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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

५४ नक्षत्र-पुरुष-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

* अध्याय ५२ *२१३

| ब्रह्मा विष्णुश्च भगवान् मार्तण्डो वृषवाहनः।<br>अष्टौ च वसवस्तद्वदेकादश गणाधिपाः।<br>लोकपालाधिपाश्चैव पितरो मातरस्तथा॥ २१ | उन्हींकी ये विभूतियाँ हैं। उन विभूतियोंके नाम ये हैं—ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, सूर्य, शिव, आठ वसु, ग्यारह गणाधिप, लोकपालाधीश्वर, पितर और मातृकाएँ। चराचर जगत्सहित |
| इमा विभूतयः प्रोक्ताश्चराचरसमन्विताः।<br>ब्रह्माद्याश्चतुरो मूलमव्यक्ताधिपतिः स्मृतः॥ २२ | ये सभी विभूतियाँ बतलायी गयी हैं। ब्रह्मा आदि चार (ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, शिव) देवता मूलरूपसे इस जगत्के अव्यक्त अधिपति कहे जाते हैं। इसलिये ब्रह्मा, सूर्य, विष्णु अथवा |
| ब्रह्मणा चाथ सूर्येण विष्णुनाथ शिवेन वा।<br>अभेदात् पूजितेन स्यात् पूजितं सचराचरम्॥ २३ | शिवकी अभेदभावसे पूजा करनेपर चराचर जगत्की पूजा सम्पन्न हो जाती है। सूर्य ब्रह्मा आदि तीनों देवताओंके परम |
| ब्रह्मादीनां परं धाम त्रयाणामपि संस्थितिः।<br>वेदमूर्तावतः पूषा पूजनीयः प्रयत्नतः॥ २४ | धाम हैं, जिनमें वे निवास करते हैं। सूर्यदेव वेदोंके मूर्तस्वरूप हैं, अतः इनकी प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये। इसलिये |
| तस्मादग्निद्विजमुखान् कृत्वा सम्पूजयेदिमान्।<br>दानैर्व्रतोपवासैश्च जपहोमादिना नरः॥ २५ | मनुष्यको चाहिये कि वह अग्नि अथवा ब्राह्मणोंके मुखोंमें इनका आवाहन करके दान, व्रत, उपवास, जप, हवन आदि-द्वारा इनकी पूजा करे। इस प्रकार जो मनुष्य कर्मयोगनिष्ठ, |
| इति क्रियायोगपरायणस्य<br>वेदान्तशास्त्रस्मृतिवत्सलस्य ।<br>विकर्मभीतस्य सदा न किंचित्<br>प्राप्तव्यमस्तीह परे च लोके॥ २६ | वेदान्तशास्त्र और स्मृतियोंका प्रेमी तथा अधर्मसे सदा भयभीत रहता है, उसके लिये इस लोक अथवा परलोकमें कुछ भी प्राप्तव्य नहीं रह जाता, अर्थात् सभी पदार्थ उसके हस्तगत हो जाते हैं॥ १७—२६॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कर्मयोगमाहात्म्यं नाम द्विपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कर्मयोगमाहात्म्यनामक बावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५२॥

२१४* मत्स्यपुराण *

तिरपनवाँ अध्याय

पुराणोंकी नामावलि और उनका संक्षिप्त परिचय

संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>पुराणसंख्यामाचक्ष्व सूत विस्तरशः क्रमात्।<br>दानधर्ममशेषं तु यथावदनुपूर्वशः॥ १ऋषियोंने पूछा—सूतजी! अब आप हमलोगोंसे क्रमशः पुराणोंकी संख्याका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। साथ ही उनके दान और धर्मकी सम्पूर्ण आनुपूर्वी विधि भी यथार्थरूपसे बतलाइये॥ १॥
सूत उवाच<br>इदमेव पुराणेषु पुराणपुरुषस्तदा।<br>यदुक्तवान् स विश्वात्मा मनवे तन्निबोधत॥ २सूतजी कहते हैं—ऋषियो! ऐसे ही प्रश्नके उत्तरमें उस समय पुराणपुरुष विश्वात्मा मत्स्यभगवान्‌ने मनुके प्रति पुराणोंके विषयमें जो कुछ कहा था, उसे सुनिये॥ २॥
मत्स्य उवाच<br>पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्।<br>अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः॥ ३<br><br>पुराणमेकमेवासीत् तदा कल्पान्तरेऽनघ।<br>त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम्॥ ४<br><br>निर्दग्धेषु च लोकेषु वाजिरूपेण वै मया।<br>अङ्गानि चतुरो वेदान् पुराणं न्यायविस्तरम्॥ ५<br><br>मीमांसां धर्मशास्त्रं च परिगृह्य मया कृतम्।<br>मत्स्यरूपेण च पुनः कल्पादावुदकार्णवे॥ ६<br><br>अशेषमेतत् कथितमुदकान्तर्गतेन च।<br>श्रुत्वा जगाद च मुनीन् प्रति देवांश्चतुर्मुखः॥ ७<br><br>प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणस्याभवत् ततः।<br>कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य ततो नृप॥ ८<br><br>व्यासरूपमहं कृत्वा संहरामि युगे युगे।<br>चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे सदा॥ ९<br><br>तथाष्टादशधा कृत्वा भूर्लोकेऽस्मिन् प्रकाश्यते।<br>अद्यापि देवलोकेऽस्मिञ्शतकोटिप्रविस्तरम्॥ १०मत्स्यभगवान्‌ने कहा—राजर्षे! ब्रह्माजीने (सृष्टिनिर्माणके समय) समस्त शास्त्रोंमें सर्वप्रथम पुराणका ही स्मरण किया था। उसके बाद उनके मुखोंसे वेद प्रादुर्भूत हुए हैं। अनघ! उस कल्पान्तरमें सौ करोड़ श्लोकोंमें विस्तृत, पुण्यप्रद और त्रिवर्ग—तीन पुरुषार्थके समुदाय (धर्म, अर्थ, काम)-का साधनस्वरूप पुराण एक ही था। सभी लोकोंके जलकर नष्ट हो जानेपर मैंने ही अश्व (हयग्रीव)-रूपसे व्याकरणादि छहों अङ्गोंसहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्रको ग्रहण करके उनका संकलन किया था। पुनः मैंने ही कल्पके आदिमें एकार्णवके समय मत्स्यरूपसे जलके भीतर स्थित रहकर इस (विषय)-का पूर्णरूपसे वर्णन किया था। उसे सुनकर ब्रह्माने देवताओं और मुनियोंसे कहा था। राजन्! तभीसे संसारमें समस्त शास्त्रों और पुराणोंका प्रचार हुआ। काल-प्रभावसे पुराणकी ओरसे लोगोंकी उदासीनता देखकर प्रत्येक द्वापरयुगमें मैं सदा व्यासरूपसे प्रकट होता हूँ* और उस (पुराण)-का संक्षेप कर चार लाख श्लोकोंमें बना देता हूँ। वही अठारह भागोंमें विभक्त होकर इस भूलोकमें प्रकाशित होता है। आज भी यह पुराण इस देवलोकमें सौ करोड़ श्लोकोंमें ही है।

* व्यासजीके विष्णुरूप होनेकी बात महाभारत, विष्णुपुराण (३। ४। ५) आदिमें भी कही गयी है, यथा—‘कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रभुम्। को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत्॥’ इत्यादि।

* अध्याय ५३ * २१५

| तदर्थोऽत्र चतुर्लक्षं संक्षेपेण निवेशितम्।<br>पुराणानि दशाष्टौ च साम्प्रतं तदिहोच्यते॥ ११<br><br>नामतस्तानि वक्ष्यामि शृणुध्वं मुनिसत्तमाः।<br>ब्रह्मणाभिहितं पूर्वं यावन्मात्रं मरीचये॥ १२<br><br>ब्राह्मं त्रिदशसाहस्रं पुराणं परिकीर्त्यते।<br>लिखित्वा तच्च यो दद्याज्जलधेनुसमन्वितम्।<br>वैशाखपूर्णिमायां च ब्रह्मलोके महीयते॥ १३<br><br>एतदेव यदा पद्ममभूद्धैरण्मयं जगत्।<br>तद्वृत्तान्ताश्रयं तद्वत् पाद्ममित्युच्यते बुधैः।<br>पाद्मं तत्पञ्चपञ्चाशत्सहस्राणीह कथ्यते॥ १४<br><br>तत्पुराणं च यो दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्।<br>ज्येष्ठे मासि तिलैर्युक्तमश्वमेधफलं लभेत्॥ १५<br><br>वाराहकल्पवृत्तान्तमधिकृत्य पराशरः।<br>यत् प्राह धर्मानखिलांस्तदुक्तं वैष्णवं विदुः॥ १६<br><br>तदाषाढे च यो दद्याद् घृतधेनुसमन्वितम्।<br>पौर्णमास्यां विपूतात्मा स पदं याति वारुणम्।<br>त्रयोविंशतिसाहस्रं तत्प्रमाणं विदुर्बुधाः॥ १७<br><br>श्वेतकल्पप्रसङ्गेन धर्मान् वायुरिहाब्रवीत्।<br>यत्र तद्वायवीयं स्याद् रुद्रमाहात्म्यसंयुतम्।<br>चतुर्विंशत्सहस्राणि पुराणं तदिहोच्यते॥ १८<br><br>श्रावण्यां श्रावणे मासि गुडधेनुसमन्वितम्।<br>यो दद्याद् वृषसंयुक्तं ब्राह्मणाय कुटुम्बिने।<br>शिवलोके स पूतात्मा कल्पमेकं वसेन्नरः॥ १९ | उसका पूरा सारांश मैंने संक्षेपसे इस चार लाख श्लोकोंवाले पुराणमें भर दिया है। अब उन अठारह पुराणोंका यहाँ वर्णन किया जाता है॥ ३—११॥<br><br>श्रेष्ठ मुनियो! अब मैं उनका नाम निर्देशानुसार वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने महर्षि मरीचिके प्रति जितने श्लोकोंका वर्णन किया था, वह प्रथम ब्रह्मपुराण कहा जाता है। उसमें तेरह हजार श्लोक हैं। जो मानव इस पुराणको लिखकर उस पुस्तकका जलधेनु¹ (दानके लिये जलके घड़ेमें कल्पित गौ)-के साथ वैशाखकी पूर्णिमा तिथिके दिन ब्राह्मणको दान कर देता है, वह ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जिस समय यह जगत् स्वर्णमय कमलके रूपमें परिणत था, उस समयका वृत्तान्त जिसमें वर्णन किया गया है, उसे विद्वान्लोग (द्वितीय) पद्मपुराण नामसे अभिहित करते हैं। उस पद्मपुराणकी श्लोक-संख्या पचपन हजार बतायी जाती है। स्वर्णनिर्मित कमलसे युक्त उस पुराणका जो मनुष्य तिलके साथ ज्येष्ठमासमें ब्राह्मणको दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञ²के फलकी प्राप्ति होती है। महर्षि पराशरने वाराह-कल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर जिन सम्पूर्ण धर्मोंका वर्णन किया है, उनसे युक्त (तृतीय) पुराणको वैष्णव (विष्णुपुराण) कहा जाता है। विद्वान्लोग उसका प्रमाण तेईस³ हजार श्लोकोंका बतलाते हैं। जो मानव आषाढमासकी पूर्णिमाको घृतधेनुयुक्त इस पुराणका दान करता है, उसका आत्मा पवित्र हो जाता है और वह वरुण-लोकमें जाता है। श्वेतकल्पके प्रसङ्गवश वायुने इस मर्त्यलोकमें जिन धर्मोंका वर्णन किया था, उनका संकलन जिसमें हुआ है, उसे (चतुर्थ) वायवीय (वायुपुराण या शिवपुराण⁴) कहते हैं। वह शङ्करजीके माहात्म्यसे भी परिपूर्ण है। इस पुराणकी श्लोक-संख्या चौबीस हजार बतलायी जाती है। जो मनुष्य श्रावणमासमें श्रावणी पूर्णिमाको गुड़धेनु और बैलके साथ इस पुराणका कुटुम्बी ब्राह्मणको दान करता है, वह पवित्रात्मा होकर शिवलोकमें एक कल्पतक निवास करता |


१. जलधेनु-दानकी विधि वाराहादि पुराणोंमें तथा इसी मत्स्यपुराणके ८२ वें अध्यायमें भी आयी है। इसके आगे घृतधेनु आदिकी भी विधि है, जिसकी चर्चा यहाँ भी आगे १७ वें श्लोकमें हुई है।
२. विष्णुपुराण (५। ५। १४) तथा मनुस्मृति (११। २६०) आदि स्मृतियोंके अनुसार यह क्रतुराट्—सभी यज्ञोंका राजा तथा सर्वपापापनोदक है। शतपथब्राह्मणके अश्वमेधकाण्डके पचासों पृष्ठों तथा ऐतरेय-तैत्तिरीय ब्राह्मणों, तैत्तिरीय संहिता-भाष्य, आश्वलायन, आपस्तम्ब, हिरण्यकेशी, कात्यायनादि श्रौतसूत्रों तथा वाल्मीकीय रामायण बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड, पद्म आदि कई स्थानों और रामाश्वमेध, महाभारतके आश्वमेधिकपर्व, जैमिनीयाश्वमेध आदि कई ग्रन्थोंमें इसकी विस्तृत महिमा एवं विधि निरूपित है। इसमें प्रति आठवें पूरे दिन 'पारिप्लव'में पुराण (विशेषकर मत्स्यपुराण) सुननेकी विधि है और इसमें पुराण-श्रवणकी ३६ बार पुनरावृत्ति होती है।
३. यह संख्या विष्णुधर्मोत्तरको लेकर है। अन्यथा लिङ्गपुराणादिके वचनानुसार इसमें साढ़े पाँच सहस्र श्लोक ही हैं।
४. पुराणगणनामें चौथी संख्यापर कहीं वायु और कहीं शिवपुराणका उल्लेख है। शिवपुराणमें भी एक वायवीय संहिता है तथा शूलपाणिके वचनानुसार वायुपुराण भी शैवपुराण ही है।

२१६* मत्स्यपुराण *

| यत्राधिकृत्य गायत्रीं वर्ण्यते धर्मविस्तरः।<br>वृत्रासुरवधोपेतं तद् भागवतमुच्यते॥ २०<br><br>सारस्वतस्य कल्पस्य मध्ये ये स्युर्नरोत्तमाः।<br>तद्वृत्तान्तोद्भवं लोके तद् भागवतमुच्यते॥ २१<br><br>लिखित्वा तच्च यो दद्याद्धेमसिंहसमन्वितम्।<br>पौर्णमास्यां प्रौष्ठपद्यां स याति परमां गतिम्।<br>अष्टादश सहस्राणि पुराणं तत् प्रचक्षते॥ २२ | है। जिसमें गायत्रीका आश्रय लेकर विस्तारपूर्वक धर्मका वर्णन किया गया है तथा जो वृत्रासुरवधके वृत्तान्तसे संयुक्त है, उसे (पञ्चम) भागवतपुराण<sup>१</sup> कहा जाता है। इसी प्रकार सारस्वतकल्पमें जो श्रेष्ठ मनुष्य हो गये हैं, लोकमें उनके वृत्तान्तसे सम्बन्धित पुराणको 'भागवतपुराण' कहा जाता है। यह पुराण अठारह हजार श्लोकोंका बतलाया जाता है। जो मनुष्य इसे लिखकर उस पुस्तकका स्वर्णनिर्मित सिंहके साथ भाद्रपदमासकी पूर्णिमा तिथिको दान कर देता है वह परमगति—मोक्षको प्राप्त हो जाता है॥ १२—२२॥ |
| यत्राह नारदो धर्मान् बृहत्कल्पाश्रयाणि च।<br>पञ्चविंशत्सहस्राणि नारदीयं तदुच्यते॥ २३<br><br>आश्विने पञ्चदश्यां तु दद्याद् धेनुसमन्वितम्।<br>परमां सिद्धिमवाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम्॥ २४ | जिस पुराणमें बृहत्कल्पका आश्रय लेकर देवर्षि नारदने धर्मोंका उपदेश किया है, उसे (षष्ठ) नारदीय (नारदपुराण) कहा जाता है। उसमें पचीस हजार श्लोक हैं। जो मनुष्य आश्विनमासकी पूर्णिमा तिथिको धेनुके साथ इस पुराणका दान करता है, वह पुनर्जन्मसे रहित परम सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। |
| यत्राधिकृत्य शकुनीन् धर्माधर्मविचारणा।<br>व्याख्याता वै मुनिप्रश्ने मुनिभिर्धर्मचारिभिः॥ २५<br><br>मार्कण्डेयेन कथितं तत् सर्वं विस्तरेण तु।<br>पुराणं नवसाहस्रं मार्कण्डेयमिहोच्यते॥ २६<br><br>प्रतिलिख्य च यो दद्यात् सौवर्णकरिसंयुतम्।<br>कार्तिक्यां पुण्डरीकस्य यज्ञस्य फलभाग् भवेत्॥ २७ | जिस पुराणमें पक्षियोंका आश्रय लेकर एक मुनिके प्रश्न करनेपर धर्मचारी मुनियोंद्वारा धर्म और अधर्मके विचारका जो कुछ व्याख्यान दिया गया है, उन सबका महर्षि मार्कण्डेयने पुनः विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, वह लोकमें (सप्तम) मार्कण्डेयपुराणके नामसे विख्यात है। इसकी श्लोक-संख्या नौ हजार है। जो मनुष्य इस पुराणको लिखकर स्वर्णनिर्मित हाथीके सहित कार्तिकी पूर्णिमाको उस पुस्तकका दान करता है, वह पुण्डरीक-यज्ञके<sup>२</sup> फलका भागी होता है। |
| यत्तदीशानकं कल्पं वृत्तान्तमधिकृत्य च।<br>वसिष्ठायाग्निना प्रोक्तमाग्नेयं तत् प्रचक्षते॥ २८<br><br>लिखित्वा तच्च यो दद्याद्धेमपद्मसमन्वितम्।<br>मार्गशीर्ष्यां विधानेन तिलधेनुसमन्वितम्।<br>तच्च षोडशसाहस्रं सर्वक्रतुफलप्रदम्॥ २९ | जिसमें ईशानकल्पके वृत्तान्तका आश्रय लेकर अग्निने महर्षि वसिष्ठके प्रति उपदेश किया है, उसे (अष्टम) आग्नेय (अग्निपुराण) कहते हैं। इसमें सोलह सहस्र श्लोक हैं। जो मनुष्य इसे लिखकर उस पुस्तकका स्वर्णनिर्मित कमल और तिलधेनुसहित मार्गशीर्षमासकी पूर्णिमा तिथिको विधि-विधानके साथ दान करता है, उसके लिये यह सम्पूर्ण यज्ञोंके फलका प्रदाता हो जाता है। |


१. भागवतपुराण बहुत प्राचीन सर्वाधिक प्रसिद्ध है; क्योंकि इसपर ११ वीं शतीकी श्रीधरीसे १९ वीं शतीकी अन्वितार्थप्रकाशिका-तक पचासों संस्कृत टीकाएँ हैं तथा सूरसागर आदि-जैसे सैकड़ों देशी-विदेशी भाषाओंमें इसके गद्य-पद्यानुवाद हैं। बर्नफका फ्रेंच अनुवाद भी श्रेष्ठरूप पर्याप्त प्रसिद्ध है। इसपर प्रथम शतीसे लेकर मध्वादिमतके 'भागवत'-तात्पर्यनिर्णय, लघुभागवतामृत, बृहद्भागवतामृतादि अगणित प्रबन्ध निबद्ध हुए हैं और गोपाल भट्ट आदिके हरिभक्तिविलासादिमें इसके हजारों वचन उद्धृत हैं। कल्याणके १६वें वर्षमें १-२ अङ्कोंमें यह अनुवाद तथा मूलसहित प्रकाशित है। गीताप्रेससे इसकी प्रायः लाखों प्रतियाँ विभिन्न संस्करणोंमें बिक चुकी हैं।

२. इस यज्ञकी विस्तृत महिमा एवं प्रक्रिया आश्वलायन, सत्याषाढ, कात्यायन देवयाज्ञिक पद्धति आदिमें है।