मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४३- ययाति-वंश-वर्णन, यदुवंशका वृत्तान्त तथा कार्तवीर्य अर्जुनकी कथा
१४२ * मत्स्यपुराण *
चालीसवाँ अध्याय
ययाति और अष्टकका आश्रमधर्मसम्बन्धी संवाद
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अष्टक उवाच<br>चरन् गृहस्थः कथमेति देवान्<br>कथं भिक्षुः कथमाचार्यकर्मा।<br>वानप्रस्थः सत्पथे सन्निविष्टो<br>बहून्यस्मिन् सम्प्रति वेदयन्ति॥ १ | अष्टकने पूछा— महाराज! वेदज्ञ विद्वान् इस धर्मके अन्तर्गत बहुत-से कर्मोंको उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका द्वार बताते हैं, अतः मैं आपसे पूछता हूँ कि आचार्यकी सेवा करनेवाला ब्रह्मचारी, गृहस्थ, सन्मार्गमें स्थित वानप्रस्थ और संन्यासी किस प्रकार धर्माचरण करके उत्तम लोकमें जाते हैं?॥ १॥ |
| ययातिरुवाच<br>आहूताध्यायी गुरुकर्मसु चोद्यतः<br>पूर्वोत्थायी चरमं चाथ शायी।<br>मृदुर्दान्तो धृतिमानप्रमत्तः<br>स्वाध्यायशीलः सिध्यति ब्रह्मचारी॥ २<br><br>धर्मागतं प्राप्य धनं यजेत<br>दद्यात् सदैवातिथीन् भोजयेच्च।<br>अनाददानश्च परैरदत्तं<br>सैषा गृहस्थोपनिषत् पुराणी॥ ३<br><br>स्ववीर्यजीवी वृजिनान्निवृत्तो<br>दाता परेभ्यो न परोपतापी।<br>तादृङ्मुनिः सिद्धिमुपैति मुख्यां<br>वसन्मरण्ये नियताहारचेष्टः॥ ४<br><br>अशिल्पजीवी विगृहश्च नित्यं<br>जितेन्द्रियः सर्वतो विप्रमुक्तः।<br>अनोकशायी लघु लिप्समान-<br>श्चरन् देशानेकाम्बरः स भिक्षुः॥ ५<br><br>रात्र्या यया चाभिरताश्च लोका<br>भवन्ति कामाभिजिताः सुखेन च।<br>तामेव रात्रिं प्रयतेत विद्वा-<br>नरण्यसंस्थो भवितुं यतात्मा॥ ६<br><br>दशैव पूर्वान् दशचापरांस्तु<br>ज्ञातींस्तथात्मानमथैकविंशम्।<br>अरण्यवासी सुकृतं दधाति<br>मुक्त्वा त्वरण्ये स्वशरीरधातून्॥ ७ | ययाति बोले— शिष्यको उचित है कि गुरुके बुलानेपर उसके समीप जाकर पढ़े, गुरुकी सेवामें बिना कहे लगा रहे, रातमें गुरुजीके सो जानेके बाद सोवे और सबेरे उनसे पहले ही उठ जाय। वह मृदुल (विनम्र), जितेन्द्रिय, धैर्यवान्, सावधान और स्वाध्यायशील हो। इस नियमसे रहनेवाला ब्रह्मचारी सिद्धिको पाता है। गृहस्थ पुरुष न्यायसे प्राप्त हुए धनको पाकर उससे यज्ञ करे, दान दे और सदा अतिथियोंको भोजन करावे। दूसरोंकी वस्तु उनके दिये बिना ग्रहण न करे। यह गृहस्थधर्मका प्राचीन एवं रहस्यमय स्वरूप है। वानप्रस्थ मुनि वनमें निवास करे। आहार और विहारको नियमित रखे। अपने ही पराक्रम एवं परिश्रमसे जीवन-निर्वाह करे, पापसे दूर रहे। दूसरोंको दान दे और किसीको कष्ट न पहुँचाये। ऐसा मुनि परम मोक्ष (सिद्धि)-को प्राप्त होता है। संन्यासी शिल्पकलासे जीवन-निर्वाह न करे। वह शम, दम आदि श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हो, सदा अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखे, सबसे अलग रहे, गृहस्थके घरमें न सोये, परिग्रहका भार न लेकर अपनेको हलका रखे, थोड़ा-थोड़ा चले और अकेला ही अनेक स्थानोंमें भ्रमण करता रहे। ऐसा संन्यासी ही वास्तवमें भिक्षु कहलाने योग्य है। जिस समय रूप, रस आदि विषय तुच्छ प्रतीत होने लगें, इच्छानुसार जीत लिये जायँ तथा उनके परित्यागमें ही सुख जान पड़े, उसी समय विद्वान् पुरुष मनको वशमें करके समस्त संग्रहोंका त्याग कर वनवासी होनेका प्रयत्न करे। जो वनवासी मुनि वनमें ही अपने पञ्चभूतात्मक शरीरका परित्याग करता है, वह दस पीढ़ी पूर्वके और दस पीढ़ी बादके जाति-भाइयोंको तथा इक्कीसवें अपनेको भी पुण्यलोकोंमें पहुँचा देता है॥ २—७॥ |
| * अध्याय ४० * | १४३ |
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| अष्टक उवाच<br>कतिस्विद् देव मुनयो मौनानि कति चाप्युत।<br>भवन्तीति तदाचक्ष्व श्रोतुमिच्छामहे वयम्॥ ८<br><br>ययातिरुवाच<br>अरण्ये वसतो यस्य ग्रामो भवति पृष्ठतः।<br>ग्रामे वा वसतोऽरण्यं स मुनिः स्याज्जनाधिप॥ ९<br><br>अष्टक उवाच<br>कथंस्विद् वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः।<br>ग्रामे वा वसतोऽरण्यं कथं भवति पृष्ठतः॥ १०<br><br>ययातिरुवाच<br>न ग्राम्यमुपयुञ्जीत य आरण्यो मुनिर्भवेत्।<br>तथास्य वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः॥ ११<br><br>अनग्निरनिकेतश्चाप्यगोत्रचरणो मुनिः।<br>कौपीनाच्छादनं यावत् तावदिच्छेच्च चीवरम्॥ १२<br><br>यावत् प्राणाभिसंधानं तावदिच्छेच्च भोजनम्।<br>तदास्य वसतो ग्रामेऽरण्यं भवति पृष्ठतः॥ १३<br><br>यस्तु कामान् परित्यज्य त्यक्तकर्मा जितेन्द्रियः।<br>आतिष्ठेत मुनिर्मौनं स लोके सिद्धिमाप्नुयात्॥ १४<br><br>धौतदन्तं कृत्तनखं सदा स्नातमलङ्कृतम्।<br>असितं सितकर्मस्थं कस्तं नार्चितुमर्हति॥ १५<br><br>तपसा कर्शितः क्षामः क्षीणमांसास्थिशोणितः।<br>यदा भवति निर्द्वन्द्वो मुनिर्मौनं समास्थितः॥ १६<br><br>अथ लोकमिमं जित्वा लोकं चापि जयेत् परम्।<br>आस्येन तु यथाहारं गोवन्मृगयते मुनिः।<br>अथास्य लोकः सर्वो यः सोऽमृतत्वाय कल्पते॥ १७ | **अष्टकने पूछा—**राजन्! मुनि कितने हैं? और मौन कितने प्रकारके हैं! यह बताइये, हम इसे सुनना चाहते हैं॥ ८॥<br><br>**ययातिने कहा—**जनेश्वर! अरण्यमें निवास करते समय जिसके लिये ग्राम पीछे होता है और ग्राममें वास करते समय जिसके लिये अरण्य पीछे होता है, वह मुनि कहलाता है॥ ९॥<br><br>**अष्टकने पूछा—**अरण्यवासीके लिये ग्राम और ग्राममें निवास करनेवालेके लिये अरण्य पीछे कैसे है?॥ १०॥<br><br>**ययातिने कहा—**जो मुनि वनमें निवास करता है और गाँवोंमें प्राप्त होनेवाली वस्तुओंका उपयोग नहीं करता, इस प्रकार वनमें निवास करनेवाले उस (वानप्रस्थ) मुनिके लिये गाँव पीछे समझा जाता है। जो अग्नि और गृहको त्याग चुका है, जिसका गोत्र और चरण (वेदकी शाखा एवं जाति)-से भी सम्बन्ध नहीं रह गया है, जो मौन रहता और उतने ही वस्त्रकी इच्छा रखता है, जितनेसे लँगोटी और ओढ़नेका काम चल जाय; इसी प्रकार जितनेसे प्राणोंकी रक्षा हो सके उतना ही भोजन चाहता है, इस नियमसे गाँवमें निवास करनेवाले उस (संन्यासी) मुनिके लिये अरण्य पीछे समझा जाता है। जो मुनि सम्पूर्ण कामनाओंको छोड़कर कर्मोंको त्याग चुका है और इन्द्रिय-संयमपूर्वक सदा मौनमें स्थित है, ऐसा संन्यासी लोकमें परम सिद्धिको प्राप्त होता है। जिसके दाँत शुद्ध और साफ हैं, जिसके नख (और केश) कटे हुए हैं, जो सदा स्नान करता है तथा यम-नियमादिसे अलंकृत (उन्हें धारण किये हुए) है, शीतोष्णको सहनेसे जिसका शरीर श्याम पड़ गया है, जिसके आचरण उत्तम हैं—ऐसा संन्यासी किसके लिये पूजनीय नहीं है। तपस्यासे मांस, हड्डी तथा रक्तके क्षीण हो जानेपर जिसका शरीर कृश और दुर्बल हो गया है तथा जो सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि द्वन्द्वोंसे रहित एवं भलीभाँति मौनावलम्बी हो चुका है, वह इस लोकको जीतकर परलोकपर भी विजय पाता है। जब संन्यासी मुनि गाय-बैलोंकी तरह मुखसे ही आहार ग्रहण करता है, हाथ आदिका भी सहारा नहीं लेता, तब उसके द्वारा ये सब लोक जीत लिये गये समझे जाते हैं और वह मोक्षकी प्राप्तिके लिये समर्थ समझा जाता है॥ ११—१७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंशवर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक चालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४०॥
| १४४ | * मत्स्यपुराण * |
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एकतालीसवाँ अध्याय
अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अष्टक उवाच<br>कतरस्त्वेतयोः पूर्वं देवानामेति सात्म्यताम्।<br>उभयोर्धावतो राजन् सूर्याचन्द्रमशोरिव॥ १ | अष्टकने पूछा— राजन्! सूर्य और चन्द्रमाकी तरह अपने-अपने लक्ष्यकी ओर दौड़ते हुए वानप्रस्थ और संन्यासी—इन दोनोंमेंसे पहले कौन-सा देवताओंके आत्मभाव (ब्रह्म)-को प्राप्त होता है?॥ १॥ |
| ययातिरुवाच<br>अनिकेतगृहस्थेषु कामवृत्तेषु संयतः।<br>ग्राम एव चरन् भिक्षुस्तयोः पूर्वतरं गतः॥ २<br>अप्राप्यं दीर्घमायुस्तु यः प्राप्तो विकृतिं चरेत्।<br>तप्येत यदि तत् कृत्वा चरेत् सोग्रं तपस्ततः॥ ३<br>यद् वै नृशंसं तदपथ्यमाहु-<br>र्यः सेवते धर्ममनर्थबुद्धिः।<br>असावनीशः स तथैव राजं-<br>स्तदार्जवं स समाधिस्तदार्यम्॥ ४ | ययाति बोले— कामवृत्तिवाले गृहस्थोंके बीच ग्राममें ही वास करते हुए भी जो जितेन्द्रिय और गृहरहित संन्यासी है, वही उन दोनों प्रकारके मुनियोंमें पहले ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। जो वानप्रस्थ दुर्लभ दीर्घायुको पाकर भी विषयोंके प्राप्त होनेपर उनसे विकृत हो उन्हींमें विचरने लगता है, उसे यदि विषयोपभोगके अनन्तर पश्चात्ताप होता है तो उसे मोक्षके लिये पुनः तपका अनुष्ठान करना चाहिये। राजन्! जो पापबुद्धिवाला मनुष्य अधर्मका आचरण करता है, उसका वह आचरण नृशंस (पापमय) और असत्य कहा गया है (एवं उस अजितेन्द्रियका धन भी वैसा ही पापमय और असत्य है); परंतु वानप्रस्थ मुनिका जो धर्मपालन है, वही सरलता है, वही समाधि है और वही श्रेष्ठ आचरण है॥ २—४॥ |
| अष्टक उवाच<br>केनाद्य त्वं तु प्रहितोऽसि राजन्<br>युवा स्रग्वी दर्शनीयः सुवर्चाः।<br>कुत आगतः कतमस्यां दिशि त्व-<br>मुताहोस्वित् पार्थिवं स्थानमस्ति॥ ५ | अष्टकने पूछा— राजन्! आपको यहाँ किसने भेजा है? आप अवस्थामें तरुण, फूलोंकी मालासे सुशोभित, दर्शनीय तथा उत्तम तेजसे उद्भासित जान पड़ते हैं। आप कहाँसे आये हैं? अथवा क्या आपके लिये इस पृथ्वीपर ही किसी दिशामें कोई उत्तम वासस्थान है?॥ ५॥ |
| ययातिरुवाच<br>इमं भौमं नरकं क्षीणपुण्यः<br>प्रवेष्टुमुर्वी गगनाद् विप्रहीणः।<br>उक्तवाहं वः प्रपतिष्याम्यनन्तरं<br>त्वरन्वमी ब्रह्मणो लोकपा ये॥ ६<br>सतां सकाशे तु वृतः प्रपात-<br>स्ते सङ्गता गुणवन्तस्तु सर्वे।<br>शक्राच्च लब्धो हि वरो मयैष<br>पतिष्यता भूमितलं नरेन्द्र॥ ७ | ययातिने कहा— मैं अपने पुण्यका क्षय होनेसे भौमनरकमें प्रवेश करनेके लिये आकाशसे गिर रहा हूँ। ये जो ब्रह्माजीके लोकपाल हैं, वे मुझे गिरनेके लिये जल्दी मचा रहे हैं। अतः (अब) आपलोगोंसे पूछकर—विदा लेकर इस पृथ्वीपर गिरूँगा। नरेन्द्र! मैं जब इस पृथ्वीतलपर गिरनेवाला था, उस समय मैंने इन्द्रसे यह वर माँगा था कि मैं साधु पुरुषोंके समीप गिरूँ। वह वर मुझे मिला, जिसके कारण आप सब सद्गुणी संतोंका सङ्ग प्राप्त हुआ॥ ६-७॥ |
| अष्टक उवाच<br>पृच्छामि त्वां प्रपतन्तं प्रपातं<br>यदि लोकाः पार्थिव सन्ति मेऽत्र।<br>यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः<br>क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये॥ ८ | अष्टक बोले— महाराज! मेरा विश्वास है कि आप पारलौकिक धर्मके ज्ञाता हैं। मैं नीचे गिरनेवाले आपसे एक बात पूछता हूँ—'क्या अन्तरिक्ष या स्वर्गलोकमें मुझे प्राप्त होनेवाले कोई पुण्यलोक भी हैं?'॥ ८॥ |
| * अध्याय ४१ * | १४५ |
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| ययातिरुवाच<br>यावत् पृथिव्यां विहितं गवाश्वं<br>सहारण्यैः पशुभिः पक्षिभिश्च।<br>तावल्लोका दिवि ते संस्थिता वै<br>तथा विजानीहि नरेन्द्रसिंह॥ ९ | **ययातिने कहा—**नरेन्द्रसिंह! इस पृथ्वीपर जंगली पशुओं और पक्षियोंके साथ जितने गाय, घोड़े आदि पशु रहते हैं, स्वर्गमें तुम्हारे लिये उतने ही लोक विद्यमान हैं। तुम इसे निश्चय जानो॥ ९॥ |
| अष्टक उवाच<br>तांस्ते ददामि मा प्रपत प्रपातं<br>ये मे लोका दिवि राजेन्द्र सन्ति।<br>यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता-<br>स्तानाक्रम क्षिप्रममित्रहासि॥ १० | **अष्टक बोले—**राजेन्द्र! स्वर्गमें मेरे लिये जो लोक विद्यमान हैं, उन्हें मैं आपको देता हूँ, परंतु आपका पतन न हो। अन्तरिक्ष या द्युलोकमें मेरे लिये जो स्थान हैं, उनमें आप शीघ्र ही चले जायें; क्योंकि आप शत्रुओंका संहार करनेवाले हैं॥ १०॥ |
| ययातिरुवाच<br>नास्मद्विधो ब्राह्मणो ब्रह्मविच्च<br>प्रतिग्रहे वर्तते राजमुख्य।<br>यथा प्रदेयं सततं द्विजेभ्य-<br>स्तथा ददे पूर्वमहं नरेन्द्र॥ ११<br>नाब्राह्मणः कृपणे जातु जीवेद्<br>याच्ञापि स्याद् ब्राह्मणी वीरपत्नी।<br>सोऽहं यदेवाकृतपूर्व चरेयं<br>विधित्समानः किमु तत्र साधुः॥ १२ | **ययातिने कहा—**नृपश्रेष्ठ! ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण ही प्रतिग्रह लेता है, मेरे-जैसा क्षत्रिय कदापि नहीं। नरेन्द्र! जैसे दान करना चाहिये, उस विधिसे मैंने पहले भी सदा उत्तम ब्राह्मणोंको बहुत दान दिये हैं। जो ब्राह्मण नहीं है, उसे दीन याचक बनकर कभी जीवन नहीं बिताना चाहिये। याचना तो विद्यासे दिग्विजय करनेवाले विद्वान् ब्राह्मणकी पत्नी है अर्थात् ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणको ही याचना करनेका अधिकार है। मुझे सत्कर्म करनेकी इच्छा है, अतः ऐसा कोई अकार्य कैसे कर सकता हूँ, जो पहले कभी न किया हो॥ ११-१२॥ |
| प्रतर्दन उवाच<br>पृच्छामि त्वां स्पृहणीयरूप<br>प्रतर्दनोऽहं यदि मे सन्ति लोकाः।<br>यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः<br>क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये॥ १३ | **प्रतर्दन बोले—**वाञ्छनीय रूपवाले श्रेष्ठ पुरुष! मैं प्रतर्दन हूँ और आपसे पूछता हूँ, यदि अन्तरिक्ष अथवा स्वर्गमें मेरे भी लोक हों तो बताइये। मैं आपको पारलौकिक धर्मका ज्ञाता मानता हूँ ॥ १३॥ |
| ययातिरुवाच<br>सन्ति लोका बहवस्ते नरेन्द्र<br>अप्येकैकं सप्त समान्यहानि।<br>मधुच्युतो घृतवन्तो विशोका-<br>स्ते नान्तवन्तः प्रतिपालयन्ति॥ १४ | **ययातिने कहा—**नरेन्द्र! तुम्हारे तो बहुत लोक हैं, यदि एक-एक लोकमें सात-सात दिन रहा जाय तो भी उनका अन्त नहीं है। वे सब-के-सब अमृतके झरने बहाते हैं एवं घृत (तेज)-से युक्त हैं। उनमें शोकका सर्वथा अभाव है। वे सभी लोक तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं॥ १४॥ |
| प्रतर्दन उवाच<br>तांस्ते ददामि पतमानस्य राजन्<br>ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु।<br>यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता-<br>स्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोहः॥ १५ | **प्रतर्दन बोले—**महाराज! वे सभी लोक मैं आपको देता हूँ, आप नीचे न गिरें। जो मेरे लोक हैं, वे सब आपके हो जायें। वे अन्तरिक्षमें हों या स्वर्गमें, आप शीघ्र मोहरहित होकर उनमें चले जाइये॥ १५॥ |
| ययातिरुवाच<br>न तुल्यतेजाः सुकृतं हि कामये<br>योगक्षेमं पार्थिवात् पार्थिवः सन्।<br>दैवादेशादापदं प्राप्य विद्वां-<br>श्रेयन्नृशंसं हि न जातु राजा॥ १६ | **ययातिने कहा—**राजन्! मैं स्वयं एक तेजस्वी राजा होकर दूसरेसे पुण्य तथा योग-क्षेमकी इच्छा नहीं करता। विद्वान् राजा दैववश भारी आपत्तिमें पड़ जानेपर भी कोई पापमय कार्य न करे। |