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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१६७- भगवान् विष्णुका एकार्णवके जलमें शयन, मार्कण्डेयको आश्चर्य तथा भगवान् विष्णु और मार्कण्डेयका संवाद

६८४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
खेचराश्च सतीपुत्राः पातालतलवासिनः।<br>गणस्तथा परो रौद्रो मेघनामाङ्कुशायुधः॥ ९१<br>ऊर्ध्वगो भीमवेगश्च सर्व एवाभिकम्पिताः।<br>गदी शूली करालश्च हिरण्यकशिपुस्तदा॥ ९२<br>जीमूतघनसङ्काशो जीमूतघननिःस्वनः।<br>जीमूतघननिर्घोषो जीमूत इव वेगवान्॥ ९३<br>देवारिर्दितिजो वीरो नृसिंहं समुपाद्रवत्।<br>समुत्पत्य ततस्तीक्ष्णैर्मृगेन्द्रेण महानखैः॥ ९४<br>तदोंकारसहायेन विदार्य निहतो युधि।आकाशचारी एवं पाताललोकमें निवास करनेवाले सतीके पुत्र, अङ्कुशको अस्त्ररूपमें धारण करनेवाला परम भयंकर मेघ नामक गण तथा ऊर्ध्वग और भीमवेग—ये सभी कँपा दिये गये। तदनन्तर जो गदा और त्रिशूल धारण किये हुए था, जिसकी आकृति बड़ी विकराल थी, जो देवताओंका शत्रु, घने बादलके समान कान्तिमान्, घने बादल-जैसा बोलनेवाला, घने बादल-सदृश गरजनेवाला और बादल-सा वेगशाली था, उस दितिनन्दन वीरवर हिरण्यकशिपुने भगवान् नरसिंहपर आक्रमण किया। तब युद्धस्थलमें ओंकारकी सहायतासे भगवान् नरसिंहने आकाशमें उछलकर अपने तीखे विशाल नखोंसे उनके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर उसे मार डाला॥ ८५—९४ १/२॥
मही च कालश्च शशी नभश्च<br>ग्रहाश्च सूर्यश्च दिशश्च सर्वाः।<br>नद्यश्च शैलाश्च महार्णवाश्च<br>गताः प्रसादं दितिपुत्रनाशात्॥ ९५<br>ततः प्रमुदिता देवा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>तुष्टुवुर्नामभिर्दिव्यैरादिदेवं सनातनम्॥ ९६<br>यत्त्वया विहितं देव नारसिंहमिदं वपुः।<br>एतदेवार्चयिष्यन्ति परावरविदो जनाः॥ ९७इस प्रकार उस दितिपुत्र हिरण्यकशिपुके मौतके मुखमें चले जानेसे पृथ्वी, काल, चन्द्रमा, आकाश, ग्रहगण, सूर्य, सभी दिशाएँ, नदियाँ, पर्वत और महासागर प्रसन्न हो गये। तदनन्तर हर्षसे फूले हुए देवता और तपोधन ऋषिगण दिव्य नामोंद्वारा उन अविनाशी आदि देवकी स्तुति करते हुए कहने लगे—'देव! आपने जो यह नरसिंहका शरीर धारण किया है, इसकी पूर्वापरके ज्ञाता लोग अर्चना करेंगे'॥ ९५—९७॥
ब्रह्मोवाच<br>भवान् ब्रह्मा च रुद्रश्च महेन्द्रो देवसत्तमः।<br>भवान् कर्ता विकर्ता च लोकानां प्रभवाव्ययः॥ ९८<br>परां च सिद्धिं च परं च देवं<br>परं च मन्त्रं परमं हविश्च।<br>परं च धर्मं परमं च विश्वं<br>त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ ९९<br>परं शरीरं परमं च ब्रह्म<br>परं च योगं परमां च वाणीम्।<br>परं रहस्यं परमां गतिं च<br>त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ १००<br>एवं परस्यापि परं पदं यत्<br>परं परस्यापि परं च देवम्।<br>परं परस्यापि परं च भूतं<br>त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ १०१ब्रह्माजीने कहा—देव! आप ही ब्रह्मा, रुद्र और देवश्रेष्ठ महेन्द्र हैं। आप ही लोकोंके कर्ता, संहर्ता और उत्पत्तिस्थान हैं। आपका कभी विनाश नहीं होता। आपको ही परमोत्कृष्ट सिद्धि, परात्पर देव, परम मन्त्र, परम हवि, परम धर्म, परम विश्व और आदि पुराणपुरुष कहा जाता है। आपको ही परम शरीर, परम ब्रह्म, परम योग, परमा वाणी, परम रहस्य, परम गति और अग्रजन्मा पुराण पुरुष कहा जाता है। इसी प्रकार जो परात्पर पद, परात्पर देव, परात्पर भूत और सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुष है, वह आप ही हैं।
* अध्याय १६४ *६८५
परं परस्यापि परं रहस्यं<br>  परं परस्यापि परं महत्त्वम्।<br>परं परस्यापि परं महद्द्यत्<br>  त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ १०२<br>परं परस्यापि परं निधानं<br>  परं परस्यापि परं पवित्रम्।<br>परं परस्यापि परं च दान्तं<br>  त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ १०३<br>एवमुक्त्वा तु भगवान् सर्वलोकपितामहः।<br>स्तुत्वा नारायणं देवं ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः॥ १०४<br>ततो नदत्सु तूर्येषु नृत्यन्तीष्वप्सरःसु च।<br>क्षीरोदस्योत्तरं कूलं जगाम हरिरीश्वरः॥ १०५<br>नारसिंहं वपुर्देवः स्थापयित्वा सुदीप्तिमत्।<br>पौराणं रूपमास्थाय प्रययौ गरुडध्वजः॥ १०६<br>अष्टचक्रेण यानेन भूतयुक्तेन भास्वता।<br>अव्यक्तप्रकृतिर्देवः स्वस्थानं गतवान् प्रभुः॥ १०७जो परात्पर रहस्य, परात्पर महत्त्व और परात्पर महत्तत्त्व है, वह सब आप अग्रजन्मा पुराणपुरुषको ही कहा जाता है। आप सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुषको परसे भी परम निधान, परसे भी परम पवित्र और परसे भी परम उदार कहा जाता है। ऐसा कहकर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह सामर्थ्यशाली भगवान् ब्रह्मा नारायणदेवकी स्तुति कर ब्रह्मलोकको चले गये। उस समय तुरहियाँ बज रही थीं और अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं। इसी बीच जगदीश्वर श्रीहरि क्षीरसागरके उत्तर तटपर जानेके लिये उद्यत हुए। वहाँसे जाते समय भगवान् गरुडध्वजने परम कान्तिमान् उस नरसिंह-शरीरको जगत्में स्थापित कर अपने पुराने रूपको धारण कर लिया था। फिर अव्यक्त प्रकृतिवाले भगवान् विष्णु पञ्चभूतोंसे युक्त एवं चमकीले आठ पहियेवाले रथपर सवार हो अपने निवास स्थानको चले गये॥ ९८—१०७॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे हिरण्यकशिपुवधो नाम त्रिषष्ठ्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें हिरण्यकशिपु-वध नामक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६३॥


एक सौ चौंसठवाँ अध्याय

पद्मोद्भवके प्रसङ्गमें मनुद्वारा भगवान् विष्णुसे सृष्टिसम्बन्धी विविध प्रश्न और भगवान्का उत्तर

ऋषय ऊचुः<br>कथितं नरसिंहस्य माहात्म्यं विस्तरेण च।<br>पुनस्तस्यैव माहात्म्यमन्यद्विस्तरतो वद॥ १<br>पद्मरूपमभूदेतत् कथं हेममयं जगत्।<br>कथं च वैष्णवी सृष्टिः पद्ममध्येऽभवत् पुरा॥ २**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! आप भगवान् नरसिंहके माहात्म्यका तो विस्तारपूर्वक वर्णन कर चुके, अब पुनः उन्हीं भगवान्के दूसरे माहात्म्यको विस्तारपूर्वक बतलाइये। भला, पूर्वकालमें स्वर्णमय कमलसे यह जगत् कैसे उत्पन्न हुआ था और उस कमलमेंसे वैष्णवी सृष्टि कैसे प्रादुर्भूत हुई थी?॥ १-२॥
सूत उवाच<br>श्रुत्वा च नरसिंहस्य माहात्म्यं रविनन्दनः।<br>विस्मयोत्फुल्लनयनः पुनः पप्रच्छ केशवम्॥ ३**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! भगवान् नरसिंहके माहात्म्यको सुनकर सूर्यपुत्र मनुके नेत्र आश्चर्यसे उत्फुल्ल हो उठे, तब उन्होंने पुनः भगवान् केशवसे प्रश्न किया॥ ३॥
मनुरुवाच<br>कथं पाद्मे महाकल्पे तव पद्ममयं जगत्।<br>जलार्णवगतस्येह नाभौ जातं जनार्दन॥ ४**मनुने पूछा—**जनार्दन! 'पाद्मकल्प' में जब आप इस जलार्णवके मध्यमें स्थित थे, तब आपकी नाभिसे यह पद्ममय जगत् कैसे उत्पन्न हुआ था?
६८६* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रभावात् पद्मनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि।<br>पुष्करे च कथं भूता देवाः सर्षिगणाः पुरा॥ ५<br>एनमाख्याहि निखिलं योगं योगविदां पते।<br>शृण्वतस्तस्य मे कीर्तिं न तृप्तिरुपजायते॥ ६<br>कियता चैव कालेन शेते वै पुरुषोत्तमः।<br>कियन्तं वा स्वपिति च कोऽस्य कालस्य सम्भवः॥ ७<br>कियता वाथ कालेन ह्युत्तिष्ठति महायशाः।<br>कथं चोत्थाय भगवान् सृजते निखिलं जगत्॥ ८<br>के प्रजापतयस्तावदासन् पूर्वं महामुने।<br>कथं निर्मितावांश्चैव चित्रं लोकं सनातनम्॥ ९<br>कथमेकार्णवे शून्ये नष्टस्थावरजङ्गमे।<br>दग्धे देवासुरनरे प्रनष्टोरगराक्षसे॥ १०<br>नष्टानिलानले लोके नष्टाकाशमहीतले।<br>केवलं गह्वरीभूते महाभूतविपर्यये॥ ११<br>विभुर्महाभूतपतिर्महातेजा महाकृतिः।<br>आस्ते सुरवरश्रेष्ठो विधिमास्थाय योगवित्॥ १२<br>शृणुयां परया भक्त्या ब्रह्मैनेतदशेषतः।<br>वक्तुमर्हसि धर्मिष्ठ यशो नारायणात्मकम्॥ १३<br>श्रद्धया चोपविष्टानां भगवन् वक्तुमर्हसि॥ १४पूर्वकालमें समुद्रके जलमें शयन करनेवाले भगवान् पद्मनाभके प्रभावसे उस कमलमें ऋषिगणोंसहित देवगण कैसे उत्पन्न हुए थे? योगवेत्ताओंके अधीश्वर! इस सम्पूर्ण योगका वर्णन कीजिये; क्योंकि भगवान्की कीर्तिका वर्णन सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है। (कृपया यह बतलाइये कि) भगवान् पुरुषोत्तम कितने समयके पश्चात् शयन करते हैं? कितने कालतक सोते हैं? इस कालका उद्भव (निर्धारण) कहाँसे होता है? फिर वे महायशस्वी भगवान् कितने समयके बाद निद्रा त्यागकर उठते हैं? निद्रासे उठकर वे भगवान् किस प्रकार सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं? महामुने! पूर्वकालमें कौन-कौन-से प्रजापति थे? इस विचित्र सनातन लोकका निर्माण किस प्रकार किया गया था? महाप्रलयके समय जब स्थावर-जङ्गम-सभी प्राणी नष्ट हो जाते हैं, देवता, राक्षस और मनुष्य जलकर भस्म हो जाते हैं, नागों और राक्षसोंका विनाश हो जाता है, लोकमें अग्नि, वायु, आकाश और पृथ्वीतलका सर्वथा लोप हो जाता है, उस समय पञ्चमहाभूतोंका विपर्यय हो जानेपर केवल घना अन्धकार छाया रहता है, तब उस शून्य एकार्णवके जलमें सर्वव्यापी, पञ्चमहाभूतोंके स्वामी, महातेजस्वी, विशालकाय, सुरेश्वरोंमें श्रेष्ठ एवं योगवेत्ता भगवान् किस प्रकार विधिका सहारा लेकर स्थित रहते हैं? ब्रह्मन्! यह सारा प्रसङ्ग मैं परम भक्तिके साथ सुनना चाहता हूँ। धर्मिष्ठ! आप इस नारायण-सम्बन्धी यशका वर्णन कीजिये। भगवन्! हमलोग श्रद्धापूर्वक आपके समक्ष बैठे हैं, अतः आप इसका अवश्य वर्णन कीजिये॥ ४—१४ ॥
मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
नारायणस्य यशसः श्रवणे या तव स्पृहा।<br>तद्वंश्यान्वयभूतस्य न्याय्यं रविकुलर्षभ॥ १५<br>शृणुष्वादिपुराणेषु वेदेभ्यश्च यथा श्रुतम्।<br>ब्राह्मणानां च वदतां श्रुत्वा वै सुमहात्मनाम्॥ १६<br>यथा च तपसा दृष्ट्वा बृहस्पतिसमद्युतिः।<br>पराशरसुतः श्रीमान् गुरुद्वैपायनोऽब्रवीत्॥ १७<br>तत्तेऽहं कथयिष्यामि यथाशक्ति यथाश्रुति।<br>यद्विज्ञातुं मया शक्यमृषिमात्रेण सत्तमाः॥ १८<br>कः समुत्सहते ज्ञातुं परं नारायणात्मकम्।<br>विश्वायनश्च यद् ब्रह्मा न वेदयति तत्त्वतः॥ १९सूर्यकुलसत्तम! नारायणकी यशोगाथा सुननेमें जो आपकी विशेष स्पृहा है, यह नारायणके वंशजोंके कुलमें उत्पन्न होनेवाले आपके लिये उचित ही है। मैंने पुराणों, वेदों तथा प्रवचनकर्ता श्रेष्ठ महात्मा ब्राह्मणोंके मुखसे जैसा सुना है तथा बृहस्पतिके समान कान्तिमान् पराशरनन्दन गुरुदेव श्रीमान् कृष्णद्वैपायन व्यासजीने तपोबलसे साक्षात्कार करके जैसा मुझे बतलाया है, वही मैं अपनी जानकारीके अनुसार यथाशक्ति आपसे वर्णन कर रहा हूँ, सावधानीपूर्वक श्रवण कीजिये। द्विजवरो! जिसे ऋषियोंमें केवल मैं ही जान सकता हूँ। जिसे विश्वके आश्रयस्थान ब्रह्मा भी तत्त्वपूर्वक नहीं जानते, नारायणके उस परम तत्त्वको जाननेके लिये दूसरा कौन उत्साह कर सकता है।
* अध्याय १६४ *६८७
तत्कर्म विश्ववेदानां तद्रहस्यं महर्षिणाम्।<br>तमिज्यं सर्वयज्ञानां तत्तत्त्वं सर्वदर्शिनाम्।<br>तदध्यात्मविदां चिन्त्यं नरकं च विकर्मिणाम्॥ २०<br>अधिदैवं च यद्दैवमधियज्ञं सुसंज्ञितम्।<br>तद्भूतमधिभूतं च तत्परं परमर्षिणाम्॥ २१<br>स यज्ञो वेदनिर्दिष्टस्तत्तपः कवयो विदुः।<br>यः कर्ता कारको बुद्धिमर्नः क्षेत्रज्ञ एव च॥ २२<br>प्रणवः पुरुषः शास्ता एकश्चेति विभाव्यते।<br>प्राणः पञ्चविधश्चैव ध्रुव अक्षर एव च॥ २३<br>कालः पाकश्च पक्ता च द्रष्टा स्वाध्याय एव च।<br>उच्यते विविधैर्देवः स एवायं न तत्परम्॥ २४<br>स एव भगवान् सर्वं करोति विकरोति च।<br>सोऽस्मान् कारयते सर्वान् सोऽत्येति व्याकुलीकृतान्॥ २५<br>यजामहे तमेवाद्यं तमेवेच्छाम निर्वृताः।<br>यो वक्ता यच्च वक्तव्यं यच्चाहं तद् ब्रवीमि वः॥ २६<br>श्रूयते यच्च वै श्राव्यं यच्चान्यत् परिजल्प्यते।<br>याः कथाश्चैव वर्तन्ते श्रुतयो वाथ तत्पराः।<br>विश्वं विश्वपतिर्यश्च स तु नारायणः स्मृतः॥ २७<br>यत्सत्यं यदमृतमक्षरं परं यत्-<br>यद्भूतं परममिदं च यद्भविष्यत्।<br>यत् किंचिच्चरमचरं यदस्ति चान्यत्<br>तत् सर्वं पुरुषवरः प्रभुः पुराणः॥ २८वही समस्त वेदोंका कर्म है। वही महर्षियोंका रहस्य है। सम्पूर्ण यज्ञोंद्वारा पूजनीय वही है। वही सर्वज्ञोंका तत्त्व है। अध्यात्मवेत्ताओंके लिये वही चिन्तनीय और कुकर्मियोंके लिये नरकस्वरूप है। उसीको अधिदेव, देव और अधियज्ञ नामसे अभिहित किया जाता है। वही भूत, अधिभूत और परमर्षियोंका परम तत्त्व है॥१५-२१॥<br><br>वेदोंद्वारा निर्दिष्ट यज्ञ वही है। विद्वान्लोग उसे तपरूपसे जानते हैं। जो कर्ता, कारक, बुद्धि, मन, क्षेत्रज्ञ, प्रणव, पुरुष, शास्ता और अद्वितीय कहा जाता है तथा विभिन्न देवता जिसे पाँच प्रकारका प्राण, अविनाशी ध्रुव, काल, पाक, पक्ता (पचानेवाला), द्रष्टा और स्वाध्याय कहते हैं, वह यही है। इसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। वे ही भगवान् सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक हैं और वे ही संहारक भी हैं। वे ही हम सब लोगोंको उत्पन्न करते हैं और अन्तमें व्याकुल करके नष्ट कर देते हैं। हमलोग उन्हीं आदि पुरुषकी यज्ञद्वारा आराधना करते हैं और निवृत्तिपरायण होकर उन्हींको प्राप्त करनेकी इच्छा करते हैं। जो वक्ता है, जो वक्तव्य है, जिसके विषयमें मैं आपलोगोंसे कह रहा हूँ, जो सुना जाता है, जो सुनने योग्य है, जिसके विषयमें अन्य सारी बातें कही जाती हैं, जो कथाएँ प्रचलित हैं, श्रुतियाँ जिसके परायण हैं, जो विश्वस्वरूप और विश्वका स्वामी है, वही नारायण कहा गया है। जो सत्य है, जो अमृत है, जो अक्षर है, जो परात्पर है, जो भूत है और जो भविष्यत् है, जो चर-अचर जगत् है, इसके अतिरिक्त अन्य जो कुछ है, वह सब कुछ सामर्थ्यशाली एवं सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुष ही है॥२२-२८॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावे चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ चौंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६४॥


६८८ * मत्स्यपुराण *


एक सौ पैंसठवाँ अध्याय

चारों युगोंकी व्यवस्थाका वर्णन

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तु कृतं युगम्।<br>तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा रविनन्दन ॥ १<br>यत्र धर्मश्चतुष्पादस्त्वधर्मः पादविग्रहः।<br>स्वधर्मनिरताः सन्तो जायन्ते यत्र मानवाः ॥ २<br>विप्राः स्थिता धर्मपरा राजवृत्तौ स्थिता नृपाः।<br>कृष्यामभिरता वैश्याः शूद्राः शुश्रूषवः स्थिताः ॥ ३<br>तदा सत्यं च शौचं च धर्मश्चैव विवर्धते।<br>सद्भिर्बाचरितं कर्म क्रियते ख्यायते च वै॥ ४<br>एतत्कार्त्तयुगं वृत्तं सर्वेषामपि पार्थिव।<br>प्राणिनां धर्मसङ्गानामपि वै नीचजन्मनाम् ॥ ५<br>त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते।<br>तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा परिकीर्त्यते ॥ ६<br>द्वाभ्यामधर्मः पादाभ्यां त्रिभिर्धर्मो व्यवस्थितः।<br>यत्र सत्यं च सत्त्वं च त्रेताधर्मो विधीयते ॥ ७<br>त्रेतायां विकृतिं यान्ति वर्णास्त्वेते न संशयः।<br>चतुर्वर्णस्य वैकृत्याद्यान्ति दौर्बल्यमाश्रमाः ॥ ८<br>एषा त्रेतायुगगतिर्विचित्रा देवनिर्मिता।<br>द्वापरस्य तु या चेष्टा तामपि श्रोतुमर्हसि ॥ ९रविनन्दन! कृतयुगकी अवधि चार हजार दिव्य वर्षोंकी बतलायी जाती है और उसकी संध्या उससे दुगुनी शती अर्थात् आठ सौ वर्षोंकी होती है। उस युगमें धर्म अपने चारों पादोंसे विद्यमान रहता है और अधर्म चतुर्थांशमात्र रहता है। उस युगमें उत्पन्न होनेवाले मानव अपने धर्ममें निरत रहते हैं। ब्राह्मण धर्म-पालनमें तत्पर रहते हैं। क्षत्रिय राज-धर्ममें स्थित रहते हैं। वैश्य कृषिकर्ममें लगे रहते हैं और शूद्र सेवाकार्यमें तल्लीन रहते हैं। उस समय सत्य, शौच और धर्मकी अभिवृद्धि होती है। सभी लोग सत्पुरुषोंद्वारा आचरित कर्मका अनुकरण करते हैं और उसकी प्रशंसा करते हैं। पार्थिव! कृतयुगका यह आचार सभी प्राणियोंमें पाया जाता है, चाहे वे धर्मप्राण विप्र आदि हों अथवा नीच जातिके हों। इसके बाद तीन हजार दिव्य वर्षोंका त्रेतायुग कहलाता है। उसकी संध्या उससे दुगुनी शती अर्थात् छः सौ वर्षकी कही गयी है। इस युगमें धर्म तीन चरणोंसे और अधर्म दो पादोंसे स्थित रहता है। उस समय त्रेताधर्म सत्य और सत्त्वगुणप्रधान माना जाता है। इसमें संदेह नहीं कि त्रेतायुगमें ये ब्राह्मणादि चारों वर्ण (कुछ) विकृत हो जाते हैं और इनके विकृत हो जानेके कारण चारों आश्रम भी दुर्बलताको प्राप्त हो जाते हैं। भगवान्द्वारा निर्मित त्रेतायुगकी यह विचित्र गति है। अब द्वापरयुगकी जो चेष्टा है, उसे भी सुनिये॥ १—९॥
द्वापरं द्वे सहस्रे तु वर्षाणां रविनन्दन।<br>तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा युगमुच्यते ॥ १०<br>तत्र चार्थपराः सर्वे प्राणिनो रजसा हताः।<br>सर्वे नैष्कृतिकाः क्षुद्रा जायन्ते रविनन्दन ॥ ११<br>द्वाभ्यां धर्मः स्थितः पद्भ्यामधर्मस्त्रिभिरुत्थितः।<br>विपर्ययाच्छनैर्धर्मः क्षयमेति कलौ युगे ॥ १२<br>ब्राह्मण्यभावस्य ततस्तथौत्सुक्यं विशीर्यते।<br>व्रतोपवासास्त्यज्यन्ते द्वापरे युगपर्यये ॥ १३रविनन्दन! द्वापरयुग दो हजार दिव्य वर्षोंका होता है। उसकी संध्या चार सौ वर्षोंकी कही जाती है। सूर्यपुत्र! उस युगमें रजोगुणसे ग्रस्त सभी प्राणी अर्थपरायण होते हैं। उस युगमें जन्म लेनेवाले सभी प्राणी निष्कर्मी एवं क्षुद्र विचारवाले होते हैं। उस समय धर्म दो चरणोंसे स्थित रहता है और अधर्मकी वृद्धि तीन चरणोंसे होती है। इस प्रकार धीरे-धीरे परिवर्तन होनेके कारण कलियुगमें धर्म नष्ट हो जाता है। द्वापरयुगके परिवर्तनके समय लोगोंमें ब्राह्मणोंके प्रति आस्था नष्ट हो जाती है और लोग व्रत-उपवास आदिको छोड़ बैठते हैं। उस समय