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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

२४३- शुभाशुभ शकुनोंका निरूपण

९२० * मत्स्यपुराण *


| सुसमे भूमिभागे च दैवज्ञाधिष्ठितो नृपः।<br>गुरुणा चैव ऋत्विग्भिः सार्धं भूमिं परीक्षयेत्॥ ५<br>खनेत् कुण्डं च तत्रैव सुसमं हस्तमात्रकम्।<br>द्विगुणं लक्षहोमे तु कोटिहोमे चतुर्गुणम्॥ ६<br>युग्मास्तु ऋत्विजः प्रोक्ता अष्टौ वै वेदपारगाः।<br>कन्दमूलफलाहारा दधिक्षीराशिनोऽपि वा॥ ७<br>वेद्यां निधापयेच्चैव रत्नानि विविधानि च।<br>सिकतापरिवेषान्च ततोऽग्निं च समिन्धयेत्॥ ८<br>गायत्र्या दशसाहस्रं मानस्तोकेन षड्गुणः।<br>त्रिंशद् ग्रहाणां मन्त्रैश्च चत्वारो विष्णुदैवतैः॥ ९<br>कूष्माण्डैर्जुहुयात् पञ्च कुसुमाद्यैस्तु षोडश।<br>होतव्या दशसाहस्रं बादरैर्जातवेदसि॥ १०<br>श्रियो मन्त्रेण होतव्याः सहस्राणि चतुर्दश।<br>शेषाः पञ्चसहस्त्रास्तु होतव्यास्त्विन्द्रदैवतैः॥ ११<br>हुत्वा शतसहस्रं तु पुण्यस्नानं समाचरेत्।<br>कुम्भैः षोडशसंख्यैश्च सहिरण्यैः सुमङ्गलैः॥ १२<br>स्नापयेद् यजमानं तु ततः शान्तिर्भविष्यति।<br>एवं कृते तु यत्किंचिद् ग्रहपीडासमुद्भवम्॥ १३<br>तत् सर्वं नाशमायाति दत्त्वा वै दक्षिणां नृप।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रधाना दक्षिणा स्मृता॥ १४<br>हस्त्यश्वरथयानानि भूमिवस्त्रयुगानि च।<br>अनुडुद्गोशतं दद्याद् ऋत्विग्जां चैव दक्षिणाम्॥ १५<br>यथाविभवसारं तु वित्तशाठ्यं न कारयेत्।<br>मासे पूर्णे समाप्तस्तु लक्षहोमो नराधिप॥ १६<br>लक्षहोमस्य राजेन्द्र विधानं परिकीर्तितम्।<br>इदानीं कोटिहोमस्य शृणु त्वं कथयाम्यहम्॥ १७<br>गङ्गातटेऽथ यमुनासरस्वत्योर्न्ररेश्वर।<br>नर्मदादेविकायास्तु तटे होमो विधीयते॥ १८<br>तत्रापि ऋत्विजः कार्या रविनन्दन षोडश।<br>सर्वहोमे तु राजर्षे दद्याद् विप्रेऽथवा धनम्॥ १९<br>ऋत्विगाचार्यसहितो दीक्षां सांवत्सरीं स्थितः।<br>चैत्रे मासे तु सम्प्राप्ते कार्त्तिके वा विशेषतः॥ २०<br>प्रारम्भः करणीयो वा वत्सरं वत्सरं नृप। | समतल भूभागपर करना चाहिये। सर्वप्रथम राजा ज्योतिषीसे परामर्श कर गुरु और ऋत्विजोंके साथ भूमिकी परीक्षा करे। वहाँ एक हाथ गहरा चौकोर कुण्ड बनाये। लक्षहोममें यह कुण्ड दुगुना और कोटिहोममें चौगुना बड़ा बनाना चाहिये। इसके लिये सोलह ऋत्विज् बतलाये गये हैं, जो वेदोंके पारगामी विद्वान् कंद-मूल-फलका आहार करनेवाले अथवा दही-दूधका भोजन करनेवाले हों। यजमान राजा यज्ञवेदीपर विविध प्रकारके रत्न स्थापित करे। बालूद्वारा वेदीके चारों ओर मण्डल बनाकर अग्नि प्रज्वलित कराये। फिर गायत्रीमन्त्रद्वारा दस हजार, 'मानस्तोके०' (ऋ० ३।१३।६, वाजसनेयि १६।१६) आदि मन्त्रद्वारा छः हजार, ग्रहोंके मन्त्रोंसे तीस हजार, विष्णुसूक्तसे चार हजार, कोंहड़ेसे पाँच हजार, पुष्प-समूहसे सोलह हजार तथा बेरके फलोंसे दस हजार आहुतियाँ अग्निमें देनी चाहिये॥ ३-१०॥<br><br>इसी प्रकार श्रीसूक्तसे चौदह हजार आहुतियाँ देनी चाहिये और शेष पाँच हजार आहुतियाँ इन्द्र देवताके मन्त्रोंसे देनी चाहिये। फिर एक लाख आहुतियोंसे हवन कर पुण्यस्नान* सम्पन्न करे। तत्पश्चात् सुवर्णयुक्त सोलह मङ्गल-कलशोंसे यजमानको स्नान कराये, तब शान्तिकी प्राप्ति होती है। नृप! ऐसा करके दक्षिणा देनेपर ग्रहपीडासे उत्पन्न जो कुछ कष्ट होता है, वह सब नष्ट हो जाता है। इसीलिये सभी प्रकारसे दक्षिणाको ही प्रधान माना गया है। उस समय राजा अपनी सम्पत्तिके अनुकूल ऋत्विजोंको हाथी, घोड़े, रथ, वाहन, भूमि, जोड़े वस्त्र, बैल तथा सौ गौएँ दक्षिणारूपमें दे, कृपणता न करे। नराधिप! लक्षहोम एक मासमें समाप्त होता है। राजेन्द्र! इस प्रकार मैंने लक्षहोमका विधान आपको बतला दिया। अब मैं कोटिहोमका विधान बतला रहा हूँ, आप सुनिये। नरेश्वर! गङ्गा, यमुना और सरस्वतीके अथवा नर्मदा और देविका (सरयू)-के तटपर इस हवनके करनेका विधान है। रविनन्दन! इस कोटिहोममें भी सोलह ऋत्विजोंका वरण करना चाहिये। राजर्षे! सभी हवन-कार्योंमें ब्राह्मणोंको धन देना चाहिये। यजमान ऋत्विज् और आचार्यके साथ वर्षभरकी दीक्षा ग्रहण करे। राजन्! चैत्र अथवा विशेषतया कार्तिकका महीना आनेपर इस यज्ञको प्रारम्भ करना चाहिये। इसी प्रकार प्रतिवर्ष करनेका विधान है॥ ११-२०$\frac{१}{२}$॥ |


* पुण्यस्नानकी विस्तृत विधि बृहत्संहितामें दी गयी है।

* अध्याय २३१ * | ९२१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यजमानः पयोभक्षी फलाशी च तथानघ ॥ २१<br>यवादिव्रीहयो माषास्तिलाश्च सह सर्षपैः।<br>पालाशाः समिधः शस्ता वसोर्धारा तथोपरि ॥ २२<br>मासेऽथ प्रथमे दद्याद् ऋग्भ्यः क्षीरभोजनम्।<br>द्वितीये कृसरां दद्याद् धर्मकामार्थसाधनीम् ॥ २३<br>तृतीये मासि संयावो देयो वै रविनन्दन।<br>चतुर्थे मोदका देया विप्राणां प्रीतिमावहन् ॥ २४<br>पञ्चमे दधिभक्तं तु षष्ठे वै सक्तुभोजनम्।<br>पूपाश्च सप्तमे देया ह्यष्टमे घृतपूपकाः ॥ २५<br>षष्ट्योदनं च नवमे दशमे यवषष्टिका।<br>एकादशे समाषं तु भोजनं रविनन्दन ॥ २६<br>द्वादशे त्वथ सम्प्राप्ते मासे रविकुलोद्बह।<br>षड्रसैः सह भक्ष्यैश्च भोजनं सार्वकामिकम् ॥ २७<br>देया द्विजानां राजेन्द्र मासि मासि च दक्षिणाः।<br>अहतवासः संवीतो दिनार्धं होमयेच्छुचिः ॥ २८<br>तस्मात् सदोत्थितैर्भाव्यं यजमानैः सह द्विजैः।<br>इन्द्राद्यादिसुराणां च प्रीणनं सार्वकामिकम् ॥ २९<br>कृत्वा सुराणां राजेन्द्र पशुघातसमन्वितम्।<br>सर्वदानानि देवाना मग्निष्टोमं च कारयेत् ॥ ३०अनघ ! (अनुष्ठानके समय) यजमानको दुग्ध अथवा फलका आहार करना चाहिये। जौ आदि अन्न, उड़द, तिल, सरसों और पलाशकी लकड़ी इस होममें प्रशंसित हैं। इसके ऊपर वसुधारा छोड़नी चाहिये। पहले महीनेमें ऋत्विजोंको दुग्धका भोजन देना चाहिये। दूसरे महीनेमें धर्म, अर्थ और कामकी साधिका खिचड़ी खिलानी चाहिये। रविनन्दन ! तीसरे महीनेमें गोझिया देनी चाहिये। चौथे महीनेमें ब्राह्मणोंको प्रसन्न करते हुए लड्डू दे। पाँचवें महीनेमें दही और भात, छठे महीनेमें सत्तूका भोजन, सातवें महीनेमें मालपुआ और आठवें मासमें मालपुआ और घी दे। रविनन्दन ! नवें महीनेमें साठीका भात, दसवेंमें जौ-मिश्रित साठीका भात तथा ग्यारहवें महीनेमें उड़दयुक्त भोजन देना चाहिये। सूर्यकुलोत्पन्न ! बारहवें महीनेके आनेपर छहों रसोंसे युक्त सभी कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला भोजन दे। राजेन्द्र ! उन ब्राह्मणोंको प्रतिमास दक्षिणा भी देनी चाहिये। मध्याह्नके समय पवित्र वस्त्र धारण कर हवन करनेका विधान है। इसलिये यजमानको ब्राह्मणोंके साथ सर्वदा यज्ञ करनेके लिये उत्साहमयुक्त रहना चाहिये। इन्द्र आदि देवताओंको प्रसन्न करना चाहिये, यह सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है। राजेन्द्र ! फिर देवताओंके उद्देश्यसे बलि देकर सभी प्रकारके दानकर्मोंको सम्पादित करे। साथ ही अग्निष्टोमका अनुष्ठान करे॥ २१—३०॥
एवं कृत्वा विधानेन पूर्णाहुतिः शते शते।<br>सहस्रे द्विगुणा देया यावच्छतसहस्रकम् ॥ ३१<br>पुरोडाशस्ततः साध्यो देवतार्थे च ऋत्विजैः।<br>युक्तो वसन् मानवैश्च पुनः प्राप्तार्चनान् द्विजान् ॥ ३२<br>प्रीणयित्वा सुरान् सर्वान् पितॄनेव ततः क्रमात्।<br>कृत्वा शास्त्रविधानेन पिण्डानां च समर्पणम् ॥ ३३<br>समाप्तौ तस्य होमस्य विप्राणामथ दक्षिणाम्।<br>समां चैव तुलां कृत्वा बध्वा शिक्यद्वयं पुनः ॥ ३४<br>आत्मानं तोलयेत् तत्र पत्नीं चैव द्वितीयाकाम्।<br>सुवर्णेन तथाऽऽत्मानं रजतेन तथा प्रियाम् ॥ ३५<br>तोलयित्वा ददेत् राजा वित्तशाठ्यविवर्जितः।<br>ददेच्छतसहस्रं तु रूप्यस्य कनकस्य च ॥ ३६इस प्रकार विधिपूर्वक ग्रहयाग सम्पन्न कर शत होममें सौ, हजार होममें हजारसे लेकर लक्ष होमतक दो सौ पूर्णाहुतियाँ देनी चाहिये। तत्पश्चात् ऋत्विजोंको देवताओंके लिये पुरोडाश देना चाहिये। उन्हें क्रमशः उन्हीं आगत मनुष्योंमें ही उपस्थित समझना चाहिये। फिर क्रमशः पूजित ब्राह्मणों और देवताओंको प्रसन्न करके सभी पितरोंको शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पिण्ड समर्पित करे। इस होमके समाप्त होनेपर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। तदुपरान्त राजाको चाहिये कि कृपणताको छोड़कर समान भागवाली तराजू बनवाकर उसमें दो पलड़े बाँध दे और उसपर पत्नीसहित अपनेको तौले। उस समय अपनेको सुवर्णसे तथा पत्नीको चाँदीसे तौलनेका विधान है। तौलनेके बाद उसे ब्राह्मणको दे देना चाहिये। पुनः चाँदी तथा सुवर्णकी बनी हुई एक लक्ष मुद्राका दान करे