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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१५६- कुसुमामोदिनी और पार्वतीकी गुप्त मन्त्रणा, पार्वतीका तपस्यामें निरत होना, आदि दैत्यका पार्वती-रूपमें शङ्करके पास जाना और मृत्युको प्राप्त होना तथा पार्वतीद्वारा वीरकको शाप

६४४ * मत्स्यपुराण *

Sanskrit ShlokaHindi Translation
तच्छ्रुत्वा कौतुकाद् देवी किमेतदिति शङ्करम्।<br>पप्रच्छ तं शुभतनुर्हरं विस्मयपूर्वकम्॥ ५२३<br>उवाच देवीं नैतत् ते दृष्टपूर्वं सुविस्मिते।<br>एते गणेशाः क्रीडन्ते शैलेऽस्मिन् मत्प्रियाः सदा॥ ५२४<br>तपसा ब्रह्मचर्येण नियमैः क्षेत्रसेवनैः।<br>यैरहं तोषितः पूर्वं त एते मनुजोत्तमाः॥ ५२५<br>मत्समीपमनुप्राप्ता मम हृद्याः शुभानने।<br>कामरूपा महोत्साहा महारूपगुणान्विताः॥ ५२६<br>कर्मभिर्विस्मयं तेषां प्रयामि बलशालिनाम्।<br>सामरस्यास्य जगतः सृष्टिसंहरणक्षमाः॥ ५२७<br>ब्रह्मविष्ण्विन्द्रगन्धर्वैः सकिन्नरमहोरगैः।<br>विवर्जितोऽप्यहं नित्यं नैभिर्विरहितो रमे॥ ५२८<br>हृद्या मे चारुसर्वाङ्गास्त एते क्रीडिता गिरौ।<br>इत्युक्ता तु ततो देवी त्यक्त्वा तद्विस्मयाकुला॥ ५२९<br>गवाक्षान्तरमासाद्य प्रेक्षते विस्मितानना।उसे सुनकर सुन्दर शरीरवाली पार्वतीदेवीने कुतूहलवश आश्चर्यपूर्वक भगवान् शंकरसे पूछा—'यह क्या हो रहा है?' तब शिवजीने पार्वतीसे कहा—'सुविस्मिते! तुमने पहले इसे नहीं देखा है। मेरे परम प्रिय ये गणेश्वर इस पर्वतपर सदा क्रीडा करते रहते हैं। शुभानने! जो लोग पहले तपस्या, ब्रह्मचर्य, नियमपालन और तीर्थसेवनद्वारा मुझे संतुष्ट कर चुके हैं, वे ही ये श्रेष्ठ पुरुष मेरे पास प्राप्त हुए हैं। ये मुझे परम प्रिय हैं। ये इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, महान् उत्साहसे सम्पन्न तथा अतिशय सौन्दर्य एवं गुणोंसे युक्त हैं। इन बलशालियोंके कार्योंसे तो मुझे भी परम विस्मय हो जाता है। ये देवताओंसहित इस जगत्की सृष्टि और संहार करनेमें समर्थ हैं। अतः ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, गन्धर्व, किंनर और प्रधान-प्रधान नागोंसे नित्य विलग रहनेपर भी मुझे कष्ट नहीं होता, परंतु इनसे वियुक्त होनेपर मुझे कभी आनन्द नहीं प्राप्त होता। इनके सभी अङ्ग अत्यन्त सुन्दर हैं और ये सभी मुझे परम प्रिय हैं। वे ही ये सब इस पर्वतपर क्रीडा कर रहे हैं।' इस प्रकार कही जानेपर पार्वतींने विस्मयसे व्याकुल हो द्यूतक्रीडा छोड़ दी और वे भौंचक्की-सी हो झरोखेमें बैठकर उनकी ओर देखने लगीं॥ ५२२—५२९ १/२ ॥
यावन्तस्ते कृशा दीर्घा ह्रस्वाः स्थूला महोदराः॥ ५३०<br>व्याघ्रेभवदनाः केचित् केचिन्मेषाजरूपिणः।<br>अनेकप्राणिरूपाश्च ज्वालास्याः कृष्णपिङ्गलाः॥ ५३१<br>सौम्या भीमाः स्मितमुखाः कृष्णपिङ्गजटासटाः।<br>नानाविहङ्गवदना नानाविधमृगाननाः॥ ५३२<br>कौशेयचर्मवसना नग्नाश्चान्ये विरूपिणः।<br>गोकर्णा गजकर्णाश्च बहुवक्त्रेक्षणोदराः॥ ५३३<br>बहुपादा बहुभुजा दिव्यनानाशस्त्रपाणयः।<br>अनेककुसुमापीडा नानाव्यालविभूषणाः॥ ५३४<br>वृत्ताननायुधधरा नानाकवचभूषणाः।<br>विचित्रवाहनारूढा दिव्यरूपा वियच्चराः॥ ५३५वे जितने थे, उनमें कुछ दुबले-पतले, लम्बे, छोटे और विशाल पेटवाले थे। किन्हींके मुख व्याघ्र और हाथीके समान थे तो कोई भेड़ और बकरेके-से रूपवाले थे। उनके रूप अनेकों प्राणियोंके सदृश थे। किन्हींके मुखसे ज्वाला निकल रही थी तो कोई काले एवं पीले रंगके थे। किन्हींके मुख सौम्य, किन्हींके भयंकर और किन्हींके मुसकानयुक्त थे। किन्हींके मस्तकपर काले एवं पीले रंगकी जटा बँधी थी। किन्हींके मुख नाना प्रकारके पक्षियोंके-से तथा किन्हींके मुख विभिन्न प्रकारके पशुओं-सदृश थे। किन्हींके शरीरपर रेशमी वस्त्र थे तो कोई वस्त्रके स्थानपर चमड़ा ही लपेटे हुए थे और कुछ नंगे ही थे। कुछ अत्यन्त कुरूप थे। किन्हींके कान गौ-सरीखे थे तो किन्हींके कान हाथी-जैसे थे। किन्हींके बहुत-से मुख, नेत्र और पेट थे तो किन्हींके बहुत-से पैर और भुजाएँ थीं। उनके हाथोंमें नाना प्रकारके दिव्यास्त्र शोभा पा रहे थे। किन्हींके मस्तकोंपर नाना प्रकारके पुष्प बँधे हुए थे तो कोई अनेकविध सर्पोंके ही आभूषण धारण किये हुए थे। कोई गोल मुखवाले अस्त्र लिये हुए थे तो कोई विभिन्न प्रकारके कवचोंसे विभूषित थे। कुछ दिव्य रूपधारी थे और विचित्र वाहनोंपर आरूढ़ हो आकाशमें विचर रहे थे।
* अध्याय १५४ *६४५
वीणावाद्यमुखोद्घुष्टा नानास्थानकनर्तकाः ।<br>गणेशांस्तांस्तथा दृष्ट्वा देवी प्रोवाच शङ्करम् ॥ ५३६<br><br>देव्युवाच<br>गणेशाः कति संख्याताः किं नामानः किमात्मकाः ।<br>एकैकशो मम ब्रूहि धिष्ठिता ये पृथक् पृथक् ॥ ५३७कुछ मुखसे वीणा आदि बाजे बजा रहे थे और कुछ यत्र-तत्र नाच रहे थे। इस प्रकार उन गणेश्वरोंको देखकर पार्वतीदेवी शंकरजीसे बोलीं ॥ ५३०-५३६ ॥<br><br>देवीने पूछा— 'प्रभो ! इन गणेश्वरोंकी संख्या कितनी है ? इनके क्या-क्या नाम हैं ? इनके स्वभाव कैसे हैं ? ये जो पृथक्-पृथक् बैठे हैं, इनमेंसे मुझे एक-एकका परिचय दीजिये ॥ ५३७ ॥
शङ्कर उवाच<br>कोटिसंख्या ह्यसंख्याता नानाविख्यातपौरुषाः ।<br>जगदापूरितं सर्वैरेभिर्भीमैर्महाबलैः ॥ ५३८<br>सिद्धक्षेत्रेषु रथ्यासु जीर्णोद्यानेषु वेश्मसु ।<br>दानवानां शरीरेषु बालेषून्मत्तकेषु च ।<br>एते विशन्ति मुदिता नानाहारविहारिणः ॥ ५३९<br>ऊष्मपाः फेनपाश्चैव धूमपा मधुपायिनः ।<br>रक्तपाः सर्वभक्षाश्च वायुपा ह्यम्बुभोजनाः ॥ ५४०<br>गेयनृत्योपहाराश्च नानावाद्यरवप्रियाः ।<br>न ह्येषां वै अनन्तत्वाद् गुणान् वक्तुं हि शक्यते ॥ ५४१शंकरजी बोले— 'देवि! यों तो ये असंख्य हैं, परंतु प्रधान-प्रधान गणेश्वरोंकी संख्या एक करोड़ है। ये विभिन्न प्रकारके पुरुषार्थोंके लिये विख्यात हैं। इन सभी महाबली भयंकर गणोंसे सारा जगत् परिपूर्ण है। नाना प्रकारके आहार-विहारसे युक्त ये गणेश्वर हर्षपूर्वक सिद्ध क्षेत्रों, गलियों, पुराने उद्यानों, घरों, दानवोंके शरीरों, बालकों और पागलोंमें प्रवेश करते हैं। ये सभी ऊष्मा, फेन, धूम, मधु, रक्त और वायुका पान करनेवाले हैं। जल इनका भोजन है और ये सर्वभक्षी हैं। ये नाच-गानके उपहारसे प्रसन्न होनेवाले और अनेकों प्रकारके वाद्य-शब्दोंके प्रेमी हैं। अनन्त होनेके कारण इनके गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ५३८-५४१ ॥
देव्युवाच<br>मार्गत्वगुत्तरासङ्गः शुद्धाङ्गो मुञ्जमेखली ।<br>वामस्थेन च शिक्येन चपलो रञ्जिताननः ॥ ५४२<br>मृगदंष्ट्रो ह्युत्पलानां स्रग्दामो मधुराकृतिः ।<br>पाषाणशकलोत्तानकांस्यतालप्रवर्तकः ॥ ५४३<br>असौ गणेश्वरो देवः किं नामा किंनरानुगः ।<br>य एष गणगीतेषु दत्तकर्णो मुहुर्मुहुः ॥ ५४४देवीने पूछा— 'स्वामिन् ! जो मृगचर्मका दुपट्टा लपेटे हुए हैं, जिसके सभी अङ्ग शुद्ध हैं; जो मूँजकी मेखला धारण किये हुए हैं, जिसके बायें कंधेपर झोली लटक रही है, जो अत्यन्त चञ्चल और रँगे हुए मुखवाला है, जिसकी दाढ़ सिंहके सदृश है, जो कमल-पुष्पोंकी माला धारण किये हुए, सुन्दर आकृतिसे युक्त और पाषाण-खण्डसे उत्तान रखे हुए काँसेके बाजेपर ताल लगा रहा है तथा जिसके पीछे किन्नर लोग चल रहे हैं और जो अन्य गणोंद्वारा गाये गये गीतोंपर बार-बार कान लगाये हुए हैं, उस गणेश्वर देवका क्या नाम है ? ॥ ५४२-५४४ ॥
शर्व उवाच<br>स एष वीरको देवि सदा मद्धृदयप्रियः ।<br>नानाश्चर्यगुणाधारो गणेश्वरगणार्चितः ॥ ५४५शंकरजीने कहा— देवि! यही वह वीरक है, जो सदा मेरे हृदयको प्रिय लगनेवाला है। यह नाना प्रकारके आश्चर्यजनक गुणोंका आश्रय तथा सभी गणेश्वरोंद्वारा पूजित—सम्मानित है ॥ ५४५ ॥
देव्युवाच<br>ईदृशस्य सुतस्यास्ति ममोत्कण्ठा पुरान्तक ।<br>कदाहमीदृशं पुत्रं द्रक्ष्याम्यानन्ददायिनम् ॥ ५४६देवीने पूछा— त्रिपुरनाशक भगवन्! मेरे मनमें ऐसा ही पुत्र प्राप्त करनेकी प्रबल उत्कण्ठा है। मैं कब ऐसे आनन्ददायक पुत्रको देखूँगी ? ॥ ५४६ ॥

६४६ * मत्स्यपुराण *

शर्व उवाचशिवजीने कहा—
शर्व उवाच<br>एष एव सुतस्तेऽस्तु नयनानन्दहेतुकः।<br>त्वया मात्रा कृतार्थस्तु वीरकोऽपि सुमध्यमे॥ ५४७<br>इत्युक्ता प्रेषयामास विजयां हर्षणोत्सुका।<br>वीरकानयनायाशु दुहिता हिमभूभृतः॥ ५४८<br>सावरुह्य त्वरायुक्ता प्रासादादम्बरस्पृशः।<br>विजयोवाच गणपं गणमध्ये प्रवर्तिता॥ ५४९<br>एहि वीरक चापल्यात् त्वया देवः प्रकोपितः।<br>किमुत्तरं वदत्यर्थे नृत्येरङ्गे तु शैलजा॥ ५५०<br>इत्युक्तस्त्यक्तपाषाणशकलो मार्जिताननः।<br>आहूतस्तु तयोद्भूतमूलप्रस्तावशंसकः॥ ५५१<br>देव्याः समीपमागच्छद् विजयानुगतः शनैः।<br>प्रासादशिखरात्फुल्लरक्ताम्बुजनिभद्युतिः॥ ५५२<br>तं दृष्ट्वा प्रस्रुतानल्पस्वादुक्षीरपयोधरा।<br>गिरिजोवाच सस्नेहं गिरा मधुरवर्णया॥ ५५३**शिवजीने कहा—**सुमध्यमे! नेत्रोंको आनन्द प्रदान करनेवाला यह वीरक ही तुम्हारा पुत्र हो और वीरक भी तुम-जैसी माताको पाकर कृतार्थ हो जाय। इस प्रकार कही जानेपर पर्वतराजकी कन्या पार्वतीने हर्षसे उत्सुक होकर तुरंत ही वीरकको बुला लानेके लिये विजयाको भेजा। तब विजया शीघ्र ही उस गगनचुम्बी अट्टालिकासे नीचे उतरकर गणोंके मध्यमें पहुँची और गणेश्वर वीरकसे बोली—'वीरक! यहाँ आओ, तुम्हारी चञ्चलतासे भगवान् शंकर क्रुद्ध हो गये हैं। तुम्हारे इस नाच-रंगके विषयमें माता पार्वती भी देखो क्या कहती हैं।' विजयाके ऐसा कहनेपर वीरकने पाषाणखण्डको फेंक दिया और वह अपने मुखको धोकर माताद्वारा बुलाये जानेके मूल कारणके विषयमें सोचता हुआ विजयाके पीछे-पीछे पार्वतीदेवीके निकट आया। खिले हुए लाल कमलपुष्पकी-सी कान्तिवाली पार्वतीने अट्टालिकाके शिखरपरसे जब वीरकको आते हुए देखा तो उनके स्तनोंसे अधिक मात्रामें स्वादिष्ट दूध टपकने लगा। तब गिरिजा स्नेहपूर्वक मधुर वाणीमें वीरकसे बोलीं॥ ५४७–५५३॥
उमोवाच<br>एह्येहि यातोऽसि मे पुत्रतां<br>देवदेवेन दत्तोऽधुना वीरक।<br>इत्येवमङ्के निधायाथ तं पर्यचुम्बत्<br>कपोले शनैः कलवादिनम्॥ ५५४<br>मूर्ध्यापाघ्राय सम्मार्ज्य गात्राणि<br>ते भूषयामास दिव्यैः स्रजैर्भूषणैः।<br>किङ्किणीमेखलानूपुरै-<br>र्माणिक्यकेयूरहारोरुमूलगुणैः ॥ ५५५<br>कोमलैः पल्लवैश्चित्रितैश्चारुभि-<br>र्दिव्यमन्त्रोद्भवैस्तस्य शुभ्रैस्ततो<br>भूरिभिश्चाकरोन्मिश्र-<br>सिद्धार्थकै रङ्गरक्षाविधिम् ॥ ५५६<br>एवमादाय चोवाच कृत्वा स्रजं<br>मूर्ध्नि गोरोचनापत्रभङ्गोञ्ज्वलैः॥ ५५७<br>गच्छ गच्छाधुना क्रीड सार्धं गणै-<br>रप्रमत्तो वस शुभ्रवर्जी शनै-**उमाने कहा—**वीरक! आओ, यहाँ आओ, देवाधिदेवने तुम्हें मुझे प्रदान किया है। अब तुम मेरे पुत्रस्वरूप हो गये हो। ऐसा कहकर माता पार्वती वीरकको अपनी गोदमें बैठाकर उस मधुरभाषी पुत्रके कपोलोंका चुम्बन करने लगीं। उन्होंने उसका मस्तक सूँघकर शरीरके सभी अङ्गोंको नहलाकर स्वच्छ किया। फिर किंकिणी, कटिसूत्र, नूपुर, मणिनिर्मित केयूर, हार और ऊरुमूलगुण (कच्छी) आदि दिव्य आभूषणोंसे उसे स्वयं विभूषित किया। तत्पश्चात् अत्यन्त सुन्दर विचित्र रंगके कोमल पल्लवों, दिव्य मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित अनेकों माङ्गलिक सूक्तों तथा अनेक धातुओंके चूर्णोंसे मिश्रित सफेद सरसोंसे उसके अङ्गोंकी रक्षाका विधान किया। इस प्रकार उसे गोदमें लेकर मुखपर गोरोचनसे उज्ज्वल पत्रभंगीकी रचना करके उसके मस्तकपर माला डालकर कहा—'बेटा! अब जाओ और अपने साथी गणोंके साथ सावधान होकर खेलो। उनके साथ कपटरहित होकर निवास करो।
  • अध्याय १५४ * । ६४७
संस्कृतहिन्दी
व्यालमालाकुलाः शैलसानुद्रुम-<br>दन्तिभिर्भिन्नसाराः परे सङ्गिनः ॥ ५५८<br>जाह्नवीयं जलं क्षुब्धतोयाकुलं<br>कूलं मा विशेथा बहुव्याघ्रदुष्टे वने।<br>वत्सासंख्येषु दुर्गा गणेश्वेष्वेतस्मिन्<br>वीरके पुत्रभावोपतुष्टान्तःकरणा तिष्ठतु ॥ ५५९<br>स्वस्य पितृजनप्रार्थितं<br>भव्यमायातिभाविन्यसौ भव्यता।तुम्हारे दूसरे साथी व्यालसमूहोंसे व्याकुल और पर्वतशिखर, वृक्ष और गजराजोंसे परास्त हो रहे हैं। गङ्गाका जल अत्यन्त क्षुब्ध हो रहा है, उसने तटको जर्जर कर दिया है, अतः वहाँ तथा बहुत-से दुष्ट व्याघ्रोंसे भरे हुए वनमें मत प्रवेश करना। इन पुत्ररूप असंख्य गणेश्वरोंमें इस वीरकपर दुर्गादेवी सदा पुत्रभावसे संतुष्ट अन्तःकरणवाली बनी रहें। अपने पितृजनोंद्वारा प्रार्थित भावी अवश्य घटित होती है, अतः यह भव्यता तुम्हें भविष्यमें प्राप्त होगी' ॥ ५५८-५५९ १/२ ॥
सोऽपि निर्वर्त्य सर्वान् गणान् सस्मय-<br>माह बालत्वलीलारसाविष्ठधीः ॥ ५६०<br>एष मात्रा स्वयं मे कृतभूषणो-<br>ऽत्र एष पटः पटलैर्बिन्दुभिः।<br>सिन्दुवारस्य पुष्पैरियं मालती-<br>मिश्रिता मालिका मे शिरस्याहिता ॥ ५६१<br>कोऽयमातोद्यधारी गणस्तस्य<br>दास्यामि हस्तादिदं क्रीडनम्।तदनन्तर बालक्रीडाके रसमें निमग्नबुद्धि वीरक भी वहाँसे लौटकर सभी गणोंसे हँसते हुए बोला—'मित्रो! देखो, स्वयं माताने मेरा यह शृङ्गार किया है। उन्होंने ही यह गुलाबी बिंदियोंसे युक्त वस्त्र पहनाया है और मालती-पुष्पोंसे मिली हुई यह सिन्दुवार-पुष्पोंकी माला मेरे सिरपर रखी है। यह आतोद्य नामक बाजा धारण करनेवाला कौन गण है? मैं उसे अपने हाथसे वह खिलौना दूँगा।' उधर
दक्षिणात्पश्चिमं पश्चिमादुत्तर-<br>मुत्तरात्पूर्वमभ्येत्य सख्या युता प्रेक्षती ॥ ५६२<br>तं गवाक्षान्तराद्वीरकं शैलपुत्री बहिः<br>क्रीडनं यज्जगन्मातुरप्येष चित्तभ्रमः।<br>पुत्रलुब्धो जनस्तत्र को मोहमायाति<br>न स्वल्पचेता जडो मांसविण्मूत्रसङ्घातदेहः॥ ५६३सखीके साथ पार्वती कभी दक्षिणसे पश्चिम, कभी पश्चिमसे उत्तर और कभी उत्तरसे पूर्वकी ओर घूम-घूमकर गवाक्ष मार्गसे बाहर खेलते हुए वीरककी ओर निहार रही थीं। जब जगन्माता पार्वतीके चित्तमें (पुत्रको खेलते हुए देखकर) इस प्रकार व्यामोह उत्पन्न हो जाता है, तब भला स्वल्पबुद्धि, मूर्ख, मांस, विष्ठा और मूत्रकी राशिसे भरे हुए शरीरको धारण करनेवाला ऐसा कौन पुत्रप्रेमी जन होगा जिसे मोह न प्राप्त हो।
द्रष्टुमभ्यन्तरं नाकवासेश्वरै-<br>रिन्दुमौलिं प्रविष्टेषु कक्षान्तरम्।<br>वाहनात्यावरोहा गणास्तैर्युतो लोक-<br>पालास्त्रमूर्तों ह्ययं खड्गो विक्षड्गकरः ॥ ५६४<br>निर्ममः कृतान्तः कस्य केनाहतो ब्रूत<br>मौनेभवन्तोऽस्त्रदण्डेन किं दुःस्पृहाः।<br>भीममूर्त्त्याननेनास्ति कृत्यं गिरौ<br>य एषोऽस्त्रज्ञेन किं वध्यते ॥ ५६५इसी बीच देवगण भगवान् चन्द्रशेखरका दर्शन करनेके लिये कक्षके भीतर प्रविष्ट हुए और प्रमथगण अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो गये। उनसे घिरे हुए वीरकने लोकपाल यमके अस्त्र खड्गको म्यानसे खींचकर कहा—'तुमलोग बतलाओ, निर्दय कृतान्त किस कारण किसका वध करना चाहता है? तुमलोग मौन क्यों हो? अस्त्रदण्डसे क्या अलभ्य है? भयंकर आकृतिवाले मेरे वर्तमान रहते इस पर्वतपर ऐसा कौन-सा कार्य है जो अस्त्रद्वारा सिद्ध नहीं हो सकता ॥ ५६०-५६५ १/२ ॥
मा वृथा लोकपालानुगचित्तता<br>एवमेवैतदित्युचुरस्मै तदा देवताः।<br>देवदेवानुगं वीरकं लक्षणा प्राह<br>देवी वनं पर्वता निर्झराण्यग्निदेव्यान्यथो ॥ ५६६वीरकके इस प्रकार कहनेपर देवताओंने उनसे कहा—'वीरक! तुम्हें इस प्रकार लोकपालोंके चित्तका अनुगमन नहीं करना चाहिये।' फिर लक्षणादेवी देवाधिदेव महादेवके अनुचर वीरकसे बोलीं—'तुमलोग प्राणियोंकी