मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
और उसका माहात्म्य तथा हरिकेशको शिवजीद्वारा वरप्राप्ति
| ७३६ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| चकर्ष कस्यचिद् वक्त्रं मध्ये गृह्यादथापरम्।<br>ते गदाचक्रनिर्दग्धा गतसत्त्वा गतासवः॥ ५३<br>गगनाद् भ्रष्टसर्वाङ्गा निपेतुर्धरणीतले।<br>तेषु दैत्येषु सर्वेषु हतेषु पुरुषोत्तमः॥ ५४<br>तस्थौ शक्रप्रियं कृत्वा कृतकर्मा गदाधरः। | किसीका मुख फाड़ दिया तो दूसरेकी कमर तोड़ दी। इस प्रकार वे सभी गदाकी चोट और चक्रसे जल चुके थे, उनके पराक्रम नष्ट हो गये थे और शरीरके सभी अङ्ग चूर-चूर हो गये थे। वे प्राणरहित होकर आकाशसे भूतलपर गिर पड़े। इस प्रकार उन सभी दैत्योंके मारे जानेपर पुरुषोत्तम भगवान् गदाधर इन्द्रका प्रिय कार्य करके कृतार्थ हो शान्तिपूर्वक स्थित हुए॥ ४५–५४ १/२ ॥ |
| तस्मिन् विमर्दे संग्रामे निवृत्ते तारकामये॥ ५५<br>तं देशमाजगामाशु ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>सर्वैर्ब्रह्मर्षिभिः सार्धं गन्धर्वाप्सरसां गणैः॥ ५६<br>देवदेवो हरिं देवं पूजयन् वाक्यमब्रवीत्।<br>कृतं देव महत् कर्म सुराणां शल्यमुद्धृतम्।<br>वधेनानेन दैत्यानां वयं च परितोषिताः॥ ५७<br>योऽयं त्वया हतो विष्णो कालनेमी महासुरः।<br>त्वमेकोऽस्य मृधे हन्ता नान्यः कश्चन विद्यते॥ ५८<br>एष देवान् परिभवँल्लोकांश्च ससुरासुरान्।<br>ऋषीणां कदनं कृत्वा मामपि प्रति गर्जति॥ ५९<br>तदनेन तवाग्र्येण परितुष्टोऽस्मि कर्मणा।<br>यदयं कालकल्पस्तु कालनेमी निपातितः॥ ६०<br>तदागच्छस्व भद्रं ते गच्छामः दिवमुत्तमम्।<br>ब्रह्मर्षयस्त्वां तत्रस्थाः प्रतीक्षन्ते सदोगताः॥ ६१<br>कं चाहं तव दास्यामि वरं वरवतां वर।<br>सुरेष्वथ च दैत्येषु वराणां वरदो भवान्॥ ६२<br>निर्यात्यैतत् त्रैलोक्यं स्फीतं निहतकण्टकम्।<br>अस्मिन्नेव मृधे विष्णो शक्राय सुमहात्मने॥ ६३<br>एवमुक्तो भगवता ब्रह्मणा हरिरव्ययः।<br>देवाञ्शक्रमुखान् सर्वानुवाच शुभया गिरा॥ ६४ | तदनन्तर उस भयानक तारकामय संग्रामके निवृत्त होनेपर लोकपितामह ब्रह्मा तुरंत ही उस स्थानपर आये। उस समय उनके साथ सभी ब्रह्मर्षि थे तथा गन्धर्वों एवं अप्सराओंका समुदाय भी था। तब देवाधिदेव ब्रह्माने भगवान् श्रीहरिका आदर करते हुए इस प्रकार कहा—'देव! आपने बहुत बड़ा काम किया है। आपने तो देवताओंका काँटा ही उखाड़ दिया। दैत्योंके इस संहारसे हमलोग परम संतुष्ट हैं। विष्णो! आपने जो इस महान् असुर कालनेमिका वध किया है, यह आपके ही योग्य है; क्योंकि एकमात्र आप ही रणभूमिमें इसके वधकर्ता हैं, दूसरा कोई नहीं है। यह दानव देवताओं और असुरोंसहित समस्त लोकों और देवताओंको तिरस्कृत करते हुए ऋषियोंका संहार कर मेरे पास भी आकर गर्जता था। इसलिये जो यह कालके समान भयंकर कालनेमि मारा गया, आपके इस श्रेष्ठ कर्मसे मैं भलीभाँति संतुष्ट हूँ। अतः आपका कल्याण हो, आइये, अब हमलोग उत्तम स्वर्गलोकमें चलें। वहाँ सभामें बैठे हुए ब्रह्मर्षिगण आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। वरदानियोंमें श्रेष्ठ भगवन्! आप तो स्वयं ही देवताओं और दैत्योंके लिये श्रेष्ठ वरदायक हैं। ऐसी दशामें मैं आपको कौन-सा वर प्रदान करूँ? विष्णो! त्रिलोकीका यह समृद्धिशाली राज्य अब कण्टकरहित हो गया है, इसे आप इसी युद्धस्थलमें महात्मा इन्द्रको समर्पित कर दीजिये।' भगवान् ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर अविनाशी श्रीहरि इन्द्र आदि सभी देवताओंसे मधुर वाणीमें बोले॥ ५५–६४॥ |
| विष्णुरुवाच<br>शृण्वन्तु त्रिदशाः सर्वे यावन्तोऽत्र समागताः।<br>श्रवणावहितैः श्रोत्रैः पुरस्कृत्य पुरंदरम्॥ ६५<br>अस्माभिः समरे सर्वे कालनेमिमुखा हताः।<br>दानवा विक्रमोपेताः शक्रादपि महत्तराः॥ ६६<br>अस्मिन् महति संग्रामे दैतेयौ द्वौ विनिःसृतौ।<br>विरोचनश्च दैत्येन्द्रः स्वर्भानुश्च महाग्रहः॥ ६७ | **भगवान् विष्णुने कहा—**यहाँ आये हुए जितने देवता हैं, वे सभी इन्द्रको आगे करके सावधानीपूर्वक कान लगाकर मेरी बात सुनें। इस समरमें हमलोगोंने कालनेमि आदि सभी महान् पराक्रमी दानवोंको, जो इन्द्रसे भी बढ़कर बलशाली थे, मार डाला है; किंतु इस महान् संग्राममें दैत्येन्द्र विरोचन और महान् ग्रह राहु—ये दोनों दैत्य भाग निकले हैं। |
- अध्याय १७८ * | ७३७
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| स्वां दिशं भजतां शक्रो दिशं वरुण एव च।<br>याम्यां यमः पालयतामुत्तरां च धनाधिपः॥ ६८<br>ऋक्षैः सह यथायोगं गच्छतां चैव चन्द्रमाः।<br>अब्दमृतुमुखे सूर्यो भजतामयनैः सह॥ ६९<br>आज्यभागाः प्रवर्त्तन्तां सदस्यैरभिपूजिताः।<br>हूयन्तामग्नयो विप्रैर्वेददृष्टेन कर्मणा॥ ७०<br>देवाश्चाप्यग्निहोमेन स्वाध्यायेन महर्षयः।<br>श्राद्धेन पितरश्चैव तृप्तिं यान्तु यथासुखम्॥ ७१<br>वायुश्चरतु मार्गस्थस्त्रिधा दीप्यतु पावकः।<br>त्रींस्तु वर्णांश्च लोकांस्त्रींस्तर्पयंश्चात्मजैर्गुणैः॥ ७२<br>क्रतवः सम्प्रवर्त्तन्तां दीक्षणीयैर्द्विजातिभिः।<br>दक्षिणाश्चोपपाद्यन्तां याज्ञिकेभ्यः पृथक् पृथक् ॥ ७३<br>गां तु सूर्यो रसान् सोमो वायुः प्राणांश्च प्राणिषु।<br>तर्पयन्तः प्रवर्त्तन्तां सर्व एव स्वकर्मभिः॥ ७४<br>यथावदानुपूर्व्येण महेन्द्रमलयोद्भवाः।<br>त्रैलोक्यमातरः सर्वाः समुद्रं यान्तु सिन्धवः॥ ७५<br>दैत्येभ्यस्त्यज्यतां भीश्च शान्तिं व्रजत देवताः।<br>स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि ब्रह्मलोकं सनातनम्॥ ७६<br>स्वगृहे स्वर्गलोके वा संग्रामे वा विशेषतः।<br>विश्रम्भो वो न मन्तव्यो नित्यं क्षुद्रा हि दानवाः॥ ७७<br>छिद्रेषु प्रहरन्त्येते न तेषां संस्थितिर्ध्रुवा।<br>सौम्यानामृजुभावानां भवतामार्जवं धनम्॥ ७८<br>एवमुक्त्वा सुरगणान् विष्णुः सत्यपराक्रमः।<br>जगाम ब्रह्मणा सार्धं स्वलोकं तु महायशाः॥ ७९<br>एतदाश्चर्यमभवत् संग्रामे तारकामये।<br>दानवानां च विष्णोश्च यन्मां त्वं परिपृष्टवान्॥ ८० | अब इन्द्र अपनी पूर्व दिशाकी रक्षा करें तथा वरुण पश्चिम दिशाकी, यम दक्षिण दिशाका और कुबेर उत्तर दिशाका पालन करें। चन्द्रमा नक्षत्रोंके साथ पूर्ववत् अपने स्थानको चले जायँ। सूर्य अयनोंके साथ ऋतुकालानुसार वर्षका उपभोग करें। यज्ञोंमें सदस्योंद्वारा अभिपूजित हो देवगण आज्यभाग ग्रहण करें। ब्राह्मणलोग वेदविहित कर्मानुसार अग्निमें आहुतियाँ डालें। देवगण अग्निहोत्रसे, महर्षिगण स्वाध्यायसे और पितृगण श्राद्धसे सुखपूर्वक तृप्तिलाभ करें। वायु अपने मार्गसे प्रवाहित हों। अग्नि अपने गुणोंसे तीनों वर्णों और तीनों लोकोंको तृप्त करते हुए तीन भागोंमें विभक्त होकर प्रकाशित हों॥ ६५-७२॥<br><br>दीक्षित ब्राह्मणोंद्वारा यज्ञानुष्ठान प्रारम्भ हों। याज्ञिक ब्राह्मणोंको पृथक्-पृथक् दक्षिणाएँ दी जायँ। सूर्य पृथ्वीको, चन्द्रमा रसोंको और वायु प्राणियोंमें स्थित प्राणोंको तृप्त करते हुए सभी अपने-अपने कर्ममें प्रवृत्त हों। महेन्द्र और मलय पर्वतसे निकलनेवाली त्रिलोकीकी मातास्वरूप सभी नदियाँ आनुपूर्वी पूर्ववत् समुद्रमें प्रविष्ट हों। देवगण! आपलोग दैत्योंसे प्राप्त होनेवाले भयको छोड़ दें और शान्ति धारण करें। आपलोगोंका कल्याण हो। अब मैं सनातन ब्रह्मलोकको जा रहा हूँ। आपलोगोंको अपने घरमें अथवा स्वर्गलोकमें अथवा विशेषकर संग्राममें दैत्योंका विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि दानव सदा क्षुद्र प्रकृतिवाले होते हैं। वे छिद्र पाकर तुरंत प्रहार कर बैठते हैं। उनकी स्थिति कभी निश्चित नहीं रहती। इधर सौम्य एवं कोमल स्वभाववाले आपलोगोंका आर्जव ही धन है। महायशस्वी एवं सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णु देवगणोंसे ऐसा कहकर ब्रह्माके साथ अपने लोकको चले गये। राजन्! दानवों और भगवान् विष्णुके मध्य घटित हुए तारकामय संग्राममें यही आश्चर्य हुआ था, जिसके विषयमें तुमने मुझसे प्रश्न किया था॥ ७३-८०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावसंग्रहो नामाष्टासप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पद्मोद्भवप्रादुर्भावसंग्रह नामक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७८॥
७३८ * मत्स्यपुराण *
एक सौ उनासीवाँ अध्याय
शिवजीके साथ अन्धकासुरका युद्ध, शिवजीद्वारा मातृकाओंकी सृष्टि, शिवजीके हाथों अन्धककी मृत्यु और उसे गणेशत्वकी प्राप्ति, मातृकाओंकी विध्वंसलीला तथा विष्णुनिर्मित देवियोंद्वारा उनका अवरोध
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>श्रुतः पद्मोद्भवस्तात विस्तरेण त्वयेरितः।<br>समासाद् भवमाहात्म्यं भैरवस्याभिधीयताम्॥ १ | ऋषियोंने पूछा—तात! आपके द्वारा विस्तारपूर्वक कहे गये पद्मोद्भवके प्रसङ्गको हमलोग सुन चुके, अब आप भैरवस्वरूप शंकरजीके माहात्म्यका संक्षेपसे वर्णन कीजिये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>तस्यापि देवदेवस्य शृणुध्वं कर्म चोत्तमम्।<br>आसीद् दैत्योऽन्धको नाम भिन्नाञ्जनचयोपमः॥ २<br>तपसा महता युक्तो ह्यवध्यस्त्रिदिवौकसाम्।<br>स कदाचिन्महादेवं पार्वत्या सहितं प्रभुम्॥ ३<br>क्रीडमानं तदा दृष्ट्वा हर्तुं देवीं प्रचक्रमे।<br>तस्य युद्धं तदा घोरमभवत् सह शम्भुना॥ ४<br>आवन्त्ये विषये घोरे महाकालवनं प्रति।<br>तस्मिन् युद्धे तदा रुद्रश्चान्धकेनातिपीडितः॥ ५<br>सुषुवे बाणमत्युग्रं नाम्ना पाशुपतं हि तत्।<br>रुद्रबाणविनिर्भेदाद् रुधिरादन्धकस्य तु॥ ६<br>अन्धकाश्च समुत्पन्नाः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>तेषां विदार्यमाणानां रुधिरादपरे पुनः॥ ७<br>बभूवुरन्धका घोरा यैर्व्याप्तमखिलं जगत्।<br>एवं मायाविनं दृष्ट्वा तं च देवस्तदान्धकम्॥ ८<br>पानार्थमन्धकास्रस्य सोऽसृजन्मातरस्तदा। | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अच्छा, आपलोग देवाधिदेव शंकरजीके भी उत्तम कर्मको सुनिये। पूर्वकालमें अञ्जनसमूहके सदृश वर्णवाला अन्धक नामका एक दैत्य हुआ था। वह महान् तपोबलसे सम्पन्न था, इसी कारण देवताओंद्वारा अवध्य था। किसी समय उसकी दृष्टि पार्वतीके साथ क्रीडा करते हुए भगवान् शंकरपर पड़ी, तब वह पार्वती देवीका अपहरण करनेके लिये प्रयास करने लगा। उस समय अवन्ती-प्रदेशमें स्थित भयंकर महाकालवनमें उसका शंकरजीके साथ भीषण संग्राम हुआ। उस युद्धमें जब भगवान् रुद्र अन्धकद्वारा अत्यन्त पीडित कर दिये गये, तब उन्होंने अतिशय भयंकर पाशुपत नामक बाणको प्रकट किया। शंकरजीके उस बाणके आघातसे निकलते हुए अन्धकके रक्तसे दूसरे सैकड़ों-हजारों अन्धक उत्पन्न हो गये। पुनः उनके घायल शरीरोंसे बहते हुए रुधिरसे दूसरे भयंकर अन्धक प्रकट हुए, जिनके द्वारा सारा जगत् व्याप्त हो गया। तब उस अन्धकको इस प्रकारका मायावी जानकर भगवान् शंकरने उसके रक्तको पान करनेके लिये मातृकाओंकी सृष्टि की॥ २–८ १/२॥ |
| माहेश्वरी तथा ब्राह्मी कौमारी मालिनी तथा॥ ९<br>सौपर्णी ह्याथ वायव्या शाक्री वै नैरृती तथा।<br>सौरी सौम्या शिवा दूती चामुण्डा चाथ वारुणी॥ १०<br>वाराही नारसिंही च वैष्णवी च चलच्छिखा।<br>शतानन्दा भगानन्दा पिच्छिला भगमालिनी॥ ११ | उन (मातृकाओं)-के नाम हैं—माहेश्वरी, ब्राह्मी, कौमारी, मालिनी, सौपर्णी, वायव्या, शाक्री, नैर्ऋती, सौरी, सौम्या, शिवा, दूती, चामुण्डा, वारुणी, वाराही, नारसिंही, वैष्णवी, चलच्छिखा, शतानन्दा, भगानन्दा, पिच्छिला, भगमालिनी, |
- अध्याय १७९ * ७३९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी सूची |
|---|---|
| बला चातिबला रक्ता सुरभी मुखमण्डिका।<br>मातृनन्दा सुनन्दा च बिडाली शकुनी तथा ॥ १२ | बला, अतिबला, रक्ता, सुरभी, मुखमण्डिका, मातृनन्दा, सुनन्दा, बिडाली, शकुनी, रेवती, महारक्ता, पिलपिच्छिका, |
| रेवती च महारक्ता तथैव पिलपिच्छिका।<br>जया च विजया चैव जयन्ती चापराजिता ॥ १३ | जया, विजया, जयन्ती, अपराजिता, काली, महाकाली, दूती, सुभगा, दुर्भगा, कराली, नन्दिनी, अदिति, दिति, |
| काली चैव महाकाली दूती चैव तथैव च।<br>सुभगा दुर्भगा चैव कराली नन्दिनी तथा ॥ १४ | मारी, मृत्यु, कर्णमोटी, ग्राम्या, उलूकी, घटोदरी, कपाली, वज्रहस्ता, पिशाची, राक्षसी, भुशुण्डी, शांकरी, चण्डा, |
| अदितिश्च दितिश्चैव मारी वै मृत्युरेव च।<br>कर्णमोटी तथा ग्राम्या उलूकी च घटोदरी ॥ १५ | लाङ्गली, कुटभी, खेटा, सुलोचना, धूम्रा, एकवीरा, करालिनी, विशालदंष्ट्रिणी, श्यामा, त्रिजटी, कुकुटी, वैनायकी, वैताली, |
| कपाली वज्रहस्ता च पिशाची राक्षसी तथा।<br>भुशुण्डी शाङ्करी चण्डा लाङ्गली कुटभी तथा ॥ १६ | उन्मत्तोदुम्बरी, सिद्धि, लेलिहाना, केकरी, गर्दभी, भुकुटी, बहुपुत्री, प्रेतयाना, बिडम्बिनी, क्रौञ्चा, शैलमुखी, विनता, |
| खेटा सुलोचना धूम्रा एकवीरा करालिनी।<br>विशालदंष्ट्रिणी श्यामा त्रिजटी कुक्कुटी तथा ॥ १७ | सुरसा, दनु, उषा, रम्भा, मेनका, सलिला, चित्ररूपिणी, स्वाहा, स्वधा, वषट्कारा, धृति, ज्येष्ठा, कपर्दिनी, माया, |
| वैनायकी च वैताली उन्मत्तोदुम्बरी तथा।<br>सिद्धिश्च लेलिहाना च केकरी गर्दभी तथा ॥ १८ | विचित्ररूपा, कामरूपा, संगमा, मुखेविला, मङ्गला, महानासा, महामुखी, कुमारी, रोचना, भीमा, सदाहा, मदोद्धता, अलम्बाक्षी, |
| भुकुटी बहुपुत्री च प्रेतयाना विडम्बिनी।<br>क्रौञ्चा शैलमुखी चैव विनता सुरसा दनुः ॥ १९ | कालपर्णी, कुम्भकर्णी, महासुरी, केशिनी, शंखिनी, लम्बा, पिंगला, लोहितामुखी, घण्टारवा, दंष्ट्रला, रोचना, काकजंघिका, |
| उषा रम्भा मेनका च ललिता चित्ररूपिणी।<br>स्वाहा स्वधा वषट्कारा धृतिर्ज्येष्ठा कपर्दिनी ॥ २० | गोकर्णिका, अजमुखिका, महाग्रीवा, महामुखी, उल्कामुखी, धूमशिखा, कम्पिनी, परिकम्पिनी, मोहना, कम्पना, श्वेला, |
| माया विचित्ररूपा च कामरूपा च सङ्गमा।<br>मुखेविला मङ्गला च महानासा महामुखी ॥ २१ | निर्भया, बाहुशालिनी, सर्पकर्णी, एकाक्षी, विशोका, नन्दिनी, ज्योत्स्नामुखी, रभसा, निकुम्भा, रक्तकम्पना, |
| कुमारी रोचना भीमा सदाहा सा मदोद्धता।<br>अलम्बाक्षी कालपर्णी कुम्भकर्णी महासुरी ॥ २२ | अविकारा, महाचित्रा, चन्द्रसेना, मनोरमा, अदर्शना, हरत्पापा, मातंगी, लम्बमेखला, अबाला, वञ्चना, काली, प्रमोदा, |
| केशिनी शङ्खिनी लम्बा पिङ्गला लोहितामुखी।<br>घण्टारवाथ दंष्ट्राला रोचना काकजङ्घिका ॥ २३ | लाङ्गलावती, चित्ता, चित्तजला, कोणा, शान्तिका, अघविनाशिनी, लम्बस्तनी, लम्बसटा, विसटा, वासचूर्णिनी, |
| गोकर्णिकाजमुखिका महाग्रीवा महामुखी।<br>उल्कामुखी धूमशिखा कम्पिनी परिकम्पिनी ॥ २४ | |
| मोहना कम्पना श्वेला निर्भया बाहुशालिनी।<br>सर्पकर्णी तथैकाक्षी विशोका नन्दिनी तथा ॥ २५ | |
| ज्योत्स्नामुखी च रभसा निकुम्भा रक्तकम्पना।<br>अविकारा महाचित्रा चन्द्रसेना मनोरमा ॥ २६ | |
| अदर्शना हरत्पापा मातङ्गी लम्बमेखला।<br>अबाला वञ्चना काली प्रमोदा लाङ्गलावती ॥ २७ | |
| चित्ता चित्तजला कोणा शान्तिकाघविनाशिनी।<br>लम्बस्तनी लम्बसटा विसटा वासचूर्णिनी ॥ २८ |
७४० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्खलन्ती दीर्घकेशी च सुचिरा सुन्दरी शुभा।<br>अयोमुखी कटुमुखी क्रोधनी च तथाशनी ॥ २९<br>कुटुम्बिका मुक्तिका च चन्द्रिका बलमोहिनी।<br>सामान्या हासिनी लम्बा कोविदारी समासवी ॥ ३०<br>शङ्कुकर्णी महानादा महादेवी महोदरी।<br>हुंकारी रुद्रसुसटा रुद्रेशी भूतडामरी ॥ ३१<br>पिण्डजिह्वा चलज्वाला शिवा ज्वालामुखी तथा।<br>एताश्चान्याश्च देवेशः सोऽसृजन्मातरस्तदा ॥ ३२<br>अन्धकानां महाघोराः पपुस्तद्रुधिरं तदा।<br>ततोऽन्धकासृजः सर्वाः परां तृप्तिमुपागताः ॥ ३३<br>तासु तृप्तासु सम्भूता भूय एवान्धकप्रजाः।<br>अर्दितस्तैर्महादेवः शूलमुद्गरपाणिभिः ॥ ३४<br>ततः स शङ्करो देवस्त्वन्धकैर्व्याकुलीकृतः।<br>जगाम शरणं देवं वासुदेवमजं विभुम् ॥ ३५<br>ततस्तु भगवान् विष्णुः सृष्टवान् शुष्करेवतीम्।<br>या पपौ सकलं तेषामन्धकानामसृक् क्षणात् ॥ ३६<br>यथा यथा च रुधिरं पिबन्त्यन्धकसम्भवम्।<br>तथा तथाधिकं देवी संशुष्यति जनाधिप ॥ ३७<br>पीयमाने तया तेषामन्धकानां तथासृजि।<br>अन्धकास्तु क्षयं नीताः सर्वे ते त्रिपुरारिणा ॥ ३८<br>मूलान्धकं तु विक्रम्य तदा शर्वस्त्रिलोकधृक्।<br>चकार वेगाच्छूलाग्रे स च तुष्टाव शङ्करम् ॥ ३९<br>अन्धकस्तु महावीर्यस्तस्य तुष्टोऽभवद् भवः।<br>सामीप्यं प्रददौ नित्यं गणेशत्वं तथैव च ॥ ४०<br>ततो मातृगणाः सर्वे शङ्करं वाक्यमब्रुवन्।<br>भगवन् भक्षयिष्यामः सदेवासुरमानुषान्।<br>त्वत्प्रसादाज्जगत्सर्वं तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ ४१ | स्खलन्ती, दीर्घकेशी, सुचिरा, सुन्दरी, शुभा, अयोमुखी, कटुमुखी, क्रोधनी, अशनी, कुटुम्बिका, मुक्तिका, चन्द्रिका, बलमोहिनी, सामान्या, हासिनी, लम्बा, कोविदारी, समासवी, शंकुकर्णी, महानादा, महादेवी, महोदरी, हुंकारी, रुद्रसुसटा, रुद्रेशी, भूतडामरी, पिण्डजिह्वा, चलज्वाला, शिवा तथा ज्वालामुखी। इनकी तथा इनके अतिरिक्त अन्यान्य मातृकाओंकी* देवेश्वर शंकरने उस समय सृष्टि की॥ ९–३२॥<br><br>तदनन्तर उत्पन्न हुई इन महाभयावनी मातृकाओंने अन्धकोंके रक्तको चूस लिया। इस प्रकार अन्धकोंके रक्तका पान करनेसे इन सबको परम तृप्तिका अनुभव हुआ। उनके तृप्त हो जानेके पश्चात् पुनः अन्धककी संतानें उत्पन्न हुई। उन्होंने हाथमें शूल और मुद्गर धारण करके पुनः महादेवजीको पीडित कर दिया। इस प्रकार जब अन्धकोंने भगवान् शंकरको व्याकुल कर दिया, तब वे सर्वव्यापी एवं अजन्मा भगवान् वासुदेवकी शरणमें गये। तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने शुष्करेवती नामवाली एक देवीको प्रकट किया, जिसने क्षणमात्रमें ही उन अन्धकोंके सम्पूर्ण रक्तको चूस लिया। जनेश्वर! वह देवी ज्यों-ज्यों अन्धकोंके शरीरसे निकले हुए रुधिरको पीती जाती थी, त्यों-त्यों वह अधिक क्षुधित एवं पिपासित होती जाती थी। इस प्रकार जब उस देवीद्वारा उन अन्धकोंका रक्त पान कर लिया गया, तब त्रिपुरारि शंकरने उन सभी अन्धकोंको कालके हवाले कर दिया। फिर त्रिलोकीको धारण करनेवाले भगवान् शंकरने जब वेगपूर्वक पराक्रम प्रकट करके प्रधान अन्धकको अपने त्रिशूलके अग्रभागका लक्ष्य बनाया, तब वह महापराक्रमी अन्धक शंकरजीकी स्तुति करने लगा। उसके स्तवन करनेसे भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये, तब उन्होंने उसे अपना नित्य सामीप्य तथा गणेशत्वका पद प्रदान कर दिया। यह देखकर सभी मातृकाएँ शंकरजीसे इस प्रकार बोलीं—‘भगवन्! हमलोग आपकी कृपासे देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत्को खा जाना चाहती हैं, इसके लिये आप हमलोगोंको आज्ञा देनेकी कृपा करें'॥ ३३—४१॥ |
* अन्धकका वृत्तान्त शिव, सौरादि प्रायः दस पुराणोंमें भी है। पर इतनी संख्यामें मातृकाओंका वर्णन अन्यत्र कहीं नहीं आया है।
* अध्याय १७९ * <span style="float: right;">७४१</span>
| शङ्कर उवाच | |
|---|---|
| भवतीभिः प्रजाः सर्वा रक्षणीया न संशयः।<br>तस्माद् घोरादभिप्रायान्मनः शीघ्रं निवर्त्यताम्॥ ४२<br><br>इत्येवं शंकरेणोक्तमनादृत्य वचस्तदा।<br>भक्षयामासुरुत्युग्रास्त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ ४३<br><br>त्रैलोक्ये भक्ष्यमाणे तु तदा मातृगणेन वै।<br>नृसिंहमूर्तिं देवेशं प्रदध्यौ भगवान्शिवः॥ ४४<br><br>अनादिनिधनं देवं सर्वलोकभवोद्भवम्।<br>दैत्येन्द्रवक्षोरुधिरचर्चिताग्रमहानखम् ॥ ४५<br><br>विद्युज्जिह्वं महादंष्ट्रं स्फुरत्केसरकण्ठकम्।<br>कल्पान्तमारुतक्षुब्धं सप्तार्णवसमस्वनम्॥ ४६<br><br>वज्रतीक्ष्णनखं घोरमाकर्णव्यादिताननम्।<br>मेरुशैलप्रतीकाशमुदयार्कसमेक्षणम् ॥ ४७<br><br>हिमाद्रिशिखराकारं चारुदंष्ट्रोज्ज्वलाननम्।<br>नखनिःसृतरोषाग्निज्वालाकेसरमालिनम् ॥ ४८<br><br>बद्धाङ्गदं सुमुकुटं हारकेयूरभूषणम्।<br>श्रोणीसूत्रेण महता काञ्चनेन विराजितम्॥ ४९<br><br>नीलोत्पलदलश्यामं वासोयुगविभूषणम्।<br>तेजसाक्रान्तसकलब्रह्माण्डागारसङ्कुलम् ॥ ५०<br><br>पवनभ्राम्यमाणानां हुतहव्यवहार्चिषाम्।<br>आवर्तसदृशाकारैः संयुक्तं देहलोमजैः॥ ५१<br><br>सर्वपुष्पविचित्रां च धारयन्तं महास्रजम्।<br>स ध्यातमात्रो भगवान् प्रददौ तस्य दर्शनम्॥ ५२<br><br>यादृशेनैव रूपेण ध्यातो रुद्रेण धीमता।<br>तादृशेनैव रूपेण दुर्निरीक्ष्येण दैवतैः॥ ५३<br><br>प्रणिपत्य तु देवेशं तदा तुष्टाव शङ्करः॥ ५४ | **शंकरजीने कहा—**देवियो! आपलोगोंको तो निःसंदेह सभी प्रजाओंकी रक्षा करनी चाहिये, अतः आपलोग शीघ्र ही उस घोर अभिप्रायसे अपने मनको लौटा लें। इस प्रकार शंकरजीद्वारा कहे गये वचनकी अवहेलना करके वे अत्यन्त निष्ठुर मातृकाएँ चराचरसहित त्रिलोकीको भक्षण करने लगीं। तब मातृकाओंद्वारा त्रिलोकीको भक्षित होते हुए देखकर भगवान् शिवने उन नृसिंहमूर्ति भगवान् विष्णुका ध्यान किया, जो आदि-अन्तसे रहित और सभी लोकोंके उत्पादक हैं, जिनके विशाल नखोंका अग्रभाग दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपुके वक्षःस्थलके रुधिरसे चर्चित है, जिनकी जीभ बिजलीकी तरह लपलपाती रहती है और दाढ़ें विशाल हैं, जिनके कंधेके बाल हिलते रहते हैं, जो प्रलयकालीन वायुकी तरह क्षुब्ध और सप्तार्णवकी भाँति गर्जना करनेवाले हैं, जिनके नख वज्र-सदृश तीक्ष्ण हैं, जिनकी आकृति भयंकर है, जिनका मुख कानतक फैला हुआ है, जो सुमेरु पर्वतके समान चमकते रहते हैं, जिनके नेत्र उदयकालीन सूर्य-सरीखे उद्दीप्त हैं, जिनकी आकृति हिमालयके शिखर-जैसी है, जिनका मुख सुन्दर उज्ज्वल दाढ़ोंसे विभूषित है, जो नखोंसे निकलती हुई क्रोधाग्निकी ज्वालारूपी केसरसे युक्त रहते हैं, जिनकी भुजाओंपर अङ्गद बँधा रहता है, जो सुन्दर मुकुट, हार और केयूरसे विभूषित रहते हैं, विशाल स्वर्णमयी करधनीसे जिनकी शोभा होती है, जिनकी कान्ति नीले कमलदलके समान श्याम है, जो दो वस्त्र धारण किये रहते हैं और अपने तेजसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमण्डलको आक्रान्त किये रहते हैं, वायुद्वारा घुमायी जाती हुई हवनयुक्त अग्निकी लपटोंकी भँवर-सदृश आकारवाले शरीर-रोमसे संयुक्त हैं तथा जो सभी प्रकारके पुष्पोंसे बनी हुई हवनयुक्त विचित्र एवं विशाल मालाको धारण करते हैं। ध्यान करते ही भगवान् विष्णु शिवजीके नेत्रोंके समक्ष प्रकट हो गये। बुद्धिमान् शंकरने जिस प्रकारके रूपका ध्यान किया था, वे उसी रूपसे प्रकट हुए। उनका वह रूप देवताओंद्वारा भी दुर्निरीक्ष्य था। तब शंकरजी उन देवेश्वरको प्रणाम कर उनकी स्तुति करने लगे॥ ४२–५४॥ |
| शङ्कर उवाच | शंकरजी बोले— |
| नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ नरसिंहवपुर्धर।<br>दैत्यनाथासृजापूर्णनखशक्तिविराजित ॥ ५५ | जगन्नाथ! आप नरसिंहका शरीर धारण करनेवाले हैं और आपकी नखशक्ति दैत्यराज हिरण्यकशिपुके रक्तसे रञ्जित होकर सुशोभित होती है, आपको नमस्कार |
७४२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततः सकलसंलग्न हेमपिङ्गलविग्रह।<br>नतोऽस्मि पद्मनाभ त्वां सुरशक्रजगद्गुरो॥ ५६<br>कल्पान्ताम्भोदनिर्घोष सूर्यकोटिसमप्रभ।<br>सहस्रयमसङ्क्रोध सहस्रेन्द्रपराक्रम॥ ५७<br>सहस्रधनदस्फीत सहस्रवरुणात्मक।<br>सहस्रकालरचित सहस्रनियतेन्द्रिय॥ ५८<br>सहस्रभूमहाधैर्य सहस्रानन्तमूर्तिमन्।<br>सहस्रचन्द्रप्रतिम सहस्रग्रहविक्रम॥ ५९<br>सहस्ररुद्रतेजस्क सहस्रब्रह्मसंस्तुत।<br>सहस्रबाहुवेगो ग्र सहस्त्रास्यनिरीक्षण।<br>सहस्रयन्त्रमथन सहस्रवधमोचन॥ ६०<br>अन्धकस्य विनाशाय याः सृष्टा मातरो मया।<br>अनादृत्य तु मद्वाक्यं भक्षयन्त्यद्य ताः प्रजाः॥ ६१<br>कृत्वा ताश्च न शक्तोऽहं संहर्तुमपराजित।<br>स्वयं कृत्वा कथं तासां विनाशमभिकारये॥ ६२ | है। पद्मनाभ! आप सर्वव्यापी हैं, आपका शरीर स्वर्णके समान पीला है और आप देवता, इन्द्र तथा जगत्के गुरु हैं, आपको प्रणाम है। आपका सिंहनाद प्रलयकालीन मेघोंके समान है, आपकी कान्ति करोड़ों सूर्योंके सदृश है, आपका क्रोध हजारों यमराजके तथा पराक्रम सहस्रों इन्द्रके समान है, आप हजारों कुबेरोंसे भी बढ़कर समृद्ध, हजारों वरुणोंके समान, हजारों कालोंद्वारा रचित और हजारों इन्द्रियनिग्रहियोंसे बढ़कर हैं, आपका धैर्य सहस्रों पृथ्वियोंसे भी उत्तम है, आप सहस्रों अनन्तोंकी मूर्ति धारण करनेवाले, सहस्रों चन्द्रमा-सरीखे सौन्दर्यशाली और सहस्रों ग्रहों-सदृश पराक्रमी हैं, आपका तेज हजारों रुद्रोंके समान है, हजारों ब्रह्मा आपकी स्तुति करते हैं, आप हजारों बाहु, मुख और नेत्रवाले हैं, आपका वेग अत्यन्त उग्र है, आप सहस्रों यन्त्रोंको एक साथ तोड़ डालनेवाले तथा सहस्रोंका वध और सहस्रोंको बन्धनमुक्त करनेवाले हैं। भगवन्! अन्धकका विनाश करनेके लिये मैंने जिन मातृकाओंकी सृष्टि की थी, वे सभी आज मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन कर प्रजाओंको खा जानेके लिये उतारू हैं। अपराजित! उन्हें उत्पन्न कर मैं पुन: उन्हींका संहार नहीं कर सकता। स्वयं उत्पन्न करके भला मैं उनका विनाश कैसे करूँ॥ ५५—६२॥ |
| एवमुक्तः स रुद्रेण नरसिंहवपुर्धरः।<br>ससर्ज देवो जिह्वायास्तदा वागीश्वरीं हरिः॥ ६३<br>हृदयाच्च तथा माया गुह्याच्च भवमालिनी।<br>अस्थिभ्यश्च तथा काली सृष्टा पूर्वं महात्मना॥ ६४<br>यया तद्रुधिरं पीतमन्धकानां महात्मनाम्।<br>या चास्मिन् कथिता लोके नामतः शुष्करेवती॥ ६५ | रुद्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर नरसिंह-विग्रहधारी भगवान् श्रीहरिने अपनी जीभसे वागीश्वरीको, हृदयसे मायाको, गुह्यप्रदेशसे भवमालिनीको और हड्डियोंसे कालीको प्रकट किया। उन महात्माने इस कालीकी सृष्टि पहले भी की थी, जिसने महान् आत्मबलसे सम्पन्न अन्धकोंके रुधिरका पान किया था और जो इस लोकमें शुष्करेवती नामसे प्रसिद्ध है। |
| द्वात्रिंशन्मातरः सृष्टा गात्रेभ्यश्चक्रिणा ततः।<br>तासां नामानि वक्ष्यामि तानि मे गदतः शृणु॥ ६६<br>सर्वास्तास्तु महाभागा घण्टाकर्णी तथैव च।<br>त्रैलोक्यमोहिनी पुण्या सर्वसत्त्ववशङ्करी॥ ६७<br>तथा च चक्रहृदया पञ्चमी व्योमचारिणी।<br>शङ्खिनी लेखिनी चैव कालसंकर्षणी तथा॥ ६८<br>इत्येताः पृष्ठगा राजन् वागीशानुचराः स्मृताः।<br>संकर्षणी तथाश्वत्था बीजभावापराजिता॥ ६९<br>कल्याणी मधुदंष्ट्री च कमलोत्पलहस्तिका।<br>इति देव्यष्टकं राजन् मायानुचरमुच्यते॥ ७० | इसी प्रकार सुदर्शन चक्रधारी भगवान्ने अपने अङ्गोंसे बत्तीस अन्य मातृकाओंकी सृष्टि की, वे सभी महान् भाग्यशालिनी थीं। मैं उनके नामोंका वर्णन कर रहा हूँ, तुम उन्हें मुझसे श्रवण करो। उनके नाम हैं—घण्टाकर्णी, त्रैलोक्यमोहिनी, पुण्यमयी सर्वसत्त्ववशंकरी, चक्रहृदया, पाँचवीं व्योमचारिणी, शङ्खिनी, लेखिनी और काल-संकर्षणी। राजन्! ये वागीश्वरीके पीछे चलनेवाली उनकी अनुचरी कही गयी हैं। राजन्! संकर्षणी, अश्वत्था, बीजभावा, अपराजिता, कल्याणी, मधुदंष्ट्री, कमला और उत्पलहस्तिका—ये आठों देवियाँ मायाकी अनुचरी कहलाती हैं। |
| * अध्याय १७९ * | ७४३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अजिता सूक्ष्महृदया वृद्धा वेशाश्मदर्शना।<br>नृसिंहभैरवा बिल्वा गरुत्मद्धृदया जया॥ ७१<br>भवमालिन्यनुचरा इत्यष्टौ नृप मातरः।<br>आकर्णनी सम्भटा च तथैवोत्तरमालिका॥ ७२<br>ज्वालामुखी भीषणिका कामधेनुश्च बालिका।<br>तथा पद्मकरा राजन् रेवत्यनुचराः स्मृताः॥ ७३<br>अष्टौ महाबलाः सर्वा देवगात्रसमुद्भवाः।<br>त्रैलोक्यसृष्टिसंहारसमर्थाः सर्वदेवताः॥ ७४ | नरेश! अजिता, सूक्ष्महृदया, वृद्धा, वेशाश्मदर्शना, नृसिंहभैरवा, बिल्वा, गरुत्मद्धृदया और जया—ये आठों मातृकाएँ भवमालिनीकी अनुचरी हैं। राजन्! आकर्णनी, सम्भटा, उत्तरमालिका, ज्वालामुखी, भीषणिका, कामधेनु, बालिका तथा पद्मकरा—ये शुष्करेवतीकी अनुचरी कही जाती हैं। आठ-आठके विभागसे भगवान्के शरीरसे उद्भूत हुई ये सभी देवियाँ महान् बलवती तथा त्रिलोकीके सृजन और संहारमें समर्थ थीं॥ ६३—७४॥ |
| ताः सृष्टमात्रा देवेन क्रुद्धा मातृगणस्य तु।<br>प्रधाविता महाराज क्रोधविस्फारितेक्षणाः॥ ७५<br>अविसह्यतमं तासां दृष्टितेजः सुदारुणम्।<br>तमेव शरणं प्राप्ता नृसिंहो वाक्यमब्रवीत्॥ ७६ | महाराज! भगवान् विष्णुद्वारा प्रकट किये जाते ही वे देवियाँ कुपित हो मातृकाओंकी ओर क्रोधवश आँखें फाड़कर देखती हुई उनपर टूट पड़ीं। उन देवियोंके नेत्रोंका तेज अत्यन्त भीषण और सर्वथा असह्य था, इसलिये वे मातृकाएँ भगवान् नृसिंहकी शरणमें आ पड़ीं। तब भगवान् नरसिंहने उनसे इस प्रकार कहा— |
| यथा मनुष्याः पशवः पालयन्ति चिरात् सुतान्।<br>जयन्ति ते तथैवाशु यथा वै देवतागणाः॥ ७७<br>भवत्यस्तु तथा लोकान् पालयन्तु मयेरिताः।<br>मनुजैश्च तथा देव्यैर्यजध्वं त्रिपुरान्तकम्॥ ७८<br>न च बाधा प्रकर्तव्या ये भक्तास्त्रिपुरान्तके।<br>ये च मां संस्मरन्तीह ते च रक्ष्याः सदा नराः॥ ७९<br>बलिकर्म करिष्यन्ति युष्माकं ये सदा नराः।<br>सर्वकामप्रदास्तेषां भविष्यध्वं तथैव च॥ ८० | ‘जिस प्रकार मनुष्य और पशु चिरकालसे अपनी संतानका पालन-पोषण करते आ रहे हैं और जिस प्रकार शीघ्र दोनों देवताओंको वशमें कर लेते हैं, उसी तरह तुमलोग मेरे आदेशानुसार समस्त लोकोंकी रक्षा करो। मनुष्य तथा देवता सभी त्रिपुरहन्ता शिवजीका यजन करें। जो लोग शंकरजीके भक्त हैं, उनके प्रति तुमलोगोंको कोई बाधा नहीं करनी चाहिये। इस लोकमें जो मनुष्य मेरा स्मरण करते हैं, वे तुमलोगोंद्वारा सदा रक्षणीय हैं। जो मनुष्य सदा तुमलोगोंके निमित्त बलिकर्म करेंगे, तुमलोग उनके सभी मनोरथ पूर्ण करो। |
| उच्छासनादिकं ये च कथयन्ति मयेरितम्।<br>ते च रक्ष्याः सदा लोका रक्षितव्यं च शासनम्॥ ८१<br>रौद्रीं चैव परां मूर्तिं महादेवः प्रदास्यति।<br>युष्मन्मुख्या महादेव्यस्तदुक्तं परिरक्ष्यथ॥ ८२ | जो लोग मेरे इस चरित्रका कथन करेंगे, उन लोगोंकी सदा रक्षा तथा मेरे आदेशका भी पालन करना चाहिये। तुमलोगोंमें जो मुख्य महादेवियाँ हैं, उन्हें महादेवजी अपनी परमोत्कृष्ट रौद्री मूर्ति प्रदान करेंगे। तुमलोगोंको उनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। |
| मया मातृगणः सृष्टो योऽयं विगतसाध्वसः।<br>एष नित्यं विशालाक्षो मयैव सह रंस्यते॥ ८३<br>मया सार्धं तथा पूजां नरेभ्यश्चैव लप्स्यथ।<br>पृथक् सुपूजिता लोके सर्वान् कामान् प्रदास्यथ॥ ८४ | लज्जा और भयसे रहित हो मैंने जो इस मातृगणकी सृष्टि की है, यह विशाल नेत्रोंवाला दल नित्य मेरे साथ ही निवास करेगा तथा मेरे साथ इसे मनुष्योंद्वारा प्रदान की गयी पूजा भी प्राप्त होती रहेगी। लोगोंद्वारा पृथक्-रूपसे सुपूजित होनेपर ये देवियाँ सभी कामनाएँ प्रदान करेंगी। |
७४४ * मत्स्यपुराण *
| शुष्कां सम्पूजयिष्यन्ति ये च पुत्रार्थिनो जनाः।<br>तेषां पुत्रप्रदा देवी भविष्यति न संशयः॥ ८५<br>एवमुक्त्वा तु भगवान् सह मातृगणेन तु।<br>ज्वालामालाकुलवपुस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ८६<br>तत्र तीर्थं समुत्पन्नं कृतशौचेति यज्जगुः।<br>तत्रापि पूर्वजो देवो जगदार्तिहरो हरः॥ ८७<br>रौद्रस्य मातृवर्गस्य दत्त्वा रुद्रस्तु पार्थिव।<br>रौद्रां दिव्यां तनुं तत्र मातृमध्ये व्यवस्थितः॥ ८८<br>सप्त ता मातरो देव्यः सार्धनारीनरः शिवः।<br>निवेश्य रौद्रं तत्स्थानं तत्रैवान्तरधीयत॥ ८९<br>समातृवर्गस्य हरस्य मूर्ति-<br>र्यदा यदा याति च तत्समीपे।<br>देवेश्वरस्यापि नृसिंहमूर्तेः<br>पूजां विधत्ते त्रिपुरान्धकारिः॥ ९० | जो पुत्राभिलाषी लोग शुष्करेवतीकी पूजा करेंगे, उनके लिये वह देवी पुत्र प्रदान करनेवाली होगी—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है'॥ ७५-८५॥<br>राजन्! ऐसा कहकर ज्वालासमूहोंसे व्याप्त शरीरवाले भगवान् नरसिंह उस मातृगणके साथ वहीं अन्तर्हित हो गये। वहीं एक तीर्थ उत्पन्न हो गया, जिसे लोग 'कृतशौच' नामसे पुकारते हैं। वहीं सबके पूर्वज तथा जगत्का कष्ट दूर करनेवाले भगवान् रुद्र उस भयंकर मातृवर्गको अपनी रौद्री दिव्य मूर्ति प्रदान कर उन्हीं मातृकाओंके मध्यस्थित हो गये। इस प्रकार अर्धनारी-नरस्वरूप शिव उन सातों मातृ-देवियोंको उस रौद्रस्थानपर स्थापित कर स्वयं वहीं अन्तर्हित हो गये। मातृवर्गसहित शिवजीकी मूर्ति जब-जब देवेश्वर भगवान् नरसिंहकी मूर्तिके निकट जाती है, तब-तब त्रिपुर एवं अन्धकके शत्रु शंकरजी उस नृसिंहमूर्तिकी पूजा करते हैं॥ ८६-९०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽन्धकवधो नामैकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अन्धकवध नामक एक सौ उन्नासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७९॥
एक सौ असीवाँ अध्याय
वाराणसी-माहात्म्यके प्रसङ्गमें हरिकेश यक्षकी तपस्या, अविमुक्तकी शोभा और उसका माहात्म्य तथा हरिकेशको शिवजीद्वारा वरप्राप्ति
| ऋषय ऊचुः<br><br>श्रुतोऽन्धकवधः सूत यथावत् त्वदुदीरितः।<br>वाराणस्यास्तु माहात्म्यं श्रोतुमिच्छाम साम्प्रतम्॥ १<br>भगवान् पिङ्गलः केन गणत्वं समुपागतः।<br>अन्नदत्वं च सम्प्राप्तो वाराणस्यां महाद्युतिः॥ २<br>क्षेत्रपालः कथं जातः प्रियत्वं च कथं गतः।<br>एतदिच्छाम कथितं श्रोतुं ब्रह्मसुत त्वया॥ ३ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी! आपद्वारा कहा गया अन्धक-वधका प्रसङ्ग तो हमलोगोंने यथार्थरूपसे सुन लिया, अब हमलोग वाराणसीका माहात्म्य सुनना चाहते हैं। ब्रह्मपुत्र सूतजी! वाराणसीमें परम कान्तिमान् भगवान् पिङ्गलको गणेश्वरत्वकी प्राप्ति कैसे हुई? वे अन्नदाता कैसे बने और क्षेत्रपाल कैसे हो गये? तथा वे शंकरजीके प्रेमपात्र कैसे बने? आपके द्वारा कहे गये इस सारे प्रसङ्गको सुननेके लिये हमलोगोंकी उत्कट अभिलाषा है॥ १-३॥ |