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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१२१- कैलास पर्वतका वर्णन, गङ्गाकी सात धाराओंका वृत्तान्त तथा जम्बूद्वीपका विवरण

* अध्याय ११९ *४०१
तत्रास्ति चापरं शृङ्गं यत्र तोयघना घनाः।<br>नित्यमेवाभिवर्षन्ति शिलाभिः शिखरं वरम्॥ ७१<br>तदाश्रमं मनोहारि यत्र कामधरा धरा।<br>सुरमुख्योपयोगित्वाच्छाखिनां सफलाः फलाः॥ ७२<br>सदोपगीतभ्रमरसुरस्त्रीसेवितं परम्।<br>सर्वपापक्षयकरं शैलस्येव प्रहारकम्॥ ७३<br>वानरैः क्रीडमानैश्च देशाद् देशान् नराधिप।<br>हिमपुञ्जाः कृतास्तत्र चन्द्रबिम्बसमप्रभाः॥ ७४<br>तदाश्रमं समंताच्च हिमसंरुद्धकन्दरैः।<br>शैलवाटैः परिवृतमगम्यं मनुजैः सदा॥ ७५<br>पूर्वाराधितभावोऽसौ महाराजः पुरूरवाः।<br>तदाश्रमपदं प्राप्तो देवदेवप्रसादतः॥ ७६<br>तदाश्रमं श्रमशमनं मनोहरं<br>मनोहरैः कुसुमशतैरलङ्कृतम् ।<br>कृतं स्वयं रुचिरमथात्रिणा शुभं<br>शुभावहं तद् ददृशे स मद्रराट्॥ ७७करते हैं। वहीं एक दूसरा शिखर भी है, उस सुन्दर शिखरपर जलसे बोझिल हुए बादल बड़ी-बड़ी शिलाओंके साथ नित्य बरसते रहते हैं। जहाँ वह मनको लुभानेवाला आश्रम स्थित है, वहाँकी पृथ्वी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली है। प्रधान देवताओंके उपयोगमें आनेके कारण वहाँके वृक्षोंके फल भी सफलताको प्राप्त करते रहते हैं। वह श्रेष्ठ आश्रम सदा भ्रमरोंकी गुंजारसे गुंजायमान एवं देवाङ्गनाओंसे सुसेवित तथा उस पर्वतके प्रहरीकी तरह सम्पूर्ण पापोंका विनाशक था। नरेश्वर! एक स्थानसे दूसरे स्थानपर क्रीडा करते हुए बन्दरोंने वहाँकी बर्फराशिको चाँदनीके समान उज्ज्वल बना दिया था। वह आश्रम चारों ओरसे हिमाच्छादित कन्दराओं और कँकरीले-पथरीले मार्गोंसे घिरा हुआ था, इसलिये वह मनुष्योंके लिये सदा अगम्य था। पूर्वजन्मकी आराधनाके प्रभावसे युक्त महाराज पुरूरवा देवाधिदेव भगवान्‌की कृपासे उस आश्रमपर पहुँचे थे। वह आश्रम थकावटको दूर करनेवाला, मनोहर, मनोमोहक पुष्पोंसे अलंकृत, स्वयं महर्षिद्वारा सुन्दररूपमें निर्मित, मङ्गलमय एवं शुभकारक था, उसे मद्रराज पुरूरवाने देखा॥ ६४–७७॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशेऽत्र्याश्रमवर्णनं नामाष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें अत्रि-आश्रमवर्णन नामक एक सौ अठारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ११८ ॥


एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय

आश्रमस्थ विवरमें पुरूरवा* का प्रवेश, आश्रमकी शोभाका वर्णन तथा पुरूरवाकी तपस्या

सूत उवाच<br>तत्र यौ तौ महाशृङ्गौ महावर्णौ महाहिमौ।<br>तृतीयं तु तयोर्मध्ये शृङ्गमत्यन्तमुच्छ्रितम्॥ १<br>नित्यातपशिलाजालं सदाभ्रपरिवर्जितम्।<br>तस्याधस्ताद् वृक्षगणो दिशां भागे च पश्चिमे॥ २<br>जातीलतापरिक्षिप्तं विवरं चारुदर्शनम्।<br>दृष्ट्वैव कौतुकाविष्टस्तं विवेश महीपतिः॥ ३**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! वहाँ सदा हिमाच्छादित तथा रंग-बिरंगे जो दो महान् शिखर थे, उनके बीचमें एक तीसरा शिखर था, जो अत्यन्त ऊँचा था। वह बादलोंसे सदा शून्य रहता था, जिससे उसकी शिलाएँ नित्य सन्तप्त बनी रहती थीं। उस शिखरके नीचे पश्चिम दिशामें वृक्षोंके समूह शोभा पा रहे थे। उन्हींके बीचमें एक अत्यन्त सुन्दर विवर (छिद्र) था, जो मालतीकी लताओंसे आच्छादित था। उसे देखते ही राजा पुरूरवा आश्चर्यचकित हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने उस विवरमें

* इस पुराणमें—यजुर्वेद ५। २, ऋग्वेद १०। ९५, शतपथब्रा० ११। ५ आदिमें संकथित पुरूरवाके कथानकका सर्वाधिक विस्तारसे उपवृंहण हुआ है और कई बार उसकी पुनरुक्ति भी हुई है। इससे विक्रमोर्वशीयमें कालिदास एवं पार्जीटर आदि आधुनिक पाश्चात्त्य विद्वान् लेखक बहुत प्रभावित हुए हैं। निघण्टु ५। ४ तथा यास्क्रीय निरुक्त १०। ४६ एवं ऋग्वेद १०। ९५। २ के अनुसार ये सूर्य या मूल प्राणतत्त्व हैं। पाणि० ६। ३। १३७ के अनुसार यहाँ 'पुरू' में दीर्घ हुआ है।

४०२ * मत्स्यपुराण *

तमसा चातिनिबिडं नल्वमात्रं सुसंकटम्।<br>नल्वमात्रमतिक्रम्य स्वप्रभाभरणोज्ज्वलम्॥ ४<br>तमुच्छ्रितमथात्यन्तं गम्भीरं परिवर्तुलम्।<br>न तत्र सूर्यस्तपति न विराजति चन्द्रमाः॥ ५<br>तथापि दिवसाकारं प्रकाशं तदहर्निशम्।<br>क्रोशाधिकपरीमाणं सरसा च विराजितम्॥ ६<br>समंतात् सरसस्तस्य शैललग्ना तु वेदिका।<br>सौवर्णै राजतैर्वृक्षैर्विद्रुमैरुपशोभितम्॥ ७<br>नानामाणिक्यकुसुमैः सुप्रभाभरणोज्ज्वलैः।<br>तस्मिन् सरसि पद्मानि पद्मरागच्छदानि तु॥ ८<br>वज्रकेशरजालानि सुगन्धीनि तथा युतम्।<br>पत्रैर्मरकतैर्नीलैर्वैदूर्यस्य महीपते॥ ९<br>कर्णिकाश्च तथा तेषां जातरूपस्य पार्थिव।<br>तस्मिन् सरसि या भूमिः सा तु वज्रसमाकुला॥ १०<br>नानारत्नैरुपचिता जलजानां समाश्रया।<br>कपर्दिकानां शुक्तीनां शङ्खानां च महीपते॥ ११<br>मकराणां च मत्स्यानां चण्डानां कच्छपैः सह।<br>तत्र मरकतखण्डानि वज्राणां च सहस्त्रशः॥ १२<br>पद्मरागेन्द्रनीलानि महानीलानि पार्थिव।<br>पुष्परागानि सर्वाणि तथा कर्केतनानि च॥ १३<br>तुत्थकस्य तु खण्डानि तथा शेषस्य भागशः।<br>रा(ला)जावर्तस्य मुख्यस्य रुधिराक्षस्य चाप्यथ॥ १४<br>सूर्येन्दुकान्तयश्चैव नीलो वर्णान्तिकश्च यः।<br>ज्योतीरसस्य रम्यस्य स्यमन्तस्य च भागशः॥ १५<br>सुरोरगवलक्षाणां स्फटिकस्य तथैव च।<br>गोमेदपित्तकानां च धूलीमरकतस्य च॥ १६<br>वैदूर्यसौगन्धिकयोस्तथा राजमणेर्नृप।<br>वज्रस्यैव च मुख्यस्य तथा ब्रह्ममणेरपि॥ १७<br>मुक्ताफलानि मुक्तानां ताराविग्रहधारिणीम्॥ १८प्रवेश किया। वह मार्ग चार सौ हाथ (एक फर्लांग)-तक घने अन्धकारसे समावृत होनेके कारण अत्यन्त संकटमय था। उस चार सौ हाथकी दूरी पार कर लेनेपर राजा ऐसे स्थानपर पहुँचे, जो अपनी कान्तिसे ही उद्भासित हो रहा था। वह स्थान ऊँचा, अत्यन्त गम्भीर और गोलाकार था तथा एक कोसके विस्तारवाला था। यद्यपि वहाँ न सूर्य तपते थे न चन्द्रमा ही विराजमान थे, तथापि वह दिनकी भाँति रात-दिन प्रकाशयुक्त बना रहता था। वहाँ एक सरोवर भी था। जो सुवर्ण, चाँदी और मूँगेके समान रंग-बिरंगे वृक्षोंसे सुशोभित था। उन वृक्षोंमें नाना प्रकारके मणियोंके सदृश परमोत्कृष्ट कान्तिसे युक्त फूल खिले हुए थे। उस सरोवरके चारों ओर शिलाओंकी वेदी बनी हुई थी, भूपाल! उस सरोवरमें विभिन्न प्रकारके कमल खिले हुए थे, जिनके पुष्पदल पद्मरागमणि-सरीखे, केसर-समूह हीरेके-से और पत्ते नीले वैदूर्य मणिके समान चमक रहे थे और वे सुगन्धसे भरे हुए थे। उनकी कर्णिका (छत्ता) सुवर्णके समान चमकीली थी॥ १-९ $\frac{१}{२}$॥<br><br>उस सरोवरमें जो भूमि थी, वह हीरेसे आच्छादित थी, साथ ही वह नाना प्रकारके दूसरे रत्नोंसे भी मण्डित थी। महीपाल! वहाँ जलमें उत्पन्न होनेवाली कौड़ी, सीपी और शङ्ख भी वर्तमान थे। वह कछुओंके साथ-साथ भयानक घड़ियालों और मछलियोंका वासस्थान था। राजन्! उसमें कहीं मरकतमणि तथा हीरेके हजारों टुकड़े पड़े थे। कहीं पद्मराग (माणिक्य या लाल), इन्द्रनील (नीलम), महानील, पुष्पराग (पुखराज), कर्केतन, तुत्थक तथा शेष मणियोंके खण्ड चमक रहे थे। कहीं लाजावर्त, मुख्य, रुधिराक्ष, सूर्यकान्त, चन्द्रकान्त, नीलवर्णान्तिक, ज्योतीरस, रम्य एवं स्यमन्तक मणियोंके टुकड़े यत्र-तत्र बिखरे पड़े थे। कहीं सुरमणि, सर्पमणि, वलक्षमणि और स्फटिकमणिकी चट्टानें चमक रही थीं, तो कहीं गोमेद, पित्तक, धूलीमणि, मरकत, वैदूर्य, सौगन्धिक, राजमणि, हीरा, मुख्य तथा ब्रह्ममणिके खण्ड दृष्टिगोचर हो रहे थे। कहीं-कहीं बिखरे हुए मोती* अपनी प्रभा फैला रहे थे, जो ताराओंके समान लग रहे थे।

* यहाँ श्लोक ८ से लेकर १९ तकके-बारह श्लोकोंमें-३२ मुख्य मणियोंके उल्लेखपूर्वक सम्पूर्ण रत्नशास्त्रका संक्षेपमें निरूपण हुआ है। गरुडपुराण ६८-७८, विष्णुधर्मो० २। १५, युक्तिकल्पतरु, बृहत्संहिता, रत्नसारमें इनका विस्तृत परिचय है।

* अध्याय १११ *

४०३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सुखोष्णं चैव तत् तोयं स्नानाच्छीतविनाशनम्।<br>वैदूर्यस्य शिला मध्ये सरसस्तस्य शोभना ॥ १९<br><br>प्रमाणेन तथा सा च द्वे च राजन् धनुःशते।<br>चतुरस्रा तथा रम्या तपसा निर्मितात्रिणा ॥ २०<br><br>बिलद्वारसमो देशो यत्र यत्र हिरण्मयः।<br>प्रदेशः स तु राजेन्द्र द्वीपे तस्मिन् मनोहरे ॥ २१उस सरोवरका जल कुछ गुनगुना गरम था, जो स्नान करनेसे ठण्डकको दूर कर देता था। उस सरोवरके मध्यमें वैदूर्यमणिकी एक सुन्दर शिला थी। राजन्! उस रमणीय शिलाको महर्षि अत्रिने अपनी तपस्याके प्रभावसे निर्मित किया था। वह आठ सौ हाथ (दो फर्लांग) विस्तृत एवं चौकोर थी। राजेन्द्र! उस मनोहर द्वीपमें सारा प्रदेश बिलद्वारके समान स्वर्णमय था॥१०—२१॥
तथा पुष्करिणी रम्या तस्मिन् राजञ्शिलातले।<br>सुशीतामलपानीया जलजैश्च विराजिता ॥ २२<br><br>आकाशप्रतिमा राजंश्चतुरस्रा मनोहरा।<br>तस्यास्तदुदकं स्वादु लघु शीतं सुगन्धिकम् ॥ २३<br><br>न क्षिणोति यथा कण्ठं कुक्षिं नापूरयत्यपि।<br>तृप्तिं विधत्ते परमां शरीरे च महत् सुखम् ॥ २४<br><br>मध्ये तु तस्याः प्रासादं निर्मितं तपसात्रिणा।<br>रुक्मसेतुप्रवेशान्तं सर्वरत्नमयं शुभम् ॥ २५<br><br>शशाङ्करश्मेः संकाशं प्रासादं रजतं हितम्।<br>रम्यवैदूर्यसोपानं विद्रुमामलसारकम् ॥ २६<br><br>इन्द्रनीलमहास्तम्भं मरकतासक्तवेदिकम्।<br>वज्रांशुजालैः स्फुरितं रम्यं दृष्टिमनोंरमम् ॥ २७<br><br>प्रासादे तत्र भगवान् देवदेवो जनार्दनः।<br>भोगिभोगावलीसुप्तः सर्वालङ्कारभूषितः ॥ २८<br><br>जान्वाच्य कुञ्चितस्त्वेको देवदेवस्य चक्रिणः।<br>फणीन्द्रसंनिविष्टोऽङ्घ्रिर्द्वितीयश्च तथानघ ॥ २९<br><br>लक्ष्म्युत्सङ्गतोऽङ्घ्रिस्तु शेषभोगप्रशायिनः।<br>फणीन्द्रभोगसंन्यस्तबाहुः केयूरभूषणः ॥ ३०राजन्! उस शिलातलपर एक रमणीय पुष्करिणी (पोखरी) थी, जो चौकोर, मनोमोहिनी तथा आकाशके समान निर्मल थी। वह अत्यन्त शीतल एवं निर्मल जलसे परिपूर्ण तथा कमलोंसे सुशोभित थी। उसका वह जल सुस्वादु, पचनेमें हलका, शीतल और सुगन्धयुक्त था। वह जैसे गलेको कष्ट नहीं पहुँचाता था, उसी प्रकार कुक्षिको भी वायुसे परिपूर्ण नहीं करता था, अर्थात् वायुविकार नहीं उत्पन्न करता था, अपितु शरीरमें पहुँचकर परम तृप्ति उत्पन्न करता तथा महान् सुख पहुँचाता था। उस पुष्करिणी (बावली)-के मध्यभागमें महर्षि अत्रिने अपनी तपस्याके बलसे एक महलका निर्माण किया था। वह सुन्दर प्रासाद चाँदीका बना हुआ था, जो चन्द्रमाकी किरणोंके समान चमक रहा था। उसमें सभी प्रकारके रत्न जड़े गये थे तथा भीतर प्रवेश करनेके लिये सोनेकी सीढ़ियाँ बनी थीं, जिनमें रमणीय वैदूर्य एवं निर्मल मूँगे लगे हुए थे। उसमें इन्द्रनील मणिके विशाल खम्भे लगे थे। उसकी वेदिका अर्थात् फर्शपर मरकतमणि जड़ी हुई थी। हीरेकी किरणोंसे चमचमाता हुआ वह रमणीय महल देखते ही मनको लुभा लेता था। उस महलमें देवाधिदेव भगवान् जनार्दन (मूर्ति-रूपसे) सम्पूर्ण आभूषणोंसे विभूषित होकर शेषनागके फणोंपर शयन कर रहे थे। अनघ! देवाधिदेव चक्रधारी भगवान्‌का एक चरण घुटनेसे मुड़ा हुआ था और दूसरा चरण शेषनागके ऊपरसे होता हुआ लक्ष्मीकी गोदमें स्थित था। शेषनागके फणोंपर शयन करनेवाले भगवान्‌का बाजूबंदसे विभूषित एक हाथ शेषनागके फणोंपर स्थापित था ॥२२—३०॥
अङ्गुलीपष्ठविन्यस्तदेवशीर्षधरं भुजम्।<br>एकं वै देवदेवस्य द्वितीयं तु प्रसारितम् ॥ ३१उस हाथकी अङ्गुलियोंका पृष्ठभाग शेषके सिरपर रखा हुआ था। उनका दूसरा हाथ फैला हुआ था।
४०४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
समाकुञ्चितजानुस्थमणिबन्धेन शोभितम्।<br>किञ्चिदाकुञ्चितं चैव नाभिदेशकरस्थितम्॥ ३२<br><br>तृतीयं तु भुजं तस्य चतुर्थं तु तथा शृणु।<br>आत्तसंतानकुसुमं घ्राणदेशानुसर्पिणम्॥ ३३<br><br>लक्ष्म्या संवाह्यमानाङ्घ्रिः पद्मपत्रनिभैः करैः।<br>संतानमालामुकुटं हारकेयूरभूषितम्॥ ३४<br><br>भूषितं च तथा देवमङ्गदैरङ्गुलीयकैः।<br>फणीन्द्रफणविन्यस्तचारुरत्नशिखोज्ज्वलम्॥ ३५<br><br>अज्ञातवस्तुचरितं प्रतिष्ठितमथात्रिणा।<br>सिद्धानुपूर्व्यं सततं संतानकुसुमार्चितम्॥ ३६<br><br>दिव्यगन्धानुलिप्ताङ्गं दिव्यधूपेन धूपितम्।<br>सुरसैः सुफलैर्हृद्यैः सिद्धैरुपहृतैः सदा॥ ३७<br><br>शोभितोत्तमपार्श्वं तं देवमुत्पलशीर्षकम्।तीसरे हाथका मणिबन्ध मुड़े हुए घुटनेपर सुशोभित था तथा कुछ मुड़कर नाभिदेशपर फैले हुए पहले हाथपर अवलम्बित था। अब उनके चौथे हाथकी दशा सुनो। चौथे हाथमें भगवान् कल्पवृक्षका पुष्प धारण किये हुए थे और उसे अपनी नासिकातक ले गये थे। उस समय लक्ष्मी अपने कमल-दलके समान कोमल हाथोंसे भगवान्‌का चरण दबा रही थीं। भगवान्‌के मस्तकपर कल्पवृक्षके पुष्पोंकी मालाओंका मुकुट शोभा दे रहा था। वे हार, केयूर, बाजूबंद और अँगूठीसे विभूषित तथा शेषनागके फणोंपर रखे हुए सुन्दर रत्नोंसे प्रकाशित हो रहे थे। एवं इनकी विशेषता यह थी कि महर्षि अत्रिने उनकी स्थापना की थी। उनका चरित्र वस्तुतः जाना नहीं जा सकता। सिद्धगण सदा उनकी पूजा करते थे। कल्पवृक्षके पुष्पोंद्वारा उनकी अर्चना होती थी। उनके अङ्गोंमें दिव्य चन्दनका अनुलेप था तथा वे दिव्य धूपसे धूपित थे। सिद्धगण उन्हें सदा सरस एवं मनोहर फलोंका उपहार देते थे। वे उत्तम पार्श्वसे सुशोभित थे तथा उनके मस्तकपर कमल शोभा पा रहा था॥ ३१-३७ १/२ ॥
ततः सम्मुखमुद्वीक्ष्य ववन्दे स नराधिपः॥ ३८<br><br>जानुभ्यां शिरसा चैव गत्वा भूमिं यथाविधि।<br>नाम्नां सहस्रेण तथा तुष्टाव मधुसूदनम्॥ ३९<br><br>प्रदक्षिणमथो चक्रे स तूत्थाय पुनः पुनः।<br>रम्यमायतनं दृष्ट्वा तत्रोवासाश्रमे पुनः॥ ४०<br><br>बिलाद् बहिर्गुहां काञ्चिदाश्रित्य सुमनोहराम्।<br>तपश्चकार तत्रैव पूजयन् मधुसूदनम्॥ ४१<br><br>नानाविधैस्तथा पुष्पैः फलमूलैः सगोरसैः।<br>नित्यं त्रिषवणस्नायी वह्निपूजापरायणः॥ ४२<br><br>देववापीजलैः कुर्वन् सततं प्राणधारणम्।<br>सर्वाहारपरित्यागं कृत्वा तु मनुजेश्वरः॥ ४३<br><br>अनास्तृतगुहाशायी कालं नयति पार्थिवः।<br>त्यक्ताहारक्रियश्चैव केवलं तोयतो नृपः।<br>न तस्य ग्लानिमायाति शरीरं च तदद्भुतम्॥ ४४ऐसे भगवान् (-की मूर्ति)-को अपने सम्मुख देखकर राजा पुरूरवाने विधिपूर्वक घुटने टेककर और मस्तकको भूमिपर रखकर भगवान्‌को प्रणाम किया तथा सहस्रनामोंद्वारा उन मधुसूदनका स्तवन किया और उठकर बारम्बार उनकी प्रदक्षिणा की। पुनः उस रमणीय देवमन्दिरको देखकर उसी आश्रममें निवास करनेका निश्चय किया। तत्पश्चात् उस बिलसे बाहर निकलकर वे किसी अतिशय मनोहारिणी गुफाका आश्रय लेकर नाना प्रकारके पुष्पों, फलों, मूलों तथा गोरसोंद्वारा भगवान् मधुसूदनकी पूजा करते हुए वहीं तपस्यामें संलग्न हो गये। वे नित्य त्रिकाल स्नान तथा अग्निहोत्र करते थे। वे नरेश सभी प्रकारके आहारका परित्याग कर सदा उस देववापी (पोखरी)-के जलसे ही प्राणोंकी रक्षा करते थे। राजा बिना बिछौनेके ही गुफामें शयन करते हुए समय बिता रहे थे। यद्यपि राजाने भोजन करना छोड़ दिया था और केवल जलपर ही निर्भर थे, तथापि उन्हें किसी प्रकारकी ग्लानि नहीं होती थी, प्रत्युत उनका शरीर अद्भुत तेजोमय हो गया
* अध्याय १२० *४०५

| एवं स राजा तपसि प्रसक्तः<br>सम्पूजयन् देववरं सदैव।<br>तत्राश्रमे कालमुवास कञ्चित्<br>स्वर्गोपमे दुःखमविन्दमानः॥ ४५॥ | था। इस प्रकार राजा पुरूरवाने तपस्यामें दत्तचित्त होकर सदा देवश्रेष्ठ भगवान् विष्णुकी पूजा करते हुए दुःखकी कुछ भी परवा न कर उस स्वर्गतुल्य आश्रममें कुछ कालतक निवास किया॥ ३८–४५॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे आयतनवर्णनं नामैकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ ११९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णनमें आयतनवर्णन नामक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११९॥


एक सौ बीसवाँ* अध्याय

राजा पुरूरवाकी तपस्या, गन्धर्वों और अप्सराओंकी क्रीडा, महर्षि अत्रिका आगमन तथा राजाको वरप्राप्ति

| सूत उवाच<br><br>स त्वाश्रमपदे रम्ये त्यक्ताहारपरिच्छदः।<br>क्रीडाविहारं गन्धर्वैः पश्यत्यप्सरसां सह॥ १<br><br>कृत्वा पुष्पोच्चयं भूरि ग्रथयित्वा तथा स्रजः।<br>अर्घ्यं निवेद्य देवाय गन्धर्वेभ्यस्तदा ददौ॥ २<br><br>पुष्पोच्चयप्रसक्तानां क्रीडन्तीनां यथासुखम्।<br>चेष्टा नानाविधाकाराः पश्यन्नपि न पश्यति॥ ३<br><br>काचित् पुष्पोच्चये सक्ता लताजालेन वेष्टिता।<br>सखीजनेन संत्यक्ता कान्तेनाभिसमुज्झिता॥ ४<br><br>काचित् कमलगन्धाभा निःश्वासपवनाहतैः।<br>मधुपैराकुलमुखी कान्तेन परिमोचिता॥ ५<br><br>मकरन्दसमाक्रान्तनयना काचिदङ्गना।<br>कान्तनिःश्वासवातेन नीरजस्ककृतेक्षणा॥ ६<br><br>काचिदुच्चीय पुष्पाणि ददौ कान्तस्य भामिनी।<br>कान्तसंग्रथितैः पुष्पै रराज कृतशेखरा॥ ७ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इस प्रकार राजकीय सामग्रियों तथा आहारका परित्याग कर राजा पुरूरवा उस रमणीय आश्रममें निवास करने लगे। वहाँ उन्हें गन्धर्वोंके साथ अप्सराओंका क्रीडाविहार भी देखनेको मिलता था। राजा बहुत-से फूलोंको तोड़कर उसकी माला गूँथते थे और उन्हें अर्घ्यसहित पहले भगवान् विष्णुको निवेदित कर पुनः गन्धर्वोंको दे देते थे। वे वहाँ पुष्प-चयनमें लगी हुई एवं सुखपूर्वक क्रीडा करती हुई अप्सराओंकी विभिन्न प्रकारकी चेष्टाओंको देखकर भी अनदेखी कर जाते थे। वहाँ पुष्प-चयनमें निरत कोई अप्सरा लता-समूहमें उलझ गयी और सखियाँ उसे उसी दशामें छोड़कर चलती बनीं, तब उसके पतिने आकर उसे बन्धन-मुक्त किया। किसी अप्सराके शरीरसे कमलकी-सी गन्ध निकल रही थी। इस कारण उसकी निःश्वासवायुसे आकृष्ट होकर भ्रमर उसके ऊपर मँडरा रहे थे। उन भ्रमरोंसे उसका मुख ढक-सा गया था; तब उसके पतिने उसे उस कष्टसे मुक्त किया। किसी अप्सराकी आँखें पुष्प-रजसे आक्रान्त हो गयीं, तब उसके पतिने अपनी श्वासवायुसे फूँककर उन्हें धूलरहित कर दिया। किसी सुन्दरीने पुष्पोंको एकत्रकर अपने पतिको दे दिया। तत्पश्चात् वह अपने पतिद्वारा गूँथी गयी पुष्पमालाको अपने मस्तकपर रखकर सुशोभित |


* इस अध्यायके अनेक शब्दालंकारोंसे उद्दीपित अधिकांश श्लोक भागवत १०। ३३ से मिलते हैं। कोई एक-दूसरेसे अवश्य प्रभावित है। वैसे इस प्रकारका वर्णन गर्गसंहिता, ब्रह्मवैवर्तपुराणके रासप्रकरणोंमें तथा भागवतके रामनारायणकृत भावविभाविक तथा किशोरीदासकृता विशुद्धरसदीपिकामें इनकी भी पूरी व्याख्या है।

४०६* मत्स्यपुराण *
संस्कृतहिन्दी
उच्चीय स्वयमुद्ग्रथ्य कान्तेन कृतशेखरा।<br>कृतकृत्यमिवात्मानं मेने मन्मथवर्धिनी ॥ ८होने लगी। तभी किसीके पतिने पुष्प-चयन करके अपने ही हाथों माला गूँथकर उसे अपनी पत्नीके मस्तकपर रखकर उसे सुसज्जित कर दिया, इससे उसने अपनेको कृतकृत्य मान लिया॥१—८॥
अस्त्यस्मिन् गहने कुञ्जे विशिष्टकुसुमा लता।<br>काचिदेवं रहो नीता रमणेन रिरंसुना ॥ ९कोई पतिद्वारा झुकायी गयी लतासे फूल तोड़ रही
कान्तसंनामितलता कुसुमानि विचिन्वती।<br>सर्वाभ्यः काचिदात्मानं मेने सर्वगुणाधिकम् ॥ १०थी, जिससे वह अपनेको सभी सखियोंसे सम्पूर्ण गुणोंमें बढ़-चढ़कर मान रही थी। कुछ सुन्दरी देवाङ्गनाएँ
काश्चित् पश्यन्ति भूपालं नलिनीषु पृथक् पृथक्।<br>क्रीडमानास्तु गन्धर्वैर्देवरामा मनोरमाः ॥ ११गन्धर्वोंके साथ पृथक्-पृथक् क्रीडा करती हुई कमलसमूहोंके बीचसे राजाकी ओर देख रही थीं। कोई
काचिदाताडयत् कान्तमुदकेन शुचिस्मिता।<br>ताड्यमानाथ कान्तेन प्रीतिं काचिदुपाययौ ॥ १२सुन्दरी अपने पतिके ऊपर जल उछाल रही थी और किसीके ऊपर उसका पति जल फेंक रहा था, जिससे
कान्तं च ताडयामास जातखेदा वराङ्गना।<br>अदृश्यत वरारोहा श्वासनृत्यत्पयोधरा ॥ १३उसे बड़ी प्रसन्नता हो रही थी। कोई देवाङ्गना खिन्न मनसे अपने पतिके ऊपर जल उछाल रही थी। पतिके
कान्ताम्बुताडनाकृष्टकेशपाशनिबन्धना ।<br>केशाकुलमुखी भाति मधुपैरिव पद्मिनी ॥ १४ऊपर जल फेंकनेसे किसीकी चोटी खुल गयी थी, जिससे उसका मुख बालोंसे ढक गया था। उस समय
स्वचक्षुःसदृशैः पुष्पैः संच्छन्ने नलिनीवने।<br>छन्ना काचिच्चिरात् प्राप्ता कान्तेनान्विष्य यत्नतः ॥ १५वह ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो भ्रमरोंसे घिरी हुई कमलिनी हो। कोई अपने नेत्रोंके समान कमल-
स्नाता शीतापदेशेन काचित् प्राहाङ्गना भृशम्।<br>रमणालिङ्गनं चक्रे मनोऽभिलषितं चिरम् ॥ १६पुष्पोंसे ढके हुए उस कमलिनीके वनमें छिप गयी थी, जिसे उसके पतिने बड़ी देरके बाद प्रयत्नपूर्वक खोजकर
जलार्द्रवसनं सूक्ष्ममङ्गलीनां शुचिस्मिता।<br>धारयन्ती जनं चक्रे काचित् तत्र समन्मथम् ॥ १७प्राप्त किया। किसीको उसका पति गलेमें पड़ी हुई मालाके
कण्ठमाल्यगुणैः काचित् कान्तेन कृष्यताम्भसि।<br>त्रुट्यत्स्त्रग्दामपतितं रमणं प्राहसच्चिरम् ॥ १८धागेको पकड़कर जलमें खींच रहा था, किंतु उस धागेके टूट
काचिद्दुग्ना सखीदत्तजानुदेशे नखक्षता।<br>सम्भ्रान्ता कान्तशरणं मग्ना काचिद् गता चिरम् ॥ १९
काचित् पृष्ठकृतादित्या केशनिस्तोयकारिणी।<br>शिलातलगता भर्त्रा दृष्टा कामार्तचक्षुषा ॥ २०
कृत्तमाल्यं विलुलितं संक्रान्तकुचकुङ्कुमम्।<br>रतिक्रीडितकान्तेव रराज तत् सरोदकम् ॥ २१
सुस्रातदेवगंधर्वदेवरामागणेन च।<br>पूज्यमानं च ददृशे देवदेवं जनार्दनम् ॥ २२