सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

९७- आदित्यवार-कल्पका विधान और माहात्म्य

३२६ * मत्स्यपुराण *

| ब्रह्महत्यासहस्त्राणि भ्रूणहत्यार्बुदानि च।<br>कोटिहोमेन नश्यन्ति यथावच्छिवभाषितम्॥ १३९<br><br>वश्यकर्माभिचारादि तथैवोच्चाटनादिकम्।<br>नवग्रहमखं कृत्वा ततः काम्यं समाचरेत्॥ १४०<br><br>अन्यथा फलदं पुंसां न काम्यं जायते क्वचित्।<br>तस्मादयुतहोमस्य विधानं पूर्वमाचरेत्॥ १४१<br><br>वृत्तं चोच्चाटने कुण्डं तथा च वशकर्मणि।<br>त्रिमेखलैश्कवक्त्रमरत्निर्विस्तरेण तु॥ १४२<br><br>पलाशसमिधः शस्ता मधुगोरोचनान्विताः।<br>चन्दनागुरुणा तद्वत् कुङ्कुमेनाभिषिञ्चिताः॥ १४३<br><br>होमयेन्मधुसर्पिर्भ्यां बिल्वानि कमलानि च।<br>सहस्राणि दशैवोक्तं सर्वदैव स्वयम्भुवा॥ १४४<br><br>वश्यकर्मणि बिल्वानां पद्मानां चैव धर्मवित्।<br>सुमित्रिया न आप ओषधय इति होमयेत्॥ १४५<br><br>न चात्र स्थापनं कार्यं न च कुम्भाभिषेचनम्।<br>स्नानं सर्वौषधैः कृत्वा शुक्लपुष्पाम्बरो गृही॥ १४६<br><br>कण्ठसूत्रैः सकनकैर्विप्रान् समभिपूजयेत्।<br>सूक्ष्मवस्त्राणि देयानि शुक्ला गावः सकाञ्चनाः॥ १४७<br><br>अवशानि वशीकुर्यात् सर्वशत्रुबलान्यपि।<br>अमित्राण्यपि मित्राणि होमोऽयं पापनाशनः॥ १४८<br><br>विद्वेषणेऽभिचारे च त्रिकोणं कुण्डमिष्यते।<br>त्रिमेखलं कोणमुखं हस्तमात्रं च सर्वशः॥ १४९<br><br>होमं कुर्युस्ततो विप्रा रक्तमाल्यानुलेपनाः।<br>निवीतलोहितोष्णीषा लोहिताम्बरधारिणः॥ १५०<br><br>नववायसरक्ताढ्यपात्रत्रयसमन्विताः ।<br>समिधो वामहस्तेन श्येनास्थिबलसंयुताः।<br>होतव्या मुक्तकेशैस्तु ध्यायद्भिर्भिरशिवं रिपौ॥ १५१<br><br>दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु तथा हुंफडितीति च।<br>श्येनाभिचारमन्त्रेण क्षुरं समभिमन्त्र्य च॥ १५२ | है। शिवजीने यथार्थरूपसे कहा है कि कोटिहोमके अनुष्ठानसे हजारों ब्रह्महत्या और अरबों भ्रूणहत्या-जैसे महापातक नष्ट हो जाते हैं॥१३१-१३९॥<br><br>नारद! यदि वशीकरण, अभिचार तथा उच्चाटन आदि काम्य कर्मोंका अनुष्ठान करना हो तो पहले नवग्रह-यज्ञ सम्पन्न कर तत्पश्चात् काम्य कर्म करना चाहिये, अन्यथा वह काम्य कर्म मनुष्योंको कहीं भी फलदायक नहीं हो सकता। अतः पहले अयुतहोमका सम्पादन कर लेना उचित है। उच्चाटन और वशीकरण कर्मोंमें कुण्डको गोलाकार बनाना चाहिये। उसका विस्तार अर्थात् व्यास एक अरत्नि हो। वह तीन मेखलाओं और एक मुखसे युक्त हो। इन कार्योंमें मधु, गोरोचन, चन्दन, अगुरु और कुङ्कुमसे अभिषिक्त की हुई पलाशकी समिधाएँ प्रशस्त मानी गयी हैं। मधु और घीसे चुपड़े हुए बेल और कमल-पुष्पके हवनका विधान है। ब्रह्माने सदा दस हजार आहुतियोंका ही विधान बतलाया है। धर्मज्ञ यजमानको वशीकरण-कर्ममें 'सुमित्रिया न आप ओषधयः'—इस मन्त्रसे हवन करना चाहिये। इस कार्यमें कलशका स्थापन और अभिषेचन नहीं किया जाता। गृहस्थ यजमान सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नान करके श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण कर ले और स्वर्णनिर्मित कण्ठहारोंसे ब्राह्मणोंकी पूजा करे तथा उन्हें महीन वस्त्र एवं स्वर्णसे विभूषित श्वेत रंगकी गौएँ प्रदान करे। (इस प्रकार विधिपूर्वक सम्पन्न किया गया) यह पापनाशक हवन वशमें न आनेवाली शत्रुओंकी सारी सेनाओंको वशीभूत कर देता है और शत्रुओंको मित्र बना देता है॥ १४०-१४८॥<br><br>समृद्धिकामी पुरुषको इन कर्मोंमेंसे केवल शान्तिकर्मका ही अनुष्ठान करना चाहिये। जो मानव निष्कामभावसे इन तीनों ग्रहयज्ञोंका अनुष्ठान करता है, वह पुनरागमनरहित विष्णुपदको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य इस ग्रहयज्ञको नित्य सुनता अथवा दूसरेको सुनाता है, उसे न तो ग्रहजनित पीडा होती है और न उसके बन्धुजनोंका विनाश ही होता है। जिस घरमें ये तीनों (ग्रह, लक्ष एवं कोटि होम) |

* अध्याय ९३ *३२७

| प्रतिरूपं रिपोः कृत्वा क्षुरेण परिकर्तयेत्।<br>रिपुरूपस्य शकलान्यथैवाग्नौ विनिःक्षिपेत्॥ १५३<br>ग्रहयज्ञविधानान्ते सदैवाभिचरन् पुनः।<br>विद्वेषणं तथा कुर्वन्नेतदेव समाचरेत्॥ १५४<br>इहैव फलदं पुंसामेतन्नामुत्र शोभनम्।<br>तस्माच्छान्तिकमेवात्र कर्तव्यं भूतिमिच्छता॥ १५५<br>ग्रहयज्ञत्रयं कुर्याद् यस्त्वकाम्येन मानवः।<br>स विष्णोः पदमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ १५६<br>य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद् वापि मानवः।<br>न तस्य ग्रहपीडा स्यान्न च बन्धुजनक्षयः॥ १५७<br>ग्रहयज्ञत्रयं गेहे लिखितं यत्र तिष्ठति।<br>न पीडा तत्र बालानां न रोगो न च बन्धनम्॥ १५८<br>अशेषयज्ञफलदं निःशेषाघविनाशनम्।<br>कोटिहोमं विदुः प्राज्ञा भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ १५९<br>अश्वमेधफलं प्राहुर्लक्षहोमं सुरोत्तमाः।<br>द्वादशाहमखस्तद्वन्नवग्रहमखः स्मृतः॥ १६०<br>इति कथितमिदानीमुत्सवानन्दहेतोः<br>सकलकलुषहारी देवयज्ञाभिषेकः।<br>परिपठति य इत्थं यः शृणोति प्रसङ्गा-<br>दभिभवति स शत्रूनायुरारोग्ययुक्तः॥ १६१ | यज्ञ-विधान लिखकर रखे रहते हैं, वहाँ न तो बालकोंको कोई कष्ट होता है, न रोग तथा बन्धन भी नहीं होता। विद्वानोंका कहना है कि कोटिहोम सम्पूर्ण यज्ञोंके फलका प्रदाता, अखिल पापोंका विनाशक और भोग एवं मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाला है। श्रेष्ठ देवगण लक्षहोमको अश्वमेध-यज्ञके समान फलदायक बतलाते हैं। उसी प्रकार नवग्रह-यज्ञ, द्वादशाह-यज्ञके सदृश फलकारक बतलाया जाता है। इस प्रकार मैंने इस समय उत्सवके आनन्दकी प्राप्तिके लिये सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाले इस देवयज्ञाभिषेकका वर्णन कर दिया। जो मनुष्य प्रसङ्गवश इसका इसी रूपमें पाठ अथवा श्रवण करता है, वह दीर्घायु एवं नीरोगतासे युक्त होकर अपने शत्रुओंको पराजित कर देता है॥ १४९-१६१॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे नवग्रहहोमशान्तिविधानं नाम त्रिनवतितमोऽध्यायः॥ ९३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नवग्रहहोमशान्तिविधान नामक तिरानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९३॥

३२८* मत्स्यपुराण *

चौरानबेवाँ अध्याय

नवग्रहोंके स्वरूपका वर्णन

शिव उवाचशिवजीने कहा— नारद! (चित्र-प्रतिमादिमें) सूर्यदेवकी दो भुजाएँ निर्दिष्ट हैं, वे कमलके आसनपर विराजमान रहते हैं, उनके दोनों हाथोंमें कमल सुशोभित रहते हैं। उनकी कान्ति कमलके भीतरी भागकी-सी है और वे सात घोड़ों तथा सात रस्सियोंसे जुते रथपर आरूढ़ रहते हैं। चन्द्रमा गौरवर्ण, श्वेतवस्त्र और श्वेत अश्वयुक्त हैं। उनका वाहन—श्वेत अश्वयुक्त रथ है। उनके दोनों हाथ गदा और वरदमुद्रासे युक्त बनाना चाहिये। धरणीनन्दन मंगलके चार भुजाएँ हैं। उनके शरीरके रोएँ लाल हैं, वे लाल रंगकी पुष्पमाला और वस्त्र धारण करते हैं और उनके चारों हाथ क्रमशः शक्ति, त्रिशूल, गदा एवं वरमुद्रासे सुशोभित रहते हैं। बुध पीले रंगकी पुष्पमाला और वस्त्र धारण करते हैं। उनकी शरीर-कान्ति कनेरके पुष्प-सरीखी है। वे भी चारों हाथोंमें क्रमशः तलवार, ढाल, गदा और वरमुद्रा धारण किये रहते हैं तथा सिंहपर सवार होते हैं। देवताओं और दैत्योंके गुरु बृहस्पति और शुक्रकी प्रतिमाएँ क्रमशः पीत और श्वेत वर्णकी करनी चाहिये। उनके चार भुजाएँ हैं, जिनमें वे दण्ड, रुद्राक्षकी माला, कमण्डलु और वरमुद्रा धारण किये रहते हैं। शनैश्चरकी शरीर-कान्ति इन्द्रनीलमणिकी-सी है। वे गीधपर सवार होते हैं और हाथमें धनुष-बाण, त्रिशूल और वरमुद्रा धारण किये रहते हैं। राहुका मुख भयंकर है। उनके हाथोंमें तलवार, ढाल, त्रिशूल और वरमुद्रा शोभा पाती हैं तथा वे नील रंगके सिंहासनपर आसीन होते हैं। ध्यान (प्रतिमा)-में ऐसे ही राहु प्रशस्त माने गये हैं। केतु बहुतेरे हैं। उन सबोंके दो भुजाएँ हैं। उनके शरीर आदि धूम्रवर्णके हैं। उनके मुख विकृत हैं। वे दोनों हाथोंमें गदा एवं वरमुद्रा धारण किये हैं और नित्य गीधपर समासीन रहते हैं। इन सभी लोक-हितकारी ग्रहोंको किरीटसे सुशोभित कर देना चाहिये तथा इन सबकी ऊँचाई एक सौ आठ अङ्गुल (४॥ हाथ)-की होनी चाहिये॥ १—९॥
पद्मासनः पद्मकरः पद्मगर्भसमद्युतिः।<br>सप्ताश्वः सप्तरज्जुश्च द्विभुजः स्यात् सदा रविः॥ १<br><br>श्वेतः श्वेताम्बरधरः श्वेताश्वः श्वेतवाहनः।<br>गदापाणिर्द्विबाहुश्च कर्तव्यो वरदः शशी॥ २<br><br>रक्तमाल्याम्बरधरः शक्तिशूलगदाधरः।<br>चतुर्भुजः रक्तरोमा वरदः स्याद् धरासुतः॥ ३<br><br>पीतमाल्याम्बरधरः कर्णिकारसमद्युतिः।<br>खड्गचर्मगदापाणिः सिंहस्थो वरदो बुधः॥ ४<br><br>देवदैत्यगुरू तद्वत् पीतश्वेतौ चतुर्भुजौ।<br>दण्डिनौ वरदौ कार्यौ साक्षसूत्रकमण्डलू॥ ५<br><br>इन्द्रनीलद्युतिः शूली वरदो गृध्रवाहनः।<br>बाणबाणासनधरः कर्तव्योऽर्कसुतस्तथा॥ ६<br><br>करालवदनः खड्गचर्मशूली वरप्रदः।<br>नीलसिंहासनस्थश्च राहुरत्र प्रशस्यते॥ ७<br><br>धूम्रा द्विबाहवः सर्वे गदिनो विकृताननाः।<br>गृध्रासनगता नित्यं केतवः स्युर्वरप्रदाः॥ ८<br><br>सर्वे किरीटिनः कार्या ग्रहा लोकहितावहाः।<br>ह्यङ्गुलेनोच्छ्रिताः सर्वे शतमष्टोत्तरं सदा॥ ९

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे ग्रहरूपाख्यानं नाम चतुर्णवतितमोऽध्यायः॥ ९४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें ग्रहरूपाख्यान नामक चौरानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९४॥