मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१७९- शिवजीके साथ अन्धकासुरका युद्ध, शिवजीद्वारा मातृकाओंकी सृष्टि, शिवजीके हाथों अन्धककी मृत्यु और उसे गणेशत्वकी प्राप्ति, मातृकाओंकी विध्वंसलीला तथा विष्णुनिर्मित देवियोंद्वारा उनका अवरोध
| ७३० | * मत्स्यपुराण * |
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| अस्त्रैरन्ये विनिर्भिन्ना वेमू रक्तं हता युधि॥ ३४<br><br>क्षरजलानां सदृशा जलदानां समागमे।<br>तैरस्त्रशस्त्रग्रथितं क्षिप्तोत्क्षिप्तगदाविलम्॥ ३५<br><br>देवदानवसंक्षुब्धं संकुलं युद्धमाबभौ।<br>तद्दानवमहामेघं देवायुधविराजितम्॥ ३६<br><br>अन्योन्यबाणवर्षेण युद्धदुर्दिनमाबभौ।<br>एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धः कालनेमी स दानवः॥ ३७<br><br>व्यवधर्त समुद्रौघैः पूर्यमाण इवाम्बुदः।<br>तस्य विद्युच्चलापीडैः प्रदीप्ताशनिवर्षिणः॥ ३८<br><br>गात्रैर्नागगिरिप्रख्या विनिपेतुर्बलाहकाः।<br>क्रोधान्निःश्वसतस्तस्य भ्रूभेदस्वेदवर्षिणः॥ ३९<br><br>साग्निस्र्फुलिङ्गप्रतता मुखान्निष्पेतुरर्चिषः।<br>तिर्यगूर्ध्वं च गगने ववृधुस्तस्य बाहवः॥ ४०<br><br>पर्वतादिव निष्क्रान्ताः पञ्चास्या इव पन्नगाः।<br>सोऽस्त्रजालैर्बहुविधैर्धनुर्भिः परिघैरपि॥ ४१<br><br>दिव्यमाकाशमावव्रे पर्वतैरुच्छ्रितैरिव।<br>सोऽनिलोद्धूतवसनस्तस्थौ संग्रामलालसः॥ ४२<br><br>संध्यातपग्रस्तशिलः साक्षान्मेरुरिवाचलः।<br>ऊरुवेगप्रमथितैः शैलशृङ्गाग्रपादपैः॥ ४३<br><br>अपातयद् देवगणान् वज्रेणेव महागिरीन्। | इसी प्रकार अन्य वीर युद्धस्थलमें अस्त्रोंद्वारा घायल होकर रक्त वमन करते हुए जलकी वृष्टि करनेवाले बादलोंकी तरह प्रतीत हो रहे थे। उस समय वह युद्ध अस्त्रों एवं शस्त्रोंसे परिपूर्ण, फेंकी गयी एवं फेंकनेके लिये उठायी हुई गदाओंसे युक्त और देवताओं एवं दानवोंसे व्याप्त और संक्षुब्ध होकर शोभा पा रहा था। दानवरूपी महामेघसे युक्त और देवताओंके हथियारोंसे विभूषित वह युद्ध परस्परकी बाणवर्षामे मेघाच्छन्न दुर्दिन-सा लग रहा था। इसी बीच क्रोधसे भरा हुआ कालनेमि नामक दानव रणभूमिमें आगे बढ़ा। वह समुद्रकी लहरोंसे पूर्ण होते हुए बादलकी तरह शोभा पा रहा था। प्रज्वलित वज्रोंकी वर्षा करनेवाले उस दानवके बिजलीके समान चञ्चल मस्तकोंसे युक्त शरीरावयवोंसे टकराकर हाथी और पर्वत-सदृश विशाल बादल तितर-बितर होकर बिखर रहे थे। क्रोधवश निःश्वास लेते हुए उसकी टेढ़ी भौंहोंसे पसीनेकी बूँदें टपक रही थीं और मुखसे अग्निकी चिनगारियोंसे व्याप्त लपटें निकल रही थीं। उसकी भुजाएँ आकाशमें तिरछी होकर ऊपरकी ओर बढ़ रही थीं, जो पर्वतसे निकले हुए पाँच मुखवाले नागकी तरह लग रही थीं। उसने ऊँचे-ऊँचे पर्वतों-सरीखे अनेक प्रकारके अस्त्रसमूहों, धनुषों और परिघोंसे दिव्य आकाशको आच्छादित कर दिया। वायुद्वारा उड़ाये जाते हुए वस्त्रोंवाला वह दानव संग्रामकी लालसासे डटकर खड़ा हुआ। उस समय वह संध्याकालीन धूपसे ग्रस्त हुई शिलासे युक्त साक्षात् मेरुपर्वतकी तरह दीख रहा था। उसने अपनी जंघाओंके वेगसे उखाड़े गये पर्वतशिखरके अग्रवर्ती वृक्षोंके प्रहारसे देवगणोंको उसी प्रकार धराशायी कर दिया, जैसे वज्रके आघातसे विशाल पर्वत ढाह दिये गये थे॥ ३४-४३ १/२ ॥ |
| बहुभिः शस्त्रनिस्त्रिंशैश्छिन्नभिन्नशिरोरुहाः॥ ४४<br><br>न शेकुश्चलितुं देवाः कालनेमिहता युधि।<br>मुष्टिभिर्निहताः केचित् केचित् तु विदलीकृताः॥ ४५<br><br>यक्षगन्धर्वपतयः पेतुः सह महोरगैः।<br>तेन वित्रासिता देवाः समरे कालनेमिना॥ ४६ | इस प्रकार रणभूमिमें कालनेमिद्वारा आहत हुए देवगण चलने-फिरनेमें भी असमर्थ हो गये। बहुत-से शस्त्रों तथा खड्गोंकी चोटसे कुछ लोगोंके सिरके बालतक छिन्न-भिन्न हो गये थे। कुछ मुक्कोंकी मारसे मार डाले गये और कुछके टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये। यक्षों और गन्धर्वोंके नायक बड़े-बड़े नागोंके साथ पृथ्वीकी गोदमें पड़ गये। समरभूमिमें उस कालनेमिद्वारा भयभीत किये गये देवगण |
| * अध्याय १७७ * | ७३१ |
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| न शेकुर्यत्नवन्तोऽपि यत्नं कर्तुं विचेतसः।<br>तेन शक्रः सहस्राक्षः स्पन्दितः शरबन्धनैः॥ ४७<br>ऐरावतगतः संख्ये चलितुं न शशाक ह।<br>निर्जलाम्भोदसदृशो निर्जलार्णवसप्रभः॥ ४८<br>निर्व्यापारः कृतस्तेन विपाशो वरुणो मृधे।<br>रणे वैश्रवणस्तेन परिघैः कामरूपिणा॥ ४९<br>वित्तदोऽपि कृतः संख्ये निर्जितः कालनेमिना।<br>यमः सर्वहरस्तेन मृत्युप्रहरणे रणे॥ ५०<br>याम्यामवस्थां संत्यज्य भीतः स्वां दिशमाविशत्।<br>स लोकपालानुत्सार्य कृत्वा तेषां च कर्म तत्॥ ५१<br>दिक्षु सर्वासु देहं स्वं चतुर्धा विदधे तदा।<br>स नक्षत्रपथं गत्वा दिव्यं स्वर्भानुदर्शनम्॥ ५२<br>जहार लक्ष्मीं सोमस्य तं चास्य विषयं महत्। | प्रयत्न करनेके लिये उद्यत होनेपर भी कोई उपाय न कर सके; क्योंकि उनका मन भ्रमित हो उठा था। उसने सहस्र नेत्रधारी इन्द्रको भी बाणोंके बन्धनसे इस प्रकार जकड़ दिया था कि वे युद्धस्थलमें ऐरावतपर बैठे हुए भी चलनेमें समर्थ न हो सके। उसने समर-भूमिमें वरुणको जलहीन बादल और निर्जल महासागरकी भाँति कान्तिहीन, व्यापाररहित और पाशसे शून्य कर दिया। स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उस दानवने रणभूमिमें परिघोंकी मारसे वैश्रवण कुबेरको भी जीत लिया। मृत्यु-सदृश प्रहार होनेवाले उस युद्धमें कालनेमिने सबके प्राणहर्ता यमको पराजित कर दिया। वे डरकर युद्धका परित्याग कर अपनी दक्षिण दिशाकी ओर चले गये। इस प्रकार उसने चारों लोकपालोंको पराजित कर दिया और अपने शरीरको चार भागोंमें विभक्त कर वह सभी दिशाओंमें उनका कार्य स्वयं सँभालने लगा। फिर जहाँ ग्रहणके समय राहुका दर्शन होता है, उस दिव्य नक्षत्रमार्गमें जाकर चन्द्रमाकी लक्ष्मी तथा उनके विशाल साम्राज्यका अपहरण कर लिया॥ ४४—५२ १/२ ॥ |
| चालयामास दीप्तांशुं स्वर्गद्वारात् सभास्करम्॥ ५३<br>सायनं चास्य विषयं जहार दिनकर्म च।<br>सोऽग्निं देवमुखं दृष्ट्वा चकारात्ममुखाश्रयम्॥ ५४<br>वायुं च तरसा जित्वा चकारात्मवशानुगम्।<br>स समुद्रान् समानीय सर्वांश्च सरितो बलात्॥ ५५<br>चकारात्ममुखे वीर्याद् देहभूताश्च सिन्धवः।<br>अपः स्ववशगाः कृत्वा दिविजा याश्च भूमिजाः॥ ५६<br>स स्वयम्भूरिवाभाति महाभूतपतिर्यथा।<br>सर्वलोकमयो दैत्यः सर्वभूतभयावहः॥ ५७<br>स लोकपालैकवपुश्चन्द्रादित्यग्रहात्मवान्।<br>स्थापयामास जगतीं सुगुप्तां धरणीधरैः॥ ५८<br>पावकानिलसम्पातो रराज युधि दानवः।<br>पारमेष्ठ्ये स्थितः स्थाने लोकानां प्रभवोपमे।<br>तं तुष्टुवुर्दैत्यगणा देवा इव पितामहम्॥ ५९ | उसने प्रदीप्त किरणोंवाले सूर्यको स्वर्गद्वारसे खदेड़ दिया और उनके सायन नामक साम्राज्य और दिनकी सृष्टि करनेकी शक्तिको छीन लिया। उसने देवताओंके मुखस्वरूप अग्निको सम्मुख देखकर उन्हें अपने मुखमें निगल लिया तथा वायुको वेगपूर्वक जीतकर उन्हें अपना वशवर्ती बना लिया। उसने अपने पराक्रमसे बलपूर्वक समुद्रोंको वशमें करके सभी नदियोंको अपने मुखमें डाल लिया और सागरोंको शरीरका अङ्ग बना लिया। इस प्रकार स्वर्ग अथवा भूतलपर जितने जल थे, उन सबको उसने अपने अधीन कर लिया। उस समय समस्त प्राणियोंको भयभीत करनेवाला वह दैत्य सम्पूर्ण लोकोंसे युक्त होकर महाभूतपति ब्रह्माकी तरह सुशोभित हो रहा था। सम्पूर्ण लोकपालोंके एकमात्र मूर्तस्वरूप तथा चन्द्र, सूर्य आदि ग्रहोंसे युक्त उस दानवने पर्वतोंद्वारा सुरक्षित पृथ्वीको स्थापित किया। इस प्रकार अग्नि और वायुके समान वेगशाली दानवराज कालनेमि युद्धस्थलमें लोकोंकी उत्पत्तिके स्थानभूत ब्रह्माके पदपर स्थित होकर शोभा पा रहा था। उस समय दैत्यगण उसकी उसी प्रकार स्तुति कर रहे थे, जैसे देवगण ब्रह्माकी किया करते हैं॥ ५३—५९॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकामययुद्धं नाम सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तारकामय-युद्ध नामक एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७७॥
७३२ * मत्स्यपुराण *
एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय
कालनेमि और भगवान् विष्णुका रोषपूर्वक वार्तालाप और भीषण युद्ध, विष्णुके चक्रके द्वारा कालनेमिका वध और देवताओंको पुनः निज पदकी प्राप्ति
| मत्स्य उवाच | |
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| पञ्च तं नाभ्यवर्तन्त विपरीतेन कर्मणा।<br>वेदो धर्मः क्षमा सत्यं श्रीश्च नारायणाश्रया॥ १<br><br>स तेषामनुपस्थानात् सक्रोधो दानवेश्वरः।<br>वैष्णवं पदमन्विच्छन् ययौ नारायणान्तिकम्॥ २<br><br>स ददर्श सुपर्णस्थं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>दानवानां विनाशाय भ्रामयन्तं गदां शुभाम्॥ ३<br><br>सजलाम्भोधसदृशं विद्युत्सदृशवाससम्।<br>स्वारूढं स्वर्णपक्षाढ्यं शिखिनं काश्यपं खगम्॥ ४<br><br>दृष्ट्वा दैत्यविनाशाय रणे स्वस्थमवस्थितम्।<br>दानवो विष्णुमक्षोभ्यं बभाषे क्षुब्धमानसः॥ ५<br><br>अयं स रिपुरस्माकं पूर्वेषां प्राणनाशनः।<br>अर्णवावासिनश्चैव मधोर्वै कैटभस्य च॥ ६<br><br>अयं स विग्रहोऽस्माकमशाम्यः किल कथ्यते।<br>अनेन संयुगेष्वद्य दानवा बहवो हताः॥ ७<br><br>अयं स निर्घृणो लोके स्त्रीबालनिरपत्रपः।<br>येन दानवनारीणां सीमन्तोद्धरणं कृतम्॥ ८<br><br>अयं स विष्णुर्देवानां वैकुण्ठश्च दिवौकसाम्।<br>अनन्तो भोगिनामप्सु स्वपन्नाद्यः स्वयम्भुवः॥ ९<br><br>अयं स नाथो देवानांमस्माकं व्यथितात्मनाम्।<br>अस्य क्रोधं समासाद्य हिरण्यकशिपुर्हतः॥ १० | मत्स्यभगवान् बोले— रविनन्दन! कालनेमिद्वारा विपरीत कर्म किये जानेके कारण वेद, धर्म, क्षमा, सत्य और नारायणके आश्रयमें रहनेवाली लक्ष्मी— ये पाँचों उसके अधीन नहीं हुए। उनके उपस्थित न होनेसे क्रोधसे भरा हुआ दानवेश्वर कालनेमि वैष्णवपदकी प्राप्तिकी अभिलाषासे नारायणके निकट गया। वहाँ जाकर उसने शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान्को गरुड़की पीठपर बैठे तथा दैत्योंका विनाश करनेके लिये कल्याणमयी गदा घुमाते देखा। उनके शरीरकी कान्ति सजल मेघके समान थी। उनका पीताम्बर बिजलीके समान चमक रहा था। वे स्वर्णमय पंखसे युक्त शिखाधारी कश्यपनन्दन गरुडपर समासीन थे। इस प्रकार रणभूमिमें दैत्योंका विनाश करनेके लिये स्वस्थचित्तसे स्थित अक्षोभ्य भगवान् विष्णुको देखकर दानवराज कालनेमिका मन क्षुब्ध हो उठा, तब वह कहने लगा— 'यही हमलोगोंके पूर्वजोंका प्राणनाशक शत्रु है तथा यही महासागरमें निवास करनेवाले मधु और कैटभका भी प्राणहर्ता है। हमलोगोंका यह विग्रह शान्त होनेका नहीं, ऐसा निश्चितरूपसे कहा जाता है। बहुतेरे युद्धोंमें इसके द्वारा बहुत-से दानव मारे जा चुके हैं। यह बड़ा निष्ठुर है। इसे जगत्में स्त्री-बच्चोंपर भी हाथ उठाते समय लज्जा नहीं आती। इसने बहुत-सी दानव-पत्नियोंके सोहागका उन्मूलन कर दिया है। यही देवताओंमें विष्णु, स्वर्गवासियोंमें वैकुण्ठ, नागोंमें अनन्त और जलमें शयन करनेवाला आदि स्वयम्भू है। यही देवताओंका स्वामी और व्यथित हृदयवाले हमलोगोंका शत्रु है। इसीके क्रोधमें पड़कर हिरण्यकशिपु मारे गये हैं॥ १-१०॥ |
| अस्य छायामुपाश्रित्य देवा मखमुखे श्रिताः।<br>आज्यं महर्षिभिर्दत्तमश्नुवन्ति त्रिधा हुतम्॥ ११ | 'इसी प्रकार इसीका आश्रय ग्रहण कर यज्ञके प्रारम्भमें स्थित देवगण महर्षियोंद्वारा तीन प्रकारकी आहुति-रूपमें दिये गये आज्यका उपभोग करते हैं। |
| अयं स निधने हेतुः सर्वेषाममरद्विषाम्।<br>यस्य चक्रे प्रविष्टानि कुलान्यस्माकमाहवे॥ १२ | यही सभी देवद्रोही असुरोंकी मृत्युका कारण है। युद्धभूमिमें हमारे सभी कुल इसीके चक्रमें प्रविष्ट हो गये हैं। |
| * अध्याय १७८ * | ७३३ |
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| अयं स किल युद्धेषु सुरार्थे त्यक्तजीवितः।<br>सवितुस्तेजसा तुल्यं चक्रं क्षिपति शत्रु host... शत्रुषु॥ १३<br>अयं स कालो दैत्यानां कालभूतः समास्थितः।<br>अतिक्रान्तस्य कालस्य फलं प्राप्स्यति केशवः॥ १४<br>दिष्ट्येदानीं समक्षं मे विष्णुरेष समागतः।<br>अद्य मद्बाहुनिष्पिष्टो मामेव प्रणयिष्यति॥ १५<br>यास्याम्यपचितिं दिष्ट्या पूर्वेषामद्य संयुगे।<br>इमं नारायणं हत्वा दानवानां भयावहम्॥ १६<br>क्षिप्रमेव हनिष्यामि रणेऽमरगणांस्ततः।<br>जात्यन्तरगतो ह्येष बाधते दानवान् मृधे॥ १७<br>एषोऽनन्तः पुरा भूत्वा पद्मनाभ इति श्रुतः।<br>जघानैकार्णवे घोरे तावुभौ मधुकैटभौ॥ १८<br>द्विधाभूतं वपुः कृत्वा सिंहस्यार्धं नरस्य च।<br>पितरं मे जघानैको हिरण्यकशिपुं पुरा॥ १९<br>शुभं गर्भमधत्तैनमदितिर्देवतारणिः।<br>त्रींल्लोकानुज्जहारैकः क्रममाणस्त्रिभिः क्रमैः॥ २०<br>भूयस्त्विदानीं संग्रामे सम्प्राप्ते तारकामये।<br>मया सह समागम्य सदेवो विनशिष्यति॥ २१<br>एवमुक्त्वा बहुविधं क्षिपन्नारायणं रणे।<br>वाग्भिरप्रतिरूपाभिर्युद्धमेवाभ्यरोचयत् ॥ २२ | यह युद्धोंमें देवताओंके हितके लिये प्राणोंकी बाजी लगा देता है और शत्रुओंपर सूर्यके समान तेजस्वी चक्रका प्रयोग करता है। यह दैत्योंके कालरूपसे यहाँ स्थित है, किंतु अब यह केशव अपने बीते हुए कालका फल भोगेगा। सौभाग्यवश यह विष्णु इस समय मेरे ही समक्ष आ गया है। यह आज मेरी भुजाओंसे पिसकर मुझसे ही प्रेम करेगा। सौभाग्यकी बात है कि आज मैं रणभूमिमें दानवोंको भयभीत करनेवाले इस नारायणका वध कर पूर्वजोंके प्रायश्चित्तको पूर्ण कर दूँगा। तत्पश्चात् रणमें शीघ्र ही देवताओंका संहार कर डालूँगा। यह अन्य जातियोंमें भी उत्पन्न होकर समरमें दानवोंको कष्ट पहुँचाता है। यही पूर्वकालमें अनन्त होकर पुनः पद्मनाभ नामसे विख्यात हुआ। इसने ही भयंकर एकार्णवके जलमें मधु-कैटभ नामक दोनों दैत्योंका वध किया था। इसने अपने शरीरको आधा सिंह और आधा मनुष्य—इस प्रकार दो भागोंमें विभक्त करके पूर्वकालमें मेरे पिता हिरण्यकशिपुको मौतके घाट उतारा था। देवताओंकी जननी अदितिने इसीको अपने मङ्गलमय गर्भमें धारण किया था। अकेले इसीने तीन पगोंसे नापते हुए त्रिलोकीका उद्धार किया था। इस समय यह पुनः तारकामय संग्रामके प्राप्त होनेपर उपस्थित हुआ है। यह मेरे साथ उलझकर सभी देवताओंसहित नष्ट हो जायगा।' ऐसा कहकर उसने रणके मैदानमें प्रतिकूल वचनोंद्वारा अनेकों प्रकारसे नायणपर आक्षेप करते हुए युद्धके लिये ही अभिलाषा व्यक्त की॥ ११—२२॥ |
| क्षिप्यमाणोऽसुरेन्द्रेण न चुकोप गदाधरः।<br>क्षमाबलेन महता सस्मितं चेदमब्रवीत्॥ २३ | भगवान् गदाधरमें क्षमाका महान् बल है, जिसके कारण असुरेन्द्रद्वारा इस प्रकार आक्षेप किये जानेपर भी वे कुपित नहीं हुए, अपितु मुसकराते हुए इस प्रकार बोले—'दैत्य! |
| अल्पं दर्पबलं दैत्य स्थिरमक्रोधजं बलम्।<br>हतस्त्वं दर्पजैर्दोषैर्हित्वा यद् भाषसे क्षमाम्॥ २४<br>अधीरस्त्वं मम मतो धिगेतत् तव वाग्बलम्।<br>न यत्र पुरुषाः सन्ति तत्र गर्जन्ति योषितः॥ २५<br>अहं त्वां दैत्य पश्यामि पूर्वेषां मार्गगामिनम्।<br>प्रजापतिकृतं सेतुं भित्त्वा कः स्वस्तिमान् व्रजेत्॥ २६ | दर्पका बल अल्पकालस्थायी होता है, किंतु क्षमाजनित बल स्थिर होता है। तुम क्षमाका परित्याग करके जो इस प्रकारकी ऊटपटाँग बातें बक रहे हो, इससे प्रतीत होता है कि तुम अपने दर्पजन्य दोषोंसे नष्ट हो चुके हो। मेरी समझसे तो तुम बड़े अधीर दीख रहे हो। तुम्हारे इस वाग्बलको धिक्कार है; क्योंकि ऐसी गर्जना तो जहाँ पुरुष नहीं होते, वहाँ स्त्रियाँ भी करती हैं। दैत्य! मैं तुम्हें भी पूर्वजोंके मार्गका अनुगामी ही देख रहा हूँ। भला, ब्रह्माद्वारा स्थापित की गयी मर्यादाओंको तोड़कर |
७३४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| अद्य त्वां नाशयिष्यामि देवव्यापारघातकम्।<br>स्वेषु स्वेषु च स्थानेषु स्थापयिष्यामि देवताः॥ २७ | कौन कुशलपूर्वक जीवित रह सकता है। अतः देवताओंके कार्योंमें बाधा पहुँचानेवाले तुम्हें मैं आज ही नष्ट कर डालूँगा और देवताओंको पुनः अपने-अपने स्थानोंपर स्थापित कर दूँगा।'॥ २३-२७॥ |
| एवं ब्रुवति वाक्यं तु मृधे श्रीवत्सधारिणि।<br>जहास दानवः क्रोधाद्धस्तांश्चक्रे सहायुधान्॥ २८<br>स बाहुशतमुद्यम्य सर्वास्त्रग्रहणं रणे।<br>क्रोधाद् द्विगुणरक्ताक्षो विष्णुं वक्ष्यस्ताडयत्॥ २९<br>दानवाश्चापि समरे मयतारपुरोगमाः।<br>उद्यतायुधनिस्त्रिंशा विष्णुमभ्यद्रवन् रणे॥ ३०<br>स ताड्यमानोऽतिबलैर्दैत्यैः सर्वोद्यतायुधैः।<br>न चचाल ततो युद्धेऽकम्प्यमान इवाचलः॥ ३१<br>संसक्तश्च सुपर्णेन कालनेमी महासुरः।<br>स्वप्राणेन महतीं गदामुद्यम्य बाहुभिः॥ ३२<br>घोरां ज्वलन्तीं मुमुचे संरब्धो गरुडोपरि।<br>कर्मणा तेन दैत्यस्य विष्णुर्विस्मयमाविशत्॥ ३३<br>यदा तेन सुपर्णस्य पातिता मूर्ध्नि सा गदा।<br>सुपर्णं व्यथितं दृष्ट्वा कृत्तं च वपुरात्मनः॥ ३४<br>क्रोधसंरक्तनयनो वैकुण्ठश्चक्रमाददे।<br>व्यवधंत स वेगेन सुपर्णेन समं विभुः॥ ३५<br>भुजाश्चास्य व्यवर्धन्त व्याप्नुवन्तो दिशो दश।<br>प्रदिशश्चैव खं गां वै पूरयामास केशवः॥ ३६ | रणभूमिमें श्रीवत्सधारी भगवान्के इस प्रकार कहनेपर दानवराज कालनेमि ठहाका मारकर हँस पड़ा और फिर उसने क्रोधवश हाथोंमें हथियार धारण कर लिया। क्रोधके कारण उसके नेत्र दुगुने लाल हो गये थे। उसने रणभूमिमें सभी प्रकारके अस्त्रोंको धारण करनेवाली अपनी सैकड़ों भुजाओंको उठाकर भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलपर प्रहार किया। इसी प्रकार मय, तारक आदि अन्यान्य दानव भी खड्ग आदि आयुध लेकर युद्धस्थलमें भगवान् विष्णुपर टूट पड़े। यद्यपि सभी प्रकारके अस्त्रोंसे युक्त अत्यन्त बली दैत्य उनपर प्रहार कर रहे थे, तथापि वे विचलित नहीं हुए, अपितु युद्धभूमिमें पर्वतकी तरह अटल बने रहे। तब महान् असुर कालनेमि गरुडके साथ उलझ गया। उसने अपनी विशाल गदाको हाथोंमें धारण कर ली और क्रोधमें भरकर पूरी शक्तिके साथ उस चमकती हुई भयंकर गदाको गरुडके ऊपर छोड़ दिया। इस प्रकार उसके द्वारा फेंकी गयी वह गदा जब गरुडके मस्तकपर जा गिरी, तब दैत्यके उस कर्मसे भगवान् विष्णु आश्चर्यचकित हो उठे। फिर गरुडको पीड़ित तथा अपने शरीरको क्षत-विक्षत देखकर उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। तब उन्होंने चक्र हाथमें उठाया। फिर तो वे सर्वव्यापी विष्णु गरुडके साथ वेगपूर्वक आगे बढ़े। उनकी भुजाएँ दसों दिशाओंमें व्यास होकर बढ़ने लगीं। इस प्रकार भगवान् केशवने प्रदिशाओं, आकाशमण्डल और भूतलको आच्छादित कर लिया॥ २८-३६॥ |
| ववृधे च पुनर्लोकान् क्रान्तुकाम इवौजसा।<br>तर्जनायासुरेन्द्राणां वर्धमानं नभस्तले॥ ३७<br>ऋषयश्चैव गन्धर्वास्तुष्टुवुर्मधुसूदनम्।<br>सर्वान् किरीटेन लिहन् साभ्रमम्बरमम्बरैः॥ ३८<br>पद्भ्यामाक्रम्य वसुधां दिशः प्रच्छाद्य बाहुभिः।<br>स सूर्यकरतुल्याभं सहस्रारमरिक्षयम्॥ ३९ | पुनः वे अपने तेजसे लोकोंका अतिक्रमण करते हुए-से बढ़ने लगे। जिस समय वे आकाशमण्डलमें सुरेन्द्रोंको भयभीत करनेके लिये बढ़ रहे थे, उस समय ऋषिगण और गन्धर्व भगवान् मधुसूदनकी स्तुति कर रहे थे। वे अपने किरीटसे ऊपरी सभी लोकोंको तथा वस्त्रोंसे मेघसहित आकाशको छूते हुए पैरोंसे पृथ्वीको आक्रान्त करके और भुजाओंसे दिशाओंको आच्छादित करके स्थित थे। उनके चक्रकी कान्ति सूर्यकी किरणोंकी-सी उद्दीप्त थी। उसमें हजारों अरे लगे थे। वह शत्रुओंका |
| * अध्याय १७८ * | ७३५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दीप्ताग्निसदृशं घोरं दर्शनेन सुदर्शनम्।<br>सुवर्णरेणुपर्यन्तं वज्रनाभं भयावहम्॥ ४०<br><br>मेदोऽस्थिमज्जारुधिरैः सिक्तं दानवसम्भवैः।<br>अद्वितीयप्रहरणं क्षुरपर्यन्तमण्डलम्॥ ४१<br><br>स्रग्दाममालाविततं कामगं कामरूपिणम्।<br>स्वयं स्वयम्भुवा सृष्टं भयदं सर्वविद्विषाम्॥ ४२<br><br>महर्षिरोषैराविष्टं नित्यमाहवदर्पितम्।<br>क्षेपणाद् यस्य मुह्यन्ति लोकाः स्थाणुजङ्गमाः॥ ४३<br><br>क्रव्यादानि च भूतानि तृप्तिं यान्ति महामृधे।<br>तदप्रतिमकर्म्मोग्रं समानं सूर्यवर्चसा॥ ४४ | विनाशक था। वह प्रज्वलित अग्निकी तरह भयंकर होनेपर भी देखनेमें परम सुन्दर था। सुवर्णकी रेणुकासे धूसरित, वज्रकी नाभिसे युक्त और अत्यन्त भयानक था। वह दानवोंके शरीरसे निकले हुए मेदा, अस्थि, मज्जा और रुधिरसे चुपड़ा हुआ था। वह अपने ढंगका अकेला ही अस्त्र था। उसके चारों ओर खुरे लगे हुए थे। वह माला और हारसे विभूषित था। वह अभीप्सित स्थानपर जानेवाला तथा स्वेच्छानुकूल रूप धारण करनेवाला था। स्वयं ब्रह्माने उसकी रचना की थी। वह सम्पूर्ण शत्रुओंके लिये भयदायक था तथा महर्षिके क्रोधसे परिपूर्ण और नित्य युद्धमें गर्वीला बना रहता था। उसका प्रयोग करनेसे स्थावर-जङ्गमसहित सभी प्राणी मोहित हो जाते हैं तथा महासमरमें मांसभोजी जीव तृप्तिको प्राप्त होते हैं। वह अनुपम कर्म करनेवाला, भयंकर और सूर्यके समान तेजस्वी था॥ ३७—४४॥ |
| चक्रमुद्यम्य समरे क्रोधदीप्तो गदाधरः।<br>स मुष्णन् दानवं तेजः समरे स्वेन तेजसा॥ ४५<br><br>चिच्छेद बाहूंश्चक्रेण श्रीधरः कालनेमिनः।<br>तस्य वक्त्रशतं घोरं साग्निपूर्णाट्टहासिवै॥ ४६<br><br>तस्य दैत्यस्य चक्रेण प्रमथ्य बलाद्धरिः।<br>स च्छिन्नबाहुर्विशिरा न प्राकम्पत दानवः॥ ४७<br><br>कबन्धोऽवस्थितः संख्ये विशाख इव पादपः।<br>संवितत्य महापक्षाै वायोः कृत्वा समं जवम्॥ ४८<br><br>उरसा पातयामास गरुडः कालनेमिनम्।<br>स तस्य देहो विमुखो विबाहुश्च परिभ्रमन्॥ ४९<br><br>निपपात दिवं त्यक्त्वा क्षोभयन् धरणीतलम्।<br>तस्मिन् निपतिते दैत्ये देवाः सर्षिगणास्तदा॥ ५०<br><br>साधुसाध्विति वैकुण्ठं समेताः प्रत्यपूजयन्।<br>अपरे ये तु दैत्याश्च युद्धे दृष्टपराक्रमाः॥ ५१<br><br>ते सर्वे बाहुभिर्व्याप्ता न शेकुश्चलितुं रणे।<br>कांश्चित् केशेषु जग्राह कांश्चित् कण्ठेषु पीडयन्॥ ५२ | क्रोधसे उद्दीप्त हुए भगवान् गदाधरने समरभूमिमें उस चक्रको उठाकर अपने तेजसे दानवके तेजको नष्ट कर दिया और फिर उन श्रीधरने चक्रद्वारा कालनेमिकी भुजाओंको काट डाला। तत्पश्चात् श्रीहरिने उस दैत्यके सौ मुखोंको, जो भयंकर, अग्निके समान तेजस्वी और अट्टहास कर रहे थे, बलपूर्वक चक्रके प्रहारसे काट डाला। इस प्रकार भुजाओं और सिरोंके कट जानेपर भी वह दानव विचलित नहीं हुआ, अपितु युद्धभूमिमें शाखाओंसे हीन वृक्षकी तरह कबन्धरूपसे स्थित रहा। तब गरुड़ने अपने विशाल पंखोंको फैलाकर और वायुके समान वेग भरकर अपनी छातीके धक्केसे कालनेमिके कबन्धको धराशायी कर दिया। मुखों और भुजाओंसे हीन उसका वह शरीर चक्कर काटता हुआ स्वर्गलोकको छोड़कर भूतलको क्षुब्ध करता हुआ नीचे गिर पड़ा। उस दैत्यके गिर जानेपर ऋषियोंसहित देवगणोंने उस समय संगठित होकर भगवान् विष्णुको साधुवाद देते हुए उनकी पूजा की। दूसरे दैत्यगण, जो युद्धमें भगवान्के पराक्रमको देख चुके थे, वे सभी भगवान्की भुजाओंके वशीभूत हो रणभूमिमें चलने-फिरनेमें भी असमर्थ थे। भगवान्ने किन्हींको केश पकड़कर पटक दिया तो किन्हींको गला घोंटकर मार डाला। |