मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
११९- आश्रमस्थ विवरमें पुरूरवाका प्रवेश, आश्रमकी शोभाका वर्णन तथा पुरूरवाकी तपस्या
| * अध्याय ११६ * | ३९३ |
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| तस्यास्तीरभवा वृक्षाः सुगन्धकुसुमाचिताः।<br>तथापकृष्टसम्भ्रान्तभ्रमरस्तनिताकुलाः ॥ १७<br>यस्यास्तीरे रतिं यान्ति सदा कामवशा मृगाः।<br>तपोवनाश्च ऋषयस्तथा देवाः सहाप्सराः॥ १८<br>लभन्ते यत्र पूताङ्गा देवेभ्यः प्रतिमानिताः।<br>स्त्रियश्च नाकबहुलाः पद्मेन्दुप्रतिमाननाः॥ १९<br>या बिभर्त्ति सदा तोयं देवसङ्गैरपीडितम्।<br>पुलिन्दैर्नृपसङ्घैश्च व्याघ्रवृन्दैरपीडितम्॥ २०<br>सतामरसपानीयां सतारगगनामलाम्।<br>स तां पश्यन् ययौ राजा सतामीप्सितकामदाम्॥ २१<br>यस्यास्तीररुहैः काशैः पूर्णैश्चन्द्रांशुसंनिभैः।<br>राजते विविधाकारै रम्यं तीरं महाद्रुमैः।<br>या सदा विविधैर्विप्रैर्देवैश्चापि निषेव्यते॥ २२<br>या च सदा सकलौघविनाशं<br>भक्तजनस्य करोत्यचिरेण।<br>यानुगता सरितां हि कदम्बै-<br>र्ह्यनुगता सततं हि मुनीन्द्रैः॥ २३<br>या हि सुतानिव पाति मनुष्यान्<br>या च युता सततं हिमसङ्घैः।<br>या च युता सततं सुरवृन्दै-<br>र्या च जनैः स्वहिताय श्रिता वै॥ २४<br>युक्ता च केसरिगणैः करिवृन्दजुष्टा<br>संतानयुक्तसलिलापि सुवर्णयुक्ता।<br>सूर्यांशुतापपरिवृद्धकदम्बवृक्षा<br>शीतांशुतुल्ययशसा ददृशे नृपेण॥ २५ | चन्दनोंने युक्त था, जिसपर भौरे मँडरा रहे थे। उसके तटपर उगे हुए वृक्ष सुगन्धित पुष्पोंसे लदे हुए तथा सुगन्धके लोभसे आकृष्ट हुए चञ्चल भौरोंकी गुंजारसे व्याप्त थे। जिसके तटपर कामके वशीभूत हुए मृग हिरनियोंके साथ विहार करते थे तथा वहाँ तपोवन, ऋषिगण, अप्सराओंसमेत देवगण, देवताओंके समान सुन्दर एवं पवित्र अङ्गोंवाले अन्य पुरुष एवं कमल और चन्द्रमाकी-सी मुखवाली स्वर्गवासिनी स्त्रियाँ भी पायी जाती थीं, जो देवगणों, पुलिन्दों (जंगली जातियों), नृपसमूहों और व्याघ्रदलोंसे अपीडित अर्थात् परम पवित्र जल धारण करती थी, जो कमलयुक्त जल धारण करनेके कारण तारिकाओंसहित निर्मल आकाशके समान सुशोभित तथा सत्पुरुषोंकी अभीष्ट कामनाओंको पूर्ण करनेवाली थी, उसे देखते हुए राजा पुरूरवा आगे बढ़े। जिस नदीके रमणीय तट तीरभूमिमें उगे हुए पूर्णिमाके चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल काश-पुष्पों तथा अनेकों प्रकारके विशाल वृक्षोंसे सुशोभित थे, जो सदा विविध मतावलम्बी ब्राह्मणों और देवताओंसे सुसेवित थी, जो सदा भक्तजनोंके सम्पूर्ण पापोंका शीघ्र ही विनाश कर देती थी, जिसमें बहुत-सी छोटी-छोटी नदियाँ आकर मिली थीं, जो निरन्तर मुनीश्वरोंद्वारा सेवित थी, जो पुत्रकी तरह मनुष्योंका पालन करती थी, जो सदा हिम (बर्फ) राशिसे आच्छादित रहती थी, जो निरन्तर देवगणोंसे संयुक्त रहती थी, अपना कल्याण करनेके लिये मनुष्य जिसका आश्रय लेते थे, जिसके किनारे झुंड-के-झुंड सिंह घूमते रहते थे, जो हाथी-समूहोंसे सेवित थी, जिसका जल कल्पवृक्षके पुष्पोंसे युक्त और सुवर्णके समान चमकीला था तथा जिसके तटवर्ती कदम्ब-वृक्ष सूर्यकी किरणोंके तापसे बढ़े हुए थे—ऐसी ऐरावती नदीको चन्द्रमा-सरीखे निर्मल यशवाले राजा पुरूरवाने देखा॥ १३-२५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे भुवनकोषे सुरनदीवर्णनं नाम षोडशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोष-वर्णनप्रसंगमें सुरनदी-वर्णन नामक एक सौ सोलहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११६॥
३९४ * मत्स्यपुराण *
एक सौ सत्रहवाँ अध्याय
हिमालयकी अद्भुत छटाका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
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| आलोकयन् नदीं पुण्यां तत्समीरहृतश्रमः ।<br>स गच्छन्नेव ददृशे हिमवन्तं महागिरिम् ॥ १<br><br>खमुल्लिखद्भिर्बहुभिर्वृतं शृङ्गैस्तु पाण्डुरैः ।<br>पक्षिणामपि सञ्चारैर्विना सिद्धगतिं शुभाम् ॥ २<br><br>नदीप्रवाहसञ्जातमहाशब्दैः समन्ततः ।<br>असंश्रुतान्यशब्दं तं शीततोयं मनोरमम् ॥ ३<br><br>देवदारुवने नीलैः कृताधोवसनं शुभम् ।<br>मेघोत्तरीयकं शैलं ददृशे स नराधिपः ॥ ४<br><br>श्वेतमेघकृतोष्णीषं चन्द्रार्कमुकुटं क्वचित् ।<br>हिमानुलिप्तसर्वाङ्गं क्वचिद् धातुविमिश्रितम् ॥ ५<br><br>चन्दनेनानुलिप्ताङ्गं दत्तपञ्चाङ्गुलं यथा ।<br>शीतप्रदं निदाघेऽपि शिलाविकटसङ्कटम् ।<br>सालक्तकैरप्सरसां मुद्रितं चरणैः क्वचित् ॥ ६<br><br>क्वचित् संस्पृष्टसूर्यांशुं क्वचिच्च तमसावृतम् ।<br>दरीमुखैः क्वचिद् भीमैः पिबन्तं सलिलं महत् ॥ ७<br><br>क्वचिद् विद्याधरगणैः क्रीडद्भिरुपशोभितम् ।<br>उपगीतं तथा मुख्यैः किन्नराणां गणैः क्वचित् ॥ ८<br><br>आपानभूमौ गलितैर्गन्धर्वाप्सरसां क्वचित् ।<br>पुष्पैः संतानकादीनां दिव्यैस्तमुपशोभितम् ॥ ९<br><br>सुमोत्थिताभिः शय्याभिः कुसुमानां तथा क्वचित् ।<br>मृदिताभिः समाकीर्णं गन्धर्वाणां मनोरमम् ॥ १०<br><br>निरुद्धपवनैर्देशैर्नीलशाद्वलमण्डितैः ।<br>क्वचिच्च कुसुमैर्युक्तमत्यन्तरुचिरं शुभम् ॥ ११ | ऋषियो! ऐरावती नदीके जलका स्पर्श करके बहती हुई वायुके स्पर्शसे राजा पुरूरवाकी थकावट दूर हो गयी थी। वे उस पुण्यमयी नदीको देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। इतनेमें उन्हें महान् पर्वत हिमवान् दृष्टिगोचर हुआ। वह बहुत-से पीलापन लिये हुए उज्ज्वल वर्णवाले गगनचुम्बी शिखरोंसे युक्त था। वहाँ मङ्गलमयी सिद्ध-गतिके बिना पक्षियोंका भी संचार कठिन था अर्थात् वहाँ केवल सिद्धलोग ही जा सकते थे। वहाँ नदियोंके प्रवाहसे उत्पन्न हुआ महान् घर्घर शब्द चारों ओर गूँज रहा था, जिसके कारण दूसरा कोई शब्द सुनायी ही नहीं पड़ता था। वह शीतल जलसे परिपूर्ण एवं अत्यन्त मनोरम था। उसने देवदारुके नीले वनोंको अधोवस्त्रके स्थानपर और मेघोंको उत्तरीय वस्त्रके रूपमें धारण कर रखा था। ऐसे हिमालय पर्वतको राजा पुरूरवाने देखा। उसने कहीं तो श्वेत बादलोंकी पगड़ी बाँध रखी थी और कहीं सूर्य एवं चन्द्रमा उसके मुकुट-सरीखे दीख रहे थे। उसका सारा अङ्ग तो बर्फसे आच्छादित था, किंतु उसमें कहीं-कहीं गेरू आदि धातुएँ भी मिली हुई थीं, जिससे वह ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो श्वेत चन्दनसे लिपटे हुए शरीरपर पाँचों अङ्गुलियोंकी छाप लगा दी गयी हो। वह ग्रीष्म-ऋतुमें भी शीतलता प्रदान कर रहा था तथा बड़ी-बड़ी शिलाओंसे युक्त होनेके कारण अगम्य था। कहीं-कहीं अप्सराओंके महावरयुक्त चरणोंसे चिह्नित था, कहीं तो सूर्यकी किरणोंका स्पर्श हो रहा था, किंतु कहीं घोर अन्धकारसे आच्छादित था, कहीं भयानक गुफाओंके मुखोंमें जल गिर रहा था, जो ऐसा लगता था मानो वह अधिक-से-अधिक जल पी रहा हो। कहीं क्रीडा करते हुए यूथ-के-यूथ विद्याधरोंसे सुशोभित था, कहीं किंनरोंके प्रधान गणोंद्वारा गान हो रहा था, कहीं गन्धर्वों एवं अप्सराओंकी आपानभूमि (मधुशाला)-में गिरे हुए कल्पवृक्ष आदि वृक्षोंके दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित था और कहीं गन्धर्वोंकी शयन करके उठ जानेके पश्चात् मर्दित हुई शय्याओंके बिखरे हुए पुष्पोंसे आच्छादित होनेके कारण अत्यन्त मनोरम लग रहा था। कहीं ऐसे प्रदेश थे, जहाँ वायुकी पहुँच नहीं थी, किंतु वे हरी घासोंसे सुशोभित थे तथा उनपर फूल बिखरे हुए थे, जिससे वह अत्यन्त रुचिर एवं सुन्दर लग रहा था॥ १—११॥ |
| * अध्याय ११७ * | ३९५ |
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| तपस्विशरणं शैलं कामिनामतिदुर्लभम्।<br>मृगैर्यथानुचरितं दन्तिभिन्नमहाद्रुमम्॥ १२<br>यत्र सिंहनिनादेन त्रस्तानां भैरवं रवम्।<br>दृश्यते न च संश्रान्तं गजानामाकुलं कुलम्॥ १३<br>तटाश्च तापसैर्यत्र कुञ्जदेशैरलङ्कृताः।<br>रत्नैर्यस्य समुत्पन्नैस्त्रैलोक्यं समलङ्कृतम्॥ १४<br>अहीनशरणं नित्यमहीनजनसेवितम्।<br>अहीनः पश्यति गिरिमहीनं रत्नसम्पदा॥ १५<br>अल्पेन तपसा यत्र सिद्धिं प्राप्स्यन्ति तापसाः।<br>यस्य दर्शनमात्रेण सर्वकल्मषनाशनम्॥ १६<br>महाप्रपातसम्पातप्रपातादिगताम्बुभिः ।<br>वायुनीतैः सदा तृप्तिकृतदेशं क्वचित् क्वचित्॥ १७<br>समालब्धजलैः शृङ्गैः क्वचिच्चापि समुच्छ्रितैः।<br>नित्यार्कतापविषमैरगम्यैर्मनसा युतम्॥ १८<br>देवदारुमहावृक्षव्रजशाखानिरन्तरैः ।<br>वंशस्तम्बवनाकारैः प्रदेशैरुपशोभितम्॥ १९<br>हिमच्छत्रमहाशृङ्गं प्रपातशतनिर्झरम्।<br>शब्दलभ्याम्बुविषमं हिमसंरुद्धकन्दरम्॥ २०<br>दृष्ट्वैव तं चारुनितम्बभूमिं<br>महानुभावः स तु मद्रनाथः।<br>बभ्राम तत्रैव मुदा समेतः<br>स्थानं तदा किंचिदथाससाद॥ २१ | वह पर्वत तपस्वियोंका आश्रयस्थान तथा कामीजनोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ था, उसपर मृग आदि वन्य पशु स्वच्छन्द विचरण करते थे, उसके विशाल वृक्षोंको हाथियोंने भिन्न-भिन्न कर दिया था, जहाँ सिंहकी गर्जनासे भयभीत हुए हाथियोंके दल व्याकुल होकर भयंकर चिग्घाड़ कर रहे थे, जिससे उनमें शान्ति नहीं दीख रही थी, जिसके तटवर्ती प्रदेश निकुञ्जों और तपस्वियोंसे अलंकृत थे, जिससे उत्पन्न हुए रत्नोंसे त्रिलोकी अलंकृत होती है, वासुकि आदि बड़े-बड़े नागोंके आश्रयस्थान, सत्पुरुषोंद्वारा सेवित तथा रत्नसम्पत्तियोंसे परिपूर्ण उस पर्वतको कोई सत्पुरुष ही देख सकता है। जहाँ तपस्वीलोग थोड़े ही तपसे सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं, जिसके दर्शनमात्रसे सारा पाप नष्ट हो जाता है, जिसके किन्हीं-किन्हीं स्थलोंपर वायुद्वारा लाये गये बड़े-बड़े झरनोंके गिरनेसे उत्पन्न हुए छोटे-छोटे झरनोंके जलसे पर्वतीय प्रदेश तृप्त होते हैं। कहीं उसके ऊँचे-ऊँचे शिखर जलसे आप्लावित थे तथा कहीं सूर्यके तापसे संतप्त होनेके कारण अगम्य थे। वहाँ केवल मनसे ही जाया जा सकता था; जो कहीं-कहीं देवदारुके विशाल वृक्षोंकी शाखा-प्रशाखाओंसे घनीभूत हुए तथा कहीं बाँसोंकी झुरमुटरूपी वनोंके आकारसे युक्त प्रदेशोंसे सुशोभित था। कहीं छत्तेके समान बड़े-बड़े शिखर बर्फसे आच्छादित थे, कहीं सैकड़ों झरने झर रहे थे, कहीं जलके गिरनेसे उत्पन्न हुए शब्दोंसे ही जलकी प्रतीति होती थी, कहीं गुफाएँ बर्फसे ढकी हुई थीं। इस प्रकार सुन्दर नितम्बरूपी भूमिसे युक्त उस हिमालय पर्वतको देखकर महानुभाव मद्रेश्वर पुरूरवा हर्षपूर्वक वहीं (अपने मनोऽनुकूल स्थानकी खोज करते हुए) घूमने लगे। तब उन्हें एक स्थान प्राप्त हुआ॥ १२–२१॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोषे हिमवद्वर्णनं नाम सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोष-वर्णनमें हिमवद् वर्णन नामक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११७ ॥
| ३९६ | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ अठारहवाँ अध्याय
हिमालयकी अनोखी शोभा तथा अत्रि-आश्रमका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! दैवयोगसे महाराज पुरूरवा उसी पर्वतराजके परम सुरम्य प्रदेशमें पहुँच गये, जो अन्य मनुष्योंके लिये अगम्य था। जहाँसे नदियोंमें श्रेष्ठ ऐरावती निकली हुई थी, वह देश मेघके समान श्यामल था तथा अनेकों प्रकारके वृक्षसमूहोंसे घिरा हुआ था। वहाँ शाल (साखू), ताल (ताड़), तमाल, कर्णिकार (कनेर), शामल (सेमल), न्यग्रोध (बरगद), अश्वत्थ (पीपल), शिरीष (सिरसा), शिंशपा (सीसम), श्लेष्मातक (लहसोढ़ा), आमलक (आमला), हरीतकी (हर्रे), बिभीतक (बहेड़ा), भूर्ज (भोजपत्र), मुञ्जक (मूँज), बाणवृक्ष (साखूका एक भेद), सप्तच्छद (छितवन), महानिम्ब (बकाइन), नीम, निर्गुण्डी (सिंदुवार या शेफाली), हरिद्रुम (दारु हल्दी), विशाल वृक्ष देवदारु, कालेयक (अगर), पद्मक (पद्माख), चन्दन, बेल, कैथ, लाल चन्दन, आम्रात (एकलता), अरिष्टक (रीठा), अक्षोट (पीलू या अखरोट), अब्दक (नागरमोथा), अर्जुन, सुन्दर पुष्पोंवाले हस्तिकर्ण (पलाश), खिले हुए फूलोंसे युक्त कोविदार (कचनार), प्राचीनामलक (पुराने आमलकके वृक्ष) धनक (धनेश), मराटक (बाजरा), खजूर, नारियल, प्रियाल (पियार, इसके फलोंकी गिरी चिरौंजी होती है), आम्रातक (आमड़ा), इङ्गुद (हिंगोट), तन्तुमाल (पटुआ), सुन्दर धवके वृक्ष, काश्मीरी, शालपर्णी, जातीफल (जायफल), पूगफल (सुपारी), कटुफल (कायफर), इलायचीकी लताओंके फल, मन्दार, कोविदार (कचनार), किंशुक (पलाश), कुसुमांशुक (एक प्रकारका अशोक), यवास (जवासा), शमी, तुलसी, बेंत, जलमें उगनेवाले बेंत, हल्के तथा गाढ़े लाल रंगवाले नारंगीके वृक्ष, हिंगु और प्रियङ्गु (बड़ी पीपर)-के वृक्ष भरे पड़े थे॥ १–१०॥ <br><br> साथ ही लाल अशोक, अशोक, आकल्ल (अकरकरा), अविचारक, मुचुकुन्द, कुन्द, आटरूष (अडूसा), परूषक (फालसा), किरात (चिरायता), किंकिरात (बबूल), केतकी, सफेद केतकी, शोभाञ्जन (सहिजन), अञ्जन, कलिंग (सिरसा), निकोटक (अंकोल), सुवर्णके-से चमकीले सुन्दर वल्कलसे युक्त विजयसालके वृक्ष, असना, कामदेवके बाणोंके-से आकारवाले सुन्दर आमके वृक्ष, |
| तस्यैव पर्वतेन्द्रस्य प्रदेशं सुमनोरमम्। <br> अगम्यं मानुषैरन्यैर्दैवयोगादुपागतः॥ १ | |
| ऐरावती सरिच्छ्रेष्ठा यस्माद् देशाद् विनिर्गता। <br> मेघश्यामं च तं देशं द्रुमषण्डैरनेकशः॥ २ | |
| शालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैः सशामलैः। <br> न्यग्रोधैश्च तथाश्वत्थैः शिरीषैः शिंशपाद्रुमैः॥ ३ | |
| श्लेष्मातकैरामलकैर्हरीतकविभीतकैः । <br> भूर्जैः समुञ्जकैर्बाणैर्वृक्षैः सप्तच्छद्रुमैः॥ ४ | |
| महानिम्बैस्तथा निम्बैर्निर्गुण्डीभिर्हरिद्रुमैः। <br> देवदारुमहावृक्षैस्तथा कालेयकद्रुमैः॥ ५ | |
| पद्मकैश्चन्दनैर्बिल्वैः कपित्थै रक्तचन्दनैः। <br> आम्रातारिष्टकाक्षोटैरब्दकैश्च तथार्जुनैः॥ ६ | |
| हस्तिकर्णैः सुमनसैः कोविदारैः सुपुष्पितैः। <br> प्राचीनामलकैश्चापि धनकैः समराटकैः॥ ७ | |
| खर्जूरैर्नारिकेलैश्च प्रियालाम्रातकेङ्गुदैः। <br> तन्तुमालैर्धवैर्भव्यैः काश्मीरीपर्णिभिस्तथा॥ ८ | |
| जातीफलैः पूगफलैः कटुफलैर्लाविलीफलैः। <br> मन्दारैः कोविदारैश्च किंशुकैः कुसुमांशुकैः॥ ९ | |
| यवासैः शमिपर्णासैर्वेतसैरम्बुवेतसैः। <br> रक्तातिरङ्गनारङ्गैर्हिङ्गुभिः सप्रियङ्गुभिः॥ १० | |
| रक्ताशोकैस्तथाशोकैराकल्लैर्विचारकैः । <br> मुचुकुन्दैस्तथा कुन्दैराटरूषपरूषकैः॥ ११ | |
| किरातैः किंकिरातैश्च केतकैः श्वेतकेतकैः। <br> शोभाञ्जनैरञ्जनैश्च सुकलिङ्गनिकोटकैः॥ १२ | |
| सुवर्णचारुवसनैर्द्रुमश्रेष्ठैस्तथासनैः । <br> मन्मथस्य शराकारैः सहकारैर्मनोरमैः॥ १३ | |