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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

४९ पूरु-वंशके वर्णन-प्रसङ्गमें भरत-वंशकी कथा, भरद्वाजकी उत्पत्ति और उनके वंशका कथन, नीप-वंशका वर्णन तथा पौरवोंका इतिहास

* अध्याय ४७ * | १८७


| प्रगृहीतायुधैर्विप्रैर्वृतः शतसहस्रशः॥ २४९<br>निःशेषः क्षुद्रराज्ञांस्तु तदा स तु करिष्यति।<br>ब्रह्मद्विषः सपत्नांस्तु संहृत्यैव च तद्वपुः॥ २५०<br>अष्टाविंशे स्थितः कल्किश्चरितार्थः ससैनिकः।<br>शूद्रान् संशोध्ययित्वा तु समुद्रान्तं च वै स्वयम्॥ २५१<br>प्रवृत्तचक्रो बलवान् संहारं तु करिष्यति।<br>उत्सादयित्वा वृषलान् प्रायशस्तानधार्मिकान्॥ २५२<br>ततस्तदा स वै कल्किश्चरितार्थः ससैनिकः।<br>प्रजास्तं साधयित्वा तु समृद्धास्तेन वै स्वयम्॥ २५३<br>अकस्मात् कोपितान्योऽन्यं भविष्यन्तीह मोहिताः।<br>क्षपयित्वा तु तेऽन्योऽन्यं भाविनाऽर्थेन चोदिताः॥ २५४<br>ततः काले व्यतीते तु स देवोऽन्तरधीयत।<br>नृपेष्वथ प्रणष्टेषु प्रजानां संग्रहात् तदा॥ २५५<br>रक्षणे विनिवृत्ते तु हत्वा चान्योऽन्यमाहवे।<br>परस्परं निहत्वा तु निराक्रन्दाः सुदुःखिताः॥ २५६<br>पुराणि हित्वा ग्रामांश्च तुल्यत्वे निष्परिग्रहाः।<br>प्रणष्टाश्रमधर्मांश्च नष्टवर्णाश्रमास्तथा॥ २५७<br>अट्टशूला जानपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः।<br>प्रमदाः केशशूलिन्यो भविष्यन्ति युगक्षये॥ २५८<br>ह्रस्वदेहायुषश्चैव भविष्यन्ति वनौकसः।<br>सरित्पर्वतवासिन्यो मूलपत्रफलाशनाः॥ २५९<br>चीरचर्माजिनधराः संकरं घोरमाश्रिताः।<br>उत्पातदुःखाः स्वल्पार्था बहुबाधाश्च ताः प्रजाः॥ २६०<br>एवं कष्टमनुप्राप्ताः काले संध्यंशके तदा।<br>ततः क्षयं गमिष्यन्ति सार्धं कलियुगेन तु॥ २६१<br>क्षीणे कलियुगे तस्मिंस्ततः कृतमवर्तत।<br>इत्येतत् कीर्तितं सम्यग् देवासुरविचेष्टितम्॥ २६२<br>यदुवंशप्रसङ्गेन समासाद् वैष्णवं यशः।<br>तुर्वसोस्तु प्रवक्ष्यामि पूरोर्द्रुह्योस्तथा ह्यनोः॥ २६३ | ओरसे धर्मविमुख जीवों, पाखण्डों और शूद्रवंशी राजाओंका सर्वथा विनाश कर डालेंगे; क्योंकि ब्रह्मद्वेषी शत्रुओंका संहार करनेके हेतु ही कल्कि-अवतार होता है। इस अट्ठाईसवें युगमें भगवान् कल्कि सेनासहित सफलमनोरथ हो विराजमान रहेंगे। उस समय वे बलशाली भगवान् उन धर्महीन शूद्रोंका समूल विनाश करके अपने राज्यचक्रका विस्तार करते हुए पापियोंका संहार कर डालेंगे। तदुपरान्त कल्कि अपना कार्य पूरा करके सेनासहित विश्राम-लाभ करेंगे। उस समय सारी प्रजाएँ उनके प्रभावसे समृद्धिशालिनी होकर उनकी सेवामें लग जायेंगी। तत्पश्चात् भावी कार्यसे प्रेरित हुई प्रजाएँ मोहित होकर अकस्मात् एक-दूसरेपर कुपित हो जायेंगी और परस्पर लड़कर एक-दूसरेको मार डालेंगी। उस समय कार्यकाल समाप्त हो जानेपर भगवान् कल्कि भी अन्तर्हित हो जायेंगे॥ २४७—२५४ १/२ ॥<br><br>इस प्रकार प्रजाओंके संगठनसे राजाओंके नष्ट हो जानेपर जब कोई रक्षक नहीं रह जायगा, तब प्रजाएँ युद्धभूमिमें एक-दूसरेको मार डालेंगी। यों परस्पर मार-पीट कर वे आक्रन्दनरहित एवं अत्यन्त दुःखित हो जायेंगी। फिर तो वे परिवारहीन होकर समानरूपसे ग्रामों एवं नगरोंको छोड़कर वनकी राह लेंगी। उनके वर्ण-धर्म तथा आश्रम-धर्म नष्ट हो जायँगे। कलियुगकी समाप्तिके समय देशवासी अन्न बेचने लगेंगे, चौराहोंपर शिवकी मूर्तियाँ बिकने लगेंगी और स्त्रियाँ अपने शीलका विक्रय करेंगी अर्थात् वेश्या-कर्ममें प्रवृत्त हो जायेंगी। लोगोंके कद छोटे होंगे। उनकी आयु स्वल्प होगी। वे वनमें तथा नदीतट और पर्वतोंपर निवास करेंगे। कन्द-मूल, पत्तियाँ और फल ही उनके भोजन होंगे। वल्कल, पशुचर्म और मृगचर्म ही उनके वस्त्र होंगे। वे सभी भयंकर वर्णसंकरत्वके आश्रित हो जायँगे। तरह-तरहके उपद्रवोंसे दुःखी रहेंगे। उनकी धन-सम्पत्ति घट जायगी और वे अनेकों बाधाओंसे घिरे रहेंगे। इस प्रकार कष्टका अनुभव करती हुई वे सारी प्रजाएँ उस संध्यांशके समय कलियुगके साथ ही नष्ट हो जायेंगी। इस कलियुगके व्यतीत हो जानेपर कृतयुगका प्रारम्भ होगा। इस प्रकार मैंने पूर्णरूपसे देवताओं और असुरोंकी चेष्टाका तथा यदुवंशके वर्णन-प्रसङ्गमें संक्षेपसे भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण)-के यशका वर्णन कर दिया। अब मैं तुर्वसु, पूरु, द्रुह्यु और अनुके वंशका क्रमशः वर्णन करूँगा॥ २५५—२६३ ॥ |


इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽसुरशापो नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें असुर-शाप-नामक सैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४७ ॥

१८८ * मत्स्यपुराण *


अड़तालीसवाँ अध्याय

तुर्वसु और द्रुह्युके वंशका वर्णन, अनुके वंश-वर्णनमें बलिकी कथा और कर्णकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग

सूत उवाच
तुर्वसोस्तु सुतो गर्भो गोभानुस्तस्य चात्मजः।<br>गोभानोस्तु सुतो वीरस्त्रिसारिरपराजितः॥ १<br>करंधमस्तु त्रैसारिर्मरुत्तस्तस्य चात्मजः।<br>दुष्यन्तं पौरवं चापि स वै पुत्रमकल्पयत्॥ २<br>एवं ययातिशापेन जरासंक्रमणे पुरा।<br>तुर्वसोः पौरवं वंशं प्रविवेश पुरा किल॥ ३<br>दुष्यन्तस्य तु दायादो वरूथो नाम पार्थिवः।<br>वरूथात् तु तथाण्डीरः संधानस्तस्य चात्मजः॥ ४<br>पाण्ड्यश्च केरलश्चैव चोलः कर्णस्तथैव च।<br>तेषां जनपदाः स्फीताः पाण्ड्याश्चोलाः सकेरलाः॥ ५<br>द्रुह्योस्तु तनयौ शूरौ सेतुः केतुस्तथैव च।<br>सेतुपुत्रः शरद्व्वांस्तु गन्धारस्तस्य चात्मजः॥ ६<br>ख्यायते यस्य नाम्नासौ गान्धारविषयो महान्।<br>आरट्टदेशजास्तस्य तुरगा वाजिनां वराः॥ ७<br>गन्धारपुत्रो धर्मस्तु धृतस्तस्यात्मजोऽभवत्।<br>धृताच्च विदुषो जज्ञे प्रचेतास्तस्य चात्मजः॥ ८<br>प्रचेतसः पुत्रशतं राजानः सर्व एव ते।<br>म्लेच्छराष्ट्राधिपाः सर्वे ह्युदीचीं दिशमाश्रिताः॥ ९**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! (ययातिके पञ्चम पुत्र) तुर्वसुका पुत्र गर्भ$^१$ और उसका पुत्र गोभानु हुआ। गोभानुका पुत्र अजेय शूरवीर त्रिसारि हुआ। त्रिसारिका$^२$ पुत्र करंधम और उसका पुत्र मरुत्त हुआ। उसने (संतानरहित होनेके कारण) पूरुवंशी दुष्यन्तको अपना पुत्र बनाया। इस प्रकार पूर्वकालमें वृद्धावस्थाके परिवर्तनके समय ययातिद्वारा दिये गये शापके कारण तुर्वसुका वंश पूरुवंशमें प्रविष्ट हो गया था$^३$। दुष्यन्तका पुत्र राजा वरूथ$^४$ था। वरूथसे आण्डीर (भुवमन्यु)-की उत्पत्ति हुई। आण्डीरके संधान, पाण्ड्य, केरल, चोल और कर्ण नामक पाँच पुत्र हुए। उनके समृद्धिशाली देश उन्हींके नामपर पाण्ड्य, चोल और केरल नामसे प्रसिद्ध हुए। (ययातिके चतुर्थ पुत्र) द्रुह्युके सेतु और केतु (अन्यत्र सर्वत्र बभ्रु) नामक दो शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुए। सेतुका पुत्र शरद्वान् और उसका पुत्र गन्धार हुआ, जिसके नामसे यह विशाल गान्धार जनपद विख्यात है। उस जनपदके आरट्ट$^५$ (पंजाबका पश्चिम भाग) प्रदेशमें उत्पन्न हुए घोड़े अश्वजातिमें सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। गन्धारका पुत्र धर्म और उसका पुत्र धृत हुआ। धृतसे विदुषका जन्म हुआ और उसका पुत्र प्रचेता हुआ। प्रचेताके सौ पुत्र हुए जो सब-के-सब राजा हुए। वे सभी उत्तर दिशामें स्थित म्लेच्छ-राज्योंके अधीश्वर थे॥ १—९॥
अनोश्चैव सुता वीरास्त्रयः परमधार्मिकाः।<br>सभानरश्चाक्षुषश्च परमेषुस्तथैव च॥ १०<br>सभानरस्य पुत्रस्तु विद्वान् कोलाहलो नृपः।<br>कोलाहलस्य धर्मात्मा संजयो नाम विश्रुतः॥ ११(ययातिके तृतीय पुत्र) अनुके सभानर, चाक्षुष और परमेषु नामक तीन शूरवीर एवं परम धार्मिक पुत्र उत्पन्न हुए। सभानरका पुत्र विद्वान् राजा कोलाहल हुआ। कोलाहलका धर्मात्मा पुत्र संजय नामसे

१. ऋग्वेदमें यह तुर्वश है और ४।३०।१६ से १०।६२।१० तक निरन्तर अपने सभी उपर्युक्त भाइयोंके साथ वर्णित है। भागवत ९।२३।१६ तथा विष्णुपुराण ४।१६।३ आदिमें तुर्वसके पुत्रका नाम 'वह्नि' और उसके पुत्रका नाम 'गोभानु'की जगह 'भर्ग' बतलाया गया है।
२. अन्यत्र प्रायः सर्वत्र इसका 'त्रिसारि'की जगह 'त्रिभानु' नाम आया है।
३. तुर्वसुके वंशके पौरव वंशमें प्रविष्ट होनेकी कथा सभी पुराणोंमें (विशेषकर वायु० ९९।५, ब्रह्माण्ड० ३।७५।७ तथा विष्णुपुराण ४।१६।६ में बहुत) स्पष्ट रूपसे आयी है।
४. इनके दूसरे नाम वितथ एवं भरद्वाज भी हैं।
५. इस प्रदेशकी महाभारत, कर्णपर्व ४४।३७-३८ (श्लोक) से ४५ (श्लोक ३० तक) अध्यायोंतकमें चर्चा एवं आलोचना है।

* अध्याय ४८ * १८९

संजयस्याभवत् पुत्रो वीरो नाम पुरंजयः।<br>जनमेजयो महाराजः पुरंजयसुतोऽभवत् ॥ १२<br>जनमेजयस्य राजर्षेर्महाशालोऽभवत् सुतः।<br>आसीदिन्द्रसमो राजा प्रतिष्ठितयशाभवत् ॥ १३<br>महामनाः सुतस्तस्य महाशालस्य धार्मिकः।<br>सप्तद्वीपेश्वरो जज्ञे चक्रवर्ती महामनाः ॥ १४<br>महामनास्तु द्वौ पुत्रौ जनयामास विश्रुतौ।<br>उशीनरं च धर्मज्ञं तितिक्षुं चैव तावुभौ ॥ १५<br>उशीनरस्य पत्न्यस्तु पञ्च राजर्षिसम्भवाः।<br>भृशा कृशा नवा दर्शा या च देवी दृषद्वती ॥ १६<br>उशीनरस्य पुत्रास्तु तासु जाताः कुलोद्वहाः।<br>तपसा ते तु महता जाता वृद्धस्य धार्मिकाः ॥ १७<br>भृशायास्तु नृगः पुत्रो नवाया नव एव च।<br>कृशायास्तु कृशो जज्ञे दर्शायाः सुव्रतोऽभवत्।<br>दृषद्वत्याः सुतश्चापि शिबिरौशीनरो नृपः ॥ १८<br>शिबेस्तु शिबयः पुत्राश्चत्वारो लोकविश्रुताः।<br>पृथुदर्भः सुवीरश्च केकयो मद्रकस्तथा ॥ १९<br>तेषां जनपदाः स्फीताः कैकया मद्रकास्तथा।<br>सौवीराश्चैव पौराश्च नृगस्य केकयास्तथा ॥ २०<br>सुव्रतस्य तथाम्बष्ठा कृशस्य वृषला पुरी।<br>नवस्य नवराष्ट्रं तु तितिक्षोस्तु प्रजां शृणु ॥ २१विख्यात था। संजयका पुरंजय नामक वीरवर पुत्र हुआ। महाराज जनमेजय (प्रथम) पुरंजयके पुत्र हुए। राजर्षि जनमेजयसे महाशाल नामक पुत्र पैदा हुआ जो इन्द्रतुल्य तेजस्वी एवं प्रतिष्ठित कीर्तिवाला राजा हुआ। उन महाशालके महामना नामक पुत्र पैदा हुआ जो परम धर्मात्मा, महान् मनस्वी तथा सातों द्वीपोंका अधीश्वर चक्रवर्ती सम्राट् हुआ। महामनाने दो पुत्रोंको जन्म दिया। वे दोनों धर्मज्ञ उशीनर और तितिक्षु नामसे विख्यात हुए। उशीनरकी भृशा, कृशा, नवा, दर्शा और देवी दृषद्वती—ये पाँच पत्नियाँ थीं, जो सभी राजर्षियोंकी कन्याएँ थीं। उनके गर्भसे उशीनरके परम धर्मात्मा एवं कुलवर्धक पुत्र उत्पन्न हुए थे। वे सभी उशीनरकी वृद्धावस्थामें महान् तपके फलस्वरूप पैदा हुए थे। भृशाका पुत्र नृग और नवाका पुत्र नव हुआ। कृशाने कृशको जन्म दिया। दर्शाके सुव्रत नामक पुत्र हुआ। दृषद्वतीके पुत्र उशीनर-नन्दन राजा शिबि हुए। शिबिके पृथुदर्भ, सुवीर, केकय और मद्रक नामक चार विश्वविख्यात पुत्र हुए। ये सभी शिबिगण नामसे भी प्रसिद्ध थे। इनके समृद्धिशाली जनपद केकय (व्यास और शतलजके मध्य पंजाबका पश्चिमोत्तर भाग), मद्रक, सौवीर (सिंधका उत्तरी भाग) और पौर नामसे विख्यात थे। नृगका जनपद केकय और सुव्रतका अम्बष्ठ नामसे प्रसिद्ध था। कृशकी राजधानी वृषलापुरी थी। नव नवराष्ट्रके अधीश्वर थे। अब तितिक्षुकी संततिका वर्णन सुनिये॥ १०—२१॥
तितिक्षुरभवद् राजा पूर्वस्यां दिशि विश्रुतः।<br>वृषद्रथः सुतस्तस्य तस्य सेनोऽभवत् सुतः ॥ २२<br>सेनस्य सुतपा जज्ञे सुतपस्तनयो बलिः।<br>जातो मानुषयोन्या तु क्षीणे वंशे प्रजेच्छया ॥ २३<br>महायोगी तु स बलिर्बद्धो बन्धैर्महात्मना।<br>पुत्रानुत्पादयामास क्षेत्रजान् पञ्च पार्थिवान् ॥ २४<br>अङ्गं स जनयामास वङ्गं सुह्मं तथैव च।<br>पुण्ड्रं कलिङ्गं च तथा बालेयं क्षेत्रमुच्यते।<br>बालेया ब्राह्मणाश्चैव तस्य वंशकराः प्रभोः ॥ २५<br>बलेश्च ब्रह्मणा दत्तो वरः प्रीतेन धीमतः।<br>महायोगित्वमायुश्च कल्पस्य परिमाणकम् ॥ २६<br>संग्रामे चाप्यजेयत्वं धर्मे चैवोत्तमा मतिः।<br>त्रैकाल्यदर्शनं चैव प्राधान्यं प्रसवे तथा ॥ २७तितिक्षु पूर्व दिशामें विख्यात राजा हुआ। उसका पुत्र वृषद्रथ और वृषद्रथका पुत्र सेन हुआ। सेनके सुतपा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और सुतपाका पुत्र बलि हुआ। महायोगी बलि अपने वंशके नष्ट हो जानेपर संतानकी कामनासे मानव-योनिमें उत्पन्न हुआ था। इसे महान् आत्मबलसे सम्पन्न भगवान् विष्णुने वामनरूपसे बन्धनोंद्वारा बाँध लिया था। राजा बलिने पाँच क्षेत्रज पुत्रोंको जन्म दिया जो सभी आगे चलकर पृथिवीपति हुए। उसने अङ्ग, वङ्ग, सुह्म, पुण्ड्र और कलिङ्ग नामक पुत्रोंको पैदा किया जो बलिके क्षेत्रज पुत्र कहलाते हैं। ये बलिपुत्र ब्राह्मणसे उत्पन्न होनेके कारण ब्राह्मण थे और सामर्थ्यशाली बलिके वंशप्रवर्तक हुए। पूर्वकालमें ब्रह्माने प्रसन्न होकर बुद्धिमान् बलिको ऐसा वरदान दिया था कि 'तुम महान् योगी होगे। कल्पपर्यन्त परिमाणवाली तुम्हारी आयु होगी। तुम संग्राममें किसीसे पराजित नहीं होगे। धर्मके विषयमें तुम्हारी बुद्धि उत्तम होगी। तुम त्रिकालदर्शी और असुरवंशमें प्रधान
१९०* मत्स्यपुराण *

| जयं चाप्रतिमं युद्धे धर्मे तत्त्वार्थदर्शनम्।<br>चतुरो नियतान् वर्णान् स वै स्थापयिता प्रभुः॥ २८<br>तेषां च पञ्च दायादा वङ्गाङ्गाः सुह्मकास्तथा।<br>पुण्ड्राः कलिङ्गाश्च तथा अङ्गस्य तु निबोधत ॥ २९ | होगे। युद्धमें तुम्हें अनुपम विजय प्राप्त होगी। धर्मके विषयमें तुम तत्त्वार्थदर्शी होगे।' इसीके परिणामस्वरूप |
| ऋषय ऊचुः<br>कथं बलेः सुता जाताः पञ्च तस्य महात्मनः।<br>किं नाम्नी महिषी तस्य जनिता कतमो ऋषिः॥ ३०<br>कथं चोत्पादितास्तेन तन्नः प्रब्रूहि पृच्छताम्।<br>माहात्म्यं च प्रभावं च निखिलेन वदस्व तत्॥ ३१ | सामर्थ्यशाली बलि चारों नियत (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, |
| सूत उवाच<br>अथौशिज इति ख्यात आसीद् विद्वान् ऋषिः पुरा।<br>पत्नी वै ममता नाम बभूवास्य महात्मनः ॥ ३२<br>उशिजस्य यवीयान् वै भ्रातृपत्नीमकामयत्।<br>बृहस्पतिर्महातेजा ममतामेत्य कामतः ॥ ३३ | शूद्र) वर्णोंकी स्थापना करनेवाला हुआ। बलिके पाँचों |
| उवाच ममता तं तु देवरं वरवर्णिनी।<br>अन्तर्वत्न्यस्मि ते भ्रातुर्ज्येष्ठस्य तु विरम्यताम् ॥ ३४<br>अयं तु मे महाभाग गर्भः कुप्येद् बृहस्पते।<br>औशिजो भ्रातृजन्यस्ते सोपाङ्गं वेदमूद्गिरन् ॥ ३५<br>अमोघरेतास्त्वं चापि न मां भजितुमर्हसि।<br>अस्मिन्नेवं गते काले यथा वा मन्यसे प्रभो॥ ३६ | क्षेत्रज पुत्रोंके वंश भी उन्हींके नामपर अङ्ग, वङ्ग, सुह्मक, पुण्ड्र और कलिङ्ग नामसे विख्यात हुए*। |
| एवमुक्तस्तथा सम्यग् बृहत्तेजा बृहस्पतिः।<br>कामात्मा स महात्मापि न मनः सोऽभ्यवारयत् ॥ ३७<br>सम्बभूवैव धर्मात्मा तया सार्धमकामया।<br>उत्सृजन्तं तु तद्रेतो वाचं गर्भोऽभ्यभाषत ॥ ३८<br>भो तात वाचामधिप द्वयोर्नास्तीह संस्थितिः।<br>अमोघरेतास्त्वं चापि पूर्वं चाहमिहागतः॥ ३९ | उनमें अङ्गके वंशका वर्णन सुनिये ॥२२—५०॥ |
| सोऽशपत् तं ततः क्रुद्ध एवमुक्तो बृहस्पतिः।<br>पुत्रं ज्येष्ठस्य वै भ्रातुर्गर्भस्थं भगवानृषिः॥ ४०<br>यस्मात् त्वमीदृशे काले गर्भस्थोऽपि निषेधसि।<br>मामेवमुक्तवांस्तस्मात् तमो दीर्घं प्रवेक्ष्यसि ॥ ४१ | ऋषियो! दीर्घतमाके प्रभावसे सुदेष्णाका जो ज्येष्ठ |
| ततो दीर्घतमा नाम शापादृषिरजायत।<br>अथौशिजो बृहत्कीर्तिर्बृहस्पतिरिवौजसा॥ ४२<br>ऊर्ध्वरेतास्ततोऽसौ वै वसते भ्रातुराश्रमे।<br>स धर्मान् सौरभेयांस्तु वृषभाच्छ्रुतवांस्ततः॥ ४३<br>तस्य भ्राता पितृव्यो यश्चकार भरणं तदा। | पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम अङ्ग था। तत्पश्चात् कलिङ्ग, पुण्ड्र, सुह्म और वङ्गराजका जन्म हुआ। ये पाँचों दैत्यराज |


* इनके वंशजातिवालोंके कारण ये जनपद भी इन्हीं नामोंसे प्रसिद्ध हुए। इनमें अङ्ग—भागलपुर, वङ्ग—पश्चिम बंगाल, सुह्म—आसाम, पुण्ड्र—आजका बंगला देश तथा कलिङ्ग—उड़ीसा है।

* अध्याय ४८ *
१९१

तस्मिन् निवसतस्तस्य यदृच्छैवागतो वृषः॥ ४४
यज्ञार्थमाहतान् दर्भांश्चचार सुरभीसुतः।
जग्राह तं दीर्घतमाः शृङ्गयोस्तु चतुष्पदम्॥ ४५
तेनासौ निगृहीतश्च न चचाल पदात् पदम्।
ततोऽब्रवीद् वृषस्तं वै मुञ्च मां बलिनां वर॥ ४६
न मयाऽऽसादितस्तात बलवांस्त्वत्समः क्वचित्।
मम चान्यः समो वापि न हि मे बलसंख्यया।
मुञ्च तातेति च पुनः प्रीतस्तेऽहं वरं वृणु॥ ४७
एवमुक्तोऽब्रवीदेनं जीवन्मे क्व यास्यसि।
एष त्वां न विमोक्ष्यामि परस्वादं चतुष्पदम्॥ ४८

वृषभ उवाच
नास्माकं विद्यते तात पातकं स्तेयमेव च।
भक्ष्याभक्ष्यं तथा चैव पेयापेयं तथैव च॥ ४९
द्विपदां बहवो ह्येते धर्म एष गवां स्मृतः।
कार्याकार्ये न वागम्यागमनं च तथैव च॥ ५०

सूत उवाच
गवां धर्मं तु वै श्रुत्वा सम्भ्रान्तस्तु विसृज्य तम्।
शक्त्यान्नपानदानात् तु गोपतिं सम्प्रसादयत्॥ ५१
प्रसादिते गते तस्मिन् गोधर्मं भक्तितस्तु सः।
मनसैव समादध्यौ तन्निष्ठस्तत्परो हि सः॥ ५२
ततो यवीयसः पत्नीं गौतमस्याभ्यपद्यत।
कृतावलेपां तां मत्वा सोऽनड्वानिव न क्षमे॥ ५३
गोधर्मं तु परं मत्वा स्नुषां तामभ्यपद्यत।
निर्भर्त्स्य चैनं रुद्ध्वा च बाहुभ्यां सम्प्रगृह्य च॥ ५४
भाव्यर्थं तु तं ज्ञात्वा माहात्म्यात् तमुवाच सा।
विपर्ययं तु त्वं लब्ध्वा अनड्वानिव वर्तसे॥ ५५
गम्यागम्यं न जानीषे गोधर्मात् प्रार्थयन् सुताम्।
दुर्वृत्तं त्वां त्यजाम्यद्य गच्छ त्वं स्वेन कर्मणा॥ ५६
काष्ठे समुद्रे प्रक्षिप्य गङ्गाम्भसि समुत्सृजत्।
तस्मात् त्वमन्धो वृद्धश्च भर्त्तव्यो दुरधिष्ठितः॥ ५७
तमुह्यमानं वेगेन स्रोतसोऽभ्याशमागतः।
जग्राह तं स धर्मात्मा बलिवैरोचनिस्तदा॥ ५८
अन्तःपुरे जुगोपैनं भक्ष्यभोज्यैश्च तर्पयन्।
प्रीतश्चैवं वरेणैवच्छन्दयामास वै बलिम्॥ ५९
तस्माच्च स वरं वव्रे पुत्रार्थे दानवर्षभः।
संतानार्थं महाभाग भार्यायां मम मानद।
पुत्रान् धर्मार्थतत्त्वज्ञानुत्पादयितुमर्हसि॥ ६०


बलिके क्षेत्रज पुत्र थे। ये सभी पुत्र महर्षि दीर्घतमाद्वारा बलिको प्रदान किये गये थे। तदनन्तर उन्होंने मानव-योनिमें कई संतानें उत्पन्न कीं। एक बार सुरभि (गौ) दीर्घतमाके पास आकर उनसे बोली—'विभो! आपने हम लोगोंके प्रति अनन्यभक्ति होनेके कारण भलीभाँति विचारकर पशु-धर्मको प्रमाणित कर दिया है, इसलिये मैं आपपर परम प्रसन्न हूँ। अनघ! आपके शरीरमें बृहस्पतिका अंशभूत जो यह पाप स्थित है, उस घोर अन्धकारको सूँघकर मैं आपसे दूर किये देती हूँ। साथ ही आपके शरीरसे बुढ़ापा, मृत्यु और अंधकारको भी सूँघकर हटा दे रही हूँ।' (ऐसा कहकर सुरभिने उनके शरीरको सूँघा।) सुरभिके सूँघते ही वे मुनिश्रेष्ठ दीर्घतमा तुरन्त दीर्घ आयु, सौन्दर्यशाली शरीर और सुन्दर नेत्रोंसे युक्त हो गये॥ ५१–८३॥

इस प्रकार गौद्वारा अन्धकारके नष्ट कर दिये जानेपर वे गौतम नामसे प्रसिद्ध हुए। तदनन्तर कक्षीवान् अपने पिता गौतमके साथ गिरिव्रजको जाकर उन्हींके साथ निवास करता हुआ चिरकालिक तपस्यामें संलग्न हो गया। वहाँ वह नित्य

१९२ * मत्स्यपुराण *


एवमुक्तोऽथ देवर्षिस्तथास्त्वित्युक्तवान् प्रभुः।
स तस्य राजा स्वां भार्यां सुदेष्णां नाम प्राहिणोत्।
अन्धं वृद्धं च तं ज्ञात्वा न सा देवी जगाम ह॥ ६१
शूद्रां धात्रेयिकां तस्मादन्धाय प्राहिणोत् तदा।
तस्यां काक्षीवदादींश्च शूद्रयोनावृषिर्वशी॥ ६२
जनयामास धर्मात्मा शूद्रान्नित्येवमादिकम्।
उवाच तं बली राजा दृष्ट्वा काक्षीवदादिकान्॥ ६३

राजोवाच
प्रवीणानृषिधर्मस्य चेश्वरान् ब्रह्मवादिनः।
विद्वान् प्रत्यक्षधर्माणं बुद्धिमान् वृत्तिमाञ्छुचीन्॥ ६४
ममैव चेति होवाच तं दीर्घतमसं बलिः।
नेत्युवाच मुनिस्तं वै ममैवमिति चाब्रवीत्॥ ६५
उत्पन्नाः शूद्रयोनौ तु भवच्छन्देऽसुरोत्तम।
अन्धं वृद्धं च मां ज्ञात्वा सुदेष्णा महिषी तव।
प्राहिणोदवमानान्मे शूद्रां धात्रेयिकां नृप॥ ६६
ततः प्रसादयामास बलिस्तमृषिसत्तमम्।
बलिः सुदेष्णां तां भार्यां भर्त्सयामास दानवः॥ ६७
पुनश्चैनामलङ्कृत्य ऋषये प्रत्यपादयत्।
तां स दीर्घतमा देवीं तथा कृतवतीं तदा॥ ६८
दध्ना लवणमिश्रेण त्वभ्यक्तं मधुकेन तु।
लिह मामजुगुप्सन्ती आपादतलमस्तकम्।
ततस्त्वं प्राप्स्यसे देवि पुत्रान् वै मनसेप्सितान्॥ ६९
तस्य सा तद्वचो देवी सर्वं कृतवती तदा।
तस्य सापानमासाद्य देवी पर्यहरत् तदा॥ ७०
तामुवाच ततः सोऽथ यत् ते परिहृतं शुभे।
विनापानं कुमारं तु जनयिष्यसि पूर्वजम्॥ ७१

सुदेष्णोवाच
नार्हसि त्वं महाभाग पुत्रं मे दातुमीदृशम्।
तोषितश्च यथाशक्ति प्रसादं कुरु मे प्रभो॥ ७२

दीर्घतमा उवाच
तवापचाराद् देव्येष नान्यथा भविता शुभे।
नैव दास्यति पुत्रस्ते पौत्रो वै दास्यते फलम्॥ ७३
तस्यापानं विना चैव योग्यभावो भविष्यति।
तस्माद् दीर्घतमाङ्गेषु कुक्षौ स्पृष्ट्वेदमब्रवीत्॥ ७४
प्राशितं यद्यदङ्गेषु न सोपस्थं शुचिस्मिते।
तेन तिष्ठन्ति ते गर्भे पौर्णमास्यामिवोडुराट्॥ ७५


पिताका दर्शन और स्पर्श करता था। दीर्घकालके पश्चात् महान् तपस्यासे शुद्ध हुए कक्षीवान्ने शूद्रा माताके गर्भसे उत्पन्न हुए शरीरको तपाकर ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति कर ली। तब पिता गौतमने उससे कहा—'बेटा! तुम्हारे-जैसे यशस्वी सत्पुत्रसे मैं पुत्रवान् हो गया हूँ। धर्मज्ञ! अब मैं कृतार्थ हो गया।' ऐसा कहकर गौतम अपने शरीरका त्याग कर ब्रह्मलोकको चले गये। ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करके कक्षीवान्ने हजारों पुत्रोंको उत्पन्न किया। कक्षीवान्के वे पुत्र कौष्माण्ड और गौतम नामसे विख्यात हुए॥ ८४-८९॥

इधर बलिने अपने पाँचों निष्पाप पुत्रोंका अभिनन्दन करके उनसे कहा—'पुत्रो! मैं कृतार्थ हो गया।' स्वयं धर्मात्मा एवं सामर्थ्यशाली बलि योगमायासे समावृत था। वह सम्पूर्ण प्राणियोंसे अदृश्य रहकर कालकी प्रतीक्षा कर रहा था। उन पुत्रोंमें अङ्गका पुत्र राजा दधिवाहन हुआ। राजा दिविरथ दधिवाहनके पुत्र कहे जाते हैं। दिविरथका पुत्र विद्वान् राजा धर्मरथ था। ये धर्मरथ बड़े सम्पत्तिशाली नरेश थे। इन्होंने विष्णुपद पर्वतपर महात्मा शुक्राचार्यके साथ सोमरसका पान किया था। धर्मरथका पुत्र चित्ररथ हुआ। उसका पुत्र सत्यरथ हुआ और उससे दशरथका जन्म हुआ जो लोमपाद नामसे विख्यात था। उसके शान्ता नामकी एक (दत्रिमा) कन्या हुई थी।