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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

२३- चन्द्रमाकी उत्पत्ति, उनका दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंके साथ विवाह, चन्द्रमाद्वारा राजसूययज्ञका अनुष्ठान, उनकी तारापर आसक्ति, उनका भगवान् शङ्करके साथ युद्ध तथा ब्रह्माजीका बीच-बचाव करके युद्ध शान्त करना

८२ * मत्स्यपुराण *


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सर्वसत्त्वानुकम्पी च सर्वसत्त्वबलाधिकः ।<br>सर्वसत्त्वरुतज्ञश्च सर्वसत्त्वेश्वरेश्वरः ॥ १७चलकर सम्पूर्ण जीवोंपर दयालु, समस्त प्राणियोंमें अमित बलसम्पन्न, सम्पूर्ण प्राणियोंकी भाषाका ज्ञाता और समस्त प्राणियोंके राजाधिराज-सम्राट् हुआ ॥ ११—१७ ॥
अहसत् तेन योगात्मा स पिपीलिकरागतः ।<br>यत्र तत्कीटमिथुनं रममाणमवस्थितम् ॥ १८<br><br>ततः सा संनतिर्दृष्ट्वा तं हसन्तं सुविस्मिता ।<br>किमप्याशङ्क्य मनसा तमपृच्छन्नरेश्वरम् ॥ १९तत्पश्चात् जहाँ वे कीट-दम्पति (चींटे-चींटी) बातें करते हुए स्थित थे, वहाँ पहुँचनेपर चींटेकी कामचेष्टाको देखकर योगात्मा ब्रह्मदत्तको हँसी आ गयी। राजाको हँसते देखकर महारानी संनति आश्चर्यचकित हो उठी और मनमें किसी भावी अनर्थकी आशङ्का करके नरेश्वर ब्रह्मदत्तसे प्रश्न कर बैठी ॥ १८-१९ ॥
संनतिरुवाच<br>अकस्मादतिहासस्ते किमर्थमभवन्नृप ।<br>हास्यहेतुं न जानामि यदकाले कृतं त्वया ॥ २०संनतिने पूछा— राजन्! अकस्मात् आपका यह अट्टहास किसलिये हुआ है? असमयमें आपको जो यह हँसी आयी है, इस हास्यका कारण मैं नहीं समझ पा रही हूँ ॥ २० ॥
सूत उवाच<br>अवदद् राजपुत्रोऽपि स पिपीलिकभाषितम् ।<br>रागवाग्भिः समुत्पन्नमेतद्धास्यं वरानने ॥ २१<br><br>न चान्यत्कारणं किंचिद्धास्यहेतौ शुचिस्मिते ।<br>न सामन्यत् तदा देवी प्राहालीकमिदं वचः ॥ २२<br><br>अहमेवाद्य हसिता न जीविष्ये त्वयाधुना ।<br>कथं पिपीलिकालापं मर्त्यो वेत्ति विना सुरान् ॥ २३<br><br>तस्मात् त्वयाहमेवेह हसिता किमतः परम् ।<br>ततो निरुत्तरो राजा जिज्ञासुस्तत्पुरो हरेः ॥ २४<br><br>आस्थाय नियमं तस्थौ समरात्रमकल्मषः ।<br>स्वप्ने प्राह हृषीकेशः प्रभाते पर्यटन् पुरम् ॥ २५<br><br>वृद्धद्विजो यस्तद्वाक्यात् सर्वं ज्ञास्यस्यशेषतः ।<br>इत्युक्त्वान्तर्दधे विष्णुः प्रभातेऽथ नृपः पुरात् ॥ २६<br><br>निर्गच्छन्मन्त्रिसहितः सभार्यो वृद्धमग्रतः ।<br>गदन्तं विप्रमायान्तं तं वृद्धं संददर्श ह ॥ २७सूतजी कहते हैं— ऋषियो! तब राजकुमार ब्रह्मदत्तने (महारानी संनतिसे) चींटे-चींटीके उस सारे वार्तालापको सुनाते हुए कहा—'वरानने! इनके प्रेमालापपूर्ण वचनोंको सुननेसे मुझे ऐसी हँसी आ गयी है। शुचिस्मिते! मेरी हँसीके विषयमें कोई अन्य कारण नहीं है।' परंतु रानी संनतिने (राजाके उस कथनपर) विश्वास नहीं किया और कहा—'राजन्! आपका यह कथन सरासर असत्य है। अभी-अभी आपने मेरे ही किसी विषयको लेकर हास्य किया है, अतः अब मैं जीवन धारण नहीं करूँगी। भला, देवताओंके अतिरिक्त मृत्युलोकनिवासी प्राणी चींटे-चींटीके वार्तालापको कैसे जान सकता है! इसलिये यहाँ आपने मेरी ही हँसी उड़ायी है। इसके अतिरिक्त और क्या हो सकता है?' रानीकी बात सुनकर निष्पाप राजा ब्रह्मदत्त कुछ उत्तर न दे सके। फिर इस रहस्यको जाननेकी इच्छासे वे श्रीहरिके समक्ष नियमपूर्वक आराधना करते हुए सात राततक बैठे रहे। अन्तमें भगवान् हृषीकेशने स्वप्नमें राजासे कहा—'राजन्! प्रातःकाल तुम्हारे नगरमें घूमता हुआ एक वृद्ध ब्राह्मण जो कुछ कहेगा, उसके उन वचनोंसे तुम्हें सारा रहस्य ज्ञात हो जायगा।' यों कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर प्रातःकाल जब राजा ब्रह्मदत्त अपनी पत्नी और दोनों मन्त्रियोंके साथ नगरसे निकल रहे थे, उसी समय उन्होंने अपने समक्ष आते हुए उस वृद्ध ब्राह्मणको देखा, जो इस प्रकार कह रहा था ॥ २१—२७ ॥
ब्राह्मण उवाच<br>ये विप्रमुख्याः कुरुजाङ्गलेषु<br>दाशास्तथा दाशपुरे मृगाश्च ।ब्राह्मण कह रहा था— 'जो (पहले) कुरुक्षेत्रमें श्रेष्ठ ब्राह्मणके रूपमें, दाशपुर (मंदसौर)-में व्याधके रूपमें,
* अध्याय २१ *८३

| कालञ्जरे सप्त च चक्रवाका<br>ये मानसे तेऽत्र वसन्ति सिद्धाः॥ २८ | कालञ्जर-पर्वतपर मृग-योनिमें और मानसरोवरमें सात चक्रवाकके रूपमें उत्पन्न हुए थे, वे ही (व्यक्ति अब) सिद्ध (होकर) यहाँ निवास कर रहे हैं'॥ २८॥ |
| सूत उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्ताभ्यां स पपात शुचा ततः।<br>जातिस्मरत्वमगमत् तौ च मन्त्रिवरावुभौ॥ २९<br>कामशास्त्रप्रणेता च बाभ्रव्यस्तु सुबालकः।<br>पाञ्चाल इति लोकेषु विश्रुतः सर्वशास्त्रवित्॥ ३०<br>कण्डरीकोऽपि धर्मात्मा वेदशास्त्रप्रवर्तकः।<br>भूत्वा जातिस्मरौ शोकात् पतितावग्रतस्तदा॥ ३१<br>हा वयं योगविभ्रष्टाः कामतः कर्मबन्धनाः।<br>एवं विलप्य बहुशस्त्रयस्ते योगपारगाः॥ ३२<br>विस्मयाच्छाद्धमाहात्म्यमभिनन्द्य पुनः पुनः।<br>ततस्तस्मै धनं दत्त्वा प्रभूतग्रामसंयुतम्॥ ३३<br>विसृज्य ब्राह्मणं तं च वृद्धं धनमुदान्वितम्।<br>आत्मीयं नृपतिः पुत्रं नृपलक्षणसंयुतम्॥ ३४<br>विष्वक्सेनाभिधानं तु राजा राज्येऽभ्यषेचयत्।<br>मानसे मिलिताः सर्वे ततस्ते योगिनो वराः॥ ३५<br>ब्रह्मदत्तादयस्तस्मिन् पितृसक्ता विमत्सराः।<br>संनतिश्चाभवद् भ्रष्टा मयैतत् किल दर्शितम्॥ ३६<br>राज्यत्यागफलं सर्वं यदेतदभिलक्ष्यते।<br>तथेति प्राह राजा तु पुनस्तामभिनन्दयन्॥ ३७<br>त्वत्प्रसादादिदं सर्वं मयैतत् प्राप्यते फलम्।<br>ततस्ते योगमास्थाय सर्व एव वनौकसः॥ ३८<br>ब्रह्मरन्ध्रेण परमं पदमापुस्तपोबलात्।<br>एवमायुर्धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च॥ ३९<br>प्रयच्छन्ति सुतान् राज्यं नृणां प्रीताः पितामहाः।<br>य इदं पितृमाहात्म्यं ब्रह्मदत्तस्य च द्विजाः॥ ४०<br>द्विजेभ्यः श्रावयेद् यो वा शृणोत्यथ पठेत्तु वा।<br>कल्पकोटिशतं साग्रं ब्रह्मलोके महीयते॥ ४१ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! ब्राह्मणकी ऐसी बात सुनकर राजा शोकाकुल हो अपने दोनों मन्त्रियोंके साथ भूतलपर गिर पड़े। उस समय उन्हें जातिस्मरत्व (पूर्वजन्मके वृत्तान्तोंके ज्ञातृत्व)-की प्राप्ति हो गयी। उन दोनों श्रेष्ठ मन्त्रियोंमें एक बाभ्रव्य सुबालक कामशास्त्रका प्रणेता और सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता था। वह संसारमें पाञ्चाल नामसे विख्यात था। दूसरा कण्डरीक भी धर्मात्मा और वेद-शास्त्रका प्रवर्तक था। वे दोनों भी उस समय राजाके अग्रभागमें शोकाविष्ट हो धराशायी हो गये और उन्हें भी जातिस्मरत्वकी प्राप्ति हुई। (उस समय वे विलाप करते हुए कहने लगे—)'हाय! हमलोग लोलुप हो कर्मबन्धनमें फँसकर योगसे पूर्णतया भ्रष्ट हो गये।' इस तरह अनेकविध विलाप करके वे तीनों योगके पारदर्शी विद्वान् विस्मयाविष्ट हो बारंबार श्राद्धके माहात्म्यका अभिनन्दन करने लगे। तत्पश्चात् राजाने उस ब्राह्मणको अनेक गाँवोंसहित प्रचुर धन-सम्पत्ति प्रदान की। इस प्रकार धनकी प्राप्तिसे हर्षित हुए उस वृद्ध ब्राह्मणको विदाकर राजा ब्रह्मदत्तने राजलक्षणोंसे युक्त अपने विष्वक्सेन नामक औरस पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया (और स्वयं जंगलकी राह ली)। तदनन्तर ब्रह्मदत्त आदि वे सभी श्रेष्ठ योगी मत्सररहित एवं पितृभक्त होकर उस मानसरोवरमें परस्पर आ मिले। संनतिका अमर्ष गल गया और वह राजासे कहने लगी—'राजन्! आप जो यह अभिलाषा कर रहे हैं, वह सब राज्य-त्यागका ही परिणाम है और निश्चय ही मेरे द्वारा घटित हुआ है।' राजाने 'तथेति'—ऐसा ही है कहकर उसकी बातको स्वीकार किया और पुनः उसका अभिनन्दन करते हुए कहा—'यह तुम्हारी ही कृपा है, जो मुझे यह सारा फल प्राप्त हो रहा है।' तदनन्तर वे सभी वनवासी योगका आश्रय लेकर अपने तपोबलके प्रभावसे ब्रह्मरन्ध्रद्वारा प्राणत्याग करके परमपदको प्राप्त हो गये। इस प्रकार प्रसन्न हुए पितामह—पितरलोग मनुष्योंको, आयु, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख, पुत्र और राज्य प्रदान करते हैं। द्विजवरो! जो मनुष्य ब्रह्मदत्तके इस पितृमाहात्म्यको ब्राह्मणोंको सुनाता है या स्वयं श्रवण करता है अथवा पढ़ता है, वह सौ करोड़ कल्पोंतक ब्रह्मलोकमें प्रशंसित होता है॥ २९—४१॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे श्राद्धकल्पे पितृमाहात्म्यं नामैकविंशोऽध्यायः॥ २१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके श्राद्धकल्पमें पितृमाहात्म्य नामक इक्कीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१॥

८४ * मत्स्यपुराण *

बाईसवाँ अध्याय

श्राद्धके योग्य समय, स्थान (तीर्थ) तथा कुछ विशेष नियमोंका वर्णन

ऋषय ऊचुः<br>कस्मिन् काले च तच्छ्राद्धमनन्तफलं भवेत्।<br>कस्मिन् वासरभोगे तु श्राद्धकृच्छ्राद्धमाचरेत्।<br>तीर्थेषु केषु च कृतं श्राद्धं बहुफलं भवेत्॥ १**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! श्राद्धकर्ताको दिनके किस भागमें श्राद्ध करना चाहिये? किस कालमें किया गया वह श्राद्ध अनन्त फलदायक होता है? तथा किन-किन तीर्थोंमें किया गया श्राद्ध अधिक-से-अधिक फल प्रदान करता है?॥ १॥
सूत उवाच<br>अपराह्ने तु सम्प्राप्ते अभिजिद्रौहिणोदये।<br>यत्किञ्चिद् दीयते तत्र तदक्षयमुदाहृतम्॥ २<br>तीर्थानि यानि सर्वाणि पितॄणां वल्लभानि च।<br>नामतस्तानि वक्ष्यामि संक्षेपेण द्विजोत्तमाः॥ ३<br>पितृतीर्थं गयानाम सर्वतीर्थवरं शुभम्।<br>यत्रास्ते देवदेवेशः स्वयमेव पितामहः॥ ४<br>तत्रैषा पितृभिर्गीता गाथा भागमभीप्सुभिः॥ ५<br>एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्।<br>यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत्॥ ६<br>तथा वाराणसी पुण्या पितॄणां वल्लभा सदा।<br>यत्राविमुक्तसांनिध्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ ७<br>पितॄणां वल्लभं तद्वत् पुण्यं च विमलेश्वरम्।<br>पितृतीर्थं प्रयागं तु सर्वकामफलप्रदम्॥ ८<br>वटेश्वरस्तु भगवान् माधवेन समन्वितः।<br>योगनिद्राशयस्तद्वत् सदा वसति केशवः॥ ९**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! अपराह्न-काल (दिनके तीसरे पहरमें प्राप्त होनेवाले) अभिजित् मुहूर्तमें तथा रोहिणीके उदयकालमें (पितरोंके निमित्त) जो कुछ दिया जाता है, वह अक्षय बतलाया गया है। द्विजवरो! अब जो-जो तीर्थ पितरोंको परम प्रिय हैं, उन सबका नाम-निर्देशपूर्वक संक्षेपसे वर्णन कर रहा हूँ। गया नामक पितृतीर्थ सभी तीर्थोंमें श्रेष्ठ एवं मङ्गलदायक है, वहाँ देवदेवेश्वर भगवान् पितामह स्वयं ही विराजमान हैं। वहाँ श्राद्धमें भाग पानेकी कामनावाले पितरोंद्वारा यह गाथा गायी गयी है—'मनुष्योंको अनेक पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये; क्योंकि उनमेंसे यदि एक भी पुत्र गयाकी यात्रा करेगा अथवा अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान कर देगा या नील वृष (साँड़)-का उत्सर्ग कर देगा (तो हमारा उद्धार हो जायगा)।' उसी प्रकार पुण्यप्रदा वाराणसी नगरी सदा पितरोंको प्रिय है, जहाँ अविमुक्तके निकट किया गया श्राद्ध भुक्ति (भोग) एवं मुक्ति (मोक्ष)-रूप फल प्रदान करता है। उसी प्रकार पुण्यप्रद विमलेश्वर तीर्थ भी पितरोंके लिये परम प्रिय है। पितृतीर्थ प्रयाग सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंका प्रदाता है। वहाँ माधवसमेत भगवान् वटेश्वर तथा उसी प्रकार योगनिद्रामें शयन करते हुए भगवान् केशव सदा निवास करते हैं॥ २—९॥
दशाश्वमेधिकं पुण्यं गङ्गाद्वारं तथैव च।<br>नन्दाथ ललिता तद्वत्तीर्थं मायापुरी शुभा॥ १०<br>तथा मित्रपदं नाम ततः केदारमुत्तमम्।<br>गङ्गासागरमित्याहुः सर्वतीर्थमयं शुभम्॥ ११<br>तीर्थं ब्रह्मसरस्तद्वच्छतद्रुसलिले ह्रदे।<br>तीर्थं तु नैमिषं नाम सर्वतीर्थफलप्रदम्॥ १२पुण्यमय दशाश्वमेधिक तीर्थ, गङ्गाद्वार (हरिद्वार), नन्दा, ललिता तथा मङ्गलमयी मायापुरी (ऋषिकेश)—ये सभी तीर्थ भी उसी प्रकार पितरोंको प्रिय हैं। मित्रपद (तीर्थ) भी श्रेष्ठ हैं। उत्तम केदारतीर्थ और सर्वतीर्थमय एवं मङ्गलप्रद गङ्गासागरतीर्थको भी पितृप्रिय कहा गया है। उसी तरह शतद्रु (सतलज) नदीके जलके अन्तर्गत कुण्डमें स्थित ब्रह्मसर तीर्थ भी श्रेष्ठ हैं। नैमिषारण्य सम्पूर्ण तीर्थोंका एकत्र फल प्रदान करनेवाला है। यह

* अध्याय २२ * । ८५


| गङ्गोद्भेदस्तु गोमत्यां यत्रोद्भूतः सनातनः।<br>तथा यज्ञवराहस्तु देवदेवश्च शूलभृत् ॥ १३<br>यत्र तत्काञ्चनं द्वारमष्टादशभुजो हरः।<br>नेमिस्तु हरिचक्रस्य शीर्णा यत्राभवत् पुरा ॥ १४<br>तदेतन्नैमिषारण्यं सर्वतीर्थनिषेवितम्।<br>देवदेवस्य तत्रापि वाराहस्य तु दर्शनम् ॥ १५<br>यः प्रयाति स पूतात्मा नारायणपदं व्रजेत्।<br>कृतशौचं महापुण्यं सर्वपापनिषूदनम् ॥ १६<br>यत्रास्ते नारसिंहस्तु स्वयमेव जनार्दनः।<br>तीर्थमिक्षुमती नाम पितॄणां वल्लभं सदा ॥ १७<br>सङ्गमे यत्र तिष्ठन्ति गङ्गायाः पितरः सदा।<br>कुरुक्षेत्रं महापुण्यं सर्वतीर्थसमन्वितम् ॥ १८<br>तथा च सरयूः पुण्या सर्वदेवनमस्कृता।<br>इरावती नदी तद्वत् पितृतीर्थाधिवासिनी ॥ १९<br>यमुना देविका काली चन्द्रभागा दृषद्वती।<br>नदी वेणुमती पुण्या परा वेत्रवती तथा ॥ २०<br>पितॄणां वल्लभा होताः श्राद्धे कोटिगुणा मताः।<br>जम्बूमार्गं महापुण्यं यत्र मार्गो हि लक्ष्यते ॥ २१<br>अद्यापि पितृतीर्थं तत् सर्वकामफलप्रदम्।<br>नीलकुण्डमिति ख्यातं पितृतीर्थं द्विजोत्तमाः ॥ २२<br>तथा रुद्रसरः पुण्यं सरो मानसमेव च।<br>मन्दाकिनी तथाच्छोदा विपाशाथ सरस्वती ॥ २३<br>पूर्वमित्रपदं तद्वद् वैद्यनाथं महाफलम्।<br>क्षिप्रा नदी महाकालस्तथा कालञ्जरं शुभम् ॥ २४<br>वंशोद्भेदं हरोद्भेदं गङ्गोद्भेदं महाफलम्।<br>भद्रेश्वरं विष्णुपदं नर्मदाद्वारमेव च ॥ २५<br>गयापिण्डप्रदानेन समान्याहुर्महर्षयः।<br>एतानि पितृतीर्थानि सर्वपापहराणि च ॥ २६<br>स्मरणादपि लोकानां किमु श्राद्धकृतां नृणाम्।<br>ओंकारं पितृतीर्थं च कावेरी कपिलोदकम् ॥ २७ | पितरोंको (बहुत) प्रिय है। यहीं गोमती नदीमें गङ्गाका सनातन स्रोत प्रकट हुआ है। यहाँ त्रिशूलधारी महादेव और सनातन यज्ञवराह विराजते हैं। यहाँ अष्टादश भुजाधारी शंकरकी प्रतिमा है। यहाँका काञ्चनद्वार प्रसिद्ध है। यहाँ पूर्वकालमें भगवान् विष्णुद्वारा दिये गये धर्मचक्रकी नेमि शीर्ण होकर गिरी थी। यह सम्पूर्ण तीर्थोंद्वारा निषेवित नैमिषारण्य नामक तीर्थ है। यहाँ देवाधिदेव भगवान् वाराहका भी दर्शन होता है। जो वहाँकी यात्रा करता है, वह पवित्रात्मा होकर नारायणपदको प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार सम्पूर्ण पापोंका विनाशक एवं महान् पुण्यशाली कृतशौच नामक तीर्थ है, जहाँ भगवान् जनार्दन नृसिंहरूपसे विराजमान रहते हैं। तीर्थभूता इक्षुमती (काली नदी) पितरोंको सदा प्रिय है। (कन्नौजके पास इस इक्षुमतीके साथ) गङ्गाजीके संगमपर पितरलोग सदा निवास करते हैं। सम्पूर्ण तीर्थोंसे युक्त कुरुक्षेत्र नामक महान् पुण्यप्रद तीर्थ है। इसी प्रकार समस्त देवताओंद्वारा नमस्कृत पुण्यसलिला सरयू, पितृ-तीर्थोंकी अधिवासिनीरूपा इरावती नदी, यमुना, देविका (देग), काली (कालीसिंध), चन्द्रभागा (चनाब), दृषद्वती (घग्गर), पुण्यतोया वेणुमती (वेण्वा) नदी तथा सर्वश्रेष्ठ वेत्रवती (बेतवा)—ये नदियाँ पितरोंको परम प्रिय हैं। इसलिये श्राद्धके विषयमें करोड़ों गुना फलदायिनी मानी गयी हैं। द्विजवरो! जम्बूमार्ग (भड़ौंच) नामक तीर्थ महान् पुण्यदायक एवं सम्पूर्ण मनोऽभिलषित फलोंका प्रदाता है, यह पितरोंका प्रिय तीर्थ है। वहाँसे पितृलोक जानेका मार्ग अभी भी दिखायी पड़ता है। नीलकुण्ड तीर्थ भी पितृतीर्थरूपसे विख्यात है॥ १०—२२॥<br><br>इसी प्रकार पुण्यप्रद रुद्रसर, मानससर, मन्दाकिनी, अच्छोदा (अच्छावत), विपाशा (व्यास नदी), सरस्वती, पूर्वमित्रपद, महान् फलदायक वैद्यनाथ, क्षिप्रा नदी, महाकाल, मङ्गलमय कालञ्जर, वंशोद्भेद, हरोद्भेद, महान् फलप्रद गङ्गोद्भेद, भद्रेश्वर, विष्णुपद और नर्मदाद्वार—ये सभी पितृप्रिय तीर्थ हैं। इन तीर्थोंमें श्राद्ध करनेसे गया तीर्थमें पिण्ड-प्रदानके तुल्य ही फल प्राप्त होता है—ऐसा महर्षियोंने कहा है। ये सभी पितृतीर्थ जब स्मरणमात्र कर लेनेसे लोगोंके सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करते हैं, तब (वहाँ जाकर) श्राद्ध करनेवाले मनुष्योंके पापनाशकी तो बात ही क्या है। इसी तरह ओंकार पितृतीर्थ है। कावेरी, कपिलोदका, |