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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१५९- स्कन्दकी उत्पत्ति, उनका नामकरण, उनसे देवताओंकी प्रार्थना और उनके द्वारा देवताओंको आश्वासन, तारकके पास देवदूतद्वारा संदेश भेजा जाना और सिद्धोंद्वारा कुमारकी स्तुति

६५४ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत मूल (श्लोक)हिन्दी अनुवाद
ब्रह्मोवाच<br>न कश्चिच्च विना मृत्युं नरो दानव विद्यते।<br>यतस्ततोऽपि दैत्येन्द्र मृत्युः प्राप्यः शरीरिणा ॥ १७<br>इत्युक्तो दैत्यसिंहस्तु प्रोवाचाम्बुजसम्भवम्।<br>रूपस्य परिवर्तो मे यदा स्यात्पद्मसम्भव ॥ १८<br>तदा मृत्युर्मम भवेद्न्यथा त्वमरो ह्यहम्।<br>इत्युक्तस्तु तदोवाच तुष्टः कमलसम्भवः ॥ १९<br>यदा द्वितीयो रूपस्य विवर्तस्ते भविष्यति।<br>तदा ते भविता मृत्युरन्यथा न भविष्यति ॥ २०<br>इत्युक्तोऽमरतां मेने दैत्यसूनुर्महाबलः।<br>तस्मिन् काले तु संस्मृत्य तद्वधोपायमात्मनः ॥ २१<br>परिहर्त्तुं दृष्टिपथं वीरकस्याभवत्तदा।<br>भुजङ्गरूपी रन्ध्रेण प्रविवेश दृशः पथम् ॥ २२<br>परिहृत्य गणेशस्य दानवोऽसौ सुदुर्जयः।<br>अलक्षितो गणेशेन प्रविष्टोऽथ पुरान्तकम् ॥ २३<br>भुजङ्गरूपं संत्यज्य बभूवाथ महासुरः।<br>उमारूपी च्छलयितुं गिरिशं मूढचेतनः ॥ २४<br>कृत्वा मायां ततो रूपमप्रतर्क्यमनोहरम्।<br>सर्वावयवसम्पूर्णं सर्वाभिज्ञानसंवृतम् ॥ २५<br>कृत्वा मुखान्तरे दन्तान् दैत्यो वज्रोपमान् दृढान्।<br>तीक्ष्णाग्रान् बुद्धिमोहेन गिरिशं हन्तुमुद्यतः ॥ २६तब ब्रह्मा ने कहा था—'दानव! इस सृष्टिमें कोई भी मनुष्य मृत्युसे रहित नहीं है। दैत्येन्द्र! शरीरधारीको किसी-न-किसी प्रकारसे मृत्यु प्राप्त होती ही है। ऐसा कहे जानेपर दैत्यसिंह आदिने पद्मयोनि ब्रह्मासे कहा था—'पद्मसम्भव! जब मेरे रूपका परिवर्तन हो जाय तभी मेरी मृत्यु हो, अन्यथा मैं अमर बना रहूँ।' उसके द्वारा ऐसा कहे जानेपर उस समय कमलयोनि ब्रह्माने प्रसन्न होकर उससे कहा था कि 'ठीक है, जब तुम्हारे रूपका दूसरा परिवर्तन होगा, तभी तुम्हारी मृत्यु होगी, अन्यथा नहीं होगी।' ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वह महाबली दैत्यपुत्र आदि अपनेको अमर मानने लगा। उस समय उसने अपनी मृत्युके उस उपायका स्मरणकर वीरकके दृष्टिमार्गको बचानेके लिये सर्पका रूप धारण कर लिया और एक बिलमें प्रविष्ट हो गया। फिर वह परम दुर्जय दानव गणेश्वर वीरकके दृष्टिपथको बचाकर उनसे अलक्षितरूपसे भगवान् शंकरके पास पहुँच गया। तदनन्तर उस मोहित चित्तवाले महासुर आदिने शंकरजीको छलनेके लिये सर्पका रूप त्यागकर उमाका रूप धारण कर लिया। उसने मायाका आश्रय लेकर पार्वतीके ऐसे अकल्पनीय एवं मनोहर रूपका निर्माण किया था, जो सभी अवयवोंसे परिपूर्ण तथा सभी लक्षणोंसे युक्त था। फिर वह दैत्य मुखके भीतर वज्रके समान सुदृढ़ और तीखे अग्रभागवाले दाँतोंका निर्माण कर मूर्खतावश शंकरजीका वध करनेके लिये उद्यत हुआ॥ १७–२६॥
कृत्वोमारूपसंस्थानं गतो दैत्यो हरान्तिकम्।<br>पापो रम्याकृतिश्चित्रभूषणाम्बरभूषितः ॥ २७तदनन्तर वह पापी दैत्य सुन्दर रूप एवं चित्र-विचित्र आभूषणों और वस्त्रोंसे विभूषित हो उमाका रूप धारण कर शंकरजीके निकट गया।
तं दृष्ट्वा गिरिशस्तुष्टस्तदाऽऽलिङ्ग्य महासुरम्।<br>मन्यमानो गिरिसुतां सर्वैरवयवान्तरैः ॥ २८उसे देखकर भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये। तब उन्होंने उस महासुरको सभी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसे पार्वती मानते हुए उसका आलिङ्गन करके पूछा—
अपृच्छत् साधु ते भावो गिरिपुत्रि न कृत्रिमः।<br>या त्वं मदाशयं ज्ञात्वा प्राप्तेह वरवर्णिनि ॥ २९<br>त्वया विरहितं शून्यं मन्यमानो जगत्त्रयम्।<br>प्राप्ता प्रसन्नवदना युक्तमेवंविधं त्वयि ॥ ३०'गिरिजे! अब तो मेरे प्रति तुम्हारा भाव उत्तम है न? बनावटी तो नहीं है? सुन्दरि! (ऐसा प्रतीत होता है कि) तुम मेरे अभिप्रायको जानकर ही यहाँ आयी हो; क्योंकि तुम्हारे बिना मैं त्रिलोकीको सूना-सा मान रहा था। अब जो तुम प्रसन्नतापूर्वक यहाँ आ गयी हो, तुम्हारे लिये ऐसा करना उचित ही है।'
* अध्याय १५६ *६५५

| इत्युक्तो दानवेन्द्रस्तु तदाभाषत् स्मयञ्शनैः।<br>न चाबुध्यदभिज्ञानं प्रायस्त्रिपुरघातिनः॥ ३१<br><br>देव्युवाच<br>यातास्म्यहं तपश्चर्तुं वाल्लभ्याय तवातुलम्।<br>रतिश्च तत्र मे नाभूत्ततः प्राप्ता त्वदन्तिकम्॥ ३२<br><br>इत्युक्तः शङ्करः शङ्कां कांचिप्राप्यावधारयत्।<br>हृदयेन समाधाय देवः प्रहसिताननः॥ ३३<br><br>कुपिता मयि तन्वङ्गि प्रकृत्या च दृढव्रता।<br>अप्राप्तकामा सम्प्राप्ता किमेतत्संशयो मम॥ ३४<br><br>इति चिन्त्य हरस्तस्या अभिज्ञानं विधारयन्।<br>नापश्यद्वामपार्श्वे तु तदङ्गे पद्मलक्षणम्॥ ३५<br><br>लोमावर्तं तु रचितं ततो देवः पिनाकधृक्।<br>अबुध्यद्दानवीं मायामाकारं गूहयंस्ततः॥ ३६<br><br>मेढ्रे वज्रास्त्रमादाय दानवं तमसूदयत्।<br>अबुध्यद्वीरको नैव दानवेन्द्रं निषूदितम्॥ ३७<br><br>हरेण सूदितं दृष्ट्वा स्त्रीरूपं दानवेश्वरम्।<br>अपरिच्छिन्नतत्त्वार्था शैलपुत्र्यै न्यवेदयत्॥ ३८<br><br>दूतेन मारुतेनाशुगामिना नगदेवता।<br>श्रुत्वा वायुमुखाद्देवी क्रोधरक्तविलोचना।<br>अशपद्वीरकं पुत्रं हृदयेन विदूयता॥ ३९ | इस प्रकार कहे जानेपर दानवेन्द्र आडि मुसकराते हुए धीरे-धीरे बोला। वह त्रिपुरहन्ता शंकरजीद्वारा पार्वतीके शरीरमें लक्षित किये गये चिह्नको प्रायः नहीं जानता था॥ २७—३१॥<br><br>देवी (रूपधारी आडि)-ने कहा—'पतिदेव! आपके अतुलनीय पति-प्रेमकी प्राप्तिके अभिप्रायसे मैं तपस्या करने गयी थी, किंतु उसमें मेरा मन नहीं लगा, अतः पुनः आपके निकट लौट आयी हूँ। उसके ऐसा कहनेपर शंकरजीके मनमें कुछ शङ्का उत्पन्न हो गयी, परंतु उसे उन्होंने हृदयमें ही समाधान करके छिपा लिया। फिर वे मुसकराते हुए बोले—'सूक्ष्माङ्गि! तुम तो मुझपर कुपित होकर तपस्या करने गयी थी न? साथ ही तुम स्वभावसे ही सुदृढ़ प्रतिज्ञावाली हो, फिर बिना मनोरथ सिद्ध किये लौट आयी हो, यह क्या बात है? इससे तो मुझे संदेह हो रहा है।' ऐसा विचारकर शंकरजी पार्वतीके उस लक्षणका स्मरण करने लगे, जिसे उन्होंने पार्वतीके शरीरके बायें भागमें बालोंको घुमाकर पद्मके रूपमें बनाया था, परंतु वह उन्हें दिखायी न पड़ा।* तब पिनाकधारी महादेवने समझ लिया कि यह दानवी माया है। फिर तो उन्होंने अपने आकारको छिपाते हुए जननेन्द्रियमें वज्रास्त्रको अभिमन्त्रित करके उस दैत्यको मार डाला। इस प्रकार मारे गये दानवेन्द्र आडिकी बात वीरकको नहीं ज्ञात हुई। उधर इसके यथार्थ तत्त्वको न जाननेवाली हिमाचलकी देवता कुसुमामोदिनीने शंकरजीद्वारा स्त्रीरूपधारी दानवेश्वरको मारा गया देखकर अपने शीघ्रगामी दूत वायुद्वारा पार्वतीको इसकी सूचना भेज दी। वायुके मुखसे वह संदेश सुनकर पार्वती देवीके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। तब वे दुःखी हृदयसे अपने पुत्र वीरकको शाप देते हुए बोलीं॥ ३२—३९॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कुमारसम्भवे आडिवधो नाम षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके कुमारसम्भव-प्रसङ्गमें आडिवध नामक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १५६॥


* यह महा-सौभाग्यजनक चिह्न है। भगवान् विष्णु तथा अन्य भाग्यशालियोंके शरीरमें ऐसा चिह्न श्रीवत्स नामसे प्रसिद्ध है।

६५६* मत्स्यपुराण *

एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय

पार्वतीद्वारा वीरकको शाप, ब्रह्माका पार्वती तथा एकानंशाको वरदान, एकानंशाका विन्ध्याचलके लिये प्रस्थान, पार्वतीका भवनद्वारपर पहुँचना और वीरकद्वारा रोका जाना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देव्युवाच<br>मातरं मां परित्यज्य यस्मात् त्वं स्नेहविकलवात्।<br>विहितावसरैः स्त्रीणां शंकरस्य रहोविधौ॥ १<br>तस्मात् ते परुषा रूक्षा जडा हृदयवर्जिता।<br>गणेश क्षारसदृशी शिला माता भविष्यति॥ २<br>निमित्तमेतद् विख्यातं वीरकस्य शिलोदये।<br>सोऽभवत् प्रक्रमेणैव विचित्राख्यानसंश्रयः॥ ३<br>एवमुत्सृष्टशापाया गिरिपुत्र्यास्त्वनन्तरम्।<br>निर्जगाम मुखात् क्रोधः सिंहरूपी महाबलः॥ ४<br>स तु सिंहः करालास्यो जटाजटिलकन्धरः।<br>प्रोद्धूतलम्बलाङ्गूलो दंष्ट्रोत्कटमुखाटटः॥ ५<br>व्यावृत्तास्यो ललज्जिह्वः क्षामकुक्षिश्चिखादिषुः।<br>तस्याशु वर्तितुं देवी व्यवस्यत सती तदा॥ ६<br>ज्ञात्वा मनोगतं तस्या भगवांश्चतुराननः।<br>आजगामाश्रमपदं सम्पदामाश्रयं तदा।<br>आगम्योवाच देवेशो गिरिजां स्पष्टया गिरा॥ ७देवीने कहा—गणेश्वर वीरक! चूँकि तुमने मुझ माताका परित्याग कर स्नेहसे विकल हो शंकरजीके एकान्तमें अन्य स्त्रियोंको प्रवेश करनेका अवसर दिया है, इसलिये अत्यन्त कठोर, स्नेहहीन, मूर्ख, हृदयरहित एवं राख-सदृशी रूखी शिला तुम्हारी माता होगी। वीरकका शिलासे उत्पन्न होनेमें यही कारण विख्यात है। आगे चलकर वही शाप क्रमशः विचित्र कथाओंका आश्रयस्थान बन गया। इस प्रकार पार्वतीके शाप दे देनेके पश्चात् क्रोध उनके मुखसे महाबली सिंहके रूपमें बाहर निकला। उस सिंहका मुख विकराल था, उसका कंधा जटाओंसे आच्छादित था, उसकी लम्बी पूँछ ऊपर उठी हुई थी, उसके मुखके दोनों किनारे भयंकर दाढ़ोंसे युक्त थे, वह मुख फैलाये हुए जीभ लपलपा रहा था, उसकी कुक्षि दुबली-पतली थी और वह किसीको खा जानेकी टोहमें था। यह देखकर पार्वतीदेवी शीघ्र ही उसपर आरूढ़ होनेकी चेष्टा करने लगीं। तब उनके मनोगत भावको जानकर भगवान् ब्रह्मा उस आश्रमस्थानपर आये जो सभी सम्पदाओंका आश्रयस्थान था। वहाँ आकर देवेश्वर ब्रह्मा गिरिजासे स्पष्ट वाणीमें बोले॥ १—७॥
ब्रह्मोवाच<br>किं पुत्रि प्राप्तुकामासि किमलभ्यं ददामि ते।<br>विरम्यतामतिक्लेशात्तपसोऽस्मान्मदाज्ञया॥ ८<br><br>तच्छ्रुत्वोवाच गिरिजा गुरुं गौरवगर्भितम्।<br>वाक्यं वाचा विरोद्गीर्णवर्णनिर्णीतवाञ्छितम्॥ ९ब्रह्माने कहा—पुत्रि! अब तुम मेरी आज्ञा मानकर इस अत्यन्त कष्टकर तपस्यासे विरत हो जाओ। बताओ, तुम क्या प्राप्त करना चाहती हो? मैं तुम्हें कौन-सी दुर्लभ वस्तु प्रदान करूँ? वह सुनकर गिरिजाने गौरवस्पद गुरुजन ब्रह्मासे अपने चिरकालसे निर्णीत मनोरथको स्पष्टाक्षरोंसे युक्त वाणीद्वारा व्यक्त करते हुए कहा॥ ८—९॥
देव्युवाच<br>तपसा दुष्करेणाप्तः पतित्वे शङ्करो मया।<br>स मां श्यामलवर्णेति बहुशः प्रोक्तवान् भवः॥ १०<br>स्यामहं काञ्चनाकारा वाल्लभ्येन च संयुता।<br>भर्तुर्भूतपतेरङ्गेमेकतो निविशेऽङ्गवत्॥ ११देवी बोलीं—प्रभो! मैंने कठोर तपस्याके फलस्वरूप शंकरजीको पतिरूपमें प्राप्त किया है, किंतु वे मुझे बहुधा 'श्यामवर्णा—काले रंगकी' कहकर अपमानित करते रहते हैं। अतः मैं चाहती हूँ कि मेरा वर्ण सुवर्ण-सा गौर हो जाय, मैं उनकी परम वल्लभा बन जाऊँ और अपने भूतनाथ पतिदेवके शरीरमें एक ओर उन्हींके अङ्गकी तरह प्रविष्ट हो जाऊँ।
* अध्याय १५७ *६५७

| तस्यास्तद् भाषितं श्रुत्वा प्रोवाच कमलासनः।<br>एवं भव त्वं भूयश्च भर्तुर्देहार्धधारिणी॥ १२<br><br>ततस्तत्याज भृङ्गाङ्गं फुल्लनीलोत्पलत्वचम्॥ १३<br><br>त्वचा सा चाभवद् दीप्ता घण्टाहस्ता त्रिलोचना।<br>नानाभरणपूर्णाङ्गी पीतकौशेयधारिणी॥ १४<br><br>तामब्रवीत्ततो ब्रह्मा देवीं नीलाम्बुजत्विषम्।<br>निशे भूधरजादेहसम्पर्कात्त्वं ममाज्ञया॥ १५<br><br>सम्प्राप्ता कृतकृत्यत्वमेकानंशा पुरा ह्यसि।<br>य एष सिंहः प्रोद्भूतो देव्याः क्रोधाद् वरानने॥ १६<br><br>स तेऽस्तु वाहनं देवि केतौ चास्तु महाबलः।<br>गच्छ विन्ध्याचलं तत्र सुरकार्यं करिष्यसि॥ १७<br><br>पञ्चालो नाम यक्षोऽयं यक्षलक्षपदानुगः।<br>दत्तस्ते किङ्करो देवि मया मायाशतैर्युतः॥ १८<br><br>इत्युक्ता कौशिकी देवी विन्ध्यशैलं जगाम ह।<br>उमापि प्राप्तसंकल्पा जगाम गिरिशान्तिकम्॥ १९ | पार्वतीके उस कथनको सुनकर कमलासन ब्रह्माने कहा—'ठीक है, तुम ऐसी ही होकर पुनः अपने पतिदेवके शरीरके अर्धभागको धारण करनेवाली हो जाओ।' ऐसा वरदान पाकर पार्वती ने अपने भ्रमर-सरीखे काले एवं खिले हुए नीले कमलके-से नीले चमड़ेको त्याग दिया। तब उनकी त्वचा उद्दीप्त हो उठी और वे तीन नेत्रोंसे भी युक्त हो गयीं। तदुपरान्त उन्होंने अपने शरीरको नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित कर पीले रंगकी रेशमी साड़ी धारण किया और हाथमें घण्टा ले लिया। तत्पश्चात् ब्रह्मा ने उस नीले कमलकी-सी कान्तिवाली देवीसे कहा—'निशे! तुम पहलेसे ही एकानंशा नामसे विख्यात हो और इस समय मेरी आज्ञासे पार्वतीके शरीरका सम्पर्क होनेके कारण तुम कृतकृत्य हो गयी हो। वरानने! पार्वतीदेवीके क्रोधसे जो यह सिंह प्रादुर्भूत हुआ है, वह तुम्हारा वाहन होगा और तुम्हारी ध्वजापर भी इस महाबलीका आकार विद्यमान रहेगा। अब तुम विन्ध्याचलको जाओ। वहाँ देवताओंका कार्य सिद्ध करो। देवि! जिसके पीछे एक लाख यक्ष चलते हैं, उस इस पञ्चाल नामक यक्षको मैं तुम्हें किंकरके रूपमें प्रदान कर रहा हूँ, यह सैकड़ों प्रकारकी मायाओंका ज्ञाता है।' ब्रह्माद्वारा ऐसा आदेश पाकर कौशिकी देवी विन्ध्यपर्वतकी ओर चली गयीं॥ १०—१८ १/२॥ |
| प्रविशन्तीं तु तां द्वारादपकृष्य समाहितः।<br>रुरोध वीरको देवीं हेमवेत्रलताधरः॥ २०<br><br>तामुवाच च कोपेन रूपात्तु व्यभिचारिणीम्।<br>प्रयोजनं न तेऽस्तीह गच्छ यावन्न भेत्स्यसि॥ २१<br><br>देव्या रूपधरो दैत्यो देवं वञ्चयितुं त्विह।<br>प्रविष्टो न च दृष्टोऽसौ स वै देवेन घातितः॥ २२<br><br>घातिते चाहमाज्ञप्तो नीलकण्ठेन कोपिना।<br>द्वारेषु नावधानं ते यस्मात् पश्यामि वै ततः॥ २३<br><br>भविष्यसि न मद्द्वाःस्थो वर्षपूगान्यनेकंशः।<br>अतस्तेऽत्र न दास्यामि प्रवेशं गम्यतां द्रुतम्॥ २४ | इधर उमा भी अपना मनोवाञ्छित वरदान प्राप्त कर शंकरजीके पास चलीं। वहाँ द्वारपर हाथमें सोनेका डंडा धारण किये हुए वीरक सावधानीपूर्वक पहरा दे रहा था। उसने प्रवेश करती हुई पार्वतीको दरवाजेसे खींचकर रोक दिया और गौर रूपसे दूसरी स्त्री-सी प्रतीत होनेवाली उनसे क्रोधपूर्वक कहा—'तुम्हारा यहाँ कोई प्रयोजन नहीं है, अतः जबतक मैं तुम्हें पीट नहीं दे रहा हूँ, उससे पहले ही भाग जाओ। यहीं महादेवजीको छलनेके लिये एक दैत्य माता पार्वतीदेवीका रूप धारण कर प्रविष्ट हो गया था, जिसे मैं देख नहीं पाया था, किंतु महादेवजीने उसे यमलोकका पथिक बना दिया, उसे मारनेके बाद नीलकण्ठ शिवजीने क्रुद्ध होकर मुझे आज्ञा दी है कि अबसे तुम द्वारपर असावधानी मत करना। तभीसे मैं अच्छी तरह सजग होकर पहरा दे रहा हूँ। द्वारपर मेरे स्थित रहते हुए तुम अनेकों वर्षसमूहोंतक प्रविष्ट न हो सकोगी, इसलिये मैं तुम्हें भवनमें प्रवेश नहीं करने दूँगा। तुम शीघ्र ही यहाँसे चली जाओ'॥ १९—२४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कुमारसम्भवे वीरकशापो नाम सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके कुमारसम्भव-प्रसङ्गमें वीरक-शाप नामक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १५७॥