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मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
१६५- चारों युगोंकी व्यवस्थाका वर्णन
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६८० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्यां प्रतिहतायां तु मायायां युधि दानवः।<br>असृजद् घोरसंकाशं तमस्तीव्रं समन्ततः॥ २७<br>तमसा संवृते लोके दैत्येष्वात्तायुधेषु च।<br>स्वतेजसा परिवृतो दिवाकर इवावभौ॥ २८<br>त्रिशिखां भृकुटीं चास्य ददृशुर्दानवा रणे।<br>ललाटस्थां त्रिशूलाङ्कां गङ्गां त्रिपथगामिव॥ २९ | दिया। युद्धस्थलमें उस मायाके नष्ट हो जानेपर उस दानवने चारों ओर भयंकर दीखनेवाले घने अन्धकारकी सृष्टि की। उस समय सारा जगत् अन्धकारसे ढक गया और दैत्यगण अपना-अपना हथियार लिये डटे रहे। उसके मध्य अपने तेजसे घिरे हुए भगवान् नरसिंह सूर्यकी तरह शोभा पा रहे थे। दानवोंने रणभूमिमें नरसिंहके ललाटमें स्थित त्रिशूलकी-सी आकारवाली उनकी त्रिशिखा भृकुटिको देखा, जो त्रिपथगा गङ्गाकी तरह प्रतीत हो रही थी॥ २१—२९॥ |
| ततः सर्वासु मायासु हतासु दितिनन्दनाः।<br>हिरण्यकशिपुं दैत्यं विवर्णाः शरणं ययुः॥ ३०<br>ततः प्रज्वलितः क्रोधात् प्रदहन्निव तेजसा।<br>तस्मिन् क्रुद्धे तु दैत्येन्द्रे तमोभूतमभूज्जगत्॥ ३१<br>आवहः प्रवहश्चैव विवहोऽथ ह्युदावहः।<br>परावहः संवहश्च महाबलपराक्रमाः॥ ३२<br>तथा परिवहः श्रीमानुत्पातभयशंसाः।<br>इत्येवं क्षुभिताः सप्त मरुतो गगनेचराः॥ ३३<br>ये ग्रहाः सर्वलोकस्य क्षये प्रादुर्भवन्ति वै।<br>ते सर्वे गगने दृष्टा व्यचरन्त यथासुखम्॥ ३४<br>अयोगतश्चाप्यचरद् योगं निशि निशाकरः।<br>सग्रहः सह नक्षत्रै राकापतिररिन्दमः॥ ३५<br>विवर्णतां च भगवान् गतो दिवि दिवाकरः।<br>कृष्णं कबन्धं च तथा लक्ष्यते सुमहद्दिवि॥ ३६<br>अमुञ्चच्चार्चिषां वृन्दं भूमिवृत्तिर्विभावसुः।<br>गगनस्थश्च भगवानभीक्ष्णं परिदृश्यते॥ ३७<br>सप्त धूम्रनिभा घोरा सूर्याद्दिवि समुत्थिताः।<br>सोमस्य गगनस्थस्य ग्रहास्तिष्ठन्ति शृङ्गगाः॥ ३८<br>वामे तु दक्षिणे चैव स्थितौ शुक्रबृहस्पती।<br>शनैश्चरो लोहिताङ्गो ज्वलनाङ्गासमद्युती॥ ३९<br>समं समधिरोहन्तः सर्वे ते गगनेचराः।<br>शृङ्गानि शनकैर्घोरा युगान्तावर्तिनो ग्रहाः॥ ४० | इस प्रकार सभी मायाओंके नष्ट हो जानेपर तेजोहीन दैत्य अपने स्वामी हिरण्यकशिपुकी शरणमें गये। यह देख वह अपने तेजसे जगत्को जलाता-सा क्रोधसे प्रज्वलित हो उठा। उस दैत्येन्द्रके क्रुद्ध होनेपर सारा जगत् अन्धकारमय हो गया। पुनः आवह, प्रवह, विवह, उदावह, परावह, संवह तथा श्रीमान् परिवह—ये महान् बल एवं पराक्रमसे सम्पन्न आकाशचारी सातों वायुमार्ग उत्पातके भयकी सूचना देते हुए क्षुब्ध हो उठे। समस्त लोकोंके विनाशके अवसरपर जो ग्रह प्रकट होते हैं, वे सभी आकाशमें दृष्टिगोचर होकर सुखपूर्वक विचरण करने लगे। राहुने अमा एवं पूर्णिमाके बिना ही ग्रहणका दृश्य उपस्थित कर दिया। रातमें नक्षत्रों और ग्रहोंसहित राकापति शत्रुसूदन चन्द्रमा और दिनमें भगवान् सूर्य कान्तिहीन हो गये तथा आकाशमें अत्यन्त विशाल काले रंगका कबन्ध (धूमकेतु) दिखायी देने लगा। भगवान् अग्नि एक ओर पृथ्वीपर रहकर चिनगारियाँ छोड़ने लगे और दूसरी ओर वे निरन्तर आकाशमें भी स्थित दिखायी दे रहे थे। आकाशमण्डलमें धुएँकी-सी कान्तिवाले सात भयंकर सूर्य प्रकट हो गये। ग्रहगण आकाशमें स्थित चन्द्रमाके शिखरपर स्थित हो गये। उनके वामभागमें शुक्र और दाहिने भागमें बृहस्पति स्थित हो गये। अग्निके समान कान्तिमान् शनैश्चर और मङ्गल भी दृष्टिगोचर हुए। युगान्तके समय प्रकट होनेवाले वे सभी भयंकर ग्रह शनैः-शनैः एक साथ शिखरोंपर आरूढ़ हो आकाशमें विचरण करने लगे॥ ३०—४०॥ |
| चन्द्रमाश्च सनक्षत्रैर्ग्रहैः सह तमोनुदः।<br>चराचरविनाशाय रोहिणीं नाभ्यनन्दत॥ ४१<br>गृह्यते राहुणा चन्द्र उल्काभिरभिहन्यते।<br>उल्काः प्रज्वलिताश्चन्द्रे विचरन्ति यथासुखम्॥ ४२ | इसी प्रकार अन्धकारका विनाश करनेवाले चन्द्रमा नक्षत्रों और ग्रहोंके साथ रहकर चराचर जगत्का विनाश करनेके लिये रोहिणीका अभिनन्दन नहीं कर रहे थे। राहु चन्द्रमाको ग्रस्त कर रहा था और उल्काएँ उन्हें मार भी रही थीं। प्रज्वलित उल्काएँ चन्द्रलोकमें सुखपूर्वक |
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* अध्याय १६३ * । ६८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देवानामपि यो देवः सोऽप्यवर्षत शोणितम्।<br>अपतनगनादुल्का विद्युद्रूपा महास्वनाः॥ ४३<br>अकाले च द्रुमाः सर्वे पुष्पन्ति च फलन्ति च।<br>लताश्च सफलाः सर्वा ये चाहुर्दैत्यनाशनम्॥ ४४<br>फलैः फलान्यजायन्त पुष्पैः पुष्पं तथैव च।<br>उन्मीलन्ति निमीलन्ति हसन्ति च रुदन्ति च॥ ४५<br>विक्रोशन्ति च गम्भीरा धूमयन्ति ज्वलन्ति च।<br>प्रतिमाः सर्वदेवानां वेदयन्ति महत् भयम्॥ ४६<br>आरण्यैः सह संसृष्टा ग्राम्याश्च मृगपक्षिणः।<br>चक्रुः सुभैरवं तत्र महायुद्धमुपस्थितम्॥ ४७<br>नद्यश्च प्रतिकूलानि वहन्ति कलुषोदकाः।<br>न प्रकाशन्ति च दिशो रक्तरेणुसमाकुलाः॥ ४८<br>वानस्पत्यो न पूज्यन्ते पूजनार्हाः कथञ्चन।<br>वायुवेगेन हन्यन्ते भज्यन्ते प्रणमन्ति च॥ ४९ | विचरण कर रही थीं। जो देवताओंका भी देवता (इन्द्र) है, वह रक्तकी वर्षा करने लगा। आकाशसे बिजलीकी-सी कान्तिवाली उल्काएँ भयंकर शब्द करती हुई पृथ्वीपर गिरने लगीं। सभी वृक्ष असमयमें ही फूलने और फलने लगे तथा सभी लताएँ फलसे युक्त हो गयीं, जो दैत्योंके विनाशकी सूचना दे रही थीं। फलोंसे फल तथा फूलोंसे फूल प्रकट होने लगे। सभी देवताओंकी मूर्तियाँ कभी आँख फाड़कर देखतीं, कभी आँखें बंद कर लेतीं, कभी हँसती थीं तो कभी रोने लगती थीं। वे कभी जोर-जोरसे चिल्लाने लगती थीं, कभी गम्भीररूपसे धुआँ फेंकती थीं तो कभी प्रज्वलित हो जाती थीं। इस प्रकार वे महान् भयकी सूचना दे रही थीं। उस समय ग्रामीण मृग-पक्षी वन्य मृग-पक्षियोंसे संयुक्त होकर अत्यन्त भयंकर महान् युद्ध करने लगे। गंदे जलसे भरी हुई नदियाँ उलटी दिशामें बहने लगीं। रक्त और धूलसे व्याप्त दिशाएँ दिखायी नहीं दे रही थीं। पूजनीय वृक्षोंकी किसी प्रकार पूजा (रक्षा) नहीं हो रही थी। वे वायुके झोंकेसे प्रताडित हो रहे थे, झुक जाते थे और टूट भी जाते थे॥ ४१—४९॥ |
| यदा च सर्वभूतानां छाया न परिवर्तते।<br>अपराह्नगते सूर्ये लोकानां युगसंक्षये॥ ५०<br>तदा हिरण्यकशिपोर्दैत्यस्योपरि वेश्मनः।<br>भाण्डागारायुधागारे निविष्टमभवन्मधु॥ ५१<br>असुराणां विनाशाय सुराणां विजयाय च।<br>दृश्यन्ते विविधोत्पाता घोरा घोरनिदर्शनाः॥ ५२ | इस प्रकार लोकोंके युगान्तके समय सूर्यके अपराह्नसमयमें पहुँचनेपर जब सभी प्राणियोंकी छायामें कोई परिवर्तन नहीं दीखने लगा, तब दैत्यराज हिरण्यकशिपुके महल, भाण्डारागार और आयुधागारके ऊपर मधु टपकने लगा। इस प्रकार असुरोंके विनाश और देवताओंकी विजयके लिये भयकी सूचना देनेवाले अनेकों प्रकारके भयंकर उत्पात दिखायी दे रहे थे। |
| एते चान्ये च बहवो घोरोत्पाताः समुत्थिताः।<br>दैत्येन्द्रस्य विनाशाय दृश्यन्ते कालनिर्मिताः॥ ५३ | ये तथा इनके अतिरिक्त और भी बहुत-से भयंकर उत्पात, जो कालद्वारा निर्मित थे, दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपुके विनाशके लिये प्रकट हुए दीख रहे थे। |
| मेदिन्यां कम्पमानायां दैत्येन्द्रेण महात्मना।<br>महीधरा नागगणा निपेतुरमितौजसः॥ ५४<br>विषज्वालाकुलैर्वक्त्रैर्विमुञ्चन्तो हुताशनम्।<br>चतुःशीर्षाः पञ्चशीर्षाः सप्तशीर्षाश्च पन्नगाः॥ ५५<br>वासुकिस्तक्षकश्चैव कर्कोटकधनञ्जयौ।<br>एलामुखः कालियश्च महापद्मश्च वीर्यवान्॥ ५६<br>सहस्रशीर्षो नागो वै हेमतालध्वजः प्रभुः।<br>शेषोऽनन्तोमहाभागो दुष्प्रकम्प्यः प्रकम्पितः॥ ५७ | महान् आत्मबलसे सम्पन्न दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपुद्वारा पृथ्वीके प्रकम्पित किये जानेपर पर्वत तथा अमित तेजस्वी नागगण गिरने लगे। वे चार, पाँच अथवा सात सिरवाले नाग विषकी ज्वालासे व्याप्त मुखोंद्वारा अग्नि उगलने लगे। वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, धनञ्जय, एलामुख, कालिय, पराक्रमी महापद्म, एक हजार फणोंवाला सामर्थ्यशाली नाग हेमतालध्वज तथा महान् भाग्यशाली अनन्त शेषनाग—इन सबका काँपना यद्यपि अत्यन्त कठिन था, तथापि ये सभी काँप उठे। |