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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१४१- पुरूरवाका सूर्य-चन्द्रके साथ समागम और पितृ-तर्पण, पर्वसंधिका वर्णन तथा श्राद्धभोजी पितरोंका निरूपण

५०० * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रियावगूढा दयितोपगूढा<br>काचित् प्ररूढाङ्कुरहापि नारी।<br>सुचारुवाष्पाङ्कुरपल्लवानां<br>नवाम्बुसिक्ता इव भूमिरासीत्॥ ३५<br><br>शशाङ्कपादैरुपशोभितेषु<br>प्रासादवर्येषु वराङ्गनानाम् ।<br>माधुर्यभूताभरणामहान्तः<br>स्वना बभूवुर्मदनेषु तुल्याः॥ ३६<br><br>पानेन खिन्ना दयितातिवेलं<br>कपोलमाघ्रासि च किं ममेदम्।<br>आरोह मे श्रोणिमिमां विशालां<br>पीनोन्नतां काञ्चनमेखलाख्याम्॥ ३७<br><br>रथ्यासु चन्द्रोदयभासितासु<br>सुरेन्द्रमार्गेषु च विस्तृतेषु।<br>दैत्याङ्गना यूथगता विभान्ति<br>तारा यथा चन्द्रमसो दिवान्ते॥ ३८<br><br>अट्टाट्टहासेषु च चामरेषु<br>प्रेङ्खासु चान्या मदलोलभावात्।<br>संदोलयन्ते कलसम्प्रहासाः<br>प्रोवाच काञ्चीगुणसूक्ष्मनादा॥ ३९<br><br>अम्लानमालान्वितसुन्दरीणां<br>पर्याय एषोऽस्ति च हर्षितानाम्।<br>श्रूयन्ति वाचः कलधौतकल्पा<br>वापीषु चान्ये कलहंसशब्दाः॥ ४०<br><br>काञ्चीकलापश्च सहाङ्गरागः<br>प्रेङ्खासु तद्रागकृताश्च भावाः।<br>छिन्दन्ति तासामसुराङ्गनानां<br>प्रियालयान् मन्मथमार्गणानाम्॥ ४१<br><br>चित्राम्बरश्रोद्धृतकेशपाशः<br>संदोल्यमानः शुशुभेऽसुरीणाम्।<br>सुचारुवेशाभरणैरुपेत-<br>स्तारागणैर्ज्योतिरिवास चन्द्रः॥ ४२<br><br>सन्दोलनादुच्छ्वसितैश्छिन्नसूत्रैः<br>काञ्चीभ्रष्टैर्मणिभिर्विप्रकीर्णैः ।<br>दोलाभूमिस्तैर्विचित्रा विभाति<br>चन्द्रस्य पार्श्वोपगतैर्विचित्रा॥ ४३<br><br>सचन्द्रिके सोपवने प्रदोषे<br>रुतेषु वृन्देषु च कोकिलानाम्।<br>शरव्यं प्राप्य पुरेऽसुराणां<br>प्रक्षीणबाणो मदनश्चचार॥ ४४है। रात्रिके समय जब चन्द्रमाकी उज्ज्वल छटा पूरे<br><br><br>त्रिपुरमें फैल गयी तब दानवगण रात बितानेके लिये<br><br><br>अपनी पत्नियोंके साथ अपने-अपने गृहोंमें चले गये।<br><br><br>इधर रात बीती और कोयलें कूजने लगीं॥ ३१–४४॥
* अध्याय १४० *५०१
इति तत्र पुरेऽमरद्विषाणां<br>सपदि हि पश्चिमकौमुदी तदासीत् ।<br>रणशिरसि पराभविष्यतां वै<br>भवतुरगैः कृतसंक्षया अरीणाम् ॥ ४५कुछ देर बाद त्रिपुरमें युद्धके मुहानेपर शङ्करजीके घोड़ोंद्वारा पराजित किये गये शत्रुओंकी क्षीण कीर्तिकी तरह उन देवशत्रुओंके नगरमें एकाएक चतुर्थ प्रहरकी क्षीण चाँदनी दीख पड़ने लगी।
चन्द्रोऽथ कुन्दकुसुमाकरहारवर्णो<br>ज्योत्स्नावितानरहितोऽभ्रसमानवर्णः।<br>विच्छा्यतां हि समुपेत्य न भाति तद्वद्<br>भाग्यक्षये धनपतिश्च नरो विवर्णः॥ ४६उस समय कुन्दके पुष्पसमूहोंसे निर्मित हारके समान उज्ज्वल वर्णवाले चन्द्रमा किरणजालके क्षीण हो जानेके कारण निर्जल बादलकी तरह दीखने लगे। चाँदनीके नष्ट हो जानेपर चन्द्रमाकी शोभा उसी प्रकार जाती रही, जैसे धन-सम्पत्तिसे सम्पन्न मनुष्य भाग्यके नष्ट हो जानेपर शोभाहीन हो जाता है।
चन्द्रप्रभामरुणसारथिनाभिभूय<br>संतप्तकाञ्चनरथाङ्गसमानबिम्बः।<br>स्थित्वोदयाग्रमुकुटे बहुरेव सूर्यो<br>भात्यम्बरे तिमिरतोयवहां तरिष्यन् ॥ ४७उस समय तपाये हुए स्वर्णमय चक्रके समान बिम्बवाले सूर्य अपने सारथि अरुणकी प्रभासे चन्द्रमाकी कान्तिको तिरस्कृत कर उदयाचलके अग्र शिखरपर स्थित हुए और आकाशमण्डलमें अन्धकाररूपी नदीको पार करते हुए शोभा पा रहे थे॥ ४५—४७॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुरकौमुदीनामैकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें त्रिपुरकौमुदी नामक एक सौ उन्तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३९ ॥


एक सौ चालीसवाँ अध्याय

देवताओं और दानवोंका भीषण संग्राम, नन्दीश्वरद्वारा विद्युन्मालीका वध, मयका पलायन तथा शङ्करजीकी त्रिपुरपर विजय

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो!
उदिते तु सहस्रांशौ मेरौ भासाकरे रवौ।<br>नदद्देव बलं कृत्स्नं युगान्त इव सागराः॥ १प्रकाश बिखेरनेवाले सहस्रांशुमाली सूर्यके मेरुगिरिपर उदित होते ही सारी-की-सारी देवसेना प्रलयकालीन सागरकी तरह उच्च स्वरसे गर्जना करने लगी।
सहस्रनयनो देवस्ततः शक्रः पुरन्दरः।<br>सवित्तदः सवरुणस्त्रिपुरं प्रययौ हरः॥ २तब भगवान् शङ्कर सहस्रनेत्रधारी पुरन्दर इन्द्र, कुबेर और वरुणको साथ लेकर त्रिपुरकी ओर प्रस्थित हुए।
ते नानाविधिरूपाश्च प्रमथातिप्रमाथिनः।<br>ययुः सिंहरवैर्घोरैर्वादित्रनिनदैरपि ॥ ३उनके पीछे विभिन्न रूपधारी शत्रुविनाशक प्रमथगण भीषण सिंहनाद करते और बाजा बजाते हुए चले।
ततो वादितवादित्रैश्चातपत्रैर्महाद्रुमैः।<br>बभूव तद्वलं दिव्यं वनं प्रचलितं यथा॥ ४उस समय बजते हुए बाजों, छत्रों और विशाल वृक्षोंसे युक्त होनेके कारण वह देवसेना ऐसी लग रही थी, मानो चलता-फिरता वन हो।
तदापतन्तं सम्प्रेक्ष्य रौद्रं रुद्रबलं महत्।<br>संक्षोभो दानवेन्द्राणां समुद्रप्रतिमो बभौ॥ ५तत्पश्चात् शङ्करजीकी उस विशाल भयंकर सेनाको आक्रमण करते देखकर दानवेन्द्रोंका समूह सागरकी तरह संक्षुब्ध हो उठा।