मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३२- देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठना और अपने पिताके पास जाना तथा शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना
| * अध्याय २९ * | १९३ |
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| फलत्येवं ध्रुवं पापं गुरुभुक्तमिवादरे।<br>यदा घातयसे विप्रं कचमाङ्गिरसं तदा॥ ४<br><br>अपापशीलं धर्मज्ञं शुश्रूषुं मद्गृहे रतम्।<br>वधादनर्हतस्तस्य वधाच्च दुहितुर्मम॥ ५<br><br>वृषपर्वन् निबोध त्वं त्यक्ष्यामि त्वां सबान्धवम्।<br>स्थातुं त्वद्विषये राजन् न शक्नोमि त्वया सह॥ ६<br><br>अद्यैवमभिजानामि दैत्यं मिथ्याप्रलापिनम्।<br>यतस्त्वमात्मनोदीर्णां दुहितां किमुपेक्षसे॥ ७ | जैसे खाया हुआ गरिष्ठ अन्न तुरंत नहीं तो कुछ देर बाद अवश्य ही पेटमें उपद्रव करता है, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी निश्चय ही अपना फल देता है। राजन्! अङ्गिराका पौत्र कच विशुद्ध ब्राह्मण है। वह स्वभावसे ही निष्पाप और धर्मज्ञ है तथा उन दिनों मेरे घरमें रहकर निरन्तर मेरी सेवामें संलग्न था, परंतु तुमने उसका बार-बार वध करवाया था। वृषपर्वन्! ध्यान देकर मेरी यह बात सुन लो, तुम्हारे द्वारा पहले वधके अयोग्य ब्राह्मणका वध किया गया है और अब मेरी पुत्री देवयानीका भी वध करनेके लिये उसे कुएँमें धकेला गया है। इन दोनों हत्याओंके कारण मैं तुमको और तुम्हारे भाई-बन्धुओंको त्याग दूँगा। राजन्! तुम्हारे राज्यमें और तुम्हारे साथ मैं एक क्षण भी नहीं ठहर सकूँगा। दैत्यराज! आज मैं तुम-जैसे मिथ्याप्रलापी दैत्यको भलीभाँति समझ सका हूँ। तुम अपनी पुत्रीके उद्धत स्वभावकी उपेक्षा क्यों कर रहे हो?'॥ १—७॥ |
| वृषपर्वावाच<br>नावहं न मृषावादं त्वयि जानामि भार्गव।<br>त्वयि सत्यं च धर्मश्च तत् प्रसीदतु मां भवान्॥ ८<br>अद्यास्मानपहाय त्वमितो यास्यसि भार्गव।<br>समुद्रं सम्प्रवेक्ष्यामि नान्यदस्ति परायणम्॥ ९ | वृषपर्वा बोले— भृगुनन्दन! आपने मेरे जानते कभी अनुचित या मिथ्या भाषण नहीं किया। आपमें धर्म और सत्य सदा प्रतिष्ठित हैं। अतः आप हमलोगोंपर कृपा करके प्रसन्न होइये! भार्गव! यदि आप हमें छोड़कर चले जाते हैं तो मैं (तुरन्त) समुद्रमें प्रवेश कर जाऊँगा; क्योंकि हमारे लिये फिर दूसरी कोई गति नहीं है॥ ८-९॥ |
| शुक्र उवाच<br>समुद्रं प्रविशध्वं वा दिशो वा व्रजतासुराः।<br>दुहितुर्नाप्रियं सोढुं शक्तोऽहं दयिता हि मे॥ १०<br><br>प्रसाद्यतां देवयानीं जीवितं यत्र मे स्थितम्।<br>योगक्षेमकरस्तेऽहमिन्द्रस्येव बृहस्पतिः॥ ११ | शुक्राचार्यने कहा— असुरो! तुम लोग समुद्रमें घुस जाओ अथवा चारों दिशाओंमें भाग जाओ, मैं अपनी पुत्रीके प्रति किया गया अप्रिय बर्ताव नहीं सह सकता; क्योंकि वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। तुम देवयानीको प्रसन्न करो; क्योंकि उसीमें मेरे प्राण बसते हैं। उसके प्रसन्न हो जानेपर इन्द्रके पुरोहित बृहस्पतिकी भाँति मैं तुम्हारे योगक्षेमका वहन करता रहूँगा॥ १०-११॥ |
| वृषपर्वावाच<br>यत्किञ्चिदसुरेन्द्राणां विद्यते वसु भार्गव।<br>भुवि हस्तिरथाश्वं वा तस्य त्वं मम चेश्वरः॥ १२ | वृषपर्वा बोले— भृगुनन्दन! असुरेश्वरोंके पास इस भूतलपर जो कुछ भी सम्पत्ति तथा हाथी-घोड़े आदि पशुधन है, उसके और मेरे भी आप ही स्वामी हैं॥ १२॥ |
| शुक्र उवाच<br>यत्किंचिदस्ति द्रविणं दैत्येन्द्राणां महासुर।<br>तस्येश्वरोऽस्मि यद्येतद् देवयानी प्रसाद्यताम्॥ १३ | शुक्राचार्यने कहा— महान् असुर! दैत्यराजोंका जो कुछ भी धन-वैभव है, यदि उसका स्वामी मैं ही हूँ तो उसके द्वारा इस देवयानीको प्रसन्न करो॥ १३॥ |
| १९४ | * मत्स्यपुराण * |
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| शौनक उवाच<br>ततस्तु त्वरितः शुक्रस्तेन राज्ञा समं ययौ।<br>उवाच चैनां सुभगे प्रतिपन्नं वचस्तव॥ १४॥ | शौनकजी कहते हैं—शतानीक! तदनन्तर शुक्राचार्य तुरंत ही राजा वृषपर्वाके साथ अपनी पुत्री देवयानीके पास पहुँचे और उससे बोले—'सुभगे! तुम्हारी बात पूरी हो गयी'॥ १४॥ |
| देवयान्युवाच<br>यदि त्वमीश्वरस्तात राज्ञो वित्तस्य भार्गव।<br>नाभिजानामि तत्तेऽहं राजा वदतु मां स्वयम्॥ १५॥ | तब देवयानीने कहा—तात भार्गव! 'आप राजाके धनके स्वामी हैं' मैं इस बातको आपके कहनेसे नहीं मानूँगी। राजा स्वयं कहें तो हमें विश्वास होगा॥ १५॥ |
| वृषपर्वोवाच<br>यं काममभिजानासि देवयानि शुचिस्मिते।<br>तत्तेऽहं सम्प्रदास्यामि यद्यपि स्यात् सुदुर्लभम्॥ १६॥ | वृषपर्वा बोले—पवित्र मुसकानवाली देवयानी! तुम जिस वस्तुको पाना चाहती हो, वह यदि अत्यन्त दुर्लभ हो तो भी मैं उसे तुम्हें अवश्य दूँगा (यह तुम विश्वास करो)॥ १६॥ |
| देवयान्युवाच<br>दासीं कन्यासहस्रेण शर्मिष्ठामभिकामये।<br>अनुयास्यति मां तत्र यत्र दास्यति मे पिता॥ १७॥ | देवयानीने कहा—मैं चाहती हूँ, शर्मिष्ठा एक हजार कन्याओंके साथ मेरी दासी बनकर रहे और पिताजी जहाँ मेरा विवाह करें, वहाँ भी वह मेरे साथ जाय॥ १७॥ |
| वृषपर्वोवाच<br>उत्तिष्ठ धात्रि गच्छ त्वं शर्मिष्ठां शीघ्रमानय।<br>यं च कामयते कामं देवयानी करोतु तम्॥ १८॥ | यह सुनकर वृषपर्वाने धायसे कहा—धात्रि! तुम उठो, जाओ और शर्मिष्ठाको (यहाँ) शीघ्र बुला लाओ एवं देवयानीकी जिस वस्तुकी कामना हो, उसे वह पूर्ण करे॥ १८॥ |
| शौनक उवाच<br>ततो धात्री तत्र गत्वा शर्मिष्ठामिदमब्रवीत्।<br>उत्तिष्ठ भद्रे शर्मिष्ठे ज्ञातीनां सुखमावह॥ १९॥<br>यं सा कामयते कामं स कार्योऽत्र त्वयानघे।<br>दासी त्वमभिजातासि देवयान्याः सुशोभने॥ २०॥<br>त्यजति ब्राह्मणः शिष्यान् देवयान्या प्रचोदितः। | शौनकजी कहते हैं—तब धायने शर्मिष्ठाके पास जाकर कहा—'भद्रे शर्मिष्ठे! उठो और अपने जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाओ। पापरहित राजकुमारी! आज शुक्राचार्य देवयानीके कहनेसे अपने शिष्यों—यजमानोंको त्याग रहे हैं। अतः देवयानीकी जो कामना हो, वह तुम्हें पूर्ण करनी चाहिये। सुशोभने! तुम देवयानीकी दासी बनायी गयी हो'॥ १९-२० १/२॥ |
| शर्मिष्ठोवाच<br>यं च कामयते कामं करवाण्यहमद्य तम्।<br>मा गान्मन्युवशं शुक्रो देवयानी च मत्कृते॥ २१॥ | शर्मिष्ठा बोली—यदि इस प्रकार देवयानीके लिये ही शुक्राचार्यजी मुझे बुला रहे हैं तो देवयानी जो कुछ चाहती हैं, वह सब आजसे मैं करूँगी। मेरे अपराधसे न शुक्राचार्यजी कहीं जायें और न देवयानी ही। मेरे कारण ये अन्यत्र जानेका विचार न करें॥ २१॥ |
| शौनक उवाच<br>ततः कन्यासहस्रेण वृता शिविकया तदा।<br>पितुर्निदेशात् त्वरिता निश्चक्राम पुरोत्तमात्॥ २२॥ | शौनकजी कहते हैं—शतानीक! तदनन्तर पिताकी आज्ञासे राजकुमारी शर्मिष्ठा शिविकापर आरूढ हो तुरन्त राजधानीसे बाहर निकली। उस समय वह एक सहस्र कन्याओंसे घिरी हुई थी॥ २२॥ |
| शर्मिष्ठोवाच<br>अहं कन्यासहस्रेण दासी ते परिचारिका।<br>ध्रुवं त्वां तत्र यास्यामि यत्र दास्यति ते पिता॥ २३॥ | शर्मिष्ठा बोली—देवयानी! मैं एक सहस्र दासियोंके साथ तुम्हारी दासी बनकर सेवा करूँगी और तुम्हारे पिता जहाँ भी तुम्हारा ब्याह करेंगे, निश्चय ही वहाँ तुम्हारे साथ चलूँगी॥ २३॥ |
* अध्याय ३० * १९५
| देवयान्युवाच<br>स्तुवतो दुहिता चाहं याचतः प्रतिगृह्णतः।<br>स्तूयमानस्य दुहिता कथं दासी भविष्यसि॥ २४ | **देवयानीने कहा—**अरी! मैं तो स्तुति करनेवाले और दान लेनेवाले भिक्षुककी पुत्री हूँ और तुम उस बड़े बापकी बेटी हो, जिसकी मेरे पिता स्तुति करते हैं, फिर मेरी दासी बनकर कैसे रहोगी ? ॥ २४ ॥ |
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| शर्मिष्ठोवाच<br>येन केनचिदार्त्तानां ज्ञातीनां सुखमावहेत्।<br>अनुयास्याम्यहं तत्र यत्र दास्यति ते पिता॥ २५ | **शर्मिष्ठा बोली—**जिस-किसी उपायसे भी सम्भव हो, अपने विपद्ग्रस्त जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाना चाहिये। (इसलिये) तुम्हारे पिता जहाँ तुम्हें देंगे, वहाँ भी मैं तुम्हारे साथ चलूँगी॥ २५॥ |
| शौनक उवाच<br>प्रतिश्रुते दासभावे दुहित्रा वृषपर्वणः।<br>देवयानी नृपश्रेष्ठ पितरं वाक्यमब्रवीत्॥ २६ | **शौनकजी कहते हैं—**नृपश्रेष्ठ! जब वृषपर्वाकी पुत्रीने दासी होनेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब देवयानीने अपने पितासे कहा॥ २६॥ |
| देवयान्युवाच<br>प्रविशामि पुरं तात तुष्टास्मि द्विजसत्तम।<br>अमोघं तव विज्ञानमस्ति विद्याबलं च ते॥ २७ | **देवयानी बोली—**पिताजी! अब मैं नगरमें प्रवेश करूँगी। द्विजश्रेष्ठ! अब मुझे विश्वास हो गया कि आपका विज्ञान और आपकी विद्याका बल अमोघ है॥ २७॥ |
| शौनक उवाच<br>एवमुक्तो द्विजश्रेष्ठो दुहित्रा सुमहायशाः।<br>प्रविवेश पुरं हृष्टः पूजितः सर्वदानवैः॥ २८ | **शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! अपनी पुत्री देवयानीके ऐसा कहनेपर महायशस्वी द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्यने समस्त दानवोंसे पूजित एवं प्रसन्न होकर नगरमें प्रवेश किया॥ २८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरितवर्णन नामक उन्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २९॥
तीसवाँ अध्याय
सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वनविहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीके साथ बातचीत तथा विवाह
| शौनक उवाच<br>अथ दीर्घेण कालेन देवयानी नृपोत्तम।<br>वनं तदैव निर्याता क्रीडार्थं वरवर्णिनी॥ १<br>तेन दासीसहस्रेण सार्धं शर्मिष्ठया तदा।<br>तमेव देशं सम्प्राप्ता यथाकामं चचार सा॥ २<br>ताभिः सखीभिः सहिता सर्वाभिर्मुदिता भृशम्।<br>क्रीडन्त्योऽभिरताः सर्वाः पिबन्त्यो मधु माधवम्॥ ३<br>खादन्त्यो विविधान् भक्ष्यान् फलानि विविधानि च।<br>पुनश्च नाहुषो राजा मृगलिप्सुर्यदृच्छया॥ ४ | **शौनकजी कहते हैं—**नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उत्तम वर्णवाली देवयानी फिर उसी वनमें विहारके लिये गयी। उस समय उसके साथ एक हजार दासियोंसहित शर्मिष्ठा भी सेवामें उपस्थित थी। वनमें उसी प्रदेशमें जाकर वह उन समस्त सखियोंके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक इच्छानुसार विचरने लगी। वे सब वहाँ भाँति-भाँतिके खेल खेलती हुई आनन्दमें मग्न हो गयीं। वे कभी वासन्तिक पुष्पोंके मकरन्दका पान करतीं, कभी नाना प्रकारके भोज्य पदार्थोंका स्वाद लेतीं और कभी फल खाती थीं। इसी समय दैवेच्छासे नहुषपुत्र राजा ययाति पुनः शिकार खेलनेके लिये |
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१९६ * मत्स्यपुराण *
| तमेव देशं सम्प्राप्तो जललिप्सुः प्रतर्षितः।<br>ददर्श देवयानीं च शर्मिष्ठां ताश्च योषितः ॥ ५<br>पिबन्त्यो ललनास्ताश्च दिव्याभरणभूषिताः ।<br>उपविष्टां च ददृशे देवयानीं शुचिस्मिताम् ॥ ६<br>रूपेणाप्रतिमां तासां स्त्रीणां मध्ये वराङ्गनाम् ।<br>शर्मिष्ठया सेव्यमानां पादसंवाहनादिभिः ॥ ७ | उसी स्थानपर आ गये। वे परिश्रम करनेके कारण अधिक थक गये थे और जल पीना चाहते थे। उन्होंने देवयानी, शर्मिष्ठा तथा अन्य युवतियोंको भी देखा। वे सभी पीनेयोग्य रसका पान कर रही थीं। राजाने पवित्र मुसकानवाली देवयानीको वहाँ परम सुन्दर आसनपर बैठी हुई देखा। उसके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी। वह सुन्दरी उन स्त्रियोंके मध्यमें बैठी हुई थी और शर्मिष्ठा उसकी चरणसेवा कर रही थी॥ ५—७॥ |
| ययातिरुवाच<br>द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यां द्वे कन्ये परिवारिते ।<br>गोत्रे च नामनी चैव द्वयोः पृच्छाम्यतो ह्यहम् ॥ ८ | ययातिने पूछा— दो हजार * कुमारी सखियोंसे घिरी हुई कन्याओ! मैं आप दोनोंके गोत्र और नाम पूछ रहा हूँ। शुभे! आप दोनों अपना परिचय दें॥ ८॥ |
| देवयान्युवाच<br>आख्यास्याम्यहमादत्स्व वचनं मे नराधिप ।<br>शुक्रो नामासुरगुरुः सुतां जानीहि तस्य माम् ॥ ९<br>इयं च मे सखी दासी यत्राहं तत्र गामिनी।<br>दुहिता दानवेन्द्रस्य शर्मिष्ठा वृषपर्वणः ॥ १० | देवयानी बोली— महाराज! मैं स्वयं परिचय देती हूँ, आप मेरी बात सुनें। असुरोंके जो सुप्रसिद्ध गुरु शुक्राचार्य हैं, मुझे उन्हींकी पुत्री जानिये। यह दानवराज वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा मेरी सखी और दासी है। मैं विवाह होनेपर जहाँ जाऊँगी, वहाँ यह भी साथ जायगी ॥ ९-१०॥ |
| ययातिरुवाच<br>कथं तु ते सखी दासी कन्येयं वरवर्णिनी।<br>असुरेन्द्रसुता सुभ्रूः परं कौतूहलं हि मे ॥ ११ | ययाति बोले— सुन्दरि! यह असुरराजकी रूपवती कन्या सुन्दर भौंहोंवाली शर्मिष्ठा आपकी सखी और दासी किस प्रकार हुई? यह बताइये। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ११ ॥ |
| देवयान्युवाच<br>सर्वमेव नरव्याघ्र विधानमनुवर्तते ।<br>विधिना विहितं ज्ञात्वा मा विचित्रं मनः कृथाः ॥ १२<br>राजवद् रूपवेशौ ते ब्राह्मीं वाचं बिभर्षि च ।<br>किं नामा त्वं कुतश्चासि कस्य पुत्रश्च शंस मे ॥ १३ | देवयानी बोली— नरश्रेष्ठ! सब लोग दैवके विधानका ही अनुसरण करते हैं। इसे भी भाग्यका विधान मानकर संतोष कीजिये। इस विषयकी विचित्र घटनाओंको न पूछिये। आपके रूप और वेश राजाके समान हैं और आप विशुद्ध संस्कृत भाषा बोल रहे हैं। मुझे बताइये, आपका क्या नाम है, आप कहाँसे आये हैं और किसके पुत्र हैं? ॥ १२-१३॥ |
| ययातिरुवाच<br>ब्रह्मचर्येण वेदो मे कृत्स्नः श्रुतिपथं गतः ।<br>राजांहं राजपुत्रश्च ययातिरिति विश्रुतः ॥ १४ | ययातिने कहा— मैंने ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक सम्पूर्ण वेदका अध्ययन किया है। मैं राजा नहुषका पुत्र हूँ और इस समय स्वयं राजा हूँ। मेरा नाम ययाति है ॥१४॥ |
| देवयान्युवाच<br>केन चार्थेन नृपते ह्येनं देशं समागतः ।<br>जिघृक्षुर्वारि यत् किञ्चिदथवा मृगलिप्सया ॥ १५ | देवयानीने कहा— महाराज! आप किस कार्यसे वनके इस प्रदेशमें आये हैं? आप जल अथवा कमल लेना चाहते हैं या शिकारकी इच्छासे ही आये हैं ? ॥ १५ ॥ |
| ययातिरुवाच<br>मृगलिप्सुरहं भद्रे पानीयार्थमिहागतः ।<br>बहुधाप्यनुयुक्तोऽस्मि त्वमनुज्ञातुमर्हसि ॥ १६ | ययातिने कहा— भद्रे! मैं एक हिंसक पशुको मारनेके लिये उसका पीछा कर रहा था, इससे बहुत थक गया हूँ और पानी पीनेके लिये यहाँ आया हूँ, अतः अब आप मुझे आज्ञा दीजिये ॥ १६ ॥ |
* यहाँ किन्हीं श्लोकोंमें देवयानीकी दो हजार और किन्हींमें एक हजार सखियोंका उल्लेख हुआ है। यथावसर दोनों ही ठीक हैं।