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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

४१- अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना

१३६ * मत्स्यपुराण *


अहं हि पूर्वो वयसा भवद्ध्य-<br>स्तेनाभिवादं भवतां न युञ्जे।<br>यो विद्यया तपसा जन्मना वा<br>वृद्धः स वै सम्भवति द्विजानाम्॥ २मैं आपलोगोंसे अवस्थामें बड़ा हूँ, अतः आपलोगोंको प्रणाम नहीं कर रहा हूँ। द्विजातियोंमें जो विद्या, तप और अवस्थामें बड़ा होता है वही पूजनीय माना जाता है॥ १-२॥
अष्टक उवाच<br>अवादीस्त्वं वयसास्मि वृद्ध<br>इति वै राजन्नधिकः कथंचित्।<br>यो वै विद्वांस्तपसा च वृद्धः<br>स एव पूज्यो भवति द्विजानाम्॥ ३**अष्टक बोले—**राजन्! आपने जो यह कहा है कि मैं अवस्थामें बड़ा हूँ, इसलिये ज्येष्ठ हूँ, सो इसमें आप कुछ अधिक कह गये; क्योंकि द्विजोंमें जो विद्या और तपस्यामें बढ़ा-चढ़ा होता है, वही पूज्य माना जाता है॥ ३॥
ययातिरुवाच<br>प्रतिकूलं कर्मणां पापमाहु-<br>स्तद्दर्त्तिनां प्रवणं पापलोकम्।<br>सन्तोऽसतो नानुवर्तन्त ते वै<br>यदात्मनैषां प्रतिकूलवादी॥ ४**ययातिने कहा—**पापको पुण्यकर्मोंका नाशक बताया जाता है। वह नरककी प्राप्ति करानेवाला है और वह उद्दण्ड पुरुषोंमें ही देखा जाता है। श्रेष्ठ पुरुष दुराचारी पुरुषोंके दुराचारका अनुसरण नहीं करते। पहलेके साधु पुरुष भी उन श्रेष्ठ पुरुषोंके ही अनुकूल आचरण करते थे।
अभूद् धनं मे विपुलं महत् वै<br>विचेष्टमानोऽधिगन्ता तदस्मि।<br>एवं प्रधार्यात्महिते निविष्टो<br>यो वर्तते स विजानाति धीरः॥ ५मेरे पास पुण्यरूपी बहुत धन था, किंतु दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण वह सब नष्ट हो गया। अब मैं चेष्टा करके भी उसे नहीं पा सकता। मेरी इस दुरवस्थाको समझ-बूझकर जो आत्मकल्याणमें संलग्न रहता है, वही ज्ञानी और धीर है।
नानाभावा बहवो जीवलोके<br>दैवाधीना नष्टचेष्टाधिकाराः।<br>तत् तत् प्राप्य न विहन्येत धीरो<br>दिष्टं बलीय इति मत्वात्मबुद्ध्या॥ ६इस जीव-जगत्‌में भिन्न-भिन्न स्वभाववाले बहुत-से प्राणी हैं, वे सभी प्रारब्धके अधीन हैं, अतः उनके धनादि पदार्थोंके लिये किये हुए उद्योग और अधिकार सभी व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिये धीर पुरुषको चाहिये कि वह अपनी बुद्धिसे
सुखं हि जन्तुर्यदि वापि दुःखं<br>दैवाधीनं विन्दति नात्मशक्त्या।<br>तस्माद् दिष्टं बलवन्मन्यमानो<br>न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कदाचित्॥ ७'प्रारब्ध ही बलवान् है'—यह जानकर दुःख या सुख जो भी मिले, उसमें विकारको न प्राप्त हो। जीव जो सुख अथवा दुःख पाता है, वह उसे प्रारब्ध (भाग्य)-से ही प्राप्त होता है, अपनी शक्तिसे नहीं; अतः प्रारब्धको ही बलवान् मानकर मनुष्य किसी प्रकार भी हर्ष अथवा शोक न करे।
दुःखे न तप्येत सुखे न हृष्येत्<br>समेन वर्तेत सदैव धीरः।<br>दिष्टं बलीय इति मन्यमानो<br>न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कदाचित्॥ ८दुःखोंसे संतप्त न हो और सुखोंसे हर्षित न हो। धीर पुरुष सदा समभावसे ही रहे और भाग्यको ही प्रबल मानकर किसी प्रकार चिन्ता एवं हर्षके वशीभूत न हो।
भये न मुह्याम्यष्टकाहं कदाचित्<br>संतापे मे मानसो नास्ति कश्चित्।<br>धाता यथा मां विदधाति लोके<br>ध्रुवं तदाहं भवितेति मत्वा॥ ९अष्टक! मैं कभी भयमें पड़कर मोहित नहीं होता, मुझे कोई मानसिक संताप भी नहीं होता; क्योंकि मैं समझता हूँ कि विधाता इस संसारमें मुझे जैसे रखेगा वैसे ही रहूँगा।
संस्वेदजा ह्याण्डजा ह्युद्भिदश्च<br>सरीसृपाः कृमयोऽप्यप्सु मत्स्याः।<br>तथाश्मानस्तृणकाष्ठं च सर्वं<br>दिष्टक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ते॥ १०स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, सरीसृप, कृमि, जलमें रहनेवाले मत्स्य आदि जीव तथा पर्वत, तृण और काष्ठ—ये सभी प्रारब्ध-भोगका सर्वथा क्षय हो जानेपर अपनी प्रकृतिको प्राप्त हो जाते हैं।
* अध्याय ३८ *१३७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अनित्यतां सुखदुःखस्य बुद्ध्वा<br>कस्मात् संतापमष्टकाहं भजेयम्।<br>किं कुर्यां वै किं च कृत्वा न तप्ये<br>तस्मात् संतापं वर्जयाम्यप्रमत्तः॥ ११अष्टक! मैं सुख तथा दुःख—दोनोंकी अनित्यताको जानता हूँ, फिर मुझे संताप हो तो कैसे? मैं क्या करूँ और क्या करके संतस न होऊँ—इन बातोंकी चिन्ता छोड़ चुका हूँ, अतः सावधान रहकर शोक-संतापको अपनेसे दूर रखता हूँ॥ ४–११॥
शौनक उवाच<br>एवं ब्रुवाणं नृपतिं ययाति-<br>मथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छत्।<br>मातामहं सर्वगुणोपपन्नं<br>यत्र स्थितं स्वर्गलोके यथावत्॥ १२शौनकजी कहते हैं—शतानीक! राजा ययाति समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थे और नातेमें अष्टकके नाना लगते थे। वे अन्तरिक्षमें वैसे ही ठहरे हुए थे, जैसे मानो स्वर्गलोकमें हों। जब उन्होंने उपर्युक्त बातें कहीं तब अष्टकने उनसे पुनः प्रश्न किया॥ १२॥
अष्टक उवाच<br>ये ये लोकाः पार्थिवेन्द्रे प्रधाना-<br>स्त्वया भुक्ता यं च कालं यथा च।<br>तन्मे राजन् ब्रूहि सर्वं यथावत्<br>क्षेत्रज्ञवद् भाषसे त्वं हि धर्मम्॥ १३अष्टकने कहा—महाराज! आपने जिन-जिन प्रधान लोकोंमें रहकर जितने समयतक वहाँके सुखोंका भली-भाँति उपभोग किया है, उन सबका मुझे यथार्थ परिचय दीजिये। राजन्! आप तो महात्माओंकी भाँति धर्मोंका उपदेश कर रहे हैं॥ १३॥
ययातिरुवाच<br>राजाहमासं त्विह सार्वभौम-<br>स्ततो लोकान् महतश्चार्जयं वै।<br>तत्रावसं वर्षसहस्त्रमात्रं<br>ततो लोकान् परमानभ्युपेतः॥ १४ययातिने कहा—अष्टक! मैं पहले समस्त भूमण्डलमें प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजा था। तदनन्तर सत्कर्मोंद्वारा बड़े-बड़े लोकोंपर मैंने विजय प्राप्त की और उनमें एक हजार वर्षोतक (सुखपूर्वक) निवास किया। इसके बाद उनसे भी उच्चतम लोकमें जा पहुँचा।
ततः पुरीं पुरुहूतस्य रम्यां<br>सहस्रद्वारां शतयोजनान्ताम्।<br>अध्यावसं वर्षसहस्त्रमात्रं<br>ततो लोकान् परमानभ्युपेतः॥ १५वहाँ सौ योजन विस्तृत और एक हजार दरवाजोंसे युक्त इन्द्रकी रमणीय पुरी प्राप्त हुई। उसमें मैंने केवल एक हजार वर्षोंतक निवास किया और उसके बाद उससे भी ऊँचे लोकमें गया।
ततो दिव्यमजरं प्राप्य लोकं<br>प्रजापतेर्लोकपतेर्दुरापम् ।<br>तत्रावसं वर्षसहस्त्रमात्रं<br>ततो लोकान् परमानभ्युपेतः॥ १६तदनन्तर लोकपालोंके लिये भी दुर्लभ प्रजापतिके उस दिव्यलोकमें जा पहुँचा, जहाँ जरावस्थाका प्रवेश नहीं है। वहाँ एक हजार वर्षतक रहा, फिर उससे भी उत्तम लोकमें चला गया।
देवस्य देवस्य निवेशने च<br>विजित्य लोकान् न्यवसं यथेष्टम्।<br>सम्पूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तै-<br>स्तुल्यप्रभावद्युतिरीश्वराणाम्॥ १७वह देवाधिदेव ब्रह्माजीका धाम था। वहाँ मैं अपनी इच्छाके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंमें विहार करता हुआ सम्पूर्ण देवताओंसे सम्मानित होकर रहा। उस समय मेरा प्रभाव और तेज देवेश्वरोंके समान था।
तथावसं नन्दने कामरूपी<br>संवत्सराणामयुतं शतानाम्।<br>सहाप्सरोभिर्विचरन् पुण्यगन्धान्<br>पश्यन् नगान् पुष्पितांश्चारुरूपान्॥ १८इसी प्रकार मैं नन्दनवनमें इच्छानुसार रूप धारण करके अप्सराओंके साथ विहार करता हुआ दस लाख वर्षोंतक रहा। वहाँ मुझे पवित्र गन्ध और मनोहर रूपवाले वृक्ष देखनेको मिले, जो फूलोंसे लदे हुए थे।