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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

५१ अग्नि-वंशका वर्णन तथा उनके भेदोपभेदका कथन

* अध्याय ४९ *१९९
जज्ञे सर्वगुणोपेतो विभ्राजस्तस्य चात्मजः।<br>विभ्राजस्य तु दायादस्त्वणुहो नाम वीर्यवान्॥ ५६<br>बभूव शुकजामाता कृत्वीभर्ता महायशाः।<br>अणुहस्य तु दायादो ब्रह्मदत्तो महीपतिः॥ ५७<br>युगदत्तः सुतस्तस्य विष्वक्सेनो महायशाः।<br>विभ्राजः पुनराजातो सुकृतेनेह कर्मणा॥ ५८<br>विष्वक्सेनस्य पुत्रस्तु उदक्सेनो बभूव ह।<br>भल्लाटस्तस्य पुत्रस्तु तस्यासीज्जनमेजयः।<br>उग्रायुधेन तस्यार्थे सर्वे नीपाः प्रणाशिताः॥ ५९उससे सम्पूर्ण गुणोंसे सम्पन्न विभ्राज नामक पुत्र पैदा हुआ। विभ्राजका पुत्र महायशस्वी एवं पराक्रमी अणुह हुआ, जो शुकदेवजीका जामाता एवं कृत्वीका पति था। अणुहका पुत्र राजा ब्रह्मदत्त हुआ। उसका पुत्र युगदत्त और युगदत्तका पुत्र महायशस्वी विष्वक्सेन हुआ। अपने पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप राजा विभ्राजने ही पुनः विष्वक्सेनरूपसे जन्म धारण किया था। विष्वक्सेनका पुत्र उदक्सेन हुआ। उसका पुत्र भल्लाट* और उसका पुत्र जनमेजय (द्वितीय) हुआ। इसी जनमेजयकी रक्षाके लिये उग्रायुधने सभी नीपवंशी नरेशोंको मौतके घाट उतारा था॥ ४६—५९॥
ऋषय ऊचुः<br>उग्रायुधः कस्य सुतः कस्य वंशे स कथ्यते।<br>किमर्थं तेन ते नीपाः सर्वे चैव प्रणाशिताः॥ ६०**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! उग्रायुध किसका पुत्र था? वह किसके वंशमें उत्पन्न हुआ बतलाया जाता है? तथा किस कारण उसने समस्त नीपवंशी राजाओंका संहार किया था? (यह हमें बतलाइये)॥ ६०॥
सूत उवाच<br>उग्रायुधः सूर्यवंश्यस्तपस्तेपे वराश्रमे।<br>स्थाणुभूतोऽष्टसाहस्रं तं भेजे जनमेजयः॥ ६१<br><br>तस्य राज्यं प्रतिश्रुत्य नीपानाजघ्निवान् प्रभुः।<br>उवाच सान्त्वं विविधं जघ्नुस्ते वै ह्युभावपि॥ ६२<br><br>हन्यमानांश्च तांश्चैव यस्माद्धेतोर्न मे वचः।<br>शरणागतरक्षार्थं तस्मादेवं शपामि वः॥ ६३<br><br>यदि मेऽस्ति तपस्तप्तं सर्वान् नयतु वो यमः।<br>ततस्तान् कृष्यमाणांस्तु यमेन पुरतः स तु॥ ६४<br><br>कृपया परयाऽऽविष्टो जनमेजयमूचिवान्।<br>गतानेतानिमान् वीरांस्त्वं मे रक्षितुमर्हसि॥ ६५**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! उग्रायुध सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए थे। इन्होंने एक श्रेष्ठ आश्रममें जाकर स्थाणुकी भाँति स्थित हो आठ हजार वर्षोंतक घोर तप किया। उसी समय (युद्धमें पराजित हुए) राजा जनमेजय उनके पास पहुँचे। (जनमेजयकी प्रार्थनापर) उन्हें राज्य दिलानेकी प्रतिज्ञा करके सामर्थ्यशाली उग्रायुधने नीपवंशियोंका संहार किया था। प्रथमतस्तु उग्रायुधने उन्हें अनेक प्रकारके सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा समझाने-बुझानेकी चेष्टा की, किंतु जब वे (इनकी बात न मानकर) इन्हीं दोनोंको मार डालनेके लिये उतारू हो गये, तब मारनेके लिये उद्यत हुए उनसे उग्रायुधने कहा—'जिस कारण तुमलोग मेरी बातको अनसुनी कर रहे हो, इसीलिये शरणागतकी रक्षाके हेतु मैं तुमलोगोंको इस प्रकारका शाप दे रहा हूँ कि यदि मैंने तपका अनुष्ठान किया है तो यमराज तुम सबको अपने घर उठा ले जायँ।' तदनन्तर अपने सामने ही उन्हें यमराजद्वारा घसीटा जाता हुआ देखकर उग्रायुधके हृदयमें अतिशय दया उत्पन्न हो गयी। तब उन्होंने जनमेजयसे कहा—'जनमेजय! तुम मेरे कहनेसे इन ले जाये गये हुए तथा ले जाये जाते हुए वीरोंकी रक्षा करो'॥ ६१—६५॥
जनमेजय उवाच<br>अरे पापा दुराचारा भवितारोऽस्य किंकराः।<br>तथेत्युक्तस्ततो राजा यमेन युयुधे चिरम्॥ ६६**जनमेजय बोले—**अरे पापी एवं दुराचारी यमदूतो! तुमलोग दण्डके भागी होओगे, अन्यथा उन्हें छोड़ दो। यमदूतोंद्वारा भी उसी प्रकारका उत्तर दिये जानेपर राजा जनमेजयने यमके साथ चिरकालतक युद्ध किया।

* इसने भल्लाटनगर (सुलेमानपर्वतके पासका एक शहर) बसाया, जहाँका राजा शशिध्वज (कल्किपुराण, अ० २१-२२) प्रसिद्ध था।

२००* मत्स्यपुराण *

| व्याधिभिर्नारकैर्घोरैर्यमेन सह तान् बलात्।<br>विजित्य मुनये प्रादात् तदद्भुतमिवाभवत्॥ ६७<br><br>यमस्तुष्टस्ततस्तस्मै मुक्तिज्ञानं ददौ परम्।<br>सर्वे यथोचितं कृत्वा जग्मुस्ते कृष्णमव्ययम्॥ ६८<br><br>येषां तु चरितं गृह्य हन्यते नापमृत्युभिः।<br>इह लोके परे चैव सुखमक्षय्यमश्नुते॥ ६९<br><br>अजमीढस्य धूमिन्द्यां विद्वाञ्जज्ञे यवीनरः।<br>धृतिमांस्तस्य पुत्रस्तु तस्य सत्यधृतिः स्मृतः।<br>अथ सत्यधृतेः पुत्रो दृढनेमिः प्रतापवान्॥ ७०<br><br>दृढनेमिसुतश्चापि सुधर्मा नाम पार्थिवः।<br>आसीत् सुधर्मतनयः सार्वभौमः प्रतापवान्॥ ७१<br><br>सार्वभौमेति विख्यातः पृथिव्यामेकराड् बभौ।<br>तस्यान्ववाये महति महापौरवनन्दनः॥ ७२<br><br>महापौरवपुत्रस्तु राजा रुक्मरथः स्मृतः।<br>अथ रुक्मरथस्यासीत् सुपार्श्वो नाम पार्थिवः॥ ७३<br><br>सुपार्श्वतनयश्चापि सुमतिर्नाम धार्मिकः।<br>सुमतेरपि धर्मात्मा राजा संनतिमानपि॥ ७४<br><br>तस्यासीत् संनतिमतः कृतो नाम सुतो महान्।<br>हिरण्यनाभिनः शिष्यः कौसल्यस्य¹ महात्मनः॥ ७५<br><br>चतुर्विंशतिधा येन प्रोक्ता वै सामसंहिताः।<br>स्मृतास्ते प्राच्यसामानः कार्ता नामेह सामगाः॥ ७६<br><br>कार्तिकृद्रायुधोऽसौ वै महापौरववर्धनः।<br>बभूव येन विक्रम्य पृथुकस्य पिता हतः॥ ७७<br><br>नीलो नाम महाराजः पाञ्चालाधिपतिर्वशी।<br>उग्रायुधस्य दायादः क्षेमो नाम महायशाः॥ ७८<br><br>क्षेमात् सुनीथः सञ्जज्ञे सुनीथस्य नृपञ्जयः।<br>नृपञ्जयाच्च विरथ इत्येते पौरवाः स्मृताः॥ ७९ | अन्ततोगत्वा उन्होंने भयंकर नारकीय व्याधियोंके साथ उन सबको बलपूर्वक जीतकर यमराजसहित उन्हें उग्रायुध मुनिको समर्पित कर दिया। यह एक अद्भुत-सी बात हुई। इससे प्रसन्न हुए यमराजने राजा जनमेजयको मुक्तिका उत्तम ज्ञान प्रदान किया। तत्पश्चात् वे सभी यथोचित धर्मकार्य कर अविनाशी भगवान् श्रीकृष्णमें लीन हो गये। इन नरेशोंके जीवन-चरितको जान लेनेपर मनुष्य अपमृत्यु आदिका शिकार नहीं होता। उसे इस लोक और परलोकमें अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है॥ ६६-६९॥<br><br>धूम्रिनीके गर्भसे अजमीढके पुत्ररूपमें विद्वान् यवीनरका जन्म हुआ। उसका पुत्र धृतिमान् हुआ और उसका पुत्र सत्यधृति कहा जाता है। सत्यधृतिका पुत्र प्रतापी दृढनेमि हुआ। दृढनेमिका पुत्र सुधर्मा नामक भूपाल हुआ। सुधर्माका पुत्र प्रतापी सार्वभौम था, जो भूतलपर एकच्छत्र चक्रवर्ती सम्राट्के रूपमें सुशोभित हुआ। उसके उस विशाल वंशमें एक महापौरव नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। राजा रुक्मरथ महापौरवके पुत्र कहे गये हैं। रुक्मरथका पुत्र सुपार्श्व नामका राजा हुआ। सुपार्श्वका पुत्र धर्मात्मा सुमति हुआ। सुमतिका पुत्र धर्मात्मा राजा संनतिमान् था। उस संनतिमान्का कृत नामक महान् प्रतापी पुत्र था, जो महात्मा हिरण्यनाभ कौसल्य (कौथुम²)—का शिष्य हुआ। इसी राजाने सामवेदकी संहिताओंको चौबीस भागोंमें विभक्त किया, जो प्राच्यसामके नामसे प्रसिद्ध हुई तथा उन साम-संहिताओंका गान करनेवाले कार्त नामसे कहे जाने लगे। ये उग्रायुध इसी कृतके पुत्र थे, जो पौरववंशकी विशेषरूपसे वृद्धि करनेवाले थे। इन्होंने ही पराक्रम प्रकट करके पृथुकके पिता पाञ्चाल-नरेश जितेन्द्रिय महाराज नीलका वध किया था। उग्रायुधका पुत्र महायशस्वी क्षेम हुआ। क्षेमसे सुनीथका और सुनीथसे नृपञ्जयका जन्म हुआ। नृपञ्जयसे विरथकी उत्पत्ति हुई। ये सभी नरेश पौरवनामसे विख्यात हुए॥ ७०-७९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे पौरववंशकीर्तनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ४९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें पौरव-वंश-कीर्तन नामक उनचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४९॥


१. वायुपुराण ९९। १०० में यहाँ 'कौथुम' पाठ है। सामवेदियोंकी कौथुमी संहिता प्रसिद्ध है।
२. यहाँ सामवेद-संहिताके इतिहासकी एकसे चौबीस (तथा पुनः एक हजार शाखा होनेकी) बड़ी रहस्यात्मक बात कही गयी है। कार्त शाखाका उल्लेख सभी चरणव्यूहोंमें भी है। इसी प्रकार वायु ५९-६१ तथा ब्रह्माण्ड २। ३८-४१ में भी वेदोंका सच्चा एवं विस्तृत इतिहास है। २४ सामशाखाएँ चरणव्यूह आदिमें यों निर्दिष्ट हैं—१-वार्त्तान्तरेय, २-राणायनीय, ३-शाट्यायनीय, ४-आसुरायणीय, ५-वासुरायणीय, ६-प्राचीनयोग, ७-प्राञ्जल ऋग्, ८-साध्यमुद्गल, ९-खल्वल, १०-महाखल्वल, ११-माङ्गल, १२-कौथुम, १३-गौतम, १४-जैमिनीय, १५-सुपर्ण, १६-बालखिल्य, १७-सान्त्यमुग्र, १८-कालेय, १९-महाकालेय, २०-लाङ्गलायन, २१-शार्दूल, २२-तातायन, २३-नैगमीय और २४-पावमान।

* अध्याय ५० *२०१

पचासवाँ अध्याय

पूरुवंशी नरेशोंका विस्तृत इतिहास

| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! अजमीढकी नीलिनी नामकी पत्नीके गर्भसे राजा नीलका$^१$ जन्म हुआ। नीलकी उग्र तपस्याके परिणामस्वरूप सुशान्तिकी उत्पत्ति हुई। सुशान्तिसे पुरुजानुका और पुरुजानुसे पृथुका जन्म हुआ। पृथुका पुत्र भद्राश्व हुआ। अब भद्राश्वके पुत्रोंके विषयमें सुनिये—मुद्गल, जय, राजा बृहदिषु, पराक्रमी जवीनर और पाँचवाँ कपिल—ये पाँचों भद्राश्वके पुत्र थे। इन पाँचोंके द्वारा शासित जनपद पञ्चाल$^२$ नामसे प्रसिद्ध हुए। ये सभी पञ्चाल देशोंके रक्षक थे—ऐसा हमलोगोंने सुना है। मुद्गलके पुत्रगण, जो क्षत्रियांशसे युक्त द्विजाति थे, मौद्गल्य नामसे प्रसिद्ध हुए। ये कण्व और मुद्गलके गोत्रमें उत्पन्न होनेवाले द्विजाति अङ्गिराके पक्षमें सम्मिलित हो गये। महायशस्वी ब्रह्मिष्ठने मुद्गलके पुत्ररूपमें जन्म लिया। उसका पुत्र इन्द्रसेन और उसका पुत्र विन्ध्याश्व हुआ। विन्ध्याश्वके संयोगसे मेनकाके गर्भसे जुड़वीं संतान उत्पन्न हुई थी—ऐसा सुना जाता है। उनमें एक तो राजर्षि दिवोदास थे और दूसरी यशस्विनी अहल्या थी। अहल्याने शरद्वान् गौतमके पुत्र ऋषिश्रेष्ठ शतानन्दको उत्पन्न किया था। शतानन्दका पुत्र महातपस्वी एवं धनुर्वेदका पारंगत विद्वान् सत्यधृति हुआ। धर्मात्मा सत्यधृतिका वीर्य अमोघ था। एक बार एक अप्सराको देखकर सत्यधृतिका वीर्य (सरोवरमें स्नान करते समय) जलमें स्खलित हो गया। उस वीर्यसे उस सरोवरमें जुड़वीं संतान उत्पन्न हो गयी। वे उसी सरोवरमें पल रहे थे। एक बार महाराज शांतनु शिकारके लिये निकले हुए थे। वे उस सरोवरमें घूमते हुए उन बच्चोंको देखकर कृपा-परवश हो उन्हें उठा लाये। इस प्रकार मैंने शरद्वान्‌के उन पुत्रोंका जो गौतम (गोत्र) नामसे विख्यात हैं, वर्णन कर दिया। अब इसके आगे दिवोदासकी संततिका वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनिये॥ १—१२॥ |
| अजमीढस्य नीलिन्यां नीलः समभवन्नृपः।<br>नीलस्य तपसोग्रेण सुशान्तिरुदपद्यत॥ १<br>पुरुजानुः सुशान्तेस्तु पृथुस्तु पुरुजानुतः।<br>भद्राश्वः पृथुदायादो भद्राश्वतनयाञ्छृणु॥ २<br>मुद्गलश्च जयश्चैव राजा बृहदिषुस्तथा।<br>जवीनरश्च विक्रान्तः कपिलश्चैव पञ्चमः॥ ३<br>पञ्चानां चैव पञ्चालानेताञ्जनपदान् विदुः।<br>पञ्चालरक्षिणो ह्येते देशानामिति नः श्रुतम्॥ ४<br>मुद्गलस्यापि मौद्गल्याः क्षत्रोपेता द्विजातयः।<br>एते ह्यङ्गिरसः पक्षं संश्रिताः काण्वमुद्गलाः॥ ५<br>मुद्गलस्य सुतो जज्ञे ब्रह्मिष्ठः सुमहाद्यशाः।<br>इन्द्रसेनः सुतस्तस्य विन्ध्याश्वस्तस्य चात्मजः॥ ६<br>विन्ध्याश्वान्मिथुनं जज्ञे मेनकायामिति श्रुतिः।<br>दिवोदासश्च राजर्षिरहल्या च यशस्विनी॥ ७<br>शरद्वतस्तु दायादमहल्या सम्प्रसूयत।<br>शतानन्दमृषिश्रेष्ठं तस्यापि सुमहातपाः॥ ८<br>सुतः सत्यधृतिर्नाम धनुर्वेदस्य पारगः।<br>आसीत् सत्यधृतेः शुक्रममोघं धार्मिकस्य तु॥ ९<br>स्कन्नं रेतः सत्यधृतेर्दृष्ट्वा चाप्सरसं जले।<br>मिथुनं तत्र सम्भूतं तस्मिन् सरसि सम्भृतम्॥ १०<br>ततः सरसि तस्मिंस्तु क्रममाणं महीपतिः।<br>दृष्ट्वा जग्राह कृपया शान्तनुर्मृगयां गतः॥ ११<br>एते शरदतः पुत्रा आख्याता गौतमा वराः।<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दिवोदासस्य वै प्रजाः॥ १२ | |


१. यह नील राजाकी चर्चा गत अध्यायके अन्तमें ७८ वें श्लोकमें भी है। ये उनसे भिन्न हैं।
२. यह रुहेलखण्ड है, जो दिल्लीसे पूर्व गङ्गाके उत्तर तथा दक्षिणमें चम्बल नदीके तटतक फैला है। ये दक्षिण और उत्तर पञ्चालके नामसे प्रसिद्ध हैं। उत्तर पञ्चालकी राजधानी अहिच्छत्र (रामनगर) तथा दक्षिण पञ्चालकी राजधानी कम्पिल और माकंद थी। (द्रष्टव्य- महाभारत आदि० १४०, उद्योग० १९३, गर्गसंहिता १३९ आदि) गौतमबुद्धके समय उत्तर पञ्चालकी राजधानी कन्नौज भी रहा। राइस् डेविड्स। 'Buddhist India'.

२०२ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दिवोदासस्य दायादो धर्मिष्ठो मित्रयुर्नृपः।<br>मैत्रायणावरः सोऽथ मैत्रेयस्तु ततः स्मृतः॥ १३<br>एते वंश्य यतेः पक्षाः क्षत्रोपेतास्तु भार्गवाः।<br>राजा चैद्यवरो नाम मैत्रेयस्य सुतः स्मृतः॥ १४<br>अथ चैद्यवराद् विद्वान् सुदासस्तस्य चात्मजः।<br>अजमीढः पुनर्जातः क्षीणे वंशे तु सोमकः॥ १५<br>सोमकस्य सुतो जन्तुर्हते तस्मिञ्शतं बभौ।<br>पुत्राणामजमीढस्य सोमकस्य महात्मनः॥ १६<br>महिषी त्वजमीढस्य धूमिनी पुत्रवर्धिनी।<br>पुत्राभावे तपस्तेपे शतं वर्षाणि दुश्चरम्॥ १७<br>हुत्वाग्निं विधिवत् सम्यक् पवित्रीकृतभोजना।<br>अग्निहोत्रक्रमेणैव सा सुष्वाप महाव्रता॥ १८<br>तस्यां वै धूम्रवर्णायामजमीढः समीयिवान्।<br>ऋक्षं सा जनयामास धूमवर्णं शताग्रजम्॥ १९<br>ऋक्षात् संवरणो जज्ञे कुरुः संवरणात् ततः।<br>यः प्रयागमतिक्रम्य कुरुक्षेत्रमकल्पयत्॥ २०<br>कृषतस्तु महाराजो वर्षाणि सुबहून्यथ।<br>कृष्यमाणस्ततः शक्रो भयात् तस्मै वरं ददौ॥ २१<br>पुण्यं च रमणीयं च कुरुक्षेत्रं तु तत् स्मृतम्।<br>तस्यान्ववायः सुमहान् यस्य नाम्ना तु कौरवाः॥ २२दिवोदासका ज्येष्ठ पुत्र धर्मिष्ठ राजा मित्रयु हुआ। तत्पश्चात् उससे छोटे मैत्रायण और उसके बाद मैत्रेयकी उत्पत्ति हुई। ये सभी पुत्र (ययातिके भाई) यतिके पक्षके थे और क्षत्रियांशसे युक्त भार्गव (भृगुवंशी) कहलाते थे। राजा चैद्यवर मैत्रेयके पुत्र कहे जाते हैं। चैद्यवरसे विद्वान् सुदासका जन्म हुआ। वंशके नष्ट हो जानेपर पुनः अजमीढ सुदासके पुत्र-रूपमें उत्पन्न हुए। इन्हींका दूसरा नाम सोमक भी है। सोमकका पुत्र जन्तु हुआ। उसके मारे जानेपर महात्मा अजमीढ सोमकके सौ पुत्र हुए। अजमीढकी धूमिनी नामकी पत्नी थी, जो पुत्रोंकी वृद्धि करनेवाली थी। जन्तुके मारे जानेसे पुत्रका अभाव हो जानेपर वह सौ वर्षोंतक दुष्कर तपस्यामें संलग्न हो गयी। एक समय भलीभाँति पवित्र किये हुए पदार्थोंको ही भोजन करनेवाली महान् व्रतपरायणा धूमिनी अग्निहोत्रके क्रमसे विधिपूर्वक अग्निमें हवन करके नींदके वशीभूत हो गयी। निरन्तर अग्निहोत्र करनेके कारण उसके शरीरका रंग धूमिल पड़ गया था। उसी समय अजमीढने उसमें गर्भाधान किया। उस गर्भसे धूमिनीने ऋक्ष नामक पुत्रको जन्म दिया, जो अपने सौ भाइयोंमें ज्येष्ठ था तथा जिसके शरीरका रंग धूम-वर्णका था। ऋक्षसे संवरणकी और संवरणसे कुरुकी उत्पत्ति हुई, जिन्होंने प्रयागका अतिक्रमण कर कुरुक्षेत्रकी तीर्थरूपमें कल्पना की थी। महाराज कुरु अनेकों वर्षोंतक इस कुरुक्षेत्रको अपने हाथों जोतते रहे। उन्हें इस प्रकार जोतते देखकर इन्द्रने भयभीत हो उन्हें वर प्रदान किया। इसी कारण कुरुक्षेत्र पुण्यप्रद और रमणीय क्षेत्र कहा जाता है। उन महाराज कुरुका वंश अत्यन्त विशाल था, जो उन्हींके नामसे (आगे चलकर) कौरव कहलाया॥ १३—२२॥
कुरोस्तु दयिताः पुत्राः सुधन्वा जहुरेव च।<br>परीक्षिच्च महातेजाः प्रजनश्चारिमर्दनः॥ २३<br>सुधन्वनस्तु दायादः पुत्रो मतिमतां वरः।<br>च्यवनस्तस्य पुत्रस्तु राजा धर्मार्थतत्त्ववित्॥ २४<br>च्यवनस्य कृमिः पुत्र ऋक्षाज्जज्ञे महातपाः।<br>कृमेः पुत्रो महावीर्यः ख्यातस्त्विन्द्रसमो विभुः॥ २५<br>चैद्योपरिचरो वीरो वसुर्नामान्तरिक्षगः।<br>चैद्योपरिचराज्जज्ञे गिरिका सप्त वै सुतान्॥ २६कुरुके सुधन्वा, जह्नु, महातेजस्वी परीक्षित् और शत्रुविनाशक प्रजन—ये चार परम प्रिय पुत्र हुए। सुधन्वाका पुत्र राजा च्यवन हुआ, जो बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ एवं धर्म और अर्थके तत्त्वका ज्ञाता था। च्यवनका पुत्र कृमि हुआ, जो ऋक्षसे उत्पन्न हुआ था। (इन्हीं) कृमिके पुत्र महापराक्रमी चैद्योपरिचर वसु हुए। वे प्रभावशाली, शूरवीर, इन्द्रके समान विख्यात और (सदा विमानद्वारा) आकाशमें गमन करनेवाले थे। चैद्योपरिचरके संयोगसे गिरिकाने सात