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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

६८ सप्तमीस्नपन-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

२५४ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्रतान्ते करकं पूर्णमेतेषां मासि मासि च।<br>दद्याद् द्विकालवेलायां पूर्णपात्रेण संयुतम्॥ १८<br>लड्डुकाञ्छ्वेतवर्णांश्च संयावमथ पूरिकाः।<br>घारिकानप्यपूंपांश्च पिष्टापूंपांश्च मण्डकान्॥ १९<br>क्षीरं शाकं च दध्यन्नमिण्डर्योऽशोकवर्तिकाः।<br>माघादिक्रमशो दद्यादेतानि करकोपरि॥ २०<br>कुमुदा माधवी गौरी रम्भा भद्रा जया शिवा।<br>उमा रतिः सती तद्वन्मङ्गला रतिलालसा॥ २१<br>क्रमान्माघादि सर्वत्र प्रीयतामिति कीर्तयेत्।इस प्रकार इन महीनोंके क्रमसे प्रत्येक मासमें व्रतकी समाप्ति के समय सायंकालकी वेलामें उपर्युक्त पदार्थोंसे भरा हुआ एक करवा पूर्णपात्रसहित ब्राह्मणको दान करे। इसी तरह श्वेत रंगके लड्डू, गोझिया, पूरी, घेवर, पूआ, आटेका बना हुआ पूआ, मण्डक (एक प्रकारका पिष्टक), दूध, शाक, दही-मिश्रित अन्न, इण्डरी (एक प्रकारकी रोटी) और अशोकवर्तिका (सेंवई)—इन पदार्थोंको माघ आदि मासक्रमसे करवाके ऊपर रखकर दान करनेका विधान है। फिर कुमुदा, माधवी, गौरी, रम्भा, भद्रा, जया, शिवा, उमा, रति, सती, मङ्गला, रतिलालसा प्रसन्न हों—ऐसा कहकर माघ आदि सभी मासोंमें क्रमशः कीर्तन करना चाहिये॥ १२—२१ १/२॥
सर्वत्र पञ्चगव्येन प्राशनं समुदाहृतम्।<br>उपवासी भवेन्नित्यमशक्ते नक्तमिष्यते॥ २२सभी मासोंके व्रतमें पञ्चगव्यका प्राशन (भक्षण) बतलाया गया है। इन सभी व्रतोंमें उपवास करनेका विधान है। यदि उपवास करनेमें असमर्थ हो तो रात्रिमें एक बार तारिकाओंके निकल आनेपर भोजन किया जा सकता है।
पुनर्माघे तु सम्प्राप्ते शर्करां करकोपरि।<br>कृत्वा तु काञ्चनीं गौरीं पञ्चरत्नसमन्विताम्॥ २३<br>हैमीमङ्गुष्ठमात्रां च साक्षसूत्रकमण्डलुम्।<br>चतुर्भुजामिन्दुयुतां सितनेत्रपटावृताम्॥ २४वर्षान्तमें पुनः माघमास आनेपर गौरीकी एक सोनेकी मूर्ति बनवाये जो अँगूठेके बराबर लम्बी हो। वह चार भुजाओं और ललाटमें चन्द्रमासे युक्त हो। उसे पञ्चरत्नोंसे विभूषित और दो श्वेत वस्त्रोंसे आच्छादित कर दे।
तद्वद् गोमिथुनं शुक्लं सुवर्णास्यं सिताम्बरम्।<br>सवस्त्रभाजनं दद्याद् भवानी प्रीयतामिति॥ २५फिर करवामें शक्कर भरकर उसीके ऊपर उस मूर्तिको स्थापित करके रुद्राक्षकी माला और कमण्डलुसहित ब्राह्मणको दान कर दे। उसी प्रकार गौके जोड़ेको, जिनका रंग श्वेत और मुख सुवर्णसे मढ़ा हुआ हो, जो श्वेत वस्त्रसे आच्छादित हों, अन्य वस्त्र और पात्रके सहित दान करके 'भवानी प्रसन्न हों' यों कहकर प्रार्थना करनी चाहिये।
अनेन विधिना यस्तु रसकल्याणिनीव्रतम्।<br>कुर्यात् स सर्वपापेभ्यस्तत्क्षणादेव मुच्यते॥ २६<br>नवार्बुदसहस्रं तु न दुःखी जायते नरः।जो मनुष्य इस विधिके अनुसार रसकल्याणिनीव्रतका अनुष्ठान करता है, वह उसी क्षण समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और नौ अरब एक हजार वर्षोंतक कष्टमें नहीं पड़ता।
सुवर्णकमलं गौरि मासि मासि ददन्नरः।<br>अग्निष्टोमसहस्रस्य यत्फलं तदवाप्नुयात्॥ २७गौरि! इसी प्रकार जो मनुष्य प्रत्येक मासमें स्वर्णनिर्मित कमलका दान करता है वह हजारों अग्निष्टोम-यज्ञोंका जो फल होता है, उसे प्राप्त कर लेता है।
नारी वा कुरुते या तु कुमारी वा वरानने।<br>विधवा या तथा नारी सापि तत्फलमाप्नुयात्।<br>सौभाग्यारोग्यसम्पन्ना गौरीलोके महीयते॥ २८वरानने! सधवा स्त्री, कुमारी अथवा विधवा स्त्री—कोई भी यदि इस व्रतका अनुष्ठान करती है तो वह भी उस फलको प्राप्त करती है, साथ ही सौभाग्य और आरोग्यसे सम्पन्न होकर गौरी-लोकमें पूजित होती है।
* अध्याय ६४ *२५५

| इति पठति शृणोति श्रावयेद् यः प्रसङ्गात् <br> कलिकलुषविमुक्तः पार्वतीलोकमेति। <br><br> मतिमपि च नराणां यो ददाति प्रियार्थं <br> विबुधपतिविमाने नायकः स्यादमोघः॥ २९॥ | इस प्रकार जो मनुष्य प्रसङ्गवश इस व्रतको पढ़ता, सुनता अथवा दूसरेको सुनाता है, वह कलियुगके पापोंसे मुक्त होकर पार्वती-लोकमें जाता है तथा जो मनुष्योंकी हित-कामनासे इस व्रतका अनुष्ठान करनेके लिये सम्मति देता है, वह इन्द्रके विमानमें स्थित होकर अक्षयकालतक नायक—नेताका पद प्राप्त करता है॥ २२—२९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे रसकल्याणिनीव्रतं नाम त्रिषष्टितमोऽध्यायः॥ ६३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें रस-कल्याणिनी-व्रत नामक तिरसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६३॥


चौंसठवाँ अध्याय

आर्द्रानन्दकरी तृतीया-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

| ईश्वर उवाच <br><br> तथैवान्यां प्रवक्ष्यामि तृतीयां पापनाशिनीम्। <br> नाम्ना च लोके विख्यातामार्द्रानन्दकरीमिमाम्॥ १ <br><br> यदा शुक्लतृतीयायामाषाढर्क्षं भवेत् क्वचित्। <br> ब्रह्मर्क्षं या मृगक्षं वा हस्तो मूलमथापि वा। <br> दर्भगन्धोदकैः स्नानं तदा सम्यक् समाचरेत्॥ २ <br><br> शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः। <br> भवानीमर्चयेद् भक्त्या शुक्लपुष्पैः सुगन्धिभिः। <br> महादेवेन सहितामुपविष्टां महासने॥ ३ <br><br> वासुदेव्यै नमः पादौ शङ्कराय नमो हरम्। <br> जङ्घे शोकविनाशिन्यै आनन्दाय नमः प्रभो॥ ४ <br><br> रम्भायै पूजयेदूरू शिवाय च पिनाकिनः। <br> अदित्यै च कटिं देव्याः शूलिनः शूलपाणये॥ ५ <br><br> माधव्यै च तथा नाभिमथ शम्भोर्भवाय च। <br> स्तनावानन्दकारिण्यै शङ्करस्येन्दुधारिणे॥ ६ <br><br> उत्कण्ठिन्यै नमः कण्ठं नीलकण्ठाय वै हरम्। <br> करावुत्पलधारिण्यै रुद्राय च जगत्पतेः। <br> बाहू च परिरम्भिण्यै त्रिशूलाय हरस्य च॥ ७ <br><br> देव्या मुखं विलासिन्यै वृषेशाय पुनर्विभोः। <br> स्मितं सस्मेरलीलायै विश्ववक्त्राय वै विभोः॥ ८ | ईश्वरने कहा—नारद! उसी प्रकार अब मैं एक-दूसरी पापनाशिनी तृतीयाका वर्णन कर रहा हूँ जो लोकमें आर्द्रानन्दकरी नामसे विख्यात है। इसकी विधि यह है—जब कभी शुक्लपक्षकी तृतीयाको पूर्वाषाढ़ अथवा उत्तराषाढ़, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त अथवा मूल नक्षत्र पड़े तो उस समय कुश और चन्दनमिश्रित जलसे भलीभाँति स्नान करना चाहिये। फिर श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत चन्दनका अनुलेप कर ले। तत्पश्चात् महादेवसहित दिव्य आसनपर विराजमान भवानीकी (स्वर्णमयी मूर्तिकी) श्वेत पुष्पों और सुगन्धित पदार्थोंद्वारा भक्तिपूर्वक अर्चना करे। (पूजनकी विधि इस प्रकार है—) ‘वासुदेव्यै नमः, शङ्कराय नमः’ से गौरी-शंकरके दोनों चरणोंका, ‘शोकविनाशिन्यै नमः, आनन्दाय नमः’ से दोनों जंघाओंका, ‘रम्भायै नमः’, ‘शिवाय नमः’ से दोनों ऊरुओंका, ‘अदित्यै नमः, शूलपाणये नमः’ से कटिप्रदेशका, ‘माधव्यै नमः, भवाय नमः’ से नाभिका, ‘आनन्दकारिण्यै नमः, इन्दुधारिणे नमः’ से दोनों स्तनोंका, ‘उत्कण्ठिन्यै नमः, नीलकण्ठाय नमः’ से कण्ठका, ‘उत्पलधारिण्यै नमः, रुद्राय नमः’ से दोनों हाथोंका, ‘परिरम्भिण्यै नमः, त्रिशूलाय नमः’ से दोनों भुजाओंका, ‘विलासिन्यै नमः, वृषेशाय नमः’ से मुखका, ‘सस्मेरलीलायै नमः, विश्ववक्त्राय नमः’ से मुसकानका, |

२५६ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नेत्रे मदनवासिन्यै विश्वधाम्ने त्रिशूलिनः।<br>भ्रुवौ नृत्यप्रियायै तु ताण्डवेशाय शूलिनः॥ ९<br>देव्या ललाटमिन्द्राण्यै हव्यवाहाय वै विभोः।<br>स्वाहायै मुकुटं देव्या विभोर्गङ्गाधराय वै॥ १०<br>विश्वकायौ विश्वमुखौ विश्वपादकरौ शिवौ।<br>प्रसन्नवदनौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥ ११'मदनवासिन्यै नमः, विश्वधाम्ने नमः' से दोनों नेत्रोंका, 'नृत्यप्रियायै नमः, ताण्डवेशाय नमः' से दोनों भौंहोंका, 'इन्द्राण्यै नमः, हव्यवाहाय नमः' से ललाटका तथा 'स्वाहायै नमः, गङ्गाधराय नमः' से मुकुटका पूजन करे। तत्पश्चात् विश्व जिनका शरीर है, जो विश्वके मुख, पाद और हस्तस्वरूप तथा मङ्गलकारक हैं, जिनके मुखपर प्रसन्नता झलकती रहती है, उन पार्वती और परमेश्वरकी मैं वन्दना करता हूँ। (ऐसा कहकर उनके चरणोंमें लुढ़क पड़े।)॥ ९—११॥
एवं सम्पूज्य विधिवदग्रतः शिवयोः नमः।<br>पद्मोत्पलानि रजसा नानावर्णेन कारयेत्॥ १२<br>शङ्खचक्रे सकटके स्वस्तिकाङ्कुशचामरान्।<br>यावन्तः पांसवस्तत्र रजसः पतिता भुवि।<br>तावद् वर्षसहस्त्राणि शिवलोके महीयते॥ १३<br>चत्वारि घृतपात्राणि सहिरण्यानि शक्तितः।<br>दत्त्वा द्विजाय करकमुदकान्नसमन्वितम्।<br>प्रतिपक्षं चतुर्मासं यावदेतन्निवेदयेत्॥ १४<br>ततस्तु चतुरो मासान् पूर्ववत् करकोपरि।<br>चत्वारि सक्तुपात्राणि तिलपात्राण्यतः परम्॥ १५<br>गन्धोदकं पुष्पवारि चन्दनं कुङ्कुमोदकम्।<br>अपक्वं दधि दुग्धं च गोशृङ्गोदकमेव च॥ १६<br>पिष्टोदकं तथा वारि कुष्ठचूर्णान्वितं पुनः।<br>उशीरसलिलं तद्वद् यवचूर्णोदकं पुनः॥ १७<br>तिलोदकं च सम्प्राश्य स्वपेन्मार्गशिरादिषु।<br>मासेषु पक्षद्वितयं प्राशनं समुदाहृतम्॥ १८<br>सर्वत्र शुक्लपुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने।<br>दानकाले च सर्वत्र मन्त्रमेतमुदीरयेत्॥ १९<br>गौरी मे प्रीयतां नित्यमघनाशाय मङ्गला।<br>सौभाग्यायास्तु ललिता भवानी सर्वसिद्धये॥ २०<br>संवत्सरान्ते लवणं गुडकुम्भं च सर्जिकाम्।<br>चन्दनं नेत्रपट्टं च सहिरण्याम्बुजेन तु॥ २१<br>उमामहेश्वरं हैमं तद्दिक्षुफलैर्युतम्।<br>सतूलावरणां शय्यां सविश्रामां निवेदयेत्।<br>सपत्नीकाय विप्राय गौरी मे प्रीयतामिति॥ २२इस प्रकार विधिके अनुसार पूजन कर पुनः शिव-पार्वतीकी मूर्तिके अग्रभागमें विभिन्न प्रकारके रङ्गोंवाले रजसे कमलका आकार बनवाये। साथ ही कटकसहित शङ्ख, चक्र, स्वस्तिक, अङ्कुश और चँवरको भी चित्रित करे। ऐसा करते समय वहाँ भूतलपर जितने रजःकण गिरते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक व्रती शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। पुनः अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसहित घीसे भरे हुए चार पात्र और अन्न एवं जलसे युक्त करवा ब्राह्मणको दान करे। ऐसा चार मासतक प्रत्येक शुक्लपक्षकी तृतीयाको करना चाहिये। इसके बाद चार मासतक पहलेकी तरह करवापर सत्तूसे पूर्ण चार पात्र रखकर तथा उसके बाद चार मासतक करवापर तिलपूर्ण चार पात्र रखकर दान करे। व्रतीको मार्गशीर्ष आदि मासोंमें क्रमशः गन्धोदक (सुगन्धमिश्रित जल), पुष्पवारि (फूलयुक्त जल), चन्दनमिश्रित जल, कुङ्कुमयुक जल, बिना पका हुआ दही, दूध, गोशृङ्गोदक (गौके सींगसे स्पर्श कराया हुआ जल), पिष्टोदक (पीठीयुक्त जल), कुष्ठ (गन्धक)-के चूर्णसे युक्त जल, उशीर (खस)-मिश्रित जल, यवके चूर्णसे युक्त जल तथा तिलमिश्रित जलका भक्षण करके रात्रिमें शयन करना चाहिये। यह प्राशन (भक्षण) प्रत्येक मासमें दोनों पक्षोंमें करनेका विधान है। सभी महीनोंके पूजनमें श्वेत पुष्प सदा प्रशस्त माने गये हैं। सभी मासोंमें दानके समय इस प्रकारका मन्त्र उच्चारण करना चाहिये—'गौरी नित्य मुझपर प्रसन्न रहें, मङ्गला मेरे पापोंका विनाश करें, ललिता मुझे सौभाग्य प्रदान करें और भवानी मेरे लिये सम्पूर्ण सिद्धियोंकी प्रदात्री हों।' इस प्रकार वर्षके अन्तमें स्वर्णनिर्मित कमलसहित नमक, गुड़से भरा हुआ घट, सज्जी, चन्दन, आँखोंको ढँकनेके लिये वस्त्र, गत्रा और नाना प्रकारके फलोंके साथ स्वर्णनिर्मित उमा और महेश्वरकी मूर्ति सपत्नीक ब्राह्मणको दान कर दे। उस समय रूईसे भरा हुआ गद्दा, चादर और तकियासे युक्त सुन्दर शय्या भी दान करनेका विधान है। (दान करनेके पश्चात् उनसे यों प्रार्थना करे—) 'गौरीदेवी मुझपर प्रसन्न हों'॥ १२—२२॥

* अध्याय ६५ * २५७

| आर्द्रानन्दकरी नाम्ना तृतीयाैषा सनातनी।<br>यामुपोष्य नरो याति शाम्भोर्यत् परमं पदम्॥ २३<br>इह लोके सदानन्दमाप्नोति धनसम्पदः।<br>आयुरारोग्यसम्पत्त्या न कश्चिच्छोकमाप्नुयात्॥ २४<br>नारी वा कुरुते या तु कुमारी विधवा च या।<br>सापि तत्फलमाप्नोति देव्यनुग्रहलालिता॥ २५<br>प्रतिपक्षमृपोष्यैवं मन्त्रार्चनविधानवित्।<br>रुद्राणीलोकमभ्येति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ २६<br>य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद् वापि मानवः।<br>शक्रलोके स गन्धर्वैः पूज्यतेऽपि युगत्रयम्॥ २७<br>आनन्ददां सकलदुःखहरां तृतीयां<br>या स्त्री करोत्यविधवा विधवाथवापि।<br>सा स्वे गृहे सुखशतान्यनुभूय भूयो<br>गौरीपदं सदयिता दयिता प्रयाति॥ २८ | यह आर्द्रानन्दकरी नामकी सनातनी तृतीया है, जिसका व्रतोपवास करके मनुष्य उस स्थानको प्राप्त होता है जो शिवजीका परमपद कहलाता है। वह इस लोकमें धन-सम्पत्ति, दीर्घायु और नीरोगतारूप सम्पत्तिसे युक्त होकर सुखका उपभोग करता है। उसे कोई शोक नहीं प्राप्त होता। यदि सधवा नारी, कुमारी अथवा विधवा इस व्रतका अनुष्ठान करती है तो वह भी देवीकी कृपासे लालित होकर उसी फलको प्राप्त होती है। इसी प्रकार मन्त्र और अर्चा-विधिका ज्ञाता मनुष्य प्रत्येक पक्षमें इस व्रतका अनुष्ठान कर रुद्राणीके उस लोकमें जाता है जहाँसे पुनरागमन नहीं होता। जो मानव नित्य इस व्रतको सुनता अथवा सुनाता है वह तीन युगोंतक इन्द्रलोकमें गन्धर्वोंद्वारा पूजित होता है। जो स्त्री, चाहे वह सधवा हो अथवा विधवा, इस सम्पूर्ण दुःखोंको हरण करनेवाली एवं आनन्ददायिनी तृतीयाका अनुष्ठान करती है वह नारी पतिसहित अपने घरमें सैकड़ों प्रकारके सुखोंका अनुभव करके पुनः गौरी-लोकमें चली जाती है॥ २३—२८॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे आर्द्रानन्दकरीतृतीयाव्रतं नाम चतुःषष्टितमोऽध्यायः॥ ६४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें आर्द्रानन्दकरी तृतीया-व्रत नामक चौंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६४॥


पैंसठवाँ अध्याय

अक्षयतृतीया-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

ईश्वर उवाचभगवान् शंकरने कहा—
अथान्यमपि वक्ष्यामि तृतीयां सर्वकामदाम्।<br>यस्यां दत्तं हुतं जप्तं सर्वं भवति चाक्षयम्॥ १<br>वैशाखशुक्लपक्षे तु तृतीया यैरुपोषिता।<br>अक्षयं फलमाप्नोति सर्वस्य सुकृतस्य च॥ २<br>सा तथा कृत्तिकोपेता विशेषेण सुपूजिता।<br>तत्र दत्तं हुतं जप्तं सर्वमक्षयमुच्यते॥ ३<br>अक्षया संततिस्तस्य तस्यां सुकृतमक्षयम्।<br>अक्षतैः पूज्यते विष्णुस्तेन साक्षया स्मृता।<br>अक्षतैस्तु नराः स्नाता विष्णोर्दत्त्वा तथाक्षताम्॥ ४नारद! अब मैं सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाली एक अन्य तृतीयाका वर्णन कर रहा हूँ, जिसमें दान देना, हवन करना और जप करना सभी अक्षय हो जाता है। जो लोग वैशाखमासके शुक्लपक्षकी तृतीयाके दिन व्रतोपवास करते हैं, वे अपने समस्त सत्कर्मोंका अक्षय फल प्राप्त करते हैं। वह तृतीया यदि कृत्तिका नक्षत्रसे युक्त हो तो विशेषरूपसे पूज्य मानी गयी है। उस दिन दिया गया दान, किया हुआ हवन और जप सभी अक्षय बतलाये गये हैं। इस व्रतका अनुष्ठान करनेवालेकी संतान अक्षय हो जाती है और उस दिनका किया हुआ पुण्य अक्षय हो जाता है। इस दिन अक्षतके द्वारा भगवान् विष्णुकी पूजा की जाती है, इसीलिये इसे अक्षय-तृतीया