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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१५१- भगवान् विष्णुपर दानवोंका सामूहिक आक्रमण, भगवान् विष्णुका अद्भुत युद्ध-कौशल और उनके द्वारा दानवसेनापति ग्रसनकी मृत्यु

५७०* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रथमारुह्य जग्राह रक्षो वामकरेण तु।<br>केशेषु निर्ऋतिं दैत्यो जानुनाक्रम्य धिष्ठितम्॥ १२६<br><br>ततः खड्गेन च शिरश्छेत्तुमैच्छदमर्षणः।<br>तस्मिंस्तदन्तरे देवो वरुणोऽपाम्पतिर्द्रुतम्॥ १२७<br><br>पाशेन दानवेन्द्रस्य बबन्ध च भुजद्वयम्।<br>ततो बद्धभुजं दैत्यं विफलीकृतपौरुषम्॥ १२८होनेपर अत्यन्त दुर्जय दानवेश्वरने रथपर आरूढ़ हो बायें हाथसे राक्षसेश्वरको पकड़ लिया। तब क्रोधसे भरा हुआ दैत्य कुजम्भ निर्ऋतिके बालोंको पकड़कर और घुटनोंसे दबाकर खड़ा हो गया तथा तलवारसे उनका सिर काट लेनेके लिये उद्यत हो गया। इसी बीच जलेश वरुणदेवने शीघ्र ही अपने पाशसे दानवेन्द्रकी दोनों भुजाओंको बाँध दिया। इस प्रकार दोनों भुजाओंके बँध जानेपर दैत्यका पुरुषार्थ विफल कर दिया गया॥ १२६-१२८॥
ताडयामास गदया दयामुत्सृज्य पाशधृक्।<br>स तु तेन प्रहारेण स्रोतोभिः क्षतजं वमन्॥ १२९<br><br>दधार रूपं मेघस्य विद्युन्मालालतावृतम्।<br>तदवस्थागतं दृष्ट्वा कुजम्भं महिषासुरः॥ १३०<br><br>व्यावृत्तवदनेऽगाधे ग्रस्तुमैच्छत् सुरावुभौ।<br>निर्ऋतिं वरुणं चैव तीक्ष्णदंष्ट्रोत्कटाननः॥ १३१<br><br>तावभिप्रायमालक्ष्य तस्य दैत्यस्य दूषितम्।<br>त्यक्त्वा रथपथं भीतौ महिषस्यातिरंहसा॥ १३२<br><br>भृशं द्रुतौ जवाद्दिग्भ्यामुभाभ्यां भयविह्वलौ।<br>जगाम निर्ऋतिः क्षिप्रं शरणं पाकशासनम्॥ १३३<br><br>कुद्धस्तु महिषो दैत्यो वरुणं समभिद्रुतः।<br>तमन्तकमुखासक्तमालोक्य हिमवद्द्युतिः॥ १३४<br><br>चक्रे सोमास्त्रनिःसृष्टं हिमसंघातकण्टकम्।<br>वायव्यं चास्त्रमतुलं चन्द्रश्चक्रे द्वितीयकम्॥ १३५<br><br>वायुना तेन चन्द्रेण संशुष्केण हिमेन च।<br>व्यथिता दानवाः सर्वे शीतोच्छिन्ना विपौरुषाः॥ १३६<br><br>न शेकुश्चलितुं पद्भ्यां नास्त्राण्यादातुमेव च।<br>महाहिमनिपातेन शस्त्रैश्चन्द्रप्रचोदितैः॥ १३७तदनन्तर पाशधारी वरुणने दयाको तिलाञ्जलि देकर उस दैत्यपर गदासे प्रहार किया। उस गदाघातसे घायल होकर कुजम्भ (मुख, नाक, कान आदि) छिद्रोंसे रक्त वमन करने लगा। उस समय उसका रूप ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो विद्युत्समूहोंसे आच्छादित मेघ हो। कुजम्भको ऐसी दशामें पड़ा देखकर तीक्ष्ण दाढ़ोंसे युक्त एवं विकराल मुखवाला महिषासुर अपने गहरे मुखको फैलाकर वरुण और निर्ऋति—इन दोनों देवताओंको निगल जानेका प्रयास करने लगा। तब वे दोनों देव उस दैत्यके क्रूर अभिप्रायको समझकर भयभीत हो गये और बड़ी शीघ्रतासे महिषासुरके रथ-मार्गको छोड़कर हट गये। फिर भयसे व्याकुल होकर दोनों बड़े वेगसे दो भिन्न दिशाओंकी ओर भाग चले। उनमें निर्ऋतिने तो तुरंत ही भागकर इन्द्रकी शरण ग्रहण की। उधर कुपित महिषासुरने वरुणका पीछा किया। इस प्रकार वरुणको मौतके मुखमें पड़ा हुआ देखकर शीतरश्मि चन्द्रमाने अपने सोमास्त्रको प्रकट किया, जो हिमसमूहसे व्याप्त होनेके कारण अत्यन्त दुःसह था। उसी समय चन्द्रमाने अपने दूसरे अनुपम अस्त्र वायव्यास्त्रका भी प्रादुर्भाव किया। चन्द्रमाद्वारा छोड़े गये उस वायव्यास्त्र एवं सूखे हिमास्त्रसे सभी दानव व्यथित हो उठे। वे शीतसे जर्जर हो गये और उनका पुरुषार्थ जाता रहा। चन्द्रमाद्वारा चलाये गये अस्त्रोंसे महान् हिमराशिके गिरनेसे समस्त दानव न तो एक पग चल सकते थे और न अस्त्र ही उठानेमें समर्थ थे॥ १२९—१३७॥
गात्राण्यसुरसैन्यानामदहन्त समंततः।<br>महिषो निष्प्रयत्नस्तु शीतेनाकम्पिताननः॥ १३८<br><br>कक्षावालम्ब्य पाणिभ्यामुपविष्टो ह्यधोमुखः।<br>सर्वे ते निष्प्रतीकारा दैत्याश्चन्द्रमसा जिताः॥ १३९इस प्रकार चारों ओर असुर-सैनिकोंके शरीर शीतसे ठिठुर गये। शीतसे काँपते हुए मुखवाला महिष भी प्रयत्नहीन हो गया। वह अपने दोनों हाथोंसे दोनों काँखोंको दबाकर नीचे मुख किये हुए बैठ गया। इस प्रकार चन्द्रमासे पराजित हुए वे सभी दैत्य बदला चुकानेमें असमर्थ हो गये।
  • अध्याय १५० *
    ५७१

| रणेच्छां दूरतस्त्यक्त्वा तस्थुस्ते जीविता crowd... जीवितार्थिनः।<br>तत्राब्रवीत् कालनेमिर्दैत्यान् कोपेन दीपितः॥ १४०<br>भो भोः शृङ्गारिणः शूराः सर्वे शस्त्रास्त्रपारगाः।<br>एकैकोऽपि जगत्सर्वं शक्तस्तूलयितुं भुजैः॥ १४१<br>एकैकोऽपि क्षमो ग्रस्तुं जगत्सर्वं चराचरम्।<br>एकैकस्यापि पर्याप्ता न सर्वेऽपि दिवौकसः॥ १४२<br>कलां पूरयितुं यत्नात् षोडशीमतिविक्रमाः।<br>किं प्रयाताश्च तिष्ठध्वं समरेऽमरनिर्जिताः॥ १४३<br>न युक्तमेतच्छूराणां विशेषाद् दैत्यजन्मनाम्।<br>राजा चान्तरितोऽस्माकं तारको लोकमारकः॥ १४४<br>विरतानां रणादस्मात् क्रुद्धः प्राणान् हरिष्यति। | तब वे युद्धकी अभिलाषाको दूर छोड़कर जीवनकी रक्षाके लिये खड़े रहे। इसी बीच क्रोधसे उद्दीप्त हुए कालनेमिने दैत्योंको ललकारते हुए कहा—‘भो भो शृङ्गारसे सुसज्जित शूरवीरो! तुम सभी शस्त्रास्त्रके पारगामी विद्वान् हो। तुमलोगोंमेंसे एक-एक भी अपनी भुजाओंसे सारे जगत्‌को तौल सकता है तथा प्रत्येक व्यक्ति सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को निगल जानेमें समर्थ है। सब-के-सब प्रबल पराक्रमी देवता एक साथ मिलकर भी यत्नपूर्वक तुमलोगोंमेंसे किसी एककी सोलहवीं कलाकी समता नहीं कर सकते। फिर भी तुमलोग समरभूमिमें देवताओंसे पराजित होकर क्यों भागे जा रहे हो? ठहरो! ऐसा करना शूरवीरोंके लिये, विशेषतया दैत्यवंशियोंके लिये उचित नहीं है। सारे संसारका संहार करनेमें समर्थ हमलोगोंका राजा तारकासुर यहाँ उपस्थित नहीं है। वह क्रुद्ध होकर इस युद्धसे भागे हुए लोगोंके प्राणोंका हरण कर लेगा’॥ १३८—१४४ $\frac{१}{२}$ ॥ |
| शीतेन नष्टश्रुतयो भ्रष्टवाक्पाटवास्तथा॥ १४५<br>मूकास्तदाभवन् दैत्या रणद्दशनपङ्क्तयः।<br>तान् दृष्ट्वा नष्टचेतस्कान् दैत्याञ्छीतेन सादितान्॥ १४६<br>मत्वा कालक्षमं कार्यं कालनेमिर्महासुरः।<br>आश्रित्य दानवीं मायां वितत्य स्वं महावपुः॥ १४७<br>पूरयामास गगनं दिशो विदिश एव च।<br>निर्ममे दानवेन्द्रेशः शरीरे भास्करायुतम्॥ १४८<br>दिशश्च मायया चण्डैः पूरयामास पावकैः।<br>ततो ज्वालाकुलं सर्वं त्रैलोक्यमभवत् क्षणात्॥ १४९<br>तेन ज्वालासमूहेन हिमांशुरगमच्छमम्।<br>ततः क्रमेण विभ्रष्टशीतदुर्दिनमाबभौ॥ १५०<br>तद् बलं दानवेन्द्राणां मायया कालनेमिनः।<br>तं दृष्ट्वा दानवानीकं लब्धसंज्ञं दिवाकरः।<br>उवाचारुणमुद्भ्रान्तः कोपाल्लोकैकलोचनः॥ १५१ | उस समय शीतके प्रभावसे उन दैत्योंकी श्रवणशक्ति और वाक्-चातुरी नष्ट हो गयी थी, वे मूक हो गये थे तथा उनके दाँत कटकटा रहे थे। महासुर कालनेमिने उन दैत्योंको इस प्रकार शीतद्वारा व्यथित और चेतनारहित देखकर इस कार्यको कालद्वारा प्रेरित माना। फिर तो उसने आसुरी मायाका आश्रय लेकर अपने विशाल शरीरका विस्तार किया और उससे आकाशमण्डल, दिशाओं और विदिशाओंको व्याप्त कर लिया। फिर उस दानवेन्द्रने अपने शरीरमें दस हजार सूर्योंका निर्माण किया। उसने मायाके बलसे दसों दिशाओंको प्रचण्ड अग्निसे पूर्ण कर दिया, जिससे क्षणमात्रमें सारी त्रिलोकी अग्निकी लपटोंसे व्याप्त हो गयी। उस ज्वालासमूहसे चन्द्रमा शान्त हो गये। तदनन्तर कालनेमिकी मायासे दानवेन्द्रोंकी वह सेना क्रमशः शीतरूपी दुर्दिनके नष्ट हो जानेपर शोभा पाने लगी। इस प्रकार दानवोंकी सेनाको चेतनायुक्त देखकर जगत्‌के एकमात्र नेत्रस्वरूप सूर्य क्रोधसे तिलमिला उठे, तब उन्होंने अरुणसे कहा॥ १४५—१५१॥ |
| दिवाकर उवाच<br>नयारुण रथं शीघ्रं कालनेमिरथो यतः।<br>विमर्दस्तत्र विषमो भविता शूरसंक्षयः॥ १५२<br>जित एष शशाङ्कोऽत्र तद्बलं बलमाश्रितम्।<br>इत्युक्तश्चोदयामास रथं गरुडपूर्वजः॥ १५३ | **सूर्य बोले—**अरुण! मेरे रथको शीघ्र वहाँ ले चलो जहाँ कालनेमिका रथ खड़ा है। वहाँ (मेरा उसके साथ) शूरवीरोंका विनाश करनेवाला भीषण संग्राम होगा। जिनके बलपर हमलोग निर्भर थे, वे चन्द्रदेव तो इस युद्धमें परास्त हो गये। इस प्रकार कहे जानेपर गरुडके अग्रज |

५७२ * मत्स्यपुराण *

प्रयत्नविधृतैरश्वैः सितचामरमालिभिः।<br>जगद्दीपोऽथ भगवान् जग्राह विततं धनुः॥ १५४<br>शरौ च द्वौ महाभागो दिव्यावाशीविषद्युती।<br>संचारास्त्रेण संधाय बाणमेकं ससर्ज सः॥ १५५<br>द्वितीयमिन्द्रजालेन योजितं प्रमुमोच ह।<br>संचारास्त्रेण रूपाणां क्षणाच्चक्रे विपर्ययम्॥ १५६<br>देवानां दानवं रूपं दानवानां च दैविकम्।<br>मत्वासुरान् स्वकानेव जघ्ने घोरास्त्रलाघवात्॥ १५७<br>कालनेमी रुषाविष्टः कृतान्त इव संक्षये।<br>कांश्चित् खड्गेन तीक्ष्णेन कांश्चिन्नाराचवृष्टिभिः॥ १५८<br>कांश्चिद्गदाभिर्घोराभिः कांश्चिद् घोरैः परश्वधैः॥ १५९<br>शिरांसि केषांचिदपातयच्च<br>भुजान् रथान् सारथींश्चोग्रवेगः।<br>कांश्चित्पिपेषाथ रथस्य वेगात्<br>कांश्चित् क्रुधा चोद्धतमुष्टिपातैः॥ १६०अरुणने श्वेत कलंगियोंसे विभूषित एवं प्रयत्नपूर्वक वशमें किये गये अश्वोंसे जुते हुए रथको आगे बढ़ाया। तत्पश्चात् जगत्‌को उद्भासित करनेवाले महाभाग भगवान् सूर्यने अपना विशाल धनुष तथा सर्पकी-सी कान्तिवाले दो दिव्य बाणोंको हाथमें लिया। उनमेंसे एक बाणको संचारास्त्रसे संयुक्त करके चलाया तथा दूसरेको इन्द्रजालसे युक्त करके छोड़ दिया। संचारास्त्रके प्रयोगसे क्षणमात्रमें ही लोगोंके रूपोंका परिवर्तन हो गया। देवता दानवोंके और दानव देवताओंके रूपमें बदल गये। फिर तो दानव देवताओंको आत्मीय मानकर दैत्योंपर ही फुर्तीसे प्रहार करने लगे। प्रलयकालमें कृतान्तके समान क्रोधसे भरा हुआ कालनेमि किन्हींको तीखी तलवारसे, किन्हींको बाणोंकी वृष्टिसे, किन्हींको भयंकर गदाओंसे और किन्हींको भीषण कुठारोंसे मार गिराया तथा किन्हींके मस्तकों, भुजाओं और सारथिसहित रथोंको धराशायी कर दिया। उस प्रचण्ड वेगशाली दैत्यने किन्हींको रथके वेगपूर्वक धक्केसे पीस दिया तथा किन्हींको क्रोधपूर्वक कठोर मुक्केके प्रहारसे यमलोकका पथिक बना दिया॥ १५२—१६०॥
रणे विनिहतान् दृष्ट्वा नेमिः स्वान् दानवाधिपः।<br>रूपं स्वं तु प्रपद्यन्त ह्यसुराः सुरधर्षिताः॥ १६१<br>कालनेमी रुषाविष्टस्तेषां रूपं न बुद्धवान्।<br>नेमिदैत्यस्तु तान् दृष्ट्वा कालनेमिमुवाच ह॥ १६२<br>अहं नेमिः सुरो नैव कालनेमे विदस्व माम्।<br>भवता मोहितेनाजौ निहता भूरिविक्रमाः॥ १६३<br>दैत्यानां दशलक्षाणि दुर्जयानां सुरैरिह।<br>सर्वास्त्रनिवारणं मुञ्च ब्राह्मास्त्रं त्वरान्वितः॥ १६४<br>स तेन बोधितो दैत्यः सम्भ्रमाकुलचेतनः।<br>योजयामास बाणं हि ब्रह्मास्त्रविहितेन तु॥ १६५<br>मुमोच चापि दैत्येन्द्रः स स्वयं सुरकण्टकः।<br>ततोऽस्त्रतेजसा व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ १६६<br>देवानां चाभवत् सैन्यं सर्वमेव भयान्वितम्।<br>संचारास्त्रं च संशान्तं स्वयमायोधने बभौ॥ १६७<br>तस्मिन् प्रतिहते ह्यस्त्रे भ्रष्टतेजा दिवाकरः।<br>महेन्द्रजालमाश्रित्य चक्रे स्वां कोटिशस्तनुम्॥ १६८उस समय देवताओंसे पराजित हुए बहुत-से दैत्योंको अपने रूपकी प्राप्ति हो चुकी थी, परंतु क्रोधसे भरा हुआ कालनेमि उनके रूपको नहीं जानता था। इस प्रकार रणभूमिमें अपने पक्षके उन दैत्योंको मारा गया देखकर दानवराज नेमि दैत्यने कालनेमिसे कहा—‘कालनेमि! मैं नेमि नामक असुर हूँ, देवता नहीं हूँ। तुम मुझे पहचानो। मायासे मोहित होनेके कारण तुमने युद्धस्थलमें बहुत-से प्रचण्ड पराक्रमी दैत्योंका सफाया कर दिया है। देवताओंने इस युद्धमें दस लाख दुर्जय दैत्योंको मौतके घाट उतार दिया है। इसलिये अब तुम शीघ्रतापूर्वक सभी अस्त्रोंके निवारण करनेवाले ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करो।’ इस प्रकार नेमिद्वारा समझाये जानेपर दैत्यराज कालनेमिका चित्त सम्भ्रमके कारण व्याकुल हो गया, तब उसने बाणको ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित करके धनुषपर संधान किया तथा उस सुरकण्टक दैत्येन्द्रने स्वयं उसे छोड़ भी दिया। फिर तो उस अस्त्रके तेजसे चराचरसहित त्रिलोकी व्याप्त हो गयी। देवताओंकी सारी सेना भयभीत हो गयी तथा युद्धभूमिमें संचारास्त्र स्वयं शान्त हो गया। उस अस्त्रके विफल हो जानेपर सूर्यका तेज नष्ट हो गया, तब उन्होंने महेन्द्रजालका आश्रय लेकर अपने शरीरको करोड़ों रूपोंमें प्रकट किया॥ १६१—१६८॥