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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

५- दक्ष-कन्याओंकी उत्पत्ति, कुमार कार्तिकेयका जन्म तथा दक्ष-कन्याओंद्वारा देवयोनियोंका प्रादुर्भाव

* अध्याय ५ *२७
दक्षादनन्तरं वृक्षानौषधानि च सर्वशः।<br>अजीजनत् सोमकन्या नदीं चन्द्रवतीं तथा॥ ५०<br>सोमांशस्य च तस्यापि दक्षस्याशीतिकोटयः।<br>तासां तु विस्तरं वक्ष्ये लोके यः सुप्रतिष्ठितः॥ ५१<br>द्विपदश्चाभवन् केचित् केचिद् बहुपदा नराः।<br>वलीमुखाः शङ्कुकर्णाः कर्णप्रावरणास्तथा॥ ५२<br>अश्वऋक्षमुखाः केचित् केचित् सिंहाननास्तथा।<br>श्वसूकरमुखाः केचित् केचिदुष्ट्रमुखास्तथा॥ ५३<br>जनयामास धर्मात्मा म्लेच्छान् सर्वाननेकंशः।<br>स सृष्ट्वा मनसा दक्षः स्त्रियः पश्चादजीजनत्॥ ५४<br>ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।<br>सप्तविंशति सोमाय ददौ नक्षत्रसंज्ञिताः।<br>देवासुरमनुष्यादि ताभ्यः सर्वमभूज्जगत्॥ ५५दक्षकी उत्पत्तिके पश्चात् उस सोमकन्याने समस्त वृक्षों और ओषधियोंको तथा चन्द्रवती नामकी नदीको उत्पन्न किया। चन्द्रमाके अंशसे उत्पन्न हुए उस दक्ष प्रजापतिकी अस्सी करोड़ संतानें हुईं, जो इस समय लोकमें सर्वत्र फैली हुई हैं और जिनका विस्तार मैं आगे वर्णन करूँगा। उनमेंसे किन्हींके दो पैर थे तो किन्हींके अनेकों पैर थे। किन्हींके मुख टेढ़े-मेढ़े थे तो किन्हींके कान खूँटे-जैसे थे तथा किन्हींके कान (बालोंसे) आच्छादित थे। किन्हींके मुख घोड़े और रीछके सदृश थे तथा कोई सिंहके समान मुखवाले थे। कुछ लोग कुत्ते और सूअरके सदृश मुखवाले थे तो किन्हींका मुख ऊँटके समान था। इस प्रकार धर्मात्मा दक्षने अपने मनसे अनेकों प्रकारके सभी म्लेच्छोंकी सृष्टि की, तत्पश्चात् स्त्रियोंको उत्पन्न किया। उनमेंसे उन्होंने दस धर्मको, तेरह कश्यपको तथा नक्षत्र नामवाली सत्ताईस स्त्रियोंको चन्द्रमाको प्रदान किया। उन्हीं कन्याओंसे देवता, असुर और मानव आदिसे परिपूर्ण यह सारा जगत् प्रादुर्भूत हुआ है॥ ५०—५५॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे आदिसर्गे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें चौथा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४॥


पाँचवाँ अध्याय

दक्ष-कन्याओंकी उत्पत्ति, कुमार कार्तिकेयका जन्म तथा दक्ष-कन्याओंद्धारा देवयोनियोंका प्रादुर्भाव

ऋषय ऊचुः<br>देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम्।<br>उत्पत्तिं विस्तरेणैव सूत ब्रूहि यथातथम्॥ १<br><br>सूत उवाच<br>संकल्पाद दर्शनात् स्पर्शात् पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते।<br>दक्षात् प्राचेतसादूर्ध्वं सृष्टिर्मैथुनसम्भवा॥ २<br>प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा।<br>यथा ससर्ज चैवादौ तथैव शृणुत द्विजाः॥ ३<br>यदा तु सृजतस्तस्य देवर्षिगणपन्नगान्।<br>न वृद्धिमगमल्लोकस्तदा मैथुनयोगतः।<br>दक्षः पुत्रसहस्राणि पाञ्चजन्यामजीजनत्॥ ४**(शौनक आदि) ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! देवता, दानव, गन्धर्व, नाग और राक्षस—इन सबकी उत्पत्ति कैसे हुई? इसका यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये॥ १॥<br><br>**सूतजी कहते हैं—**द्विजवरो! प्रचेता-पुत्र दक्षसे पूर्व उत्पन्न हुए लोगोंकी सृष्टि संकल्प, दर्शन और स्पर्शमात्रसे हुई है, ऐसा कहा जाता है; किंतु दक्षके पश्चात् स्त्री-पुरुषके संयोगद्वारा सृष्टि प्रचलित हुई है। पूर्वकालमें जब ब्रह्मा प्रजाकी आज्ञा दी कि तुम प्रजाओंकी सृष्टि करो, तब दक्षने पहले-पहल जैसी सृष्टि-रचना की, उसे (मैं) उसी प्रकार (वर्णन करता हूँ, आपलोग) श्रवण करें। जब (संकल्प, दर्शन और स्पर्शद्वारा) देव, ऋषि और नागोंकी सृष्टि करनेपर जीव-लोकका विस्तार नहीं हुआ, तब दक्षने पाञ्चजनीके गर्भसे एक हजार
२८* मत्स्यपुराण *
श्लोकअर्थ
तांस्तु दृष्ट्वा महाभागः सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।<br>नारदः प्राह हर्यश्वान् दक्षपुत्रान् समागतान्॥ ५<br><br>भुवः प्रमाणं सर्वत्र ज्ञात्वोर्ध्वमध एव च।<br>ततः सृष्टिं विशेषेण कुरुध्वमृषिसत्तमाः॥ ६<br><br>ते तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतो दिशम्।<br>अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रादिव सिन्धवः॥ ७<br><br>हर्यश्वेषु प्रणष्टेषु पुनर्दक्षः प्रजापतिः।<br>वीरिण्यामेव पुत्राणां सहस्रमसृजत् प्रभुः॥ ८<br><br>शबला नाम ते विप्राः समेताः सृष्टिहेतवः।<br>नारदोऽनुगतान् प्राह पुनस्तान् पूर्ववत् स तान्॥ ९<br><br>भुवः प्रमाणं सर्वत्र ज्ञात्वा भ्रातृनथो पुनः।<br>आगत्य चाथ सृष्टिं च करिष्यथ विशेषतः॥ १०<br><br>तेऽपि तेनैव मार्गेण जग्मुर्भ्रातृपथा तदा।<br>ततः प्रभृति न भ्रातुः कनीयान् मार्गमिच्छति।<br>अन्विष्यन् दुःखमाप्नोति तेन तत् परिवर्जयेत्॥ ११पुत्रोंको पैदा किया, जो 'हर्यश्व' नामसे विख्यात हुए। उन हर्यश्वनामक दक्ष-पुत्रोंको नाना प्रकारके जीवोंकी सृष्टि करनेके लिये उत्सुक देखकर महाभाग नारदने निकट आये हुए उन लोगोंसे कहा—'श्रेष्ठ ऋषियो! पहले आपलोग सर्वत्र घूमकर पृथ्वीके विस्तार तथा उसके ऊपर और नीचेके भागको जान लें, तब विशेषरूपसे सृष्टि-रचना कीजिये।' नारदजीकी बात सुनकर वे लोग विभिन्न दिशाओंकी ओर चले गये और आजतक भी वे उसी प्रकार नहीं लौटे, जैसे नदियाँ समुद्रमें मिलकर पुनः वापस नहीं आतीं। इस प्रकार हर्यश्व नामक पुत्रोंके नष्ट हो जानेपर प्रभावशाली प्रजापति दक्षने वीरिणीके गर्भसे पुनः एक हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया, जो शबल नामसे प्रसिद्ध हुए। जब ये द्विजवर सृष्टि-रचनाके लिये एकत्र होकर नारदजीके निकट पहुँचे, तब उन्होंने उन अनुगतोंसे भी पुनः वही पूर्ववत् बात कही—'ऋषियो! आपलोग पहले सब ओर घूमकर पृथ्वीके विस्तारको समझिये और अपने भाइयोंका पता लगाकर लौटिये, तत्पश्चात् विशेषरूपसे सृष्टि-रचना कीजिये।' तब जिस मार्गसे भाई लोग गये थे, उसी मार्गसे वे लोग भी चले, उसी मार्गसे चले गये (और पुनः वापस नहीं आये)। तभीसे छोटा भाई बड़े भाईको ढूँढ़ने नहीं जाता। यदि जाता है तो वह दुःखभागी होता है। इसलिये ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये॥२—११॥*
ततस्तेषु विनष्टेषु षष्टिं कन्याः प्रजापतिः।<br>वीरिण्यां जनयामास दक्षः प्राचेतसस्तथा॥ १२<br><br>प्रादात् स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।<br>सप्तविंशति सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमये॥ १३<br><br>द्वे चैव भृगुपुत्राय द्वे कृशाश्वाय धीमते।<br>द्वे चैवाङ्गिरसे तद्वत्तासां नामानि विस्तरात्॥ १४<br><br>शृणुध्वं देवमातॄणां प्रजाविस्तरमादितः।<br>मरुत्वतो वसुर्यामी लम्बा भानुरुरुन्धती॥ १५<br><br>संकल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भामिनी।<br>धर्मपत्न्यः समाख्यातास्तासां पुत्रान् निबोधत॥ १६<br><br>विश्वेदेवास्तु विश्वायाः साध्या साध्यान्जीजनत्।<br>मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवस्तथा॥ १७<br><br>भानोस्तु भानवस्तद्वन्मुहूर्तायां मुहूर्त्तकाः।<br>लम्बायां घोषनामानो नागवीथी तु यामिजा॥ १८तदनन्तर उन पुत्रोंके भी विनष्ट हो जानेपर प्रचेतानन्दन प्रजापति दक्षने वीरिणीके गर्भसे साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। उनमेंसे दक्षने दस धर्मको, तेरह कश्यपको, सत्ताईस चन्द्रमाको, चार अरिष्टनेमिको, दो भृगुनन्दन शुक्रको, दो बुद्धिमान् कृशाश्वको और दो कन्याएँ अङ्गिराको प्रदान कर दीं। अब आपलोग इन देवमाताओंके नाम तथा जिस प्रकार इनकी संतानोंका विस्तार हुआ, वह सब आदिसे ही विस्तारपूर्वक सुनिये। इनमेंसे मरुत्वती, वसु, यामी, लम्बा, भानु, अरुंधती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या और सुन्दरी विश्वा—ये दस धर्मकी पत्नियाँ बतलायी गयी हैं। अब इनके पुत्रोंके भी नाम सुनिये—विश्वाने (दस) विश्वेदेवोंको, साध्याने (बारह) साध्योंको, मरुत्वतीने (उनचास) मरुतोंको, वसुने आठ वसुओंको, भानुने (बारह) सूर्योंको, मुहूर्ताने मुहूर्त्तकको, लम्बाने घोषको, यामीने नागवीथीको

* विष्णुपुराण १।१५।१०१, ब्रह्म० २।८०, वायु० ६५ आदिमें ऐसा ही है, पर भागवत० ६।५ में इसके विपरीत सम्मति है।

* अध्याय ५ *२९

| पृथिवीतलसम्भूतमरुन्धत्यामजायत ।<br>संकल्पायास्तु संकल्पो वसुसृष्टिं निबोधत ॥ १९<br>ज्योतिष्मन्तस्तु ये देवा व्यापकाः सर्वतो दिशम्।<br>वसवस्ते समाख्यातास्तेषां सर्गे निबोधत ॥ २०<br>आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोऽनलः।<br>प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ २१<br>आपस्य पुत्राश्चत्वारः शान्तो वै दण्ड एव च।<br>शाम्बोऽथ मणिवक्त्रश्च यज्ञरक्षाधिकारिणः ॥ २२<br>ध्रुवस्य कालः पुत्रस्तु वर्चः सोमादजायत।<br>द्रविणो हव्यवाहश्च धरपुत्रावुभौ स्मृतौ ॥ २३<br>कल्याणियां ततः प्राणो रमणः शिशिरोऽपि च।<br>मनोहरा धरात् पुत्रानवापाथ हरेः सुता ॥ २४<br>शिवा मनोजवं पुत्रमविज्ञातगतिं तथा।<br>अवाप चानलात् पुत्रावग्निप्रायगुणौ पुनः ॥ २५<br>अग्निपुत्रः कुमारस्तु शरस्तम्बे व्यजायत।<br>तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठजाः ॥ २६<br>अपत्यं कृत्तिकानां तु कार्त्तिकेयस्ततः स्मृतः।<br>प्रत्यूषस्य ऋषेः पुत्रो विभुर्नाम्नाथ देवलः।<br>विश्वकर्मा प्रभासस्य पुत्रः शिल्पी प्रजापतिः ॥ २७<br>प्रासादभवनोद्यानप्रतिमाभूषणादिषु ।<br>तडागारामकूपेषु स्मृतः सोऽमरवर्धकिः ॥ २८ | और संकल्पाने संकल्पको जन्म दिया। अरुन्धतीके गर्भसे भूतलपर होनेवाले समस्त जीव-जन्तुओंकी उत्पत्ति हुई। अब वसुओंकी सृष्टिके विषयमें सुनिये—ये जो प्रभाशाली देवता सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त हैं, वे सभी 'वसु' नामसे विख्यात हैं। अब इनके सृष्टि-विस्तारका वर्णन सुनिये। आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं। इनमें आप नामक वसुके शान्त, दण्ड, शाम्ब और मणिवक्त्र नामक चार पुत्र हुए, जो सब-के-सब यज्ञ-रक्षाके अधिकारी हैं। (शेष वसुओंमें) ध्रुवका पुत्र काल हुआ। सोमसे वर्चाकी उत्पत्ति हुई। धरके कल्याणिनीके गर्भसे द्रविण और हव्यवाह नामके दो पुत्र बतलाये जाते हैं तथा हरिकी कन्या मनोहराने उन्हीं धरके संयोगसे प्राण, रमण और शिशिर नामक तीन पुत्र प्राप्त किये। शिवाने अनलसे मनोजव तथा अविज्ञातगति नामक दो पुत्रोंको प्राप्त किया, जो प्रायः अग्निके सदृश ही गुणवाले थे। अग्निपुत्र कुमार (कार्त्तिकेय) सरकंडेके झुरमुटमें पैदा हुए थे। इनके अनुज शाख, विशाख और नैगमेय नामसे प्रसिद्ध हैं। कृत्तिकाकी संतति होनेके कारण ये कार्त्तिकेय नामसे भी विख्यात हैं। प्रत्यूष वसुके विभु तथा देवल* नामके दो पुत्र हुए, जो आगे चलकर महान् ऋषि हुए। प्रभासका पुत्र विश्वकर्मा हुआ, जो शिल्पविद्यामें निपुण और प्रजापति हुआ। वह प्रासाद (अट्टालिका) भवन, उद्यान, प्रतिमा, आभूषण, वापी, सरोवर, बगीचा और कुएँ आदिके निर्माणकार्यमें देवताओंके बढ़ईरूपसे विख्यात हुआ॥ १२—२८॥ |
| अजैकपादहिर्बुध्न्यो विरूपाक्षोऽथ रैवतः।<br>हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्च सुरेश्वरः ॥ २९<br>सावित्रश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः।<br>एते रुद्राः समाख्याता एकादश गणेश्वराः ॥ ३०<br>एतेषां मानसानां तु त्रिशूलवरधारिणाम्।<br>कोटयश्चतुराशीतिस्तत्पुत्राश्चाक्षया मताः ॥ ३१<br>दिक्षु सर्वासु ये रक्षां प्रकुर्वन्ति गणेश्वराः।<br>पुत्रपौत्रसुताश्चैते सुरभीगर्भसम्भवाः ॥ ३२ | अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, सुरराजत्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित—ये एकादश रुद्र गणेश्वर नामसे प्रख्यात हैं। श्रेष्ठ त्रिशूल धारण करनेवाले इन ब्रह्माके मानस पुत्ररूप गणेश्वरोंके चौरासी करोड़ पुत्र उत्पन्न हुए, जो सब-के-सब अक्षय माने गये हैं। सुरभीके गर्भसे उद्भूत ये एकादश रुद्रोंके पुत्र-पौत्र आदि, जो गणेश्वर कहे जाते हैं, सभी दिशाओंमें (चराचर जगत्‌की) रक्षा करते हैं॥ २९—३२॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदिसर्गे वसुरुद्रान्वयवायो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें वसुओं और रुद्रोंके वंशका वर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५ ॥


* असित और एकपर्णाके पुत्र महर्षि देवल, जो 'देवलस्मृति' के रचयिता हैं, इनसे भिन्न हैं।