वस्तु,
भले ही एक प्रकार की रहो, परन्तु भोक्ता लोगों की बुद्धि-
वृत्तियों के नाना प्रकार की होने पर, उस एक ही मणि का
नाना प्रकार का भोग होजाता है ॥२०॥ देखते हैं कि मणि का
लालची तो उसे पाकर हृष्ट होता है, दूसरे लालची को जब
वह मणि नहीं मिलती तब उसे क्रोध आता है, मणि के विषय
में जो लापरवाह है वह तीसरा उदास मनुष्य तो उस मणि
को देखता ही देखता है [ मणि मिलने से ] न उसे हर्ष होता
है और [ मणि के न मिलने से] उसे क्रोध भी नहीं आता है ।
प्रियोऽप्रिय उपेक्ष्यश्चेत्याकारा मणिगास्त्रयः ।
सृष्टा जीवै रीशसृष्टं रूपं साधारणं त्रिषु ॥२२॥
[ जीव के बनाये हुए आकारभेदों का वर्णन इस श्लोक
में किया गया है ] प्रिय, अप्रिय तथा उपेक्ष्य ये तीन आकार
मणि में पाये जाते हैं । ये तीनों ही आकार जीवों के बनाये
हुए हैं। इन तीनों में साधारण रीति से अनुस्यूत जो मणि
का स्वरूप है वही ईश्वर का बनाया हुआ रूप कहाता है।
भार्या स्नुषा ननान्दा च याता मातेत्यनेकधा ।
प्रतियोगिधिया योषिद्भिद्यते न स्वरूपतः ॥२३॥
[ एक ही वस्तु में जीव के बनाये हुए आकार किस प्रकार
भिन्न भिन्न होते हैं, यही बात इस श्लोक में दूसरा उदाहरण
देकर समझायी गयी है ] देखा जाता है कि सम्बन्धियों की
भिन्न भिन्न बुद्धि के कारण एक ही स्त्रीशरीर 'भार्या' भी
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५९
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५९
कहाता है 'स्नुषा' [ पुत्रवधू ] भी कहा जाता है 'ननान्दा' भी
समझा जाता है 'याता' [ देवर की स्त्री ] भी मान लिया जाता
है और 'माता' भी कहलाने लगता है । ईश्वर ने इसे स्वरूप
से तो केवल स्त्री ही बनाया था परन्तु प्राणियों ने अपने
भिन्न भिन्न भावों के अनुसार उस एक ही स्त्री को पत्नी,
पुत्रवधू, ननान्दा [ पति की बहन ] याता, तथा माता मान
लिया है ।
ननु ज्ञानानि भिद्यन्ता माकारस्तु न भिद्यते ।
योषिद्वपुष्यतिशयो न दृष्टो जीवनिर्मितः ॥२४॥
शंका होती है कि—स्त्री विषयक ज्ञान ही तो भिन्न भिन्न
उपलब्ध होते हैं, उन ज्ञानों का विषय बनी हुई स्त्री का स्वरूप
तो भिन्न नहीं होता है । वह तो वैसे का वैसा ही रहता है ।
[ फिर यह क्यों कहा जाता है कि सम्बन्धियों की भिन्न भिन्न
बुद्धि से स्त्री भी भिन्न भिन्न हो जाती है ? ]
मैवं मांसमयी योषित् काचिदन्या मनोमयी ।
मांसमय्या अभेदेऽपि भिद्यते हि मनोमयी ॥२५॥
[ ज्ञेय पदार्थ की विलक्षणता के बिना ज्ञान में विलक्षणता
आती ही नहीं इस सिद्धान्त के कारण ज्ञेय में आकार का भेद
मानना ही चाहिये, इस अभिप्राय से पूर्वोक्त आक्षेप का परिहार
इस श्लोक में किया जाता है कि ] तुम्हारा आक्षेप ठीक
नहीं। क्योंकि एक स्त्री में दो स्त्रियां रहती हैं, एक मांसमयी
दूसरी 'मनोमयी' । 'मनोमयी' स्त्री उस 'मांसमयी' स्त्री से
सर्वथा भिन्न होती है । 'मांसमयी' स्त्री तो यद्यपि एक ही
रहती है परन्तु 'मनोमयी' स्त्री भिन्न भिन्न हो जाती हैं ।
१०० : पञ्चदशी
भ्रान्तिस्वप्नमनोराज्यस्मृतिष्वस्तु मनोमयम् ।
जाग्रन्मानेन मेयस्य न मनोमयतेति चेत् ॥२६॥
फिर शंका होती है कि भ्रान्ति, स्वप्न, मनोराज्य तथा स्मृति
के समय [ जब कि बाह्य विषय नहीं होते ] तब वहां की वस्तुयें
'मनोमय' हुआ करें, परन्तु जो वस्तु प्रत्यक्षादि प्रमाणों से प्रमेय
है उस वस्तु को 'मनोमय' क्योंकर मान लिया जाय ?
बाढं, माने तु मेयेन योगात् स्याद् विषयाकृतिः ।
भाष्यवार्तिककाराभ्या मयमर्थ उदीरितः ॥२७॥
यह तो ठीक है कि प्रमिति के स्थल में बाह्य विषय रहता
है [ उस विषय को जब हम मनोमय कहते हैं तब उसका
कारण हमसे सुन लो कि ] मान [ प्रमाण ] में जो विषयाकार
आता है वह तो मेय पदार्थ के संयोग से ही आता है [ उस
को ( मान में आये हुए विषयाकार को) ही हम मनोमय पदार्थ
कहते हैं ] भाष्यकार श्री शंकराचार्य तथा वार्तिककार सुरेश्वरा-
चार्य ने भी यही बात कही है ।
मूषासिक्तं यथा ताम्रं तन्निभं जायते यथा ।
रूपादीन् व्याप्नुवच्चित्तं तन्निभं दृश्यते ध्रुवम् ॥२८॥
भाष्यकार ने कहा है कि जैसे पिघला हुआ तांबा मूषा
[ मूस ] में जब ढाल दिया जाता है तब वह उसी के आकार
का होजाता है इसी प्रकार रूपादि विषयों को व्याप्त करने
किंवा अपना विषय बनाने वाला चित्त भी अवश्य ही उन
जैसा ही दीखने लगता है ।
व्यञ्जको वा यथाऽऽलोको व्यङ्ग्यस्याकारतामियात् ।
सर्वार्थव्यञ्जकत्वाद्धीरर्थाकारा प्रदृश्यते ॥२९॥
द्वैतविवेकप्रकरणम्
[विषय को व्याप्त करने वाली बुद्धि स्वयं भी विषय के
आकार की हो जाती है इस बात को सिद्ध करनेवाला दूसरा
दृष्टान्त यह है कि] जिस प्रकार व्यञ्जक [आतप आदि]
प्रकाश व्यङ्ग्य [घटादि] के आकार का हो जाता है, इसी
प्रकार, सकल पदार्थों का व्यञ्जक होने के कारण यह बुद्धि भी
पदार्थ के आकार की सी दीखने लगती है। जैसा आकार
पदार्थ का होता है वैसा ही आकार उस पदार्थ को देखनेवाली
बुद्धि का भी हो जाता है। [बुद्धिका वह आकार ही मनोमय
पदार्थ कहाता है। यही जीवों का बन्धक होता है। जिन
पदार्थों का हम अधिक संकल्प करते हैं उन पदार्थों के आकार
हमारी बुद्धि में जम जाते हैं। फिर उनके विषय के बहुत से
संकल्प बनते हैं। वे ही हमें बाँध रखते हैं। यों ईश्वर की
बनायी वस्तु हमें नहीं बाँधती किन्तु हमारी बनाई मनोमय
वस्तु ही हमें बाँधनेवाली है।]
मातु र्मानाभिनिष्पत्ति र्निष्पन्नं मेयमेति तत् ।
मेयाभिसंगतं तच्च मेयाभत्वं प्रपद्यते ॥३०॥
इसी विषय में वार्तिककार ने भी कहा है कि—पहले माता
[अर्थात् प्रमात] से [अन्तःकरणवृत्ति रूपी] प्रमाण की उत्पत्ति
हुआ करती है। जब वह प्रमाण उत्पन्न हो जाता है तब वह
[घटादि] मेय पदार्थों के पास जाता है। मेय पदार्थ से सम्बद्ध
हुआ वह प्रमाण उसी आकार का दीखने लग पड़ता है, जिस
आकार का कि प्रमेय पदार्थ होता है।
सत्येवं विषयौ द्वौ स्तो घटौ मृन्मयधीमयौ ।
मृन्मयो मानमेयः स्यात् साक्षिभास्यस्तु धीमयः ॥३१॥
१०२ पञ्चदशी
इस सब कथन से यही सिद्ध होता है कि- घट दो प्रकार
का होता है- एक 'मृन्मय' दूसरा 'धीमय' । मृन्मय घट तो
प्रमाणों से जाना जाता है तथा धीमय घट साक्षिभास्य होता है।
(जब किसी घड़े को देखते हैं तब वहाँ दो घड़े होते हैं एक
तो मिट्टी का घड़ा तथा दूसरा मनोमय घड़ा) मिट्टी के घड़ों को
तो हम प्रमाणों से जानते हैं । उस मिट्टी के घड़े से जो मनो-
मय घड़ा बनता है उसको तो हम साक्षीप्रत्य से जाना
करते हैं।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां धीमयो जीवबन्धकृत् ।
सत्यस्मिन् सुखदुःखे स्त स्तस्मिन्नसति न द्वयम् ॥३२॥
अन्वय और व्यतिरेक से यह बात सिद्ध हो जाती है कि
(जीव का बनाया हुआ धीमय ( मनोमय ) द्वैत ही जीव को सुख)
बन्धन में डालनेवाला है [इस लिये वही हेय भी है ।] वे
अन्वय व्यतिरेक ये हैं कि- जीव के बनाये हुए इस मानस-
जगत् के विद्यमान रहने पर ही सुख दुःख होते हैं। उसके न
होने पर तो सुख या दुःख कुछ भी नहीं होते।
असत्यपि च बाह्यार्थे स्वप्नादौ बध्यते नरः ।
समाधिसुप्तिमूर्छासु सत्यप्यस्मिन्न बध्यते ॥३३॥
सपने आदि में बाह्य पदार्थ के न होने पर भी, मनुष्य
सुखी दुःखी होता है। समाधि सुप्ति या मूर्छा में बाह्यार्थ के
होने पर भी सुखी दुःखी नहीं होता है।
मनुष्यादि प्राणी स्वप्न या स्मृति आदि के समय, जब कि
अनुकूल स्त्री आदि सच्चा बाह्यार्थ नहीं होता, अथवा जब कि
प्रतिकूल व्याघ्रादि सच्चा पदार्थ नहीं होता तो भी सुखी या दुःखी
हुआ ही करता है । इसके विपरीत समाधि सुषुप्ति तथा मूर्छा
के समय, इन बाह्य पदार्थों के विद्यमान रहने पर भी, सुखी
या दुःखी नहीं होता । इससे यही सिद्ध होता है कि सुख दुःख
के साथ बाह्य पदार्थ के अन्वय व्यतिरेक हैं ही नहीं । किन्तु
सुख दुःख के साथ मानस पदार्थ के ही अन्वय व्यतिरेक हैं।
उन्हीं से जीव सुखी या दुःखी हुआ करता है (केवल बाह्यार्थ
से कोई भी सुखी या दुःखी नहीं होता है ।)
दूरदेशं गते पुत्रे जीवत्येवात्र तत्पिता ।
विप्रलम्भकवाक्येन मृतं मत्वा प्ररोदिति ॥३४॥
मृतेऽपि तस्मिन् वार्ताया मश्रुतायां न रोदिति ।
अतः सर्वस्य जीवस्य बन्धकृन्मानसं जगत् ॥३५॥
[मनोमय प्रपंच ही बन्धक होता है । उसी के साथ सुख
दुःख का अन्वयव्यतिरेक है। यह बात एक अत्यन्त स्पष्ट उदा-
हरण से इस श्लोक में समझायी गयी है ](जब किसी का पुत्र
किसी दूरदेश को चला गया होता है और वहाँ भला चंगा ही
रहता है परन्तु घर बैठा हुआ उसका पिता किसी धोखेबाज के
झूठ-मूठ ही यह कह देने से कि तुम्हारा पुत्र तो मर गया अपने
मनोमय पुत्र को मरा हुआ मान कर, फूट फूट कर रोने लगता है।
[३४] तथा उसी पुत्र के परदेश में यथार्थ ही मर जाने पर भी
उसके मरने की बात न सुनने पर रोता नहीं है।) इस बात को देख
कर यही निश्चय करना पड़ता है कि जीव को मानस जगत् ही
सब को बन्धन में डाला करता है ।
विज्ञानवादो बाह्यार्थवैयर्थ्यात् स्यादिहेति चेत् ।
न हृद्याकारमाधातुं बाह्यस्यापेक्षितत्वतः ॥३६॥
'यदि धीमय जगत् को ही बन्धन का कारण मानें तो
बाह्यार्थ की कुछ जरूरत नहीं रह जाती । फिर ऐसी अवस्था
में विज्ञानवाद आ खड़ा होता है' ऐसी किसी को शंका हो तो
उस से कहो कि—हृदय में आकार को बैठाने [जमाने] के
लिये तो बाह्य पदार्थ की अपेक्षा होती ही है । [तात्पर्य यह
है कि यद्यपि बन्ध का कारण तो मानस प्रपंच ही है । परन्तु
मानस प्रपंच को उत्पन्न करने वाला तो बाह्य प्रपंच ही होता
है । यों बाह्यार्थ को भी स्वीकार करने के कारण हम विज्ञान-
वादी नहीं हो जाते हैं]।
वैयर्थ्यमस्तु वा, बाह्यं न वारयितुमीश्महे ।
प्रयोजनमपेक्षन्ते न मानानीति हि स्थितिः ॥३७॥
अथवा बाह्यार्थ व्यर्थ भी रहो, तो भी हम [विज्ञानवादी
की तरह] बाह्य पदार्थ का वारण नहीं कर सकते हैं। [विज्ञान-
वादी तो बाह्यार्थ का अपलाप करते हैं। वैसा हम नहीं करते।
यही हमारा उन का भेद है] सिद्धान्त तो यह है कि प्रमाण
प्रयोजन की अपेक्षा (परवाह) ही नहीं करते हैं ।
किसी भी वस्तु की सिद्धि प्रयोजन के अधीन नहीं होती
है । किन्तु प्रमाण के अधीन होती है । जिस पदार्थ को प्रमाणों
ने सिद्ध कर दिया हो, फिर भले ही उस का कुछ भी प्रयोजन
न हो, उस को असत् नहीं माना जा सकता है ।
बन्धश्चेन्मानसंद्वैतं तन्निरोधेन शाम्यति ।
अभ्यसेद् योगमेवातो ब्रह्मज्ञानेन किं वद ॥३८॥
मानस द्वैत ही यदि बन्ध का कारण है, तो बस केवल
उस मन का निरोध करने से ही वह बन्ध शान्त हो सकता
द्वैतविवेकप्रकरणम् १०५
द्वैतविवेकप्रकरणम् १०५
है। इस कारण मनोनिरोध रूपी योग का ही अभ्यास कर
डालना चाहिये। इस विचारे ब्रह्मज्ञान से क्या होगा सो
बताओ ? [ब्रह्मज्ञान को बन्ध का निवर्तक मानना ठीक बात
नहीं है]।
तात्कालिकं द्वैतशान्तावप्यागामिजनिक्षयः ।
ब्रह्मज्ञानं विना न स्यादिति वेदान्तडिण्डिमः ॥३९॥
सुनो, योग से तात्कालिक द्वैत तो शान्त हो सकता है,
परन्तु आगामी जन्मों का नाश तो ब्रह्मज्ञान के बिना हो ही
नहीं सकता। यह बात 'ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः (श्वे० ५-१३)
'ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति । यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः ।
तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति।' (श्वे० ६-२०) इत्यादि
श्रुतियों में डंके की चोट कही गई है। ये श्रुतियां ब्रह्मज्ञान से
बन्ध की निवृत्ति को कहती हैं।
अनिवृत्ते ऽपीशसृष्टे द्वैते तस्य मृषात्मताम् ।
बुद्ध्वा ब्रह्म द्वयं बोद्धुं शक्यं वस्त्वैक्यवादिनः ॥४०॥
एकवस्तुवादी के मत में, ईश्वर का बनाया हुआ द्वैत
भले ही बना रहो, उस को तो मिथ्या समझ लेने मात्र से ही
अद्वितीय ब्रह्म का बोध हो सकता है। [ईश्वर के बनाये हुए
द्वैत की मौजूदगी में ही यदि उस द्वैत को मिथ्या समझ लिया
जाय तभी अद्वितीय ब्रह्मतत्त्व जाना जा सकता है। ईश्वर का
बनाया हुआ द्वैत न रहेगा तो अद्वितीय ब्रह्मतत्त्व समझ में आ ही
नहीं सकेगा। क्योंकि तब उस को जानने का साधन कुछ भी
नहीं रहेगा। ईश्वर के द्वैत पर जब हम अपना द्वैत बनाने
लगते हैं तब तो यह हमें बांधता है। जब हम इस को हटा कर
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इस के मूलाधार को टटोलते हैं तब हमारी दृष्टि ब्रह्मतत्त्व पर
जा पड़ती है । यों इस की सत्यता से हम बंधते हैं और इस के
नकार से हम छुट जाते हैं। यों ईश्वर का द्वैत तो हमारे बड़े ही
काम की वस्तु है] ।
प्रलये तन्निवृत्तौ तु गुरुशास्त्राद्यभावतः ।
विरोधिद्वैताभावेपि न शक्यं बोद्धुमद्वयम् ॥४१॥
प्रलय काल में, जब कि द्वैत छिप जाता है, और अद्वैत
ज्ञान का विरोधी द्वैत नहीं रह जाता, तब भी अद्वय भाव को
जाना नहीं जा सकता । क्योंकि अद्वय भाव को जताने वाले
गुरु या शास्त्र उस समय नहीं रहते ।
जो यह समझा बैठा है कि द्वैत को मिथ्या समझने से
अद्वैत ज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता । किन्तु अद्वैत ज्ञान के लिए
द्वैत का निवारण कर डालना—द्वैत को मार भगाना—ही अत्या-
वश्यक होता है, उसको यों समझाना चाहिये कि—प्रलय-
काल में, जब कि तुम्हारे भी मत में द्वैत की निवृत्ति हो जाती
है, जब कि विरोधी द्वैत का सर्वथा निवारण हो जाता है, जब
कि अद्वैत ज्ञान का विरोध करनेवाला द्वैत शेष ही नहीं रह
जाता है, तब ज्ञान के साधन गुरु अथवा शास्त्रादि के न रह जाने
के कारण ही से, अद्वय वस्तु का बोध किसी को भी नहीं हो सकता।
इसी से कहते हैं कि द्वैत का निवारण करना कोई आवश्यक
बात नहीं है । उसको तो मिथ्या समझने से ही साधक का काम
चलता है। यों मिथ्या समझने में ईश्वर के द्वैत का उपयोग है ही।
अबाधकं साधकं च द्वैतमीश्वरनिर्मितम् ।
अपनेतुमशक्यं चेत्यास्तां तद् द्विष्यते कुतः ॥४२॥