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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

५५ आदित्यशयन-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

* अध्याय ५३ * २१७


| यत्राधिकृत्य माहात्म्यमादित्यस्य चतुर्मुखः।<br>अघोरकल्पवृत्तान्तप्रसङ्गेन जगत्स्थितिम्।<br>मनवे कथयामास भूतग्रामस्य लक्षणम्॥ ३०<br>चतुर्दशसहस्राणि तथा पञ्चशतानि च।<br>भविष्यच्चरितप्रायं भविष्यं तदिहोच्यते॥ ३१<br>तत्पौषे मासि यो दद्यात् पौर्णमास्यां विमत्सरः।<br>गुडकुम्भसमायुक्तमग्निष्टोमफलं भवेत्॥ ३२<br>रथन्तरस्य कल्पस्य वृत्तान्तमधिकृत्य च।<br>सावर्णिना नारदाय कृष्णमाहात्म्यमुत्तमम्॥ ३३<br>यत्र ब्रह्मवराहस्य चोदनं वर्णितं मुहुः।<br>तदष्टादशसाहस्रं ब्रह्मवैवर्तमुच्यते॥ ३४<br>पुराणं ब्रह्मवैवर्तं यो दद्यान्माघमासि च।<br>पौर्णमास्यां शुभदिने ब्रह्मलोके महीयते॥ ३५ | जिसमें अघोर कल्पके वृत्तान्तके प्रसङ्गवश सूर्यके माहात्म्यका आश्रय लेकर ब्रह्माने मनुके प्रति जगत्की स्थिति और प्राणिसमूहके लक्षणका वर्णन किया है तथा जिसमें प्रायः भविष्यकालीन चरितका वर्णन आया है, उसे इस लोकमें (नवम) भविष्यपुराण कहते हैं। उसमें चौदह हजार पाँच सौ श्लोक हैं। जो मनुष्य ईर्ष्या-द्वेषरहित हो पौषमासकी पूर्णिमा तिथिको उसका गुड़से पूर्ण घड़ेसहित दान करता है, उसे अग्निष्टोम* नामक यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। जिसमें रथन्तर कल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर सावर्णि मनुने नारदजीके प्रति भगवान् श्रीकृष्णके श्रेष्ठ माहात्म्यका वर्णन किया है तथा जिसमें ब्रह्मवराहका वृत्तान्त बारम्बार वर्णित हुआ है, उसे (दशम) ब्रह्मवैवर्तपुराण कहते हैं। इसमें अठारह सहस्र श्लोक हैं। जो मनुष्य माघमासमें पूर्णिमा तिथिको शुभ दिनमें इस ब्रह्मवैवर्तपुराणका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें सत्कृत होता है॥ २३—३५॥ |
| यत्राग्निलिङ्गमध्यस्थः प्राह देवो महेश्वरः।<br>धर्मार्थकाममोक्षार्थमाग्रेयमधिकृत्य च॥ ३६<br>कल्पान्ते लैङ्गमित्युक्तं पुराणं ब्रह्मणा स्वयम्।<br>तदेकादशसाहस्रं फाल्गुन्यां यः प्रयच्छति।<br>तिलधेनुसमायुक्तं स याति शिवसाम्यताम्॥ ३७ | जिसमें कल्पान्तके समय अग्निका आश्रय लेकर देवाधिदेव महेश्वरने अग्निलिङ्गके मध्यमें स्थित रहते हुए धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारोंकी प्राप्तिके लिये उपदेश दिया है, उस पुराणको स्वयं ब्रह्माने (एकादश) लैङ्ग (लिङ्ग)-पुराण नामसे अभिहित किया है। उसमें ग्यारह हजार श्लोक हैं। जो मानव फाल्गुनमासकी पूर्णिमा तिथिको तिलधेनुसहित इस पुराणका दान करता है, वह शिवजीकी साम्यताको प्राप्त कर लेता है। |
| महावराहस्य पुनर्माहात्म्यमधिकृत्य च।<br>विष्णुनाभिहितं क्षोण्यै तद्वाराहमिहोच्यते॥ ३८<br>मानवस्य प्रसङ्गेन कल्पस्य मुनिसत्तमाः।<br>चतुर्विंशत्सहस्राणि तत्पुराणमिहोच्यते॥ ३९<br>काञ्चनं गरुडं कृत्वा तिलधेनुसमन्वितम्।<br>पौर्णमास्यां मधौ दद्याद् ब्राह्मणाय कुटुम्बिने।<br>वराहस्य प्रसादेन पदमाप्नोति वैष्णवम्॥ ४० | मुनिवरो! जिसमें मानककल्पके प्रसङ्गवश पुनः महावराहके माहात्म्यका आश्रय लेकर भगवान् विष्णुने पृथ्वीके प्रति उपदेश दिया है, उसे भूतलपर (द्वादश) वराहपुराण कहते हैं। उस पुराणकी श्लोक-संख्या चौबीस हजार बतलायी जाती है। जो मनुष्य गरुड़की सोनेकी मूर्ति बनवाकर उस मूर्ति तथा तिल-धेनुके साथ इस पुराणका चैत्रमासकी पूर्णिमा तिथिको कुटुम्बी ब्राह्मणको दान करता है, वह वराहभगवान्की कृपासे विष्णुपदको प्राप्त कर लेता है। |


* यह ज्योतिष्टोमका एक अङ्ग है।

२१८ * मत्स्यपुराण *

यत्र माहेश्वरान् धर्मानधिकृत्य च षण्मुखः।<br>कल्पे तत्पुरुषं वृत्तं चरितैरुपबृंहितम्॥ ४१<br><br>स्कान्दं नाम पुराणं च ह्येकाशीति निगद्यते।<br>सहस्राणि शतं चैकमिति मर्त्येषु गद्यते॥ ४२<br><br>परिलिख्य च यो दद्याद्धेमशूलसमन्वितम्।<br>शैवं पदमवाप्नोति मीने चोपागते रवौ॥ ४३<br><br>त्रिविक्रमस्य माहात्म्यमधिकृत्य चतुर्मुखः।<br>त्रिवर्गमभ्यधात् तच्च वामनं परिकीर्तितम्॥ ४४<br><br>पुराणं दशसाहस्रं कूर्मकल्पानुगं शिवम्।<br>यः शरद्विषुवे दद्याद् वैष्णवं यात्यसौ पदम्॥ ४५<br><br>यत्र धर्मार्थकामानां मोक्षस्य च रसातले।<br>माहात्म्यं कथयामास कूर्मरूपी जनार्दनः॥ ४६<br><br>इन्द्रद्युम्नप्रसङ्गेन ऋषिभ्यः शक्रसंनिधौ।<br>अष्टादश सहस्राणि लक्ष्मीकल्पानुषङ्गिकम्॥ ४७<br><br>यो दद्यादयने कूर्मं हेमकूर्मसमन्वितम्।<br>गोसहस्रप्रदानस्य फलं सम्प्राप्नुयान्नरः॥ ४८<br><br>श्रुतीनां यत्र कल्पादौ प्रवृत्त्यर्थं जनार्दनः।<br>मत्स्यरूपेण मनवे नरसिंहोपवर्णनम्॥ ४९<br><br>अधिकृत्याब्रवीत् सप्तकल्पवृत्तं मुनीश्वराः।<br>तन्मात्स्यमिति जानीध्वं सहस्राणि चतुर्दश॥ ५०जिसमें कल्पान्तके समय स्वामिकार्तिकने माहेश्वर धर्मोंका आश्रय लेकर शिवजीके सुशोभन चरित्रोंसे युक्त वृत्तान्तका वर्णन किया है, उस (त्रयोदश पुराण)-का नाम स्कन्दपुराण है। वह मृत्युलोकमें इक्यासी हजार एक सौ श्लोकोंका बतलाया जाता है।$^१$ जो मनुष्य उसे लिखकर उस पुस्तकका स्वर्णनिर्मित त्रिशूलके साथ सूर्यके मीन राशिपर आनेपर (प्रायः चैत्रमासमें) दान करता है, वह शिव-पदको प्राप्त कर लेता है। जिसमें ब्रह्माने त्रिविक्रमके माहात्म्यका आश्रय लेकर त्रिवर्गोंका वर्णन किया है, उसे (चतुर्दश) वामनपुराण कहते हैं। इसमें दस हजार श्लोक हैं। यह कूर्मकल्पका अनुगमन करनेवाला तथा मङ्गलप्रद है। जो मानव शरत्कालीन विषुवयोग (१८ सितम्बरके लगभग दिन-रातके बराबर होनेके काल—तुलासंक्रान्ति)-में इसका दान करता है, वह विष्णु-पदको प्राप्त कर लेता है। जिसमें कूर्मरूपी भगवान् जनार्दनने रसातलमें इन्द्रद्युम्नकी कथाके प्रसङ्गवश इन्द्रके निकट धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके माहात्म्यका ऋषियोंके प्रति वर्णन किया है, उसे (पञ्चदश) कूर्मपुराण कहते हैं। यह लक्ष्मीकल्पसे सम्बन्ध रखनेवाला है। इसमें अठारह हजार श्लोक हैं। जो मनुष्य सूर्यके उत्तरायण एवं दक्षिणायनके प्रारम्भकालमें स्वर्णनिर्मित कच्छपसहित कूर्मपुराणका दान करता है, उसे एक हजार गोदान करनेका फल प्राप्त होता है॥ ३६—४८॥<br><br>मुनिवरो! जिसमें कल्पके प्रारम्भमें भगवान् जनार्दनने मत्स्य-रूप धारण करके मनुके प्रति श्रुतियोंकी प्रवृत्तिके निमित्त नृसिंहावतारके वृत्तान्तका आश्रय लेकर सातों कल्पोंके वृत्तान्तोंका वर्णन किया है, उसे (षोडश$^२$ मात्स्य) मत्स्यपुराण जानना चाहिये। उसमें चौदह हजार श्लोक हैं।

१. यहाँके अतिरिक्त विष्णुपुराण ३।६।२१—२४; भागवत १२।७ तथा १३; मार्कण्डेय १३४; वाराह ११२।७९-७२; कूर्म १।१३-१५; लिङ्ग १।३९।६१-४; पद्म १।६२।२-७; नारद १।९२-१०९ आदिमें पुराणक्रम एवं श्लोक-संख्यादिका वर्णन है। शोधकर्त्ताओंने इन क्रमोंको तीन भागोंमें क्रमबद्ध किया है। इनमें मत्स्य, भागवत, विष्णु आदि क्रमको मत्स्य या विष्णुपुराणक्रम कहा है। इनके अनुसार स्कन्दपुराण १३वीं संख्यापर तथा लिङ्गपुराणद्वारा निर्दिष्ट क्रममें १७ वीं संख्यापर निर्दिष्ट है। इसके सूतसंहितादि छः संहिताओंका एक रूप तथा माहेश्वरादि सात खण्डोंका दूसरा रूप—दोनों मिलकर पौने दो लाख श्लोक होते हैं। फिर शाम्भल-माहात्म्य, सत्यनारायण-व्रतकथा आदि इसके अनेक खिल ग्रंथ भी हैं।
२. यह विष्णुपुराण आदिक्रममें १६ वीं संख्यापर, पर लिङ्गादिक्रममें १५ वीं संख्यापर परिगणित है।

* अध्याय ५३ * २१९

| विषुवे हेममत्स्येन धेन्वा चैव समन्वितम्।<br>यो दद्यात् पृथिवी तेन दत्ता भवति चाखिला॥ ५१<br><br>यदा च गारुडे कल्पे विश्वाण्डाद् गरुडोद्भवम्।<br>अधिकृत्याब्रवीत् कृष्णो गारुडं तदिहोच्यते॥ ५२<br><br>तदष्टादशकं चैकं सहस्त्राणीह पठ्यते।<br>सौवर्णहंससंयुक्तं यो ददाति पुमानिह।<br>स सिद्धिं लभते मुख्यां शिवलोके च संस्थितिम्॥ ५३<br><br>ब्रह्मा ब्रह्माण्डमाहात्म्यमधिकृत्याब्रवीत् पुनः।<br>तच्च द्वादशसाहस्त्रं ब्रह्माण्डं द्विशताधिकम्॥ ५४<br><br>भविष्याणां च कल्पानां श्रूयते यत्र विस्तरः।<br>तद् ब्रह्माण्डपुराणं च ब्रह्मणा समुदाहृतम्॥ ५५<br><br>यो दद्यात् तद् व्यतीपाते पीतोर्णायुगसंयुतम्।<br>राजसूयसहस्त्रस्य फलमाप्नोति मानवः।<br>हेमधेन्वा युतं तच्च ब्रह्मलोकफलप्रदम्॥ ५६<br><br>चतुर्लक्षमिदं प्रोक्तं व्यासेनाद्भुतकर्मणा।<br>मत्पितुर्मम पित्रा च मया तुभ्यं निवेदितम्॥ ५७<br><br>इह लोकहितार्थाय संक्षिप्तं परमर्षिणा।<br>इदमद्यापि देवेषु शतकोटिप्रविस्तरम्॥ ५८<br><br>उपभेदान् प्रवक्ष्यामि लोके ये सम्प्रतिष्ठिताः।<br>पाद्मे पुराणे यत्रोक्तं नरसिंहोपवर्णनम्।<br>तच्चाष्टादशसाहस्त्रं नारसिंहमिहोच्यते॥ ५९<br><br>नन्दाया यत्र माहात्म्यं कार्त्तिकेयेन वर्ण्यते।<br>नन्दीपुराणं तल्लोकैराख्यातमिति कीर्त्यते॥ ६० | जो मनुष्य विषुवयोग (मेष अथवा तुलाकी संक्रान्ति)-में स्वर्णनिर्मित मत्स्य और दुधारू गौके साथ इस पुराणका दान करता है, उसके द्वारा समग्र पृथ्वीका दान सम्पन्न हो जाता है अर्थात् उसे सम्पूर्ण पृथ्वीके दानका फल प्राप्त होता है। जिसमें भगवान् श्रीकृष्णने गरुड-कल्पके समय विश्वाण्ड (ब्रह्माण्ड)-से गरुडकी उत्पत्तिके वृत्तान्तका आश्रय लेकर उपदेश दिया है, उसे इस लोकमें सप्तदश गारुड (गरुडपुराण) कहते हैं। उसे भूतलपर उन्नीस हजार श्लोकोंका कहा जाता है। जो पुरुष स्वर्णनिर्मित हंसके साथ इस पुराणका दान करता है, उसे मुख्य सिद्धि प्राप्त होती है और वह शिवलोकमें निवास करता है। जिसमें ब्रह्माने पुनः ब्रह्माण्डके माहात्म्यका आश्रय लेकर वृत्तान्तोंका वर्णन किया है तथा जिसमें भविष्यकल्पोंका भी विस्तारपूर्वक वर्णन सुना जाता है, उसे ब्रह्माने (अन्तिम—अष्टादश) ब्रह्माण्डपुराण बतलाया है<sup>१</sup>। वह ब्रह्माण्डपुराण बारह हजार दो सौ श्लोकोंवाला है। जो मानव व्यतीपात नामक योगमें पीले रंगके दो ऊनी वस्त्रोंके साथ इस पुराणका दान करता है, उसे एक हजार राजसूय-यज्ञके<sup>२</sup> फलकी प्राप्ति होती है। उसी (ब्रह्माण्डपुराण)-को यदि स्वर्णनिर्मित गौके साथ दान किया जाय तो वह ब्रह्मलोक-प्राप्तिरूपी फलका प्रदाता बन जाता है। अद्भुतकर्मा महर्षि वेदव्यासने मेरे पिता रोमहर्षणके प्रति इन चार लाख श्लोकोंका वर्णन किया था। उसीको मेरे पिताने मुझे बतलाया और मैंने आपलोगोंके प्रति निवेदन कर दिया। परमर्षि व्यासजीने मृत्युलोकमें लोकहितके लिये इसका संक्षेप कर दिया है, किंतु देवलोकमें तो यह आज भी सौ करोड़ श्लोकोंसे युक्त ही है॥ ४९—५८॥<br><br>ऋषियो! अब मैं उन उपपुराणोंका वर्णन कर रहा हूँ, जो लोकमें प्रचलित हैं। पद्मपुराणमें जहाँ नृसिंहावतारके वृत्तान्तका वर्णन किया गया है, उसे नारसिंह (नरसिंहपुराण<sup>३</sup>) कहते हैं। उसमें अठारह हजार श्लोक हैं। जिसमें स्वामिकार्तिकने नन्दाके माहात्म्यका वर्णन किया है, उसे लोग नन्दीपुराणके नामसे पुकारते हैं। |


१. यह पुराण प्रायः सर्वांशमें वायुपुराणसे (और अत्यधिक अंशोंमें मत्स्यपुराणसे भी) मिल जाता है, यह एक विचित्र बात है। केवल अन्तमें उसके गयामाहात्म्यकी जगह इसमें ललितोपाख्यान है।
२. यह भी अश्वमेधवत् प्रसिद्ध तथा श्रौतसूत्रोंमें प्रायः उन्हीं स्थलोंपर चर्चित है।
३. कल्याण वर्ष ४५ में यह मूलसहित और सानुवाद प्रकाशित है और अब ग्रन्थरूपमें पुनर्मुद्रित हो चुका है।