मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२०८- सावित्री और सत्यवान्का चरित्र
* अध्याय २०४ * ८३५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| आकल्पकालिकी तृप्तिस्तेनास्माकं भविष्यति।<br>दाता सर्वेषु लोकेषु कामचारो भविष्यति॥ ९<br>आभूतसम्प्लवं कालं नात्र कार्या विचारणा।<br>यदेतत्पञ्चकं तस्मादेकेनापि वयं सदा॥ १०<br>तृप्तिं प्राप्स्याम चानन्तां किं पुनः सर्वसम्पदा।<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं दद्यात् कृष्णाजिनं च यः॥ ११ | इन खाद्य पदार्थोंसे हमलोगोंको कल्पपर्यन्त तृप्ति बनी रहती है और दाता प्रलयकालपर्यन्त सभी लोकोंमें स्वेच्छानुसार विचरण करता है—इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। पूर्वकथित इन पाँचोंमेंसे एकसे भी हमलोग सदा अनन्त तृप्ति प्राप्त करते हैं, फिर सभीके द्वारा करनेपर तो कहना ही क्या है? क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति उत्पन्न होगा, जो कृष्णमृगचर्मका दान देगा?॥ ९—११॥ |
| अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं कश्चित् पुरुषसत्तमः।<br>प्रसूयमानां यो धेनुं दद्याद् ब्राह्मणपुङ्गवे॥ १२<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं वृषभं यः समुत्सृजेत्।<br>सर्ववर्णविशेषेण शुक्लं नीलं वृषं तथा॥ १३<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं यः कुर्याच्छ्रद्धयान्वितः।<br>सुवर्णदानं गोदानं पृथिवीदानमेव च॥ १४<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं कश्चित् पुरुषसत्तमः।<br>कूपारामतडागानां वापीनां यश्च कारकः॥ १५<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं सर्वभावेन यो हरिम्।<br>प्रयायाच्छरणं विष्णुं देवेशं मधुसूदनम्॥ १६<br>अपि नः स कुले भूयात् कश्चिद् विद्वान् विचक्षणः।<br>धर्मशास्त्राणि यो दद्याद् विधिना विदुषामपि॥ १७<br>एतावदुक्तं तव भूमिपाल<br>श्राद्धस्य कल्पं मुनिसम्प्रदिष्टम्।<br>पापापहं पुण्यविवर्धनं च<br>लोकेषु मुख्यत्वकरं तथैव॥ १८<br>इत्येतां पितृगाथां तु श्राद्धकाले तु यः पितॄन्।<br>श्रावयेत्तस्य पितरो लभन्ते दत्तमक्षयम्॥ १९ | क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा नरश्रेष्ठ पैदा होगा, जो ब्राह्मणश्रेष्ठको व्याती हुई गायका दान देगा? क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा, जो वृषभका उत्सर्ग करेगा? वह वृष विशेषरूपसे सभी रङ्गोंकी अपेक्षा नील अथवा शुक्ल वर्णका होना चाहिये। क्या हमलोगोंके कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति उत्पन्न होगा, जो श्रद्धासम्पन्न होकर सुवर्ण-दान, गो-दान और पृथ्वीदान करेगा? क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा पुरुषश्रेष्ठ पैदा होगा, जो कूप, बगीचा, सरोवर और बावलियोंका निर्माण करायेगा? क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म ग्रहण करेगा जो सभी प्रकारसे मधु दैत्यके नाशक देवेश भगवान् विष्णुकी शरण ग्रहण करेगा? क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा प्रतिभाशाली विद्वान् होगा, जो विद्वानोंको विधिपूर्वक धर्मशास्त्रकी पुस्तकोंका दान देगा? भूपाल! मैंने इस प्रकार आपसे मुनियोंद्वारा कही गयी इस श्राद्धकर्मकी विधिको वर्णन कर दिया। यह पापनाशिनी, पुण्यको बढ़ानेवाली एवं संसारमें प्रमुखता प्रदान करनेवाली है। जो श्राद्धके समय पितरोंको यह पितृगाथा सुनाता है उसके पितर दिये गये पदार्थोंको अक्षयरूपमें प्राप्त करते हैं॥ १२—१९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पितृगाथाकीर्तनं नाम चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पितृगाथानुकीर्तन नामक दो सौ चारवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०४॥
| ८३६ | * मत्स्यपुराण * |
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दो सौ पाँचवाँ अध्याय
धेनु-दान-विधि
| मनुरुवाच <br> प्रसूयमाना दातव्या धेनुर्ब्राह्मणपुङ्गवे। <br> विधिना केन धर्मज्ञ दानं दद्याच्च किं फलम्॥ १ <br><br> मत्स्य उवाच <br> स्वर्णशृङ्गीं रौप्यखुरां मुक्तालाङ्गूलभूषिताम्। <br> कांस्योपदोहनां राजन् सवत्सां द्विजपुङ्गवे॥ २ <br> प्रसूयमानां गां दत्त्वा महत्पुण्यफलं लभेत्। <br> यावद्वत्सो योनिगतो यावद्गर्भं न मुञ्चति॥ ३ <br> तावद् वै पृथिवी ज्ञेया सशैलवनकानना। <br> प्रसूयमानां यो दद्याद् धेनुं द्रविणसंयुताम्॥ ४ <br> ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना। <br> चतुरन्ता भवेद् दत्ता पृथिवी नात्र संशयः॥ ५ <br> यावन्ति धेनुरोमाणि वत्सस्य च नराधिप। <br> तावत्संख्यं युगगणं देवलोके महीयते॥ ६ <br> पितॄन् पितामहांश्चैव तथैव प्रपितामहान्। <br> उद्धरिष्यत्यसंदेहं नरकाद् भूरिदक्षिणः॥ ७ <br> घृतक्षीरवहाः कुल्या दधिपायसकर्दमाः। <br> यत्र तत्र गतिस्तस्य द्रुमाश्चेप्सितकामदाः। <br> गोलोकः सुलभस्तस्य ब्रह्मलोकश्च पार्थिव॥ ८ <br> स्त्रियश्च तं चन्द्रसमानवक्त्राः <br> प्रतप्तजाम्बूनदतुल्यरूपाः। <br> महानितम्बास्तनुवृत्तमध्या <br> भजन्त्यजस्रं नलिनाभनेत्राः॥ ९ | **मनुजीने पूछा—**धर्मके तत्त्वोंको जाननेवाले भगवन्! श्रेष्ठ ब्राह्मणको ब्याती हुई गौका दान किस विधिसे देना चाहिये और उस दानसे क्या फल प्राप्त होता है?॥ १॥ <br><br> **मत्स्यभगवान् बोले—**राजन्! जिसके सींग सुवर्णजटित हों, खुर चाँदीसे मढ़े गये हों, जिसकी पूँछ मोतियोंसे सुशोभित हो तथा जिसके निकट काँसेकी दोहनी रखी हो, ऐसी सवत्सा गौका दान श्रेष्ठ ब्राह्मणको देना चाहिये। ब्याती हुई गायका दान करनेपर महान् पुण्यफल प्राप्त होता है। जबतक बछड़ा योनिके भीतर रहता है एवं जबतक गर्भको नहीं छोड़ता, तबतक उस गौको वन-पर्वतोंसहित पृथ्वी समझना चाहिये। जो व्यक्ति द्रव्यसहित ब्याती हुई गायका दान देता है, उसने मानो सभी समुद्र, गुफा, पर्वत और जंगलोंके साथ चतुर्दिग्व्यास पृथ्वीका दान कर दिया, इसमें संदेह नहीं है। नरेश्वर! उस बछड़ेके तथा गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं उतने युगोंतक दाता देवलोकमें पूजित होता है। विपुल दक्षिणा देनेवाला मनुष्य निश्चय ही अपने पिता, पितामह तथा प्रपितामहका नरकसे उद्धार कर देता है। वह जहाँ-कहीं जाता है, वहाँ उसे दही और पायसरूपी कीचड़से युक्त घृत एवं क्षीरकी नदियाँ प्राप्त होती हैं तथा मनोवाञ्छित फल प्रदान करनेवाले वृक्ष प्राप्त होते रहते हैं। राजन्! उसे गोलोक और ब्रह्मलोक सुलभ हो जाते हैं तथा चन्द्रमुखी, तपाये हुए सुवर्णके समान वर्णवाली, स्थूल नितम्बवाली, पतली कमरसे सुशोभित, कमलनयनी स्त्रियाँ निरन्तर उसकी सेवा करती हैं॥ २—९॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे धेनुदानं नाम पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें धेनु-दान-माहात्म्य नामक दो सौ पाँचवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०५॥