मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३३- ययातिका अपने यदु आदि पुत्रोंसे अपनी युवावस्था देकर वृद्धावस्था लेनेके लिये आग्रह और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देना, फिर पूरुको जरावस्था देकर उसकी युवावस्था लेना तथा उसे वर प्रदान करना
* अध्याय ३० * । ११७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देवान्युवाच<br>द्वाभ्यां कन्यासहस्त्राभ्यां दास्या शर्मिष्ठया सह।<br>त्वदधीनास्मि भद्रं ते सखे भर्ता च मे भव ॥ १७ | **देवयानीने कहा—**सखे! आपका कल्याण हो। मैं दो हजार कन्याओं तथा अपनी सेविका शर्मिष्ठाके साथ आपके अधीन होती हूँ। आप मेरे पति हो जायँ ॥ १७॥ |
| ययातिरुवाच<br>विद्ध्यौशनसि भद्रं ते न त्वदर्होऽस्मि भामिनि।<br>अविवाह्याः स्म राजानो देवयानि पितुस्तव ॥ १८ | **ययाति बोले—**शुक्रनन्दिनी देवयानि! आपका भला हो। भामिनि! मैं आपके योग्य नहीं हूँ। क्षत्रियलोग आपके पितासे कन्यादान लेनेके अधिकारी नहीं हैं॥ १८ ॥ |
| देवान्युवाच<br>सृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रं ब्रह्मणि संश्रितम्।<br>ऋषिश्च ऋषिपुत्रश्च नाहुषाद्य भजस्व माम् ॥ १९ | **देवयानीने कहा—**नहुषनन्दन! ब्राह्मणसे क्षत्रिय जाति और क्षत्रियसे ब्राह्मण जाति मिली हुई है। आप राजर्षिके पुत्र हैं और स्वयं भी राजर्षि हैं; अतः आज मुझसे विवाह कीजिये ॥ १९॥ |
| ययातिरुवाच<br>एकदेहोद्भवा वर्णाश्चत्वारोऽपि वरानने।<br>पृथग्धर्माः पृथक्शौचास्तेषां वै ब्राह्मणो वरः ॥ २० | **ययाति बोले—**वरानने! एक ही परमेश्वरके शरीरसे चारों वर्णोंकी उत्पत्ति हुई है, परंतु सबके धर्म और शौचाचार अलग-अलग हैं। ब्राह्मण उन सभी वर्णोंमें श्रेष्ठ है ॥ २० ॥ |
| देवान्युवाच<br>पाणिग्रहो नाहुषायं न पुम्भिः सेवितः पुरा।<br>त्वमेनमग्रहीरग्रे वृणोमि त्वामहं ततः ॥ २१<br>कथं तु मे मनस्विन्याः पाणिमन्यः पुमान् स्पृशेत्।<br>गृहीतमृषिपुत्रेण स्वयं वाप्युषिणा त्वया ॥ २२ | **देवयानीने कहा—**नहुषकुमार! नारीके लिये पाणिग्रहण एक धर्म है। पहले किसी भी पुरुषने मेरा हाथ नहीं पकड़ा था। सबसे पहले आपने ही मेरा हाथ पकड़ा था। इसलिये आपका ही मैं पतिरूपमें वरण करती हूँ। मैं मनको वशमें रखनेवाली स्त्री हूँ। आप-जैसे राजर्षिकुमार अथवा राजर्षिद्वारा पकड़े गये मेरे हाथका स्पर्श अब दूसरा कोई कैसे कर सकता है? ॥ २१-२२ ॥ |
| ययातिरुवाच<br>क्रुद्धादाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात्।<br>दुराधर्षतरो विप्रः पुरुषेण विजानता ॥ २३ | **ययाति बोले—**देवि! विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह ब्राह्मणको क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्प अथवा सब ओरसे प्रज्वलित अग्निसे भी अधिक दुर्धर्ष एवं भयंकर समझे ॥ २३ ॥ |
| देवान्युवाच<br>कथमाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात्।<br>दुराधर्षतरो विप्र इत्यात्थ पुरुषर्षभ ॥ २४ | **देवयानीने कहा—**पुरुषप्रवर! ब्राह्मण विषधर सर्प और सब ओरसे प्रज्वलित होनेवाली अग्निसे भी दुर्धर्ष एवं भयंकर है, यह बात आपने कैसे कही? ॥ २४ ॥ |
| ययातिरुवाच<br>दशेदाशीविषस्त्वेकं शस्त्रेणैकश्च वध्यते।<br>हन्ति विप्रः सराष्ट्राणि पुराण्यपि हि कोपितः ॥ २५<br>दुराधर्षतरो विप्रस्तस्माद् भीरु मतो मम।<br>अतोऽदत्तां च पित्रा त्वां भद्रे न विवहाम्यहम् ॥ २६ | **ययाति बोले—**भद्रे! सर्प एकको ही डँसता है, शस्त्रसे भी एक ही व्यक्तिका वध होता है; परंतु क्रोधमें भरा हुआ ब्राह्मण समस्त राष्ट्र और नगरका भी नाश कर सकता है। भीरु! इसीलिये मैं ब्राह्मणको अधिक दुर्धर्ष मानता हूँ। अतः जबतक आपके पिता आपको मेरे हवाले न कर दें, तबतक मैं आपसे विवाह नहीं करूँगा॥ २५-२६॥ |
| देवान्युवाच<br>दत्तां वहस्व पित्रा मां त्वं हि राजन् वृतो मया।<br>अयाचतो भयं नास्ति दत्तां च प्रतिगृह्णतः ॥ २७ | **देवयानीने कहा—**राजन्! मैंने आपका वरण कर लिया है, अब आप मेरे पिताके देनेपर ही मुझसे विवाह करें। आप स्वयं तो उनसे याचना करते नहीं हैं, उनके देनेपर ही मुझे स्वीकार करेंगे; अतः आपको उनके कोपका भय नहीं है। (राजन्! दो घड़ी ठहर जाइये। मैं अभी पिताके पास संदेश भेजती हूँ। धाय! शीघ्र जाओ और मेरे ब्रह्मतुल्य पिताको यहाँ बुला ले आओ। उनसे यह भी कह देना कि देवयानीने स्वयंवरकी विधिसे नहुष-नन्दन राजा ययातिका पतिरूपमें वरण किया है।) ॥ २७ ॥ |
१९८ * मत्स्यपुराण *
शौनक उवाच
त्वरितं देवयान्याथ प्रेषिता पितुरात्मनः।
सर्वं निवेदयामास धात्री तस्मै यथातथम् ॥ २८
श्रुत्वैव च स राजानं दर्शयामास भार्गवः।
दृष्ट्वैवमागतं विप्रं ययातिः पृथिवीपतिः ॥ २९
ववन्दे ब्राह्मणं काव्यं प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः।
तं चाप्यभ्यवदत् काव्यः साम्ना परमवल्गुना ॥ ३०
देवयान्युवाच
राजायं नहुषस्तात दुर्गमे पाणिमग्रहीत्।
नमस्ते देहि मामस्मै लोके नान्यं पतिं वृणे ॥ ३१
शुक्र उवाच
वृतोऽनया पतिर्वीर सुतया त्वं ममेष्टया।
गृहाणेमां मया दत्तां महिषीं नहुषात्मज ॥ ३२
ययातिरुवाच
अधर्मो मां स्पृशेदेवं पापमस्याश्च भार्गव।
वर्णसंकरतो ब्रह्मन्निति त्वां प्रवृणोम्यहम् ॥ ३३
शुक्र उवाच
अधर्मात् त्वां विमुञ्चामि वरं वरय चेप्सितम्।
अस्मिन् विवाहे त्वं श्लाघ्यो रहःपापं नुदामि ते ॥ ३४
वहस्व भार्यां धर्मेण देवयानीं शुचिस्मिताम्।
अनया सह सम्प्रीतिमतुलां समवाप्नुहि ॥ ३५
इयं चापि कुमारी ते शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।
सम्पूज्या सततं राजन् न चैनां शयने ह्वय ॥ ३६
शौनक उवाच
एवमुक्तो ययातिस्तु शुक्रं कृत्वा प्रदक्षिणम्।
जगाम स्वपुरं हृष्टः सोऽनुज्ञातो महात्मना ॥ ३७
शौनकजी कहते हैं - राजन् ! इस प्रकार देवयानीने
तुरन्त धायको भेजकर अपने पिताको संदेश दिया।
धायने जाकर शुक्राचार्यसे सब बातें ठीक-ठीक बता
दीं। सब समाचार सुनते ही शुक्राचार्यने वहाँ आकर
राजाको दर्शन दिया। विप्रवर शुक्राचार्यको आया देख
राजा ययातिने उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर
विनम्रभावसे खड़े हो गये। तब शुक्राचार्यने भी राजाको
परम मधुर वाणीसे सान्त्वना प्रदान की ॥ २८-३० ॥
देवयानी बोली- तात ! आपको (हाथ जोड़कर)
नमस्कार है। ये नहुषपुत्र राजा ययाति हैं। इन्होंने संकटके
समय मेरा हाथ पकड़ा था। आप मुझे इन्हींकी सेवामें
समर्पित कर दें। मैं इस जगत्में इनके सिवा दूसरे किसी
पतिका वरण नहीं करूँगी ॥ ३१ ॥
शुक्राचार्यने कहा - वीर नहुषनन्दन ! मेरी इस
लाड़ली पुत्रीने तुम्हें पतिरूपमें वरण किया है, अतः मेरी
दी हुई इस कन्याको तुम अपनी पटरानीके रूपमें ग्रहण
करो ॥ ३२ ॥
ययाति बोले- भार्गव ब्रह्मन् ! मैं आपसे यह वर
माँगता हूँ कि इस विवाहमें यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला
वर्णसंकरजनित महान् अधर्म मेरा स्पर्श न करे ॥ ३३ ॥
शुक्राचार्यने कहा - राजन् ! मैं तुम्हें अधर्मसे मुक्त
करता हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँग लो। विवाहको
लेकर तुम प्रशंसाके पात्र बन जाओगे। मैं तुम्हारे सारे
पापको दूर करता हूँ। तुम सुन्दर मुसकानवाली देवयानीको
धर्मपूर्वक अपनी पत्नी बनाओ और इसके साथ रहकर
अतुल सुख एवं प्रसन्नता प्राप्त करो। महाराज ! वृषपर्वाकी
पुत्री यह कुमारी शर्मिष्ठा भी तुम्हें समर्पित है। इसका
सदा आदर करना, किंतु इसे अपनी सेजपर कभी न
सुलाना ॥ ३४-३६ ॥
(तुम्हारा कल्याण हो। इस शर्मिष्ठाको एकान्तमें बुलाकर
न तो इससे बात करना और न इसके शरीरका स्पर्श ही
करना। अब तुम विवाह करके इसे (देवयानीको) अपनी
पत्नी बनाओ। इससे तुम्हें इच्छानुसार फलकी प्राप्ति होगी।)
शौनकजी कहते हैं - शतानीक ! शुक्राचार्यके ऐसा
कहनेपर राजा ययातिने उनकी परिक्रमा की (और
शास्त्रोक्त विधिसे मङ्गलमय विवाह-कार्य सम्पन्न किया)।
पुनः उन महात्माकी आज्ञा ले नृपश्रेष्ठ ययाति बड़े हर्षके
साथ अपनी राजधानीको चले गये ॥ ३७ ॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित नामक तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥
| * अध्याय ३१ * | १९९ |
|---|
एकतीसवाँ अध्याय
ययातिसे देवयानीको पुत्रप्राप्ति, ययाति और शर्मिष्ठाका एकान्त-मिलन और उनसे एक पुत्रका जन्म
| शौनक उवाच | शौनकजी कहते हैं— |
|---|---|
| ययातिः स्वपुरं प्राप्य महेन्द्रपुरसंनिभम्।<br>प्रविश्यान्तःपुरं तत्र देवयानीं न्यवेशयत्॥ १<br><br>देवयान्याश्चानुमते सुतां तां वृषपर्वणः।<br>अशोकवनिकाभ्याशे गृहं कृत्वा न्यवेशयत्॥ २<br><br>वृतां दासीसहस्रेण शर्मिष्ठामासुरायणीम्।<br>वासोभिरन्नपानैश्च संविभज्य सुसंवृताम्॥ ३<br><br>देवयान्या तु सहितः स नृपो नहुषात्मजः।<br>विजहार बहून्ब्दान् देववन्मुदितो भृशम्॥ ४<br><br>ऋतुकाले तु सम्प्राप्ते देवयानी वराङ्गना।<br>लेभे गर्भं प्रथमतः कुमारश्च व्यजायत॥ ५<br><br>गते वर्षसहस्रे तु शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।<br>ददर्श यौवनं प्राप्ता ऋतुं सा कमलेक्षणा॥ ६<br><br>चिन्तयामास धर्मज्ञा ऋतुप्राप्तौ च भामिनी।<br>ऋतुकालश्च सम्प्राप्तो न कश्चिन्मे पतिर्वृतः॥ ७<br><br>किं प्राप्तं किं च कर्तव्यं कथं कृत्वा सुखं भवेत्।<br>देवयानी प्रसूतासौ वृथाहं प्राप्तयौवना॥ ८<br><br>यथा तया वृतो भर्ता तथैवाहं वृणोमि तम्।<br>राज्ञा पुत्रफलं देयमिति मे निश्चिता मतिः।<br>अपीदानीं स धर्मात्मा रहो मे दर्शनं व्रजेत्॥ ९ | शतानीक! ययातिकी राजधानी महेन्द्रपुरी (अमरावती)-के समान थी। उन्होंने वहाँ आकर देवयानीको अन्तःपुरमें स्थान दिया तथा उसीकी अनुमतिसे अशोकवाटिकाके समीप एक महल बनवाकर उसमें वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाको उसकी एक हजार दासियोंके साथ ठहराया और उन सबके लिये अन्न, वस्त्र तथा पेय आदिकी अलग-अलग व्यवस्था कर दी। (देवयानी ययातिके साथ परम रमणीय एवं मनोरम अशोकवाटिकामें आती और शर्मिष्ठाके साथ वन-विहार करके उसे वहीं छोड़कर स्वयं राजाके साथ महलमें चली जाती थी। इस तरह वह बहुत समयतक प्रसन्नतापूर्वक आनन्द भोगती रही।) नहुषकुमार राजा ययातिने देवयानीके साथ बहुत वर्षोंतक देवताओंकी भाँति विहार किया। वे उसके साथ बहुत प्रसन्न और सुखी थे। ऋतुकाल आनेपर सुन्दरी देवयानीने गर्भ धारण किया और समयानुसार प्रथम पुत्रको जन्म दिया। इधर एक हजार वर्ष व्यतीत हो जानेपर युवावस्थाको प्राप्त हुई वृषपर्वाकी पुत्री कमलनयनी शर्मिष्ठाने अपनेको रजस्वलावस्थामें देखा और चिन्तामग्न हो मन-ही-मन कहने लगी—'मुझे ऋतुकाल प्राप्त हो गया, किंतु अभीतक मैंने पतिका वरण नहीं किया। यह कैसी परिस्थिति आ गयी। अब क्या करना चाहिये अथवा क्या करनेसे सुख होगा। देवयानी तो पुत्रवती हो गयी, किंतु मुझे जो युवावस्था प्राप्त हुई है, वह व्यर्थ जा रही है। जिस प्रकार उसने पतिका वरण किया है, उसी तरह मैं भी उन्हीं महाराजका क्यों न पतिके रूपमें वरण कर लूँ। मेरे याचना करनेपर राजा मुझे पुत्ररूप फल दे सकते हैं, इस बातका मुझे पूरा विश्वास है; परंतु क्या वे धर्मात्मा नरेश इस समय मुझे एकान्तमें दर्शन देंगे?॥ १—९॥ |
| शौनक उवाच<br><br>अथ निष्क्रम्य राजासौ तस्मिन् काले यदृच्छया।<br>अशोकवनिकाभ्याशे शर्मिष्ठां प्राप्य विस्मितः॥ १०<br><br>तमेकं रहसि दृष्ट्वा शर्मिष्ठा चारुहासिनी।<br>प्रत्युद्गम्याञ्जलिं कृत्वा राजानं वाक्यमब्रवीत्॥ ११ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक! शर्मिष्ठा इस प्रकार विचार कर ही रही थी कि राजा ययाति उसी समय दैववश महलसे बाहर निकले और अशोकवाटिकाके निकट शर्मिष्ठाको देखकर आश्चर्यचकित हो गये। मनोहर हासवाली शर्मिष्ठाने उन्हें एकान्तमें अकेला देखा। तब उसने आगे बढ़कर उनकी अगवानी की तथा हाथ जोड़कर राजासे यह बात कही— ॥ १०-११ ॥ |