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मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
३०- सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन-विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीके साथ बातचीत तथा विवाह
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* अध्याय २६ * <p align="right">१०७</p>
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आपृच्छे त्वां गमिष्यामि शिवमस्त्वथ मे पथि।<br>अविरोधेन धर्मस्य स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे ॥ १५<br><br>अप्रमत्तोद्यता नित्यमाराधय गुरुं मम। | अब मैं जाऊँगा, इसलिये तुम्हारी आज्ञा चाहता हूँ; आशीर्वाद दो कि मार्गमें मेरा मङ्गल हो। धर्मकी अनुकूलता रखते हुए बातचीतके प्रसङ्गमें कभी मेरा भी स्मरण कर लेना और सदा सावधान एवं सजग रहकर मेरे गुरुदेव (अपने पिता शुक्राचार्य) की सेवामें लगी रहना ॥ १२-१५ १/२ ॥ |
| देव्यान्युवाच<br>दैत्यैर्हतस्त्वं यद्भर्तृबुद्ध्या त्वं रक्षितो मया ॥ १६<br><br>यदि मां धर्मकामार्था प्रत्याख्यास्यसि धर्मतः।<br>ततः कच न ते विद्या सिद्धिरेषा गमिष्यति ॥ १७ | देवयानी बोली— कच! दैत्योंद्वारा बार-बार तुम्हारे मारे जानेपर मैंने पति-बुद्धिसे ही तुम्हारी रक्षा की है (अर्थात् पिताद्वारा जीवनदान दिलाया है, इसीलिये) मैंने धर्मानुकूल कामके लिये तुमसे प्रार्थना की है। यदि तुम मुझे ठुकरा दोगे तो यह संजीवनी-विद्या तुम्हारे कोई काम न आयेगी ॥ १६-१७ ॥ |
| कच उवाच<br>गुरुपुत्रीति कृत्वाहं प्रत्याख्यास्ये न दोषतः।<br>गुरुणा चाभ्यनुज्ञातः काममेवं शपस्व माम् ॥ १८<br><br>आर्षं धर्मं ब्रुवाणोऽहं देवयानि यथा त्वया।<br>शप्तुं नार्होऽस्मि कल्याणि कामतोऽद्य च धर्मतः ॥ १९<br><br>तस्माद् भवत्या यः कामो न तथा सम्भविष्यति।<br>ऋषिपुत्रो न ते कश्चिज्जातु पाणिं ग्रहीष्यति ॥ २०<br><br>फलिष्यति न मे विद्या त्वद्वचश्चेति तत् तथा।<br>अध्यापयिष्यामि च यं तस्य विद्या फलिष्यति ॥ २१ | कचने कहा— देवयानी! गुरुपुत्री समझकर ही मैंने तुम्हारे अनुरोधको टाल दिया है, तुममें कोई दोष देखकर नहीं। गुरुजी भी इसे जानते-मानते हैं। स्वेच्छासे मुझे शाप भी दे दो। बहन! मैं आर्ष-धर्मकी बात कर रहा था। इस दशामें तुम्हारे द्वारा शाप पानेके योग्य नहीं था। तुमने मुझे धर्मके अनुसार नहीं, कामके वशीभूत होकर आज शाप दिया है, इसलिये तुम्हारे मनमें जो कामना है, वह पूरी नहीं होगी। कोई भी ऋषिपुत्र (ब्राह्मणकुमार) कभी तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं करेगा। तुमने जो मुझे यह कहा कि तुम्हारी विद्या सफल नहीं होगी, सो ठीक है; किंतु मैं जिसे यह पढ़ा दूँगा, उसकी विद्या तो सफल होगी ही ॥ १८-२१ ॥ |
| शौनक उवाच<br>एवमुक्त्वा नृपश्रेष्ठ देवयानीं कचस्तदा।<br>त्रिदशेशालयं शीघ्रं जगाम द्विजसत्तमः ॥ २२<br><br>तमागतमभिप्रेक्ष्य देवाः सेन्द्रपुरोगमाः।<br>बृहस्पतिं सभाज्येदं कचमाहुर्मुदान्विताः ॥ २३ | शौनकजी कहते हैं— नृपश्रेष्ठ शतानीक! द्विजश्रेष्ठ कच देवयानीसे ऐसा कहकर तत्काल बड़ी उतावलीके साथ इन्द्रलोकको चला गया। उसे आया देख इन्द्रादि देवता बृहस्पतिजीकी सेवामें उपस्थित हो उन्हें साथ ले आगे बढ़कर बड़ी प्रसन्नतासे कचसे इस प्रकार बोले ॥ २२-२३ ॥ |
| देवा ऊचुः<br>त्वं कचास्मद्धितं कर्म कृतवान् महदद्भुतम्।<br>न ते यशः प्रणशिता भागभाक् च भविष्यसि ॥ २४ | देवता बोले— कच! तुमने हमारे हितके लिये यह बड़ा अद्भुत कार्य किया है, अतः तुम्हारे यशका कभी लोप नहीं होगा और तुम यज्ञमें भाग पानेके अधिकारी होओगे ॥ २४ ॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित नामक छब्बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥
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१०८
* मत्स्यपुराण *
सत्ताईसवाँ अध्याय
देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यके साथ वार्तालाप
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शौनक उवाच<br>कृतविद्ये कचे प्राप्ते हृष्टरूपा दिवौकसः।<br>कचादवेत्य तां विद्यां कृतार्था भरतर्षभ॥ १<br>सर्व एव समागम्य शतक्रतुमथाब्रुवन्।<br>कालस्त्वद्विक्रमस्याद्य जहि शत्रून् पुरंदर॥ २<br>एवमुक्तस्तु सह तैस्त्रिदशैर्मघवांस्तदा।<br>तथेत्युक्त्वोपचक्राम सोऽपश्यद् विपिने स्त्रियः॥ ३<br>क्रीडन्तीनां तु कन्यानां वने चैत्ररथोपमे।<br>वायुर्भूतः स वस्त्राणि सर्वाण्येव व्यमिश्रयत्॥ ४<br>ततो जलात् समुत्तीर्य ताः कन्याः सहितास्तदा।<br>वस्त्राणि जगृहुस्तानि यथा संस्थान्यनेकशः॥ ५<br>तत्र वासो देवयान्याः शर्मिष्ठा जगृहे तदा।<br>व्यतिक्रममजानन्ती दुहिता वृषपर्वणः॥ ६<br>ततस्तयोर्मिथस्तत्र विरोधः समजायत।<br>देवयान्याश्च राजेन्द्र शर्मिष्ठायाश्च तत्कृते॥ ७ | शौनकजी कहते हैं— भरतर्षभ! जब कच मृतसंजीवनी-विद्या सीखकर आ गये, तब देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे कचसे उस विद्याको पढ़कर कृतार्थ हो गये। फिर सबने मिलकर इन्द्रसे कहा—'पुरंदर! अब आपके लिये पराक्रम करनेका समय आ गया है, अपने शत्रुओंका संहार कीजिये।' संगठित होकर आये हुए देवताओंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर इन्द्र 'बहुत अच्छा' कहकर भूलोकमें आये। वहीं एक वनमें उन्होंने बहुत-सी स्त्रियोंको देखा। वह वन चैत्ररथ* नामक देवोद्यानके समान मनोहर था। उसमें वे कन्याएँ जलक्रीड़ा कर रही थीं। इन्द्रने वायुका रूप धारण करके उनके सारे कपड़े परस्पर मिला दिये। तब वे सभी कन्याएँ एक साथ जलसे निकलकर अपने-अपने अनेक प्रकारके वस्त्र, जो निकट ही रखे हुए थे, लेने लगीं। उस सम्मिश्रणमें शर्मिष्ठाने देवयानीका वस्त्र ले लिया। शर्मिष्ठा वृषपर्वाकी पुत्री थी। दोनोंके वस्त्र मिल गये हैं, इस बातका उसे पता न था। राजेन्द्र! वस्त्रोंकी उस अदला-बदलीको लेकर देवयानी और शर्मिष्ठा—दोनोंमें वहाँ परस्पर बड़ा भारी विरोध खड़ा हो गया॥ १—७॥ |
| देवयान्युवाच<br>कस्माद् गृह्णासि मे वस्त्रं शिष्या भूत्वा ममासुरि।<br>समुदाचारहीनाया न ते श्रेयो भविष्यति॥ ८ | देवयानी बोली— अरी दानवकी बेटी! मेरी शिष्या होकर तू मेरा वस्त्र कैसे ले रही है? तू सज्जनोंके उत्तम आचारसे शून्य है, अतः तेरा भला न होगा॥ ८॥ |
| शर्मिष्ठोवाच<br>आसीनं च शयानं च पिता ते पितरं मम।<br>स्तौति पृच्छति चाभीक्ष्णं नीचस्थः सुविनीतवत्॥ ९<br>याचतस्त्वं च दुहिता स्तुवतः प्रतिगृह्णतः।<br>सुताहं स्तूयमानस्य ददतो न तु गृह्णतः॥ १० | शर्मिष्ठाने कहा— अरी! मेरे पिता बैठे हों या सो रहे हों, उस समय तेरा पिता विनयशील सेवकके समान नीचे खड़ा होकर बार-बार वन्दीजनोंकी भाँति उनकी स्तुति करता है। तू भिखमंगेकी बेटी है, तेरा बाप स्तुति करता और दान लेता है। मैं उनकी बेटी हूँ, जिनकी स्तुति की जाती है, जो दूसरोंको दान देते हैं और स्वयं किसीसे कुछ भी नहीं लेते। |
* जैसे इन्द्रके वनका नाम नन्दन है, वैसे वरुणका उद्यान चैत्ररथ है।
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* अध्याय २७ * । १०९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अनायुधा सायुधायाः किं त्वं कुप्यसि भिक्षुकि।<br>लप्स्यसे प्रतियोद्धारं न च त्वां गणयाम्यहम्॥ ११ | अरी भिक्षुकि ! तू खाली हाथ है, तेरे पास कोई अस्त्र-शस्त्र भी नहीं है। और देख ले, मेरे पास हथियार है। इसलिये तू मेरे ऊपर व्यर्थ ही क्रोध कर रही है। यदि लड़ना ही चाहती है तो इधरसे भी डटकर सामना करनेवाली मुझ-जैसी योद्ध्री तुझे मिल जायगी। मैं तुझे कुछ भी नहीं गिनती ॥ ९—११ ॥ |
| शौनक उवाच<br><br>सा विस्मयं देवयानीं गतां सक्तां च वाससि।<br>शर्मिष्ठा प्राक्षिपत् कूपे ततः स्वपुरमाविशत्॥ १२<br>हतेयमिति विज्ञाय शर्मिष्ठा पापनिश्चया।<br>अनवेक्ष्य ययौ तस्मात् क्रोधवेगपरायणा॥ १३<br>अथ तं देशमध्यागाद् ययातिर्नहुषात्मजः।<br>श्रान्तयुग्यः श्रन्तरूपो मृगलिप्सुः पिपासितः॥ १४<br>नाहुषिः प्रेक्षमाणो हि स निपाते गतोदके।<br>ददर्श कन्यां तां तत्र दीप्तामग्निशिखामिव॥ १५<br>तामपृच्छत् स दृष्ट्वैव कन्याममरवर्णिनीम्।<br>सान्त्वयित्वा नृपश्रेष्ठः साम्ना परमवल्गुना॥ १६<br>का त्वं चारुमुखी श्यामा सुमृष्टमणिकुण्डला।<br>दीर्घं ध्यायसि चात्यर्थं कस्माच्छ्वसिषि चातुरा॥ १७<br>कथं च पतिता ह्यस्मिन् कूपे वीरुत्तृणावृते।<br>दुहिता चैव कस्य त्वं वद सर्वं सुमध्यमे॥ १८ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक ! यह सुनकर देवयानी आश्चर्यचकित हो गयी और शर्मिष्ठाके शरीरसे अपने वस्त्रको खींचने लगी। यह देख शर्मिष्ठाने उसे कुएँमें ढकेल दिया और अब वह (डूबकर) मर गयी होगी—ऐसा समझकर पापमय विचारवाली शर्मिष्ठा नगरको लौट आयी। वह क्रोधके आवेशमें थी, अतः देवयानीकी ओर देखे बिना घर लौट गयी। तदनन्तर नहुषपुत्र ययाति उस स्थानपर आये। उनके रथके वाहन तथा अन्य घोड़े भी थक गये थे। वे भी थकावटसे चूर हो गये थे। वे एक हिंसक पशुको पकड़नेके लिये उसके पीछे-पीछे आये थे और प्याससे कष्ट पा रहे थे। ययाति उस जलशून्य कूपको देखने लगे। वहाँ उन्हें अग्निशिखाके समान तेजस्विनी एक कन्या दिखायी दी, जो देवाङ्गनाके समान सुन्दरी थी। उसपर दृष्टि पड़ते ही नृपश्रेष्ठ ययातिने पहले परम मधुर वचनोंद्वारा शान्तभावसे उसे आश्वासन दिया और पूछा—'सुमध्यमे ! तुम कौन हो? तुम्हारा मुख परम मनोहर है। तुम्हारी अवस्था भी अभी बहुत अधिक नहीं दीखती। तुम्हारे कानोंके मणिमय कुण्डल अत्यन्त सुन्दर और चमकीले हैं। तुम किसी अत्यन्त घोर चिन्तामें पड़ी हो। आतुर होकर लम्बी साँस क्यों ले रही हो? तृण और लताओंसे ढके हुए इस कुएँमें कैसे गिर पड़ी? तुम किसकी पुत्री हो? सब ठीक-ठीक बताओ'॥ १२–१८॥ |
| देवयान्युवाच<br><br>योऽसौ देवैर्हतान् दैत्यानुत्थापयति विद्यया।<br>तस्य शुक्रस्य कन्याहं त्वं मां नूनं न बुध्यसे॥ १९<br>एष मे दक्षिणो राजन् पाणिस्ताम्रनखाङ्गुलिः।<br>समुद्धर गृहीत्वा मां कुलीनस्त्वं हि मे मतः॥ २०<br>जानामि त्वां च संशान्तं वीर्यवन्तं यशस्विनम्।<br>तस्मान्मां पतितामस्मात्कूपादुद्धर्तुमर्हसि॥ २१ | देवयानी बोली— जो देवताओंद्वारा मारे गये दैत्योंको अपनी विद्याके बलसे जिलाया करते हैं, उन्हीं शुक्राचार्यकी मैं पुत्री हूँ। निश्चय ही आप मुझे पहचानते नहीं हैं। महाराज ! लाल नख और अङ्गुलियोंसे युक्त यह मेरा दाहिना हाथ है। इसे पकड़कर आप इस कुएँसे मेरा उद्धार कीजिये। मैं जानती हूँ, आप उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए नरेश हैं। मुझे यह भी ज्ञात है कि आप परम शान्त स्वभाववाले, पराक्रमी तथा यशस्वी वीर हैं। इसलिये इस कुएँमें गिरी हुई मुझ अबलाका आप यहाँसे उद्धार कीजिये॥ १९–२१॥ |
| शौनक उवाच<br><br>तामथ ब्राह्मणीं स्त्रीं च विज्ञाय नहुषात्मजः।<br>गृहीत्वा दक्षिणे पाणावुज्जहार ततोऽवटात्॥ २२<br>उद्धृत्य चैनां तरसा तस्मात् कूपान्नराधिपः।<br>आमन्त्रयित्वा सुश्रोणीं ययातिः स्वपुरं ययौ॥ २३ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक ! तदनन्तर नहुषपुत्र राजा ययातिने देवयानीको ब्राह्मण-कन्या जानकर उसका दाहिना हाथ अपने हाथमें ले उसे उस कुएँसे बाहर निकाला। इस प्रकार वेगपूर्वक उसे कुएँसे बाहर निकालकर राजा ययाति सुन्दरी देवयानीकी अनुमति लेकर अपने |
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१९० * मत्स्यपुराण *
| गते तु नाहुषे तस्मिन् देवयान्यप्यनिन्दिता।<br>उवाच शोकसंतप्ता घूर्णिकामागतां पुनः॥ २४ | नगरको चले गये। नहुषनन्दन ययातिके चले जानेपर सती-साध्वी देवयानी शोकसे संतप्त हो अपने सामने आयी हुई धाय घूर्णिकासे बोली॥ २२—२४॥ |
|---|---|
| देवयानुवाच<br>त्वरितं घूर्णिके गच्छ सर्वमाचक्ष्व मे पितुः।<br>नेदानीं तु प्रवेक्ष्यामि नगरं वृषपर्वणः॥ २५ | **देवयानीने कहा—**घूर्णिके! तुम तुरंत वेगपूर्वक यहाँसे जाओ और शीघ्र मेरे पिताजीसे सब वृत्तान्त कह दो। अब मैं (राजा) वृषपर्वाके नगरमें प्रवेश नहीं करूँगी—उस नगरमें पैर नहीं रखूँगी॥ २५॥ |
| शौनक उवाच<br>सा तु वै त्वरितं गत्वा घूर्णिकासुरमन्दिरम्।<br>दृष्ट्वा काव्यमुवाचेदं कम्पमाना विचेतना॥ २६<br>आचख्यौ च महाभागा देवयानी वने हता।<br>शर्मिष्ठया महाप्राज्ञ दुहित्रा वृषपर्वणः॥ २७<br>श्रुत्वा दुहितरं काव्यस्तदा शर्मिष्ठया हताम्।<br>त्वरया निर्ययौ दुःखान्मार्गमाणः सुतां वने॥ २८<br>दृष्ट्वा दुहितरं काव्यो देवयानीं ततो वने।<br>बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य दुःखितो वाक्यमब्रवीत्॥ २९<br>आत्मदोषैर्नियच्छन्ति सर्वे दुःखसुखे जनाः।<br>मन्ये दुश्चरितं तस्मिंस्तस्येयं निष्कृतिः कृता॥ ३० | **शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! देवयानीकी बात सुनकर घूर्णिका तुरंत असुरराजके महलमें गयी और वहाँ शुक्राचार्यको देखकर काँपती हुई उसने सम्भ्रमपूर्ण चित्तसे वह बात बतला दी। उसने कहा—‘महाप्राज्ञ! वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाके द्वारा देवयानी वनमें मार डाली (मृततुल्य कर दी) गयी है।’ अपनी पुत्रीको शर्मिष्ठाद्वारा मृततुल्य की गयी सुनकर शुक्राचार्य बड़ी उतावलीके साथ निकले और दुःखी होकर उसे वनमें ढूँढ़ने लगे। तदनन्तर वनमें अपनी बेटी देवयानीको देखकर शुक्राचार्यने दोनों भुजाओंसे उठाकर उसे हृदयसे लगा लिया और दुःखी होकर कहा—‘बेटी! सब लोग अपने ही दोष और गुणोंसे—अशुभ या शुभ कर्मोंसे दुःख एवं सुखमें पड़ते हैं। मालूम होता है, तुमसे कोई बुरा कर्म बन गया था, जिसका तुमने इस रूपमें प्रायश्चित्त किया है’॥ २६—३०॥ |
| देवयानुवाच<br>निष्कृतिर्वास्तु वा मास्तु शृणुष्वावहितो मम।<br>शर्मिष्ठया यदुक्तास्मि दुहित्रा वृषपर्वणः॥ ३१<br>सत्यं किलैतत् सा प्राह दैत्यानामस्मि गायना।<br>एवं हि मे कथयति शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी॥ ३२<br>वचनं तीक्ष्णपरुषं क्रोधरक्तेक्षणा भृशम्।<br>स्तुवतो दुहितासि त्वं याचतः प्रतिगृह्णतः॥ ३३<br>सुताहं स्तूयमानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः।<br>इति मामाह शर्मिष्ठा दुहिता वृषपर्वणः।<br>क्रोधसंरक्तनयना दर्पपूर्णानना ततः॥ ३४<br>यद्यहं स्तुवतस्तात दुहिता प्रतिगृह्णतः।<br>प्रसादयिष्ये शर्मिष्ठामित्युक्ता हि सखी मया॥ ३५ | **देवयानी बोली—**पिताजी! मुझे अपने कर्मोंके फलसे निस्तार हो या न हो, आप मेरी बात ध्यान देकर सुनिये। वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने आज मुझसे जो कुछ कहा है, क्या यह सच है? वह कहती है—मैं भाटोंकी तरह दैत्योंके गुण गाया करती हूँ। वृषपर्वाकी लाड़िली शर्मिष्ठा क्रोधसे लाल आँखें करके आज मुझसे इस प्रकार अत्यन्त तीखे और कठोर वचन कह रही थी। ‘देवयानी! तू स्तुति करनेवाले, नित्य भीख माँगनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी है और मैं तो उन महाराजकी पुत्री हूँ, जिनकी तुम्हारे पिता स्तुति करते हैं, जो स्वयं दान देते हैं और लेते (किसीसे) एक अधेला भी नहीं हैं।’ वृषपर्वाकी बेटी शर्मिष्ठाने आज मुझसे ऐसी बात कही है। कहते समय उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वह भारी घमंडसे भरी हुई थी। तात! यदि सचमुच मैं स्तुति करनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी हूँ तो मैं शर्मिष्ठाको अपनी सेवाओंद्वारा प्रसन्न करूँगी। यह बात मैंने अपनी सखीसे कह दी थी। (मेरे ऐसा कहनेपर भी अत्यन्त क्रोधमें भरी हुई शर्मिष्ठाने उस निर्जन वनमें मुझे पकड़कर कुएँमें ढकेल दिया। उसके बाद वह अपने घर चली गयी)॥ ३१—३५॥ |