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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

८३ पर्वतदानके दस भेद, धान्यशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य

* अध्याय ७९ *२९१
अहोरात्रे गते पश्चादष्टम्यां भोजयेद् द्विजान्।<br>यथाशक्त्यथ भुञ्जीत मांसतैलविवर्जितम्॥ ६<br>अनेन विधिना शुक्लसप्तम्यां मासि मासि च।<br>सर्वं समाचरेद् भक्त्या वित्तशाठ्यविवर्जितः॥ ७<br>व्रतान्ते शयनं दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्।<br>गां च दद्यात् स्वशक्त्या तु सुवर्णाढ्यां पयस्विनीम्॥ ८<br>भोजनासनदीपादीन् दद्यादिष्टानुपस्करान्।<br>अनेन विधिना यस्तु कुर्यात् कमलसप्तमीम्।<br>लक्ष्मीमनन्तामभ्येति सूर्यलोके महीयते॥ ९<br>कल्पे कल्पे ततो लोकान् सप्त गत्वा पृथक् पृथक्।<br>अप्सरोभिः परिवृतस्ततो याति परां गतिम्॥ १०<br>यः पश्यतीदं शृणुयाच्च मर्त्यः<br>पठेच्च भक्त्याथ मतिं ददाति।<br>सोऽप्यत्र लक्ष्मीमचलामवाप्य<br>गन्धर्वविद्याधरलोकभाक् स्यात्॥ ११भी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक सुसज्जित करके दान करे। पुनः दिन-रात बीत जानेके बाद अष्टमी तिथिको अपनी सामर्थ्यके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन करावे। उसके बाद स्वयं भी मांस और तेलसे रहित अन्नका भोजन करे। प्रत्येक मासमें शुक्लपक्षकी सप्तमीको इसी विधिके अनुसार कंजूसी छोड़कर भक्तिपूर्वक सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये। (एक वर्ष पूर्ण होनेपर) व्रतकी समाप्तिके समय स्वर्णमय कमलके साथ एक शय्याका भी दान करना चाहिये। साथ ही अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसे सुसज्जित एक दुधारू गौ तथा भोजन, आसन, दीप आदि अभीष्ट सामग्रियोंके भी दान करनेका विधान है। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार कमलसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करता है, उसे अनन्त लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है और वह सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वह प्रत्येक कल्पमें अप्सराओंसे घिरा हुआ पृथक्-पृथक् सातों लोकोंमें भ्रमण करनेके पश्चात् परमगतिको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस व्रतको देखता, सुनता, पढ़ता और इसे करनेके लिये सम्मति देता है, वह भी इस लोकमें अचल लक्ष्मीका उपभोग कर अन्तमें गन्धर्व-विद्याधरलोकका भागी होता है॥ १—११॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कमलसप्तमीव्रतं नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कमलसप्तमीव्रत नामक अठहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७८ ॥


उन्यासीवाँ अध्याय

मन्दारसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

ईश्वर उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम्।<br>सर्वकामप्रदां पुण्यां नाम्ना मन्दारसप्तमीम्॥ १<br>माघस्यामलपक्षे तु पञ्चम्यां लघुभुङ्नरः।<br>दन्तकाष्ठं ततः कृत्वा षष्ठीमुपवसेद् बुधः॥ २<br>विप्रान् सम्पूजयित्वा तु मन्दारं प्राशयेन्निशि।<br>ततः प्रभात उत्थाय कृत्वा स्नानं पुनर्द्विजान्॥ ३ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! अब मैं परम पुण्यप्रदायिनी मन्दारसप्तमीका वर्णन करता हूँ, जो समस्त पापोंकी विनाशिनी एवं सम्पूर्ण कामनाओंकी प्रदात्री है। बुद्धिमान् व्रतीको चाहिये कि वह माघमासमें शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिको थोड़ा आहार करके (रात्रिमें शयन करे)। पुनः षष्ठी तिथिको प्रातःकाल दातून कर दिनभर उपवास करे। रातमें ब्राह्मणोंकी पूजा कर मन्दार-पुष्पका भक्षण करे और सो जाय। तत्पश्चात् सप्तमी* तिथिको प्रातःकाल उठकर स्नान आदि नित्यकर्म सम्पादन कर

* पाद्म, वायव्यादि विविध माघमाहात्म्यों एवं 'व्रतरत्न' आदि व्रतनिबन्धोंमें इसी तिथिको अचलासप्तमी, रथसप्तमी, रथाङ्गसप्तमी, महासप्तमी आदि कहकर अन्य व्रत भी निर्दिष्ट हैं।

२९२* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भोजयेच्छक्तितः कुर्यात् मन्दारकुसुमाष्टकम्।<br>सौवर्णं पुरुषं तद्वत् पद्महस्तं सुशोभनम्॥ ४<br><br>पद्मं कृष्णातिलैः कृत्वा ताम्रपात्रेऽष्टपत्रकम्।<br>हेममन्दारकुसुमैर्भास्करायेति पूर्वतः॥ ५<br><br>नमस्कारेण तद्वच्च सूर्यायेत्यानले दले।<br>दक्षिणे तद्वदर्काय तथार्यम्णेति नैर्ऋते॥ ६<br><br>पश्चिमे वेदधाम्ने च वायव्ये चण्डभानवे।<br>पूष्णोत्युत्तरतः पूज्यमानन्दायैत्यतः परम्॥ ७<br><br>कर्णिकायां च पुरुषं स्थाप्य सर्वात्मनेति च।<br>शुक्लवस्त्रैः समावेष्ट्य भक्ष्यैर्माल्पफलादिभिः॥ ८अपनी शक्तिके अनुसार पुनः ब्राह्मणोंको भोजन करावे। तदनन्तर सोनेके आठ मन्दार-पुष्प और एक पुरुषाकार सुन्दर मूर्ति बनवाये, जिसके हाथमें कमल सुशोभित हो। पुनः ताँबेके पात्रमें काले तिलोंसे अष्टदल कमलकी रचना करे। तदनन्तर स्वर्णमय मन्दार-पुष्पोंद्वारा (कमलके आठों दलोंपर वक्ष्यमाण-मन्त्रोंका उच्चारण करके सूर्यका आवाहन करे। यथा—) 'भास्कराय नमः' से पूर्वदलपर, 'सूर्याय नमः' से अग्निकोणस्थित दलपर, 'अर्काय नमः' से दक्षिणदलपर, 'अर्यम्णे नमः' से नैर्ऋत्यकोणवाले दलपर, 'वेदधाम्ने नमः' से पश्चिमदलपर, 'चण्डभानवे नमः' से वायव्यकोणस्थित दलपर, 'पूष्णे नमः' से उत्तरदलपर, उसके बाद 'आनन्दाय नमः' से ईशानकोणवाले दलपर स्थापना करके कर्णिकाके मध्यमें 'सर्वात्मने नमः' कहकर पुरुषाकार मूर्तिको स्थापित कर दे तथा उसे श्वेत वस्त्रोंसे ढँककर खाद्य पदार्थ (नैवेद्य), पुष्पमाला, फल आदिसे उसकी अर्चना करे॥ १-८॥
एवमभ्यर्च्य तत् सर्वं दद्याद् वेदविदे पुनः।<br>भुञ्जीतातैललवणं वाग्यतः प्राङ्मुखो गृही॥ ९<br><br>अनेन विधिना सर्वं सप्तम्यां मासि मासि च।<br>कुर्यात् संवत्सरं यावद् वित्तशाठ्यविवर्जितः॥ १०इस प्रकार गृहस्थ व्रती उस मूर्तिका पूजन कर पुनः वह सारा सामान वेदज्ञ ब्राह्मणको दान कर दे और स्वयं पूर्वाभिमुख बैठकर मौन हो तेल और नमकरहित अन्नका भोजन करे। इस प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक मासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको इसी विधिके अनुसार सारा कार्य सम्पन्न करनेका विधान है। इसमें कृपणता नहीं करनी चाहिये।
एतदेव व्रतान्ते तु निधाय कलशोपरि।<br>गोभिर्विभवतः सार्धं दातव्यं भूतिमिच्छता॥ ११व्रतकी समाप्तिके समय वैभवकी अभिलाषा रखनेवाला व्रती उस मूर्तिको कलशके ऊपर रखकर अपनी धन-सम्पत्तिके अनुसार प्रस्तुत की गयी गौओंके साथ दान कर दे।
नमो मन्दारनाथाय मन्दारभवनाय च।<br>त्वं रवे तारयस्वास्मानस्मात् संसारसागरात्॥ १२(उस समय सूर्यभगवान्से यों प्रार्थना करे—) 'सूर्यदेव! आप मन्दारके स्वामी हैं और मन्दार आपका भवन है, आपको नमस्कार है। आप हमलोगोंका इस संसाररूपी सागरसे उद्धार कीजिये।'
अनेन विधिना यस्तु कुर्यान्मन्दारसप्तमीम्।<br>विपाप्मा स सुखी मर्त्यः कल्पं च दिवि मोदते॥ १३जो मानव उपर्युक्त विधिके अनुसार इस मन्दारसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करता है, वह पापरहित हो सुखपूर्वक एक कल्पतक स्वर्गमें आनन्दका उपभोग करता है।
इमामघौघपटलभीषणध्वान्तदीपिकाम् ।<br>गच्छन् संगृह्य संसारशर्वर्यां न स्खलेन्नरः॥ १४यह सप्तमीव्रत पापसमूहरूप परदेसे आच्छादित होनेके कारण प्रकट हुए भयंकर अन्धकारके लिये दीपकके समान है, जो मनुष्य इसे हाथमें लेकर संसाररूपी रात्रिमें यात्रा करता है, वह कहीं पथभ्रष्ट नहीं होता।
मन्दारसप्तमीमेतामीप्सितार्थफलप्रदाम् ।<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ १५जो मनुष्य अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली इस मन्दारसप्तमीके व्रतको पढ़ता अथवा श्रवण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ९-१५॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे मन्दारसप्तमीव्रतं नामैकोनाशीतितमोऽध्यायः॥ ७९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें मन्दारसप्तमीव्रत नामक उन्यासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७९॥

* अध्याय ८० * <span style="float: right;">२९३</span>


अस्सीवाँ अध्याय

शुभसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

श्रीभगवानुवाचश्रीभगवान्‌ने कहा—
अथान्यामपि वक्ष्यामि शोभनां शुभसप्तमीम्।<br>यामुपोष्य नरो रोगशोकदुःखैः प्रमुच्यते॥ १<br><br>पुण्ये चाश्वयुजे मासि कृतस्नानजपः शुचिः।<br>वाचयित्वा ततो विप्रानारभेच्छुभसप्तमीम्॥ २<br><br>कपिलां पूजयेद् भक्त्या गन्धमाल्यानुलेपनैः।<br>नमामि सूर्यसम्भूतामशेषभुवनालयाम्।<br>त्वामहं शुभकल्याणशरीरां सर्वसिद्धये॥ ३<br><br>अथ कृत्वा तिलप्रस्थं ताम्रपात्रेण संयुतम्।<br>काञ्चनं वृषभं तद्वद् गन्धमाल्यगुडान्वितम्॥ ४<br><br>फलैर्नानाविधैर्भक्ष्यैर्घृतपायससंयुतैः ।<br>दद्याद् विकालवेलायामर्यमा प्रीयतामिति॥ ५<br><br>पञ्चगव्यं च सम्प्राश्य स्वपेद् भूमावसंस्तरे।<br>ततः प्रभाते संजाते भक्त्या सम्पूजयेद् द्विजान्॥ ६<br><br>अनेन विधिना दद्यान्मासि मासि सदा नरः।<br>वाससी वृषभं हैमं तद्वद् गां काञ्चनोद्भवाम्॥ ७<br><br>संवत्सरान्ते शयनमिक्षुदण्डगुडान्वितम्।<br>सोपधानकविश्रामं भाजनासनसंयुतम्॥ ८<br><br>ताम्रपात्रे तिलप्रस्थं सौवर्णं वृषभं तथा।<br>दद्याद् वेदविदे सर्वं विश्वात्मा प्रीयतामिति॥ ९ब्रह्मन्! अब मैं एक अन्य सुन्दर शुभसप्तमीव्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका अनुष्ठान करके मनुष्य रोग, शोक और दुःखसे मुक्त हो जाता है। पुण्यप्रद आश्विनमासमें (शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको) व्रती स्नान, जप आदि नित्यकर्म करके पवित्र हो जाय, तब ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर शुभसप्तमी-व्रत आरम्भ करे। उस समय सुगन्धित पदार्थ, पुष्पमाला और चन्दन आदिसे भक्तिपूर्वक कपिला गौकी पूजा करके यों प्रार्थना करे—'देवि! आप सूर्यसे उत्पन्न हुई हैं और सम्पूर्ण लोकोंकी आश्रयभूता हैं तथा आपका शरीर सुशोभन मङ्गलोंसे युक्त है, आपको मैं समस्त सिद्धियोंकी प्राप्तिके निमित्त नमस्कार करता हूँ।' तदनन्तर एक ताँबेके पात्रमें एक सेर तिल भर दे और एक बड़े आसनपर स्वर्णमय वृषभको स्थापित कर उसकी चन्दन, माला, गुड़, फल, घी एवं दूधसे बने हुए नाना प्रकारके नैवेद्य आदिसे पूजा करे। फिर सायंकाल 'अर्यमा प्रसन्न हों' यों कहकर उसे दान कर दे। रातमें पञ्चगव्य खाकर बिना बिछावनके ही भूमिपर शयन करे। प्रातःकाल होनेपर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंकी पूजा करे। व्रती मनुष्यको प्रत्येक मासमें सदा इसी विधिसे दो वस्त्र, स्वर्णमय बैल और स्वर्णनिर्मित गौका दान करना चाहिये। इस प्रकार वर्षकी समाप्तिमें विश्रामहेतु गद्दा, तकिया आदिसे युक्त एवं ईख, गुड़, बर्तन, आसन आदिसे सम्पन्न शय्या तथा एक सेर तिलसे परिपूर्ण ताँबेके पात्रके ऊपर स्थापित स्वर्णमय वृषभ आदि सारा उपकरण वेदज्ञ ब्राह्मणको दान कर दे और यों कहे—'विश्वात्मा मुझपर प्रसन्न हों'॥ १-९॥
अनेन विधिना विद्वान् कुर्याद् यः शुभसप्तमीम्।<br>तस्य श्रीर्विपुला कीर्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि॥ १०<br><br>अप्सरोगणगन्धर्वैः पूज्यमानः सुरालये।<br>वसेद् गणाधिपो भूत्वा यावदाभूतसम्प्लवम्।<br>कल्पादाववतीर्णस्तु सप्तद्वीपाधिपो भवेत्॥ ११जो विद्वान् पुरुष उपर्युक्त विधिके अनुसार इस शुभसप्तमी-व्रतका अनुष्ठान करता है, उसे प्रत्येक जन्ममें विपुल लक्ष्मी और कीर्ति प्राप्त होती है। वह देवलोकमें गणाधीश्वर होकर अप्सराओं और गन्धर्वोंद्वारा पूजित होता हुआ प्रलयपर्यन्त निवास करता है। पुनः कल्पके
२९४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्रह्महत्यासहस्रस्य भ्रूणहत्याशतस्य च।<br>नाशयालमियं पुण्या पठ्यते शुभसप्तमी ॥ १२<br>इमां पठेद् यः शृणुयान्मुहूर्तं<br>पश्येत् प्रसङ्गादपि दीयमानम्।<br>सोऽप्यत्र सर्वाघविमुक्तदेहः<br>प्राप्नोति विद्याधरनायकत्वम् ॥ १३<br>यावत् समाः सप्त नरः करोति<br>यः सप्तमीं सप्तविधानयुक्ताम्।<br>स सप्तलोकाधिपतिः क्रमेण<br>भूत्वा पदं याति परं मुरारेः ॥ १४ ।आदिमें उत्पन्न होकर सातों द्वीपोंका अधिपति होता है। यह पुण्यप्रद शुभसप्तमी एक हजार ब्रह्महत्या और एक सौ भ्रूणहत्याके पापोंका नाश करनेके लिये समर्थ कही जाती है। जो मनुष्य इस व्रत-विधिको पढ़ता अथवा दो घड़ीतक सुनता है तथा प्रसङ्गवश दिये जाते हुए दानको देखता है, वह भी इस लोकमें समस्त पापोंसे विमुक्त होकर परलोकमें विद्याधरोंके अधिनायक-पदको प्राप्त करता है। जो मनुष्य उपर्युक्त सात विधानोंसे युक्त इस सप्तमीव्रतका सात वर्षोंतक अनुष्ठान करता है, वह क्रमशः सातों लोकोंका अधिपति होकर अन्तमें भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त हो जाता है॥ १०—१४॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे शुभसप्तमीव्रतं नामाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शुभसप्तमीव्रत नामक अस्सीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८०॥


इक्यासीवाँ अध्याय

विशोकद्वादशीव्रतकी विधि

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मनुरुवाच<br>किमभीष्टवियोगशोकसंघा-<br>दलमुद्धर्तुमुपोषणं व्रतं वा।<br>विभवोद्भवकारि भूतलेऽस्मिन्<br>भवभीतेरपि सूदनं च पुंसः ॥ १मनुने पूछा— भगवन्! इस भूतलपर कौन ऐसा उपवास या व्रत है, जो मनुष्यके अभीष्ट वस्तुओंके वियोगसे उत्पन्न शोकसमूहसे उद्धार करनेमें समर्थ, धन-सम्पत्तिकी वृद्धि करनेवाला और संसार-भयका नाशक है ॥ १॥
मत्स्य उवाच<br>परिपृष्टमिदं जगत्प्रियं ते<br>विबुधानामपि दुर्लभं महत्त्वात्।<br>तव भक्तिमतस्तथापि वक्ष्ये<br>व्रतमिन्द्रासुरमानवेषु गुह्यम् ॥ २<br><br>पुण्यमाश्वयुजे मासि विशोकद्वादशीव्रतम्।<br>दशम्यां लघुभुग्विद्वानारभेन्नियमेन तु ॥ ३<br><br>उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वा दन्तधावनपूर्वकम्।<br>एकादश्यां निराहारः सम्यगभ्यर्च्य केशवम्।<br>श्रियं वाभ्यर्च्य विधिवद् भोक्ष्येऽहं चापरेऽहनि ॥ ४मत्स्यभगवान्ने कहा— राजर्षे! तुमने जिस व्रतके विषयमें प्रश्न किया है, यह समस्त जगत्को प्रिय तथा इतना महत्त्वशाली है कि देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। यद्यपि इन्द्र, असुर और मानव भी उसे नहीं जानते, तथापि तुम-जैसे भक्तिमान्के प्रति मैं अवश्य इसका वर्णन करूँगा। उस पुण्यप्रद व्रतका नाम विशोकद्वादशीव्रत है। विद्वान् व्रतीको आश्विनमासमें दशमी तिथिको अल्प आहार करके नियमपूर्वक इस व्रतका आरम्भ करना चाहिये। पुनः एकादशीके दिन व्रती मानव उत्तराभिमुख अथवा पूर्वाभिमुख बैठकर दातून करे, फिर (स्नान आदिसे निवृत्त होकर) निराहार रहकर भगवान् केशव और लक्ष्मीकी विधिपूर्वक भलीभाँति पूजा करे और 'दूसरे दिन
* अध्याय ८१ *२९५
एवं नियमकृत् सुप्त्वा प्रातरुत्थाय मानवः।<br>स्नानं सर्वौषधैः कुर्यात् पञ्चगव्यजलेन तु॥<br>शुक्लमाल्याम्बरधरः पूजयेच्छ्रीशमुत्पलैः॥ ५<br>विशोकाय नमः पादौ जङ्घे च वरदाय वै।<br>श्रीशाय जानुनी तद्वदूरू च जलशायिने॥ ६<br>कन्दर्पाय नमो गुह्यं माधवाय नमः कटिम्।<br>दामोदरायेत्युदरं पार्श्वे च विपुलाय वै॥ ७<br>नाभिं च पद्मनाभाय हृदयं मन्मथाय वै।<br>श्रीधराय विभोर्वक्षः करौ मधुजिते नमः॥ ८<br>चक्रिणे वामबाहुं च दक्षिणं गदिने नमः।<br>वैकुण्ठाय नमः कण्ठमास्यं यज्ञमुखाय वै॥ ९<br>नासामशोकनिधये वासुदेवाय चक्षुषी।<br>ललाटं वामनायेति हरयेति पुनर्ध्रुवौ॥ १०<br>अलकान् माधवायेति किरीटं विश्वरूपिणे।<br>नमः सर्वात्मने तद्वच्छिर इत्यभिपूजयेत्॥ ११<br>एवं सम्पूज्य गोविन्दं फलमाल्यानुलेपनैः।<br>ततस्तु मण्डलं कृत्वा स्थण्डिलं कारयेन्मुदा॥ १२<br>चतुरस्रं समन्ताच्च रत्निमात्रमुदक्प्लवम्।<br>श्लक्ष्णं हृद्यं च परितो वप्रत्रयसमावृतम्॥ १३<br>त्र्यङ्गुलेनोच्छ्रिता वप्रास्तद्विस्तारस्तु द्व्यङ्गुलः।<br>स्थण्डिलस्योपरिष्टाच्च भित्तिरष्टाङ्गुला भवेत्॥ १४<br>नदीवालुकया शूर्पे लक्ष्म्याः प्रतिकृतिं न्यसेत्।<br>स्थण्डिले शूर्पमारोप्य लक्ष्मीमित्यर्चयेद् बुधः॥ १५<br>नमो देव्यै नमः शान्त्यै नमो लक्ष्म्यै नमः श्रियै।<br>नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै वृष्ट्यै हृष्ट्यै नमो नमः॥ १६<br>विशोका दुःखनाशाय विशोका वरदास्तु मे।<br>विशोका चास्तु सम्पत्त्यै विशोका सर्वसिद्धये॥ १७<br>ततः शुक्लाम्बरैः शूर्पं वेष्ट्य सम्पूजयेत् फलैः।<br>वस्त्रैर्नानाविधैस्तद्वत् सुवर्णकमलेन च॥ १८<br>रजनीषु च सर्वासु पिबेद् दर्भोदकं बुधः।<br>ततस्तु गीतनृत्यादि कारयेत् सकलां निशाम्॥ १९भोजन करूँगा'—ऐसा नियम लेकर रात्रिमें शयन करे। प्रातःकाल उठकर सर्वौषधि और पञ्चगव्य मिले हुए जलसे स्नान करे तथा श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करके भगवान् विष्णुकी कमल-पुष्पोंद्वारा पूजा करे। (पूजनकी विधि इस प्रकार है—) 'विशोकाय नमः' से दोनों चरणोंका, 'वरदाय नमः' से दोनों जङ्घाओंका, 'श्रीशाय नमः' से दोनों जानुओंका, 'जलशायिने नमः' से दोनों ऊरुओंका, 'कन्दर्पाय नमः' से गुह्यप्रदेशका, 'माधवाय नमः' से कटिप्रदेशका, 'दामोदराय नमः' से उदरका, 'विपुलाय नमः' से दोनों पार्श्वभागोंका, 'पद्मनाभाय नमः' से नाभिका, 'मन्मथाय नमः' से हृदयका, 'श्रीधराय नमः' से विष्णुके वक्षःस्थलका, 'मधुजिते नमः' से दोनों हाथोंका, 'चक्रिणे नमः' से बाँयीं भुजाका, 'गदिने नमः' से दाहिनी भुजाका, 'वैकुण्ठाय नमः' से कण्ठका, 'यज्ञमुखाय नमः' से मुखका, 'अशोकनिधये नमः' से नासिकाका, 'वासुदेवाय नमः' से दोनों नेत्रोंका, 'वामनाय नमः' से ललाटका, 'हरये नमः' से दोनों भौंहोंका, 'माधवाय नमः' से बालोंका, 'विश्वरूपिणे नमः' से किरीटका और 'सर्वात्मने नमः' से सिरका पूजन करना चाहिये॥ २—११॥<br><br>इस प्रकार हर्षपूर्वक फल, पुष्पमाला और चन्दन आदिसे भगवान् गोविन्दका पूजन करनेके पश्चात् मण्डल बनाकर वेदीका निर्माण कराये। वह वेदी बीस अंगुल लम्बी-चौड़ी, चारों ओरसे चौकोर, उत्तरकी ओर ढालू, चिकनी, सुन्दर और तीन ओर वप्र (परिधि)-से युक्त हो। वे वप्र तीन अङ्गुल ऊँचे और दो अङ्गुल चौड़े होने चाहिये। वेदीके ऊपर आठ अङ्गुलकी दीवाल बनायी जाय। तत्पश्चात् बुद्धिमान् व्रती सूपमें नदीकी बालुकासे लक्ष्मीकी मूर्ति अङ्कित करे और उस सूपको वेदीपर रखकर 'देव्यै नमः', 'शान्त्यै नमः', 'लक्ष्म्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'पुष्ट्यै नमः', 'तुष्ट्यै नमः', 'वृष्ट्यै नमः', 'हृष्ट्यै नमः' के उच्चारणपूर्वक लक्ष्मीकी अर्चना करे और यों प्रार्थना करे—'विशोका (लक्ष्मीदेवी) मेरे दुःखोंका नाश करें, विशोका मेरे लिये वरदायिनी हों, विशोका मुझे धन-सम्पत्ति दें और विशोका मुझे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करें।' तदनन्तर श्वेत वस्त्रोंसे सूपको परिवेष्टित कर नाना प्रकारके फलों, वस्त्रों और स्वर्णमय कमलसे लक्ष्मीकी पूजा करे। चतुर व्रती सभी रात्रियोंमें कुशोदक पान करे और सारी रात नाच-गान आदिका आयोजन