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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

४८ तुर्वसु और द्रुह्यके वंशका वर्णन, अनुके वंश-वर्णनमें बलिकी कथा और कर्णकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग

१८० * मत्स्यपुराण *

| प्रजानां पतये चैव तुभ्यं ब्रह्मात्मने नमः ॥ १६१<br><br>आत्मेशायात्मवश्याय सर्वेशातिशयाय च।<br>सर्वभूताङ्गभूताय तुभ्यं भूतात्मने नमः ॥ १६२ | मन्त्र और औषधके निर्माता, स्वयम्भू—स्वयं उत्पन्न होनेवाले, अज—जन्मरहित, अपूर्वप्रथम—आद्यन्तरूप, प्रजापति—प्रजाओंके स्वामी और ब्रह्मात्मा—ब्रह्मस्वरूप हैं, आपको अभिवादन है। आप आत्मेश—मनके स्वामी, आत्मवश्य—मनको वशमें रखनेवाले, सर्वेशातिशय—समस्त ईश्वरोंमें सबसे बढ़कर, सर्वभूताङ्गभूत—सम्पूर्ण जीवोंके अङ्गभूत तथा भूतात्मा—समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं, आपको नमस्कार है ॥ १५८–१६२ ॥ |
| निर्गुणाय गुणज्ञाय व्याकृतायामृताय च।<br>निरुपाख्याय मित्राय तुभ्यं योगात्मने नमः ॥ १६३<br><br>पृथिव्यै चान्तरिक्षाय महसे त्रिदिवाय च।<br>जनस्तपाय सत्याय तुभ्यं लोकात्मने नमः ॥ १६४<br><br>अव्यक्ताय च महते भूतादेरिन्द्रियाय च।<br>आत्मज्ञाय विशेषाय तुभ्यं सर्वात्मने नमः ॥ १६५<br><br>नित्याय चात्मलिङ्गाय सूक्ष्मायैवेतराय च।<br>शुद्धाय विभवे चैव तुभ्यं मोक्षात्मने नमः ॥ १६६<br><br>नमस्ते त्रिषु लोकेषु नमस्ते परतस्त्रिषु।<br>सत्यान्तेषु महाद्येषु चतुर्षु च नमोऽस्तु ते ॥ १६७<br><br>नमः स्तोत्रे मया ह्यस्मिन् सदसद् व्याहृतं विभो।<br>मद्भक्त इति ब्रह्मण्य तत् सर्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ १६८ | आप निर्गुण—सत्त्व, रजस्, तमस्—तीनों गुणोंसे परे, गुणज्ञ—तीनों गुणोंके रहस्यके ज्ञाता, व्याकृत—रूपान्तरित, अमृत—अमृतस्वरूप, निरुपाख्य—अदृश्य, मित्र—जीवोंके हितैषी और योगात्मा—योगस्वरूप हैं, आपको प्रणाम है। आप पृथिवी—मृत्युलोक, अन्तरिक्ष—अन्तरिक्षलोक, मह—महर्लोक, त्रिदिव्य—स्वर्गलोक, जन—जनलोक, तपः—तपोलोक, सत्य—सत्यलोक हैं, इस प्रकार लोकात्मा—सातों लोकस्वरूप आपको अभिवादन है। आप अव्यक्त—निराकाररूप, महान्—पूज्य, भूतादि—समस्त प्राणियोंके आदिभूत, इन्द्रिय—इन्द्रियस्वरूप, आत्मज्ञ—आत्मतत्त्वके ज्ञाता, विशेष—सर्वाधिक और सर्वात्मा—सम्पूर्ण जीवोंके आत्मस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप नित्य—सनातन, आत्मलिङ्ग—स्वप्रमाणस्वरूप, सूक्ष्म—अणुसे भी अणु, इतर—महान्‌से भी महान्, शुद्ध—शुद्धज्ञानसम्पन्न, विभु—सर्वव्यापक और मोक्षात्मा—मोक्षरूप हैं, आपको प्रणाम है। यहाँ तीनों लोकोंमें आपके लिये मेरा नमस्कार है तथा इनके अतिरिक्त (अन्य) तीन परलोकोंमें भी मैं आपको प्रणाम करता हूँ। इसी प्रकार महर्लोकसे लेकर सत्यलोकपर्यन्त चारों लोकोंमें मैं आपको अभिवादन करता हूँ। ब्राह्मणवत्सल विभो! इस स्तोत्रमें मेरे द्वारा जो कुछ उचित-अनुचित कहा गया, उसे 'यह मेरा भक्त है'—ऐसा जानकर आप क्षमा कर दें ॥ १६३—१६८ ॥ |
| सूत उवाच<br>एवमाभाष्य देवेशमीश्वरं नीललोहितम्।<br>प्रह्वोऽभिप्रणतस्तस्मै प्राञ्जलिर्वाग्यतोऽभवत् ॥ १६९ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर शुक्राचार्य देवाधिदेव नीललोहित भगवान् शंकरसे इस प्रकार प्रार्थना करके हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें लोट गये और पुनः विनम्र होकर उनके समक्ष चुपचाप खड़े हो गये। |
| काव्यस्य गात्रं संस्पृश्य हस्तेन प्रीतिमान् भवः।<br>निकामं दर्शनं दत्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥ १७० | तब शिवजीने हर्षपूर्वक अपने हाथसे शुक्राचार्यके शरीरको सहलाते हुए उन्हें यथेष्ट दर्शन दिया और वे वहीं अन्तर्हित हो गये। |
| ततः सोऽन्तर्हिते तस्मिन् देवेशेऽनुचरीं तदा।<br>तिष्ठन्तीं पार्श्वतो दृष्ट्वा जयन्तीमिदमब्रवीत् ॥ १७१ | उन देवेश्वरके अन्तर्हित हो जानेपर शुक्राचार्य अपने पार्श्व भागमें खड़ी हुई सेविका जयन्तीको देखकर उससे इस |

* अध्याय ४७ * १८१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कस्य त्वं सुभगे का वा दुःखिते मयि दुःखिता।<br>महता तपसा युक्ता किमर्थं मां निषेवसे॥ १७२<br><br>अनया संस्तुतो भक्त्या प्रश्रयेण दमेन च।<br>स्नेहेन चैव सुश्रोणि प्रीतोऽस्मि वरवर्णिनि॥ १७३<br><br>किमिच्छसि वरारोहे कस्ते कामः समृद्ध्यताम्।<br>तं ते सम्पादयाम्यद्य यद्यपि स्यात् सुदुष्करः॥ १७४प्रकार बोले—'सुभगे! तुम कौन हो अथवा किसकी पुत्री हो, जो मेरे तपस्यामें निरत होनेपर तुम भी कष्ट झेल रही हो? इस प्रकार यह घोर तप करती हुई तुम किसलिये मेरी सेवा कर रही हो? सुश्रोणि! मैं तुम्हारी इस उत्कृष्ट भक्ति, विनम्रता, इन्द्रियनिग्रह और प्रेमसे परम प्रसन्न हूँ। वरवर्णिनि! तुम मुझसे क्या प्राप्त करना चाहती हो? वरारोहे! तुम्हारी क्या अभिलाषा है? उसे तुम अवश्य बतलाओ। मैं आज उसे अवश्य पूर्ण करूँगा, चाहे वह कितना ही दुष्कर क्यों न हो'॥ १६९—१७४॥
एवमुक्ताब्रवीदेनं तपसा ज्ञातुमर्हसि।<br>चिकीर्षितं हि मे ब्रह्मंस्त्वं हि वेत्थ यथातथम्॥ १७५<br><br>एवमुक्तोऽब्रवीदेनां दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा।<br>मया सह त्वं सुश्रोणि दश वर्षाणि भामिनि॥ १७६<br><br>देवि चेन्दीवरश्यामे वराहें वामलोचने।<br>एवं वृणोषि कामं त्वं मत्तो वै वल्गुभाषिणि॥ १७७<br><br>एवं भवतु गच्छामो गृहान्नो मत्तकाशिनि।<br>ततः स्वगृहमागत्य जयन्त्याः पाणिमुद्वहन्॥ १७८<br><br>तया सहावसद् देव्या दश वर्षाणि भार्गवः।<br>अदृश्यः सर्वभूतानां मायया संवृतः प्रभुः॥ १७९<br><br>कृतार्थमागतं दृष्ट्वा काव्यं सर्वे दितेः सुताः।<br>अभिजग्मुर्गृहं तस्य मुदितास्ते दिदृक्षवः॥ १८०<br><br>यदा गता न पश्यन्ति मायया संवृतं गुरुम्।<br>लक्षणं तस्य तद् बुद्ध्वा प्रतिजग्मुर्यथागतम्॥ १८१शुक्राचार्यके यों कहनेपर जयन्तीने उनसे कहा—'ब्रह्मन्! आप अपने तपोबलसे मेरे मनोरथको भली-भाँति जान सकते हैं; क्योंकि आपको तो सबका यथार्थ ज्ञान है। ऐसा कहे जानेपर शुक्राचार्यने अपनी दिव्य दृष्टिद्वारा जयन्तीके मनोरथको जानकर उससे कहा—'सुन्दर भावोंवाली सुश्रोणि! इन्दीवर कमलके सदृश तुम्हारा वर्ण श्याम है, देवि! तुम्हारे नेत्र अत्यन्त रमणीय हैं तथा तुम्हारा भाषण अतिशय मधुर है। वराहें! तुम दस वर्षोंतक मेरे साथ रहनेका जो मुझसे वर चाह रही हो, वह वैसा ही हो। मत्तकाशिनि! आओ, अब हमलोग अपने घर चलें।' तब अपने घर आकर शुक्राचार्यने जयन्तीका पाणिग्रहण किया। फिर तपोबलसम्पन्न शुक्राचार्यने मायाका आवरण डाल दिया, जिससे सभी प्राणियोंसे अदृश्य होकर वे दस वर्षोंतक जयन्तीके साथ निवास करते रहे। इसी बीच जब दितिके पुत्रोंको यह ज्ञात हुआ कि शुक्राचार्य सफलमनोरथ होकर घर लौट आये हैं, तब वे सभी हर्षपूर्वक उन्हें देखनेकी अभिलाषासे उनके घरकी ओर चल पड़े। वहाँ पहुँचनेपर जब उन्हें मायासे छिपे हुए गुरुदेव शुक्राचार्य नहीं दीख पड़े, तब वे उनके उस लक्षणको समझकर जैसे आये थे, वैसे ही वापस चले गये॥ १७५—१८१॥
बृहस्पतिस्तु संरुद्धं काव्यं ज्ञात्वा वरेण तु।<br>तुष्ट्यर्थं दश वर्षाणि जयन्त्या हितकाम्यया॥ १८२<br><br>बुद्ध्वा तदन्तरं सोऽपि दैत्यानामिन्द्रनोदितः।<br>काव्यस्य रूपमास्थाय असुरान् समुपाव्हयत्॥ १८३<br><br>ततस्तानागतान् दृष्ट्वा बृहस्पतिरुवाच ह।<br>स्वागतं मम याज्यानां प्राप्तोऽहं वो हिताय च॥ १८४इधर बृहस्पतिको जब यह ज्ञात हुआ कि शुक्राचार्य जयन्तीकी हित-कामनासे उसे संतुष्ट करनेके लिये दस वर्षोंतक वरदानके बन्धनसे बँध चुके हैं, तब इसे दैत्योंका महान् छिद्र जानकर इन्द्रकी प्रेरणासे उन्होंने शुक्राचार्यका रूप धारणकर असुरोंको बुलाया। उन्हें आया देखकर (शुक्ररूपधारी) बृहस्पतिने उनसे कहा—'मेरे यजमानो! तुम्हारा स्वागत है। मैं तुमलोगोंके कल्याणके लिये तपोवनसे लौट आया हूँ।

१८२ * मत्स्यपुराण *

अहं वोऽध्यापयिष्यामि विद्याः प्राप्तास्तु या मया।<br>ततस्ते हृष्टमनसो विद्यार्थमुपपेदिरे॥ १८५<br>पूर्णे काव्यस्तदा तस्मिन् समये दशवार्षिके।<br>समयान्ते देवयानी तदोत्पन्ना इति श्रुतिः।<br>बुद्धिं चक्रे ततः सोऽथ याज्यानां प्रत्यवेक्षणे॥ १८६<br>देवि गच्छाम्यहं द्रष्टुं तव याज्याञ् शुचिस्मिते।<br>विभ्रान्तवीक्षिते साध्वि विवर्णायतलोचने॥ १८७<br>एवमुक्ताब्रवीदेनं भज भक्तान् महाव्रत।<br>एष धर्मः सतां ब्रह्मन् न धर्मं लोपयामि ते॥ १८८'वहाँ मुझे जो विद्याएँ प्राप्त हुई हैं, उन्हें मैं तुमलोगोंको पढ़ाऊँगा।' यह सुनकर वे सभी प्रसन्नमनसे विद्या-प्राप्तिके लिये वहाँ एकत्र हो गये। उधर जब वह दस वर्षका निश्चित समय पूर्ण हो गया, तब शुक्राचार्यने अपने यजमानोंकी खोज-खबर लेनेका विचार किया। इसी समयकी समाप्तिपर (जयन्तीके गर्भसे) देवयानी उत्पन्न हुई थी—ऐसा सुना जाता है। (तब वे जयन्तीसे बोले—) 'पावन मुसकानवाली देवि! तुम्हारे नेत्र तो विभ्रान्त-से एवं बड़े हैं तथा तुम्हारी दृष्टि चञ्चल है, साध्वि! अब मैं तुम्हारे यजमानोंकी देखभाल करनेके लिये जा रहा हूँ।' यों कहे जानेपर जयन्तीने शुक्राचार्यसे कहा—'महाव्रत! आप अपने भक्तोंका अवश्य भला कीजिये; क्योंकि यही सत्पुरुषोंका धर्म है। ब्रह्मन्! मैं आपके धर्मका लोप नहीं करना चाहती'॥ १८२—१८८॥
ततो गत्वासुरान् दृष्ट्वा देवाचार्येण धीमता।<br>वञ्चितान् काव्यरूपेण ततः काव्योऽब्रवीत्तु तान्॥ १८९<br>काव्यं मां वो विजानीध्वं तोषितो गिरिशो विभुः।<br>वञ्चिता बत यूयं वै सर्वे शृणुत दानवाः॥ १९०<br>श्रुत्वा तथा ब्रुवाणं तं सम्भ्रान्तास्ते तदाभवन्।<br>प्रेक्षन्तस्तावभौ तत्र स्थितासीनौ सुविस्मिताः॥ १९१<br>सम्प्रमूढास्ततः सर्वे न प्राबुध्यन्त किंचन।<br>अब्रवीत् सम्प्रमूढेषु काव्यस्तानसुरांस्तदा॥ १९२<br>आचार्यों वो ह्यहं काव्यो देवाचार्योऽयमङ्गिराः।<br>अनुगच्छत मां दैत्यास्त्यजतैनं बृहस्पतिम्॥ १९३<br>इत्युक्ता ह्यसुरास्तेन तावुभौ समवेक्ष्य च।<br>यदासुरा विशेषं तु न जानन्त्युभयोस्तयोः॥ १९४<br>बृहस्पतिरुवाचैनानसम्भ्रान्तस्तपोधनः ।<br>काव्यो वोऽहं गुरुर्दैत्या मद्रूपोऽयं बृहस्पतिः॥ १९५<br>सम्मोहयति रूपेण मामकेनैष वोऽसुराः।<br>श्रुत्वा तस्य ततस्ते वै समेत्य तु ततोऽब्रुवन्॥ १९६तदनन्तर असुरोंके निकट पहुँचकर शुक्राचार्यने जब यह देखा कि बुद्धिमान् देवाचार्य बृहस्पतिने मेरा रूप धारणकर असुरोंको ठग लिया है, तब वे असुरोंसे बोले—'दानवो! तुमलोग ध्यानपूर्वक सुन लो। अपनी तपस्याद्वारा भगवान् शंकरको प्रसन्न करनेवाला शुक्राचार्य मैं हूँ। मुझे ही तुमलोग अपना गुरुदेव शुक्राचार्य समझो। बृहस्पतिद्वारा तुम सब लोग ठग लिये गये हो।' शुक्राचार्यको वैसा कहते हुए सुनकर उस समय वे सभी अत्यन्त भ्रममें पड़ गये और आश्चर्यचकित हो वहाँ बैठे हुए उन दोनोंकी ओर निहारते ही रह गये। वे किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये थे। उस समय उनकी समझमें कुछ भी नहीं आ रहा था। इस प्रकार उनके किंकर्तव्यविमूढ़ हो जानेपर शुक्राचार्यने उन असुरोंसे कहा—'असुरो! तुमलोगोंका आचार्य शुक्राचार्य मैं हूँ और ये देवताओंके आचार्य बृहस्पति हैं। इसलिये तुमलोग इन बृहस्पतिका त्याग कर दो और मेरा अनुगमन करो।' शुक्राचार्यके यों समझानेपर असुरगण उन दोनोंकी ओर ध्यानपूर्वक निहारने लगे, परंतु जब उन्हें उन दोनोंमें कोई विशेषता नहीं प्रतीत हुई, तब तपस्वी बृहस्पति धैर्यपूर्वक उन असुरोंसे बोले—'दैत्यो! तुमलोगोंका गुरु शुक्राचार्य मैं हूँ और मेरा रूप धारण करनेवाले ये बृहस्पति हैं। असुरो! ये मेरा रूप धारणकर तुमलोगोंको मोहमें डाल रहे हैं'॥ १८९—१९५ ½॥
अयं नो दशवर्षाणि सततं शास्ति वै प्रभुः।<br>एष वै गुरुरस्माकमन्तरे स्फुरयन् द्विजः॥ १९७बृहस्पतिकी बात सुनकर वे सभी एकत्र हो इस प्रकार बोले—'ये सामर्थ्यशाली ब्राह्मणदेवता हमारे अन्तःकरणमें स्फुरित होते हुए दस वर्षोंसे लगातार हमलोगोंको शिक्षा दे रहे हैं, अतः ये ही हमारे गुरु हैं।'
* अध्याय ४७ *१८३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततस्ते दानवाः सर्वे प्रणिपत्याभिनन्द्य च।<br>वचनं जगृहुस्तस्य चिराभ्यासेन मोहिताः॥ १९८<br>ऊचुस्तमसुराः सर्वे क्रोधसंरक्तलोचनाः।<br>अयं गुरुर्हितोऽस्माकं गच्छ त्वं नासि नो गुरुः॥ १९९<br>भार्गवो वाङ्गिरा वापि भगवानेष नो गुरुः।<br>स्थिता वयं निदेशेऽस्य साधु त्वं गच्छ मा चिरम्॥ २००<br>एवमुक्त्वासुराः सर्वे प्रापद्यन्त बृहस्पतिम्।<br>यदा न प्रत्यपद्यन्त काव्येनोक्तं महद्धितम्॥ २०१<br>चुकोप भार्गवस्तेषामवलेपेन तेन तु।<br>बोधिता हि मया यस्मान्न मां भजथ दानवाः॥ २०२<br>तस्मात् प्रनष्टसंज्ञा वै पराभवमवाप्स्यथ।<br>इति व्याहृत्य तान् काव्यो जगामाथ यथागतम्॥ २०३‘ऐसा कहकर चिरकालके अभ्याससे मोहित हुए उन सभी दानवोंने बृहस्पतिको प्रणाम करके उनका अभिनन्दन किया और उन्हींके वचनोंको अङ्गीकार किया। तत्पश्चात् क्रोधसे आँखें लाल करके उन सभी असुरोंने शुक्राचार्यसे कहा—‘ये ही हमलोगोंके हितैषी गुरुदेव हैं, आप हमारे गुरु नहीं हैं, अतः आप यहाँसे चले जाइये। ये चाहे शुक्राचार्य हों अथवा बृहस्पति ही क्यों न हों, ये ही हमारे ऐश्वर्यशाली गुरुदेव हैं। हमलोग इन्हींकी आज्ञामें स्थित हैं। अतः आपके लिये यही अच्छा होगा कि आप यहाँसे शीघ्र चले जाइये, विलम्ब मत कीजिये।’ ऐसा कहकर सभी असुर बृहस्पतिके निकट चले आये। इधर जब असुरोंने शुक्राचार्यद्वारा कहे गये महान् हितकारक वचनोंपर कुछ ध्यान नहीं दिया, तब उनके उस गर्वसे शुक्राचार्य कुपित हो उठे (और शाप देते हुए बोले—) ‘दानवो! चूँकि मेरे समझानेपर भी तुमलोगोंने मेरी बात नहीं मानी है, इसलिये (भावी संग्राममें) तुम्हारी चेतना नष्ट हो जायगी और तुमलोग पराभवको प्राप्त करोगे।’ इस प्रकार असुरोंको शाप देकर शुक्राचार्य जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये॥ १९६—२०३॥
शमांस्तानसुराञ्ज्ञात्वा काव्येन स बृहस्पतिः।<br>कृतार्थः स तदा हृष्टः स्वरूपं प्रत्यपद्यत॥ २०४<br>बुद्ध्यासुरान् हताञ्ज्ञात्वा कृतार्थोऽन्तर्दधीयत।<br>ततः प्रनष्टे तस्मिंस्तु विभ्रान्ता दानवाभवन्॥ २०५<br>अहो विवञ्चिताः स्मेति परस्परमथाब्रुवन्।<br>पृष्ठतोऽभिमुखाश्चैव ताडिताङ्गिरसेन तु॥ २०६<br>वञ्चिताः सोपधानेन स्वे स्वे वस्तुनि मायया।<br>ततस्त्वपरितुष्टास्ते तमेव त्वरिता ययुः।<br>प्रह्लादमग्रतः कृत्वा काव्यस्यानुपदं पुनः॥ २०७<br>ततः काव्यं समासाद्य उपतस्थुरवाङ्मुखाः।<br>समागतान् पुनर्द्दष्ट्वा काव्यो याज्यानुवाच ह॥ २०८<br>मया सम्बोधिताः सर्वे यस्मान्मां नाभिनन्दथ।<br>ततस्तेनावमानेन गता यूयं पराभवम्॥ २०९<br>एवं ब्रुवाणं शुक्रं तु बाष्पसंदिग्धया गिरा।<br>प्रह्लादस्तं तदोवाच मा नस्त्वं त्यज भार्गव॥ २१०<br>स्वाश्रयान् भजमानांश्च भक्तांस्त्वं भज भार्गव।इधर जब बृहस्पतिको यह ज्ञात हुआ कि शुक्राचार्यने असुरोंको शाप दे दिया, तब वे प्रसन्नतासे खिल उठे; क्योंकि उनका प्रयोजन सिद्ध हो चुका था। तत्पश्चात् वे तुरंत अपने वास्तविक बृहस्पतिरूपमें प्रकट हो गये और अपने बुद्धिबलसे असुरोंको मरा हुआ जानकर सफलमनोरथ हो अन्तर्हित हो गये। बृहस्पतिके आँखोंसे ओझल हो जानेपर दानवगण विशेषरूपसे भ्रममें पड़ गये और परस्पर यों कहने लगे—‘अहो! हमलोग तो विशेषरूपसे ठग लिये गये। बृहस्पतिने हमलोगोंको आगे और पीछे अर्थात् प्रत्यक्ष और परोक्ष—दोनों ओरसे व्यथित कर दिया। उन्होंने अपनी मायाद्वारा सहायकसहित हमलोगोंको अपनी-अपनी वस्तुओंसे वञ्चित कर दिया।’ इस प्रकार असंतुष्ट हुए वे सभी दानव प्रह्लादको आगे कर पुनः उन्हीं शुक्राचार्यका अनुगमन करनेके लिये तुरंत प्रस्थित हुए और शुक्राचार्यके निकट पहुँचकर नीचे मुख किये हुए उन्हें घेरकर खड़े हो गये। तब अपने यजमानोंको पुनः आया देखकर शुक्राचार्यने उनसे कहा—‘दानवो! चूँकि मेरे द्वारा भलीभाँति समझाये जानेपर भी तुम सब लोगोंने मेरा अभिनन्दन नहीं किया, इसलिये मेरे प्रति किये हुए उस अपमानके कारण तुमलोग पराभवको प्राप्त हुए हो।’ शुक्राचार्यके यों कहनेपर प्रह्लादकी आँखोंमें आँसू उमड़ आये। तब वे गद्गद वाणीद्वारा उनसे प्रार्थना करते हुए बोले—‘भृगुनन्दन! आप हमलोगोंका परित्याग न करें। भार्गव! हमलोग आपके आश्रित,

१८४ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्वय्यदृष्टे वयं तेन देवाचार्येण मोहिताः।<br>भक्तानर्हसि वै ज्ञातुं तपोदीर्घेण चक्षुषा॥ २११<br><br>यदि नस्त्वं न कुरुषे प्रसादं भृगुनन्दन।<br>अपध्यातास्त्वया ह्यद्य प्रविशामो रसातलम्॥ २१२सेवक और भक्त हैं, इसलिये आप हमें अपनाइये। आपके अदृष्ट हो जानेपर देवाचार्य बृहस्पतिने हमलोगोंको मोहमें डाल दिया था। आप अपनी दीर्घकालिक तपस्याद्वारा अर्जित दिव्यदृष्टिद्वारा स्वयं अपने भक्तोंको जान सकते हैं। भृगुनन्दन! यदि आप हमलोगोंपर कृपा नहीं करेंगे और हमलोगोंका अनिष्ट-चिन्तन ही करते रहेंगे तो हमलोग आज ही रसातलमें प्रवेश कर जायेंगे'॥ २०४—२१२॥
ज्ञात्वा काव्यो यथातत्त्वं कारुण्यादनुकम्पया।<br>एवं प्रत्यनुनीतो वै ततः कोपं नियम्य सः।<br>उवाचैतान् न भेतव्यं न गन्तव्यं रसातलम्॥ २१३<br><br>अवश्यं भाविनो ह्यर्थाः प्राप्तव्या मयि जाग्रति।<br>न शक्यमन्यथा कर्तुं दिष्टं हि बलवत्तरम्॥ २१४<br><br>संज्ञा प्रणष्टा या वोऽद्य कामं तां प्रतिपत्स्यथ।<br>देवाञ्जित्वा सकृच्चापि पातालं प्रतिपत्स्यथ॥ २१५<br><br>प्राप्ते पर्यायकाले च हीति ब्रह्माभ्यभाषत।<br>मत्प्रसादाच्च त्रैलोक्यं भुक्तं युष्माभिरूर्जितम्॥ २१६<br><br>युगाख्या दश सम्पूर्णा देवानाक्रम्य मूर्धनि।<br>एतावन्तं च कालं वै ब्रह्मा राज्यमभाषत॥ २१७<br><br>राज्यं सावर्णिके तुभ्यं पुनः किल भविष्यति।<br>लोकानामीश्वरो भाव्यस्तव पौत्रः पुनर्बलिः॥ २१८<br><br>एवं किल मिथः प्रोक्तः पौत्रस्ते विष्णुना स्वयम्।<br>वाचा हृतेषु लोकेषु तास्तास्तस्याभवन् किल॥ २१९<br><br>यस्मात् प्रवृत्तयश्चास्य सकाशादभिसंधिताः।<br>तस्माद् वृत्तेन प्रीतेन तुभ्यं दत्तं स्वयम्भुवा॥ २२०<br><br>देवराज्ये बलिर्भाव्य इति मामीश्वरोऽब्रवीत्।<br>तस्माददृश्यो भूतानां कालापेक्षः स तिष्ठति॥ २२१<br><br>प्रीतेन चापरो दत्तो वरस्तुभ्यं स्वयम्भुवा।<br>तस्मान्निरुत्सुकस्त्वं वै पर्यायं सहितोऽसुरैः॥ २२२<br><br>न हि शक्यं मया तुभ्यं पुरस्ताद् विप्रभाषितुम्।इस प्रकार अनुनय-विनय किये जानेपर शुक्राचार्यने दिव्यदृष्टिद्वारा यथार्थ तत्त्वको समझ लिया, तब उनके हृदयमें करुणा एवं अनुकम्पा उमड़ आयी और वे उमड़े हुए क्रोधको रोककर उन असुरोंसे इस प्रकार बोले—'प्रह्लाद! न तो तुमलोग डरो और न रसातलको ही जाओ। यों तो जो अवश्यम्भावी इष्ट-अनिष्ट कार्य हैं, वे तो मेरे जागरूक रहनेपर भी तुमलोगोंको प्राप्त होंगे ही, उन्हें अन्यथा नहीं किया जा सकता; क्योंकि दैवका विधान सबसे बलवान् होता है। मेरे शापानुसार तुमलोगोंकी जो चेतना नष्ट हो गयी है, उसे तो तुमलोग आज ही प्राप्त कर लोगे। साथ ही विपरीत समय आनेपर तुमलोगोंको देवताओंपर विजय पा लेनेपर भी एक बार पातालमें जाना पड़ेगा; क्योंकि ब्रह्माने पहले ही ऐसा बतलाया है। मेरी ही कृपासे तुमलोगोंने देवताओंके मस्तकपर पैर रखकर समूचे दस युगपर्यन्त त्रिलोकीके ऊर्जस्वी राज्यका उपभोग किया है। इतने ही दिनोंतक ब्रह्माने तुमलोगोंका राज्यकाल बतलाया था। सावणि-मन्वन्तरमें पुनः तुमलोगोंका राज्य होगा। उस समय तुम्हारा पौत्र बलि त्रिलोकीका अधीश्वर होगा। ऐसा स्वयं भगवान् विष्णुने वाणीद्वारा त्रिलोकीके अपहरण कर लेनेपर तुम्हारे पौत्रसे परस्पर वार्तालापके प्रसङ्गमें कहा था। वे सारी बातें अब उसके लिये घटित होंगी। चूँकि इसकी प्रवृत्तियाँ दस वर्षोंतक उत्तम बनी रहीं, इसलिये इसके व्यवहारसे प्रसन्न होकर स्वयम्भूने तुम्हें यह राज्य प्रदान किया है। देवराज्यपर बलि अधिष्ठित होगा—ऐसा मुझसे भगवान् शंकरने भी कहा था। इसी कारण वह कालकी प्रतीक्षा करता हुआ जीवोंके नेत्रोंके अगोचर होकर अवस्थित है। उस समय प्रसन्न हुए स्वयम्भूने तुम्हें एक दूसरा वरदान भी दिया था, इसलिये तुम असुरोंसहित निरुत्सुक रहकर कालकी प्रतीक्षा करो। विभो! यद्यपि मैं भविष्यकी सारी बातें जानता हूँ, तथापि मैं पहले ही तुमसे उन घटनाओंका वर्णन नहीं कर सकता;
* अध्याय ४७ *१८५
ब्रह्मणा प्रतिषिद्धोऽहं भविष्यं जानता विभो ॥ २२३<br>इमौ च शिष्यौ द्वौ मह्यं समावेतौ बृहस्पतेः ।<br>दैवतैः सह संसृष्टान् सर्वान् वो धारयिष्यतः ॥ २२४क्योंकि ब्रह्माजीने मुझे मना कर दिया है। मेरे ये दोनों शिष्य (षण्ड और अमर्क), जो बृहस्पतिके समान प्रभावशाली हैं, देवताओंके साथ ही उत्पन्न हुए तुम सब लोगोंकी रक्षा करेंगे' ॥ २१३—२२४ ॥
इत्युक्ता ह्यसुराः सर्वे काव्येनाक्लिष्टकर्मणा ।<br>हृष्टास्तेन ययुः सार्धं प्रह्लादेन महात्मना ॥ २२५सरलतापूर्वक कार्यको सम्पन्न करनेवाले शुक्राचार्यके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर असुरगण उन महात्मा प्रह्लादके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने वासस्थानको चले गये।
अवश्यं भाव्यमर्थं तु श्रुत्वा शुक्रेण भाषितम् ।<br>सकृदाशंसमानास्तु जयं शुक्रेण भाषितम् ।<br>दंशिताः सायुधाः सर्वे ततो देवान् समाह्वयन् ॥ २२६उस समय उनके मनमें शुक्राचार्यद्वारा कथित यह विचार कि 'अवश्यम्भावी कार्य तो होगा ही' गूँज रहा था। कुछ दिन व्यतीत होनेपर उन्होंने सोचा कि शुक्राचार्यके कथनानुसार एक बार विजय तो होगी ही, अतः सभी असुरोंने विजयकी आशासे अपना-अपना कवच धारण कर लिया और शस्त्रास्त्रसे लैस हो देवताओंके निकट जाकर उन्हें ललकारा।
देवास्तदासुरान् दृष्ट्वा संग्रामे समुपस्थितान् ।<br>सर्वे सम्भृतसम्भारा देवास्तान् समयोधयन् ॥ २२७<br>देवासुरे तदा तस्मिन् वर्तमाने शतं समाः ।<br>अजयन्नसुरा देवांस्ततो देवा ह्यामन्त्रयन् ॥ २२८देवताओंने जब यह देखा कि असुरगण सेनासहित रणभूमिमें आ डटे हैं, तब देवगण भी संगठित एवं युद्ध-सामग्रीसे सुसज्जित हो असुरोंके साथ युद्ध करने लगे। वह देवासुर-संग्राम सौ वर्षोंतक चलता रहा। उसमें असुरोंने देवताओंको पराजित किया। तब देवताओंने परस्पर मन्त्रणा करके यह निश्चय किया कि
यज्ञेनोपाह्वयामस्तौ ततो जेष्यामहेऽसुरान् ।<br>तदोपामन्त्रयन् देवाः षण्डामकौँ तु तावुभौ ॥ २२९<br>यज्ञे चाहूय तौ प्रोक्तौ त्यजेतामसुरान् द्विजौ ।<br>वयं युवां भजिष्यामः सह जित्वा तु दानवान् ॥ २३०जब हमलोग यज्ञके निमित्तसे उन दोनों (षण्ड और अमर्क)-को अपने यहाँ बुलायेंगे तभी असुरोंपर विजय पा सकेंगे। ऐसा परामर्श करके देवताओंने उन षण्ड और अमर्क—दोनोंको आमन्त्रित किया और अपने यज्ञमें बुलाकर उनसे कहा—'द्विजवरो! आपलोग असुरोंका पक्ष छोड़ दें। हमलोग आप दोनोंके सहयोगसे दानवोंको पराजित कर आपकी सेवा करेंगे।'
एवं कृताभिसंधी तौ षण्डामकौँ सुरास्तथा ।<br>ततो देवा जयं प्रापुर्दानवाश्च पराजिताः ॥ २३१<br>षण्डामर्कपरित्यक्ता दानवा ह्यबलास्तथा ।<br>एवं दैत्याः पुरा काव्यशापेनाभिहतास्तदा ॥ २३२इस प्रकार जब देवताओंके तथा षण्ड-अमर्क—दोनों दैत्याचार्योंके बीच संधि हो गयी, तब रणभूमिमें देवताओंको विजय प्राप्त हुई और दानवगण पराजित हो गये; क्योंकि षण्ड-अमर्कद्वारा परित्याग कर दिये जानेपर दानववृन्द बलहीन हो गये थे। इस प्रकार पूर्वकालमें शुक्राचार्यद्वारा दिये गये शापके कारण उस समय दैत्यगण मारे गये।
काव्यशापाभिभूतास्ते निराधाराश्च सर्वशः ।<br>निरस्यमाना देवैश्च विविशुस्ते रसातलम् ॥ २३३अवशिष्ट दैत्यगण शुक्राचार्यके शापसे अभिभूत होनेके कारण जब सब ओरसे निराधार हो गये, साथ ही देवताओंने उन्हें खदेड़ना आरम्भ किया, तब वे विवश होकर रसातलमें प्रविष्ट हो गये।
एवं निरुद्यमा देवैः कृताः कृच्छ्रेण दानवाः ।<br>ततः प्रभृति शापेन भृगोर्नैमित्तिकेन तु ॥ २३४<br>जज्ञे पुनः पुनर्विष्णुर्धर्मे प्रशिथिले प्रभुः ।इस प्रकार देवगण दानवोंको बड़ी कठिनाईसे उद्यमहीन अर्थात् युद्धविमुख कर पाये। तभीसे शुक्राचार्यके नैमित्तिक शापके कारण धर्मका विशेषरूपसे ह्रास हो जानेपर धर्मकी पुनः स्थापना
१८६* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कुर्वन् धर्मव्यवस्थानमसुराणां प्रणाशनम्॥ २३५और असुरोंका विनाश करनेके लिये भगवान् विष्णु बारंबार अवतीर्ण होते रहे॥ २२५-२३५॥
प्रह्लादस्य निदेशे तु न स्थास्यन्त्यसुराश्च ये।<br>मनुष्यवध्यास्ते सर्वे ब्रह्मेति व्याहरत् प्रभुः॥ २३६<br>धर्मन्नारायणस्यांशः सम्भूतश्चाक्षुषेऽन्तरे।<br>यज्ञं प्रवर्तयामासदेवो वैवस्वतेऽन्तरे॥ २३७<br>प्रादुर्भावे ततस्तस्य ब्रह्मा ह्वासीत् पुरोहितः।<br>युगाख्यायां चतुर्थ्यां तु आपन्नेषु सुरेषु वै॥ २३८<br>सम्भूतस्तु समुद्रान्ते हिरण्यकशिपोर्वधे।<br>द्वितीये नरसिंहाख्ये रुद्रो ह्वासीत् पुरोहितः॥ २३९<br>बलिसंस्थेषु लोकेषु त्रेतायां सप्तमं प्रति।<br>दैत्यैस्त्रैलोक्य आक्रान्ते तृतीयो वामनोऽभवत्॥ २४०<br>एतास्तिस्रः स्मृतास्तस्य दिव्याः सम्भूतयो द्विजाः।<br>मानुषाः सप्त यान्यास्तु शापतस्ता निबोधत॥ २४१<br>त्रेतायुगे तु प्रथमे दत्तात्रेयो बभूव ह।<br>नष्टे धर्मे चतुर्थांशे मार्कण्डेयपुरःसरः॥ २४२<br>पञ्चमः पञ्चदश्यां च त्रेतायां सम्बभूव ह।<br>मान्धाता चक्रवर्ती तु तस्थौतथ्यपुरःसरः॥ २४३<br>एकोनविंश्यां त्रेतायां सर्वक्षत्रान्तकृद् विभुः।<br>जामदग्न्यस्तथा षष्ठो विश्वामित्रपुरःसरः॥ २४४<br>चतुर्विंशे युगे रामो वसिष्ठेन पुरोधसा।<br>सप्तमो रावणस्यार्थे जज्ञे दशरथात्मजः॥ २४५<br>अष्टमे द्वापरे विष्णुरष्टाविंशे पराशरात्।<br>वेदव्यासस्तथा जज्ञे जातूकर्ण्यपुरःसरः॥ २४६पूर्वकालमें सामर्थ्यशाली ब्रह्मा ने प्रसङ्गवश ऐसा कहा था कि जो असुर प्रह्लादकी आज्ञाके वशीभूत नहीं रहेंगे, वे सभी मनुष्योंके हाथों मारे जायँगे। चाक्षुष-मन्वन्तरमें धर्मके अंशसे साक्षात् भगवान् नारायणका अवतार हुआ था। अपने प्रादुर्भावके पश्चात् वैवस्वत-मन्वन्तरमें उन्होंने एक यज्ञानुष्ठान प्रवर्तित किया था; उस यज्ञके पुरोहित ब्रह्मा थे। चौथे तामस-मन्वन्तरमें देवताओंके विपत्तिग्रस्त हो जानेपर हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये समुद्रतटपर नृसिंहका अवतार हुआ था। इस द्वितीय नृसिंहावतारमें रुद्र पुरोहित-पदपर आसीन थे। सातवें वैवस्वत-मन्वन्तरके त्रेतायुगमें, जब त्रिलोकीपर बलिक अधिकार था, उस समय तीसरा वामन-अवतार हुआ था। (उस कार्यकालमें धर्म पुरोहितका पद सँभाल रहे थे।) द्विजवरो! भगवान् विष्णुकी ये तीन दिव्य उत्पत्तियाँ बतलायी गयी हैं। अब अन्य सात सम्भूतियाँ, जो भृगुके शापवश मानव-योनिमें हुई हैं, उन्हें सुनिये। प्रथम त्रेतायुगमें, जब धर्मका चतुर्थांश नष्ट हो गया था, भगवान् मार्कण्डेयको पुरोहित बनाकर दत्तात्रेयके रूपमें अवतीर्ण हुए थे। पंद्रहवें त्रेतायुगमें चक्रवर्ती मान्धाताके रूपमें पाँचवाँ अवतार हुआ था। उस समय पुरोहितका पद महर्षि तथ्य (उत्तथ्य)-को मिला था। उन्नीसवें त्रेतायुगमें छठा अवतार जमदग्निनन्दन महाबली परशुरामके रूपमें हुआ था, जो सम्पूर्ण क्षत्रिय-वंशके संहारक थे। उस समय महर्षि विश्वामित्र आदि सहायक बने थे। चौबीसवें त्रेतायुगमें सातवें अवतारके रूपमें रावणका वध करनेके लिये भगवान् श्रीराम महाराज दशरथके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए थे। उस समय महर्षि वसिष्ठ पुरोहित थे। अट्ठाईसवें द्वापरयुगमें आठवें अवतारमें भगवान् विष्णु महर्षि पराशरसे वेदव्यासके रूपमें अवतीर्ण हुए। उस समय जातूकर्ण्यने पुरोहित-पदको सुशोभित किया॥ २३६-२४६॥
कर्तुं धर्मव्यवस्थानमसुराणां प्रणाशनम्।<br>बुद्धो नवमको जज्ञे तपसा पुष्करेक्षणः।<br>देवसुन्दररूपेण द्वैपायनपुरःसरः॥ २४७<br>तस्मिन्नेव युगे क्षीणे संध्याशिष्टे भविष्यति।<br>कल्की तु विष्णुयशसः पाराशर्यपुरःसरः।<br>दशमो भाव्यसम्भूतो याज्ञवल्क्यपुरःसरः॥ २४८<br>सर्वांश्च भूतान् स्तिमितान् पाषण्डांश्चैव सर्वशः।धर्मकी विशेषरूपसे स्थापना और असुरोंका विनाश करनेके निमित्त नवें अवतारमें बुद्ध अवतीर्ण हुए। सुन्दर (सौन्दरानन्दके नायक) उनके सहचर रूपवाले थे। उनके नेत्र कमल-सरीखे थे। उनके पुरोहित महर्षि द्वैपायन थे। इसी युगकी समाप्तिके समय, जब संध्यामात्र अवशिष्ट रह जायगी, विष्णुयशके पुत्ररूपमें कल्कि का अवतार होगा। इसी भावी दसवें अवतारमें पराशर-पुत्र व्यास और याज्ञवल्क्य पुरोहितका कार्यभार सँभालेंगे। उस समय भगवान् कल्कि आयुधधारी सैकड़ों एवं सहस्रों विप्रोंको साथ लेकर चारों