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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

३६- इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना

१२४* मत्स्यपुराण *

| शुक्र उवाच<br>धर्मज्ञस्त्वं महाराज योऽधर्ममकृथाः प्रियम्।<br>तस्माज्जरा त्वामचिराद् धर्षयिष्यति दुर्जया॥ ३१ | शुक्राचार्यने (ययातिसे) कहा— महाराज! तुमने धर्मज्ञ होकर भी अधर्मको प्रिय मानकर उसका आचरण किया है। इसलिये जिसको जीतना कठिन है, वह वृद्धावस्था तुम्हें शीघ्र ही धर दबायेगी॥ ३१॥ |
| ययातिरुवाच<br>ऋतुं यो याच्यमानाया न ददाति पुमान् वृतः।<br>भ्रूणहेत्युच्यते ब्रह्मन् स चेह ब्रह्मवादिभिः॥ ३२<br><br>ऋतुकामां स्त्रियं यस्तु गम्यां रहसि याचितः।<br>नोपैति यो हि धर्मेण ब्रह्महेत्युच्यते बुधैः॥ ३३<br><br>इत्येतानि समीक्ष्याहं कारणानि भृगूद्वह।<br>अधर्मभयसंविग्नः शर्मिष्ठामुपजग्मिवान्॥ ३४ | ययाति बोले— भगवन्! दानवराजकी पुत्री मुझसे ऋतुदान माँग रही थी, अतः मैंने धर्मसम्मत मानकर यह कार्य किया, किसी दूसरे विचारसे नहीं। ब्रह्मन्! जो पुरुष न्याययुक्त ऋतुकी याचना करनेवाली स्त्रीको ऋतुदान नहीं देता, वह ब्रह्मवादी विद्वानोंद्वारा भ्रूण (गर्भ)-की हत्या करनेवाला कहा जाता है। जो न्यायसम्मत कामनासे युक्त गम्या स्त्रीके द्वारा एकान्तमें प्रार्थना करनेपर उसके साथ समागम नहीं करता, वह धर्मशास्त्रके विद्वानोंद्वारा गर्भ या ब्राह्मणकी हत्या करनेवाला बताया जाता है। (ब्रह्मन्! मेरा यह व्रत है कि मुझसे कोई जो भी वस्तु माँगे, उसे वह अवश्य दे दूँगा। आपके ही द्वारा मुझे सौंपी हुई शर्मिष्ठा इस जगत्में दूसरे किसी पुरुषको अपना पति बनाना नहीं चाहती थी; अतः उसकी इच्छा पूर्ण करना धर्म समझकर मैंने वैसा किया है। आप इसके लिये मुझे क्षमा करें।) भृगुश्रेष्ठ! इन्हीं सब कारणोंका विचार करके अधर्मके भयसे उद्विग्न हो मैं शर्मिष्ठाके पास गया था॥ ३२-३४॥ |
| शुक्र उवाच<br>न त्वहं प्रत्यवेक्ष्यस्ते मदधीनोऽसि पार्थिव।<br>मिथ्याचरणधर्मेषु चौर्यं भवति नाहूष॥ ३५ | शुक्राचार्यने कहा— राजन्! तुम्हें इस विषयमें मेरे आदेशका भी ध्यान रखना चाहता था; क्योंकि तुम मेरे अधीन हो। नहुषनन्दन! धर्ममें मिथ्या आचरण करनेवाले पुरुषको चोरीका पाप लगता है॥ ३५॥ |
| शौनक उवाच<br>क्रोधेनोशनसा शप्तो ययातिर्नाहुषस्तदा।<br>पूर्वं वयः परित्यज्य जरां सद्योऽन्वपद्यत॥ ३६ | शौनकजी कहते हैं— क्रोधमें भरे हुए शुक्राचार्यके शाप देनेपर नहुष-पुत्र राजा ययाति उसी समय पूर्वावस्था (यौवन)-का परित्याग करके तत्काल बूढ़े हो गये॥ ३६॥ |
| ययातिरुवाच<br>अतृप्तो यौवनस्याहं देवयान्यां भृगूद्वह।<br>प्रसादं कुरु मे ब्रह्मञ्जरेयं मा विशेत माम्॥ ३७ | ययाति बोले— भृगुश्रेष्ठ! मैं देवयानीके साथ युवावस्थामें रहकर तृप्त नहीं हो सका हूँ, अतः ब्रह्मन्! मुझपर ऐसी कृपा कीजिये, जिससे यह बुढ़ापा मेरे शरीरमें प्रवेश न करे॥ ३७॥ |
| शुक्र उवाच<br>नाहं मृषा वदाम्येतज्जरां प्राप्तोऽसि भूमिप।<br>जरां त्वेतां त्वमन्यस्मिन् संक्रामय यदिच्छसि॥ ३८ | शुक्राचार्यने कहा— भूमिपाल! मैं झूठ नहीं बोलता। बूढ़े तो तुम हो ही गये, किंतु तुम्हें इतनी सुविधा देता हूँ कि यदि चाहो तो किसी दूसरेसे जवानी लेकर इस बुढ़ापाको उसके शरीरमें डाल सकते हो॥ ३८॥ |
| ययातिरुवाच<br>राज्यभाक् स भवेद् ब्रह्मन् पुण्यभाक् कीर्तिभाक् तथा।<br>यो दद्यान्मे वयः शुक्र तद् भवाननुमन्यताम्॥ ३९ | ययाति बोले— ब्रह्मन्! मेरा जो पुत्र अपनी युवावस्था मुझे दे, वही पुण्य और कीर्तिका भागी होनेके साथ ही मेरे राज्यका भी भागी हो। शुक्राचार्यजी! आप इसका अनुमोदन करें॥ ३९॥ |

* अध्याय ३३ *१२५

| शुक्र उवाच | शुक्राचार्यने कहा— नहुषनन्दन! तुम भक्तिभावसे मेरा चिन्तन करके अपनी वृद्धावस्थाका इच्छानुसार दूसरेके शरीरमें संचार कर सकोगे। उस दशामें तुम्हें पाप भी नहीं लगेगा। जो पुत्र तुम्हें (प्रसन्नतापूर्वक) अपनी युवावस्था देगा, वही राजा होगा। साथ ही दीर्घायु, यशस्वी तथा अनेक संतानोंसे युक्त होगा॥ ४०-४१॥ |
| संक्रामयिष्यसि जरां यथेष्टं नहुषात्मज।<br>मामनुध्याय तत्त्वेन न च पापमवाप्स्यसि॥ ४०<br>वयो दास्यति ते पुत्रो यः स राजा भविष्यति।<br>आयुष्मान् कीर्तिमांश्चैव बह्वपत्यस्तथैव च॥ ४१ | |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते द्वात्रिंशोऽध्यायः॥ ३२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिचरित नामक बत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३२॥


तैंतीसवाँ अध्याय

ययातिका अपने यदु आदि पुत्रोंसे अपनी युवावस्था देकर वृद्धावस्था लेनेके लिये आग्रह और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देना, फिर पूरुको जरावस्था देकर उसकी युवावस्था लेना तथा उसे वर प्रदान करना

SanskritHindi
शौनक उवाच<br>जरां प्राप्य ययातिस्तु स्वपुरं प्राप्य चैव हि।<br>पुत्रं ज्येष्ठं वरिष्ठं च यदुमित्यब्रवीद् वचः॥ १शौनकजी कहते हैं— शतानीक! राजा ययाति बुढ़ापा लेकर वहाँसे अपने नगरमें आये और अपने ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ पुत्र यदुसे इस प्रकार बोले—॥ १॥
ययातिरुवाच<br>जरा बली च मां तात पलितानि च पर्यगुः।<br>काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने॥ २<br>त्वं यदो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह।<br>यौवनेन त्वदीयेन चरेयं विषयान्हम्॥ ३<br>पूर्णे वर्षसहस्रे तु त्वदीयं यौवनं त्वहम्।<br>दत्त्वा सम्प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह॥ ४ययातिने कहा— तात! कवि-पुत्र शुक्राचार्यके शापसे मुझे बुढ़ापेने घेर लिया, मेरे शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयीं और बाल सफेद हो गये, किंतु मैं अभी जवानीके भोगोंसे तृप्त नहीं हुआ हूँ। यदो! तुम बुढ़ापेके साथ मेरे दोषको ले लो और मैं तुम्हारी जवानीके द्वारा विषयोंका उपभोग करूँ। एक हजार वर्ष पूरे होनेपर मैं पुनः तुम्हारी जवानी देकर बुढ़ापेके साथ अपना दोष वापस ले लूँगा॥ २-४॥
यदुरुवाच<br>सितश्मश्रुधरो दीनो जरसा शिथिलीकृतः।<br>बलीसंततगात्रश्च दुर्दर्शो दुर्बलः कृशः॥ ५<br>अशक्तः कार्यकरणे परिभूतः स यौवने।<br>सहोपजीविभिश्चैव तज्जरां नाभिकामये॥ ६<br>सन्ति ते बहवः पुत्रा मत्तः प्रियतरा नृप।<br>जरां ग्रहीतुं धर्मज्ञ पुत्रमन्यं वृणीष्व वै॥ ७यदु बोले— महाराज! मैं उस बुढ़ापेको लेनेकी इच्छा नहीं करता, जिसके आनेपर दाढ़ी-मूँछके बाल सफेद हो जाते हैं, जीवनका आनन्द चला जाता है। वृद्धावस्था सर्वथा शिथिल कर देती है। सारे शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं और मनुष्य इतना दुर्बल तथा कृशकाय हो जाता है कि उसकी ओर देखते नहीं बनता। बुढ़ापेमें काम-काज करनेकी शक्ति नहीं रहती, युवतियाँ तथा जीविका पानेवाले सेवक भी तिरस्कार करते हैं, अतः मैं वृद्धावस्था नहीं लेना चाहता। धर्मज्ञ नरेश्वर! आपके बहुत-से पुत्र हैं, जो आपको मुझसे भी अधिक प्रिय हैं; अतः बुढ़ापा लेनेके लिये आप अपने किसी दूसरे पुत्रको चुन लीजिये॥ ५-७॥