मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५६ श्रीकृष्णमाष्टमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
२२० | *** मत्स्यपुराण ***
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यत्र साम्बं पुरस्कृत्य भविष्यति कथानकम्।<br>प्रोच्यते तत् पुनर्लोके साम्बमेतन्मुनिव्रताः॥ ६१<br><br>एवमादित्यसंज्ञा च तत्रैव परिगण्यते।<br>अष्टादशभ्यस्तु पृथक् पुराणं यत् प्रदिश्यते॥ ६२<br><br>विजानीध्वं द्विजश्रेष्ठास्तदेतेभ्यो विनिर्गतम्।<br>पञ्चाङ्गानि पुराणेषु आख्यानकमतः स्मृतम्॥ ६३<br><br>सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।<br>वंश्यानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम्॥ ६४<br><br>ब्रह्मविष्ण्वर्करुद्राणां माहात्म्यं भुवनस्य च।<br>ससंहारप्रदानां च पुराणे पञ्चवर्णके॥ ६५<br><br>धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्चैवात्र कीर्त्यते।<br>सर्वेष्वपि पुराणेषु तद्विरुद्धं च यत् फलम्॥ ६६ | मुनिवरो! जहाँ भविष्यकी चर्चासहित साम्बका प्रसङ्ग लेकर कथानकका वर्णन किया गया है, उसे लोकमें साम्बपुराण कहते हैं। इस प्रकार सूर्य-महिमाके प्रसङ्गमें होनेसे उसे आदित्यपुराण भी कहा जाता है। द्विजवरो! उपर्युक्त अठारह पुराणोंसे पृथक् जो पुराण बतलाये गये हैं, उन्हें इन्हींसे निकला हुआ समझना चाहिये। पुराणोंमें बतलाये गये सर्गादि पाँच अङ्ग तथा आख्यान भी कहे गये हैं। उनमें—सर्ग (ब्रह्माद्वारा की गयी सृष्टिरचना), प्रतिसर्ग (ब्रह्माके मानस पुत्रोंद्वारा की गयी सृष्टिरचना*), वंश (सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि), मन्वन्तर (स्वायम्भुव आदि मनुओंका कार्यकाल) और वंश्यानुचरित (पूर्वोक्त वंशोंमें उत्पन्न हुए नरेशोंका जीवन-चरित्र)—ये पाँच पुराणोंके लक्षण बतलाये गये हैं। इन पाँच लक्षणोंवाले सभी पुराणोंमें सृष्टि और संहार करनेवाले ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और रुद्रके तथा भुवनके माहात्म्यका वर्णन किया गया है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका भी इनमें विस्तृत विवेचन किया गया है। इनके विरुद्ध आचरण करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उसका भी निरूपण किया गया है॥ ५९—६६॥ |
| सात्त्विकेषु पुराणेषु माहात्म्यमधिकं हरेः।<br>राजसेषु च माहात्म्यमधिकं ब्रह्मणो विदुः॥ ६७<br><br>तद्वदग्नेश्च माहात्म्यं तामसेषु शिवस्य च।<br>संकीर्णेषु सरस्वत्याः पितॄणां च निगद्यते॥ ६८ | सत्त्वगुणप्रधान पुराणोंमें भगवान् विष्णुके माहात्म्यकी तथा रजोगुणप्रधान पुराणोंमें ब्रह्माकी प्रधानता जाननी चाहिये। उसी प्रकार तमोगुणप्रधान पुराणोंमें अग्नि और शिवजीके माहात्म्यका विशेषरूपसे वर्णन किया गया है। संकीर्ण पुराणों (उपपुराणों)-में सरस्वती और पितरोंका वृत्तान्त कहा गया है। |
| अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः।<br>भारताख्यानमखिलं चक्रे तदुपबृंहितम्।<br>लक्षेणैकेन यत् प्रोक्तं वेदार्थपरिबृंहितम्॥ ६९ | सत्यवती-नन्दन व्यासजीने इन अठारह पुराणोंकी रचना कर इनके कथानकोंसे समन्वित सम्पूर्ण महाभारत नामक इतिहासकी रचना की, जो वेदोंके अर्थसे सम्पन्न है। वह एक लाख श्लोकोंमें वर्णित है। |
| वाल्मीकिना तु यत् प्रोक्तं रामोपाख्यानमुत्तमम्।<br>ब्रह्मणाभिहितं यच्च शतकोटिप्रविस्तरम्॥ ७०<br><br>आहृत्य नारदायैव तेन वाल्मीकये पुनः।<br>वाल्मीकिना च लोकेषु धर्मकामार्थसाधनम्।<br>एवं सपादाः पञ्चैते लक्षा मर्त्ये प्रकीर्तिताः॥ ७१ | महर्षि वाल्मीकिने जिस उत्तम रामोपाख्यान—रामायणका वर्णन किया है, उसीको पहले सौ करोड़ श्लोकोंमें विस्तार करके ब्रह्माने नारदजीको बतलाया था। नारदजीने उसे लाकर वाल्मीकिजीको प्रदान किया। वाल्मीकिजीने धर्म, अर्थ और कामके साधनस्वरूप उस रामायणका लोकोंमें प्रचार किया। इस प्रकार ये सवा पाँच लाख श्लोक मृत्युलोकमें प्रचलित बतलाये गये हैं। |
* पुराणोंमें प्रायः 'प्रतिसर्ग'का दूसरा अर्थ प्रतिसंचर या प्रलय भी आया है। यहाँ केवल तीन ही उपपुराणोंका वर्णन हुआ है। पर कूर्मपुराणके आरम्भमें अठारह उपपुराणोंका रूप कथन है।
| * अध्याय ५४ * | २२१ |
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| पुरातनस्य कल्पस्य पुराणानि विदुर्बुधाः।<br>धन्यं यशस्यमायुष्यं पुराणानामनुक्रमम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि स याति परमां गतिम्॥ ७२<br>इदं पवित्रं यशसो निधान-<br> मिदं पितृणामतिवल्लभं च।<br>इदं च देवेष्वमृतायितं च<br> नित्यं त्विदं पापहरं च पुंसाम्॥ ७३* | विद्वान्लोग इन पुराणोंको पुरातन कल्पकी कथाएँ मानते हैं। इन पुराणोंका अनुक्रम धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला है। जो इसे पढ़ता अथवा सुनता है, वह परम गतिको प्राप्त हो जाता है। यह परम पवित्र और यशका खजाना है। यह पितरोंको परम प्रिय है। यह देवताओंमें अमृतके समान प्रतिष्ठित है और नित्य मनुष्योंके पापका हरण करनेवाला है॥ ६७—७३॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे पुराणानुक्रमणिकाभिधानं नाम त्रिपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पुराणानुक्रमणिकाभिधान नामक तिरपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५३॥
चौवनवाँ अध्याय
नक्षत्र-पुरुष-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इसके बाद अब मैं व्रत और उपवाससे समन्वित सभी दान-धर्मोंका पूर्णरूपसे उसी प्रकार वर्णन कर रहा हूँ, जैसे इस मृत्युलोकमें मत्स्यभगवान्ने मनुके प्रति किया था। इसी प्रकार महादेवजी तथा बुद्धिमान् नारदजीके संवादमें धर्म, काम और अर्थको सिद्ध करनेवाला जैसा वृत्तान्त घटित हुआ था, उसे भी बतला रहा हूँ। पूर्वकालकी बात है, एक बार भगवान् शङ्कर, जो तीन नेत्रोंसे युक्त, कामदेवके शत्रु और कामदेवके शरीरको दग्ध कर देनेवाले हैं, कैलास पर्वतके शिखरपर सुखपूर्वक बैठे हुए थे, उसी समय देवर्षि नारदने उनके पास जाकर ऐसा प्रश्न किया॥ १—३॥ |
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| अतः परं प्रवक्ष्यामि दानधर्मानशेषतः।<br>व्रतोपवाससंयुक्तान् यथा मत्स्योदितानिह॥ १<br><br>महादेवस्य संवादे नारदस्य च धीमतः।<br>यथावृत्तं प्रवक्ष्यामि धर्मकामार्थसाधकम्॥ २<br><br>कैलासशिखरासीनमपृच्छन्नारदः पुरा।<br>त्रिनयनमनङ्गारिमनङ्गाङ्गहरं हरम्॥ ३ | |
| नारद उवाच | **नारदजीने पूछा—**भगवन्! आप तो देवेश्वरोंके भी देव तथा ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्रके अधीश्वर हैं, इसलिये यह बताइये कि आपका अथवा भगवान् विष्णुका भक्त पुरुष किस प्रकार धन-सम्पत्ति, नीरोगता, सौन्दर्य, आयु, भाग्य और सौभाग्यरूपी सम्पत्तिसे सम्पन्न हो सकता है? अथवा विधवा स्त्री (जन्मान्तरमें) किस प्रकार समस्त गुणों एवं सौभाग्यसे संयुक्त हो सकती है? तथा देव! इस लोकमें कोई अन्य मुक्तिदायक व्रत हो तो क्रमशः उसे भी बतलाइये॥ ४-५॥ |
| भगवन् देवदेवेश ब्रह्मविष्ण्विन्द्रनायक।<br>श्रीमदारोग्यरूपायुर्भाग्यसौभाग्यसम्पदा ।<br>संयुक्तस्तव विष्णोर्वा पुमान् भक्तः कथं भवेत्॥ ४<br><br>नारी वा विधवा सर्वगुणसौभाग्यसंयुता।<br>क्रमान्मुक्तिप्रदं देव किञ्चिद् व्रतामिहोच्यताम्॥ ५ |
* पुराण-संख्या-निर्देश-दाननिरूपणादि प्रायः अठारह पुराणोंमें ही वर्णित है। पर यहाँ तथा नारदपुराण ९१—१०८में यह कुछ विस्तारसे निरूपित है। गीतामें ब्रह्मसूत्रका, ब्रह्मसूत्रमें गीताका, पुराणोंमें महाभारतका तथा परस्पर एक-दूसरेका एवं महाभारतमें पुराणोंका ठीक-ठीक वर्णन व्यासजीके अद्भुत दिव्य ज्ञान एवं वैदुष्यका ही चमत्कार है।