मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४४- कार्तवीर्यका आदित्यके तेजसे सम्पन्न होकर वृक्षोंको जलाना, महर्षि आपवद्वारा कार्तवीर्यको शाप और क्रोष्टुके वंशका वर्णन
| १४६ | * मत्स्यपुराण * |
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| धर्म्यं मार्गं चिन्तयानो यशस्यं<br>कुर्यान्नृपो धर्ममवेक्षमाणः।<br>न मद्धिधो धर्मबुद्धिर्हि राजा<br>ह्येवं कुर्यात् कृपणं मां यथात्थ ॥ १७<br>कुर्यामपूर्वं न कृतं यदन्यै-<br>र्विधित्समानः किमु तत्र साधुः।<br>ब्रुवाणमेवं नृपतिं ययातिं<br>नृपोत्तमो वसुमानब्रवीत्तम् ॥ १८ | धर्मपर दृष्टि रखनेवाले राजाको उचित है कि वह प्रयत्नपूर्वक धर्म और यशके मार्गपर ही चले। जिसकी बुद्धि धर्ममें लगी हो, उस मेरे-जैसे मनुष्यको जान-बूझकर ऐसा दीनतापूर्ण कार्य नहीं करना चाहिये जिसके लिये तुम मुझसे कह रहे हो। जो शुभ कर्म करनेकी इच्छा रखता है वह ऐसा काम नहीं कर सकता, जिसे अन्य राजाओंने नहीं किया हो। (तदनन्तर) इस प्रकारकी बातें कहनेवाले राजा ययातिसे नृपश्रेष्ठ वसुमान् बोले ॥ १६—१८ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक एकतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥
बयालीसवाँ अध्याय
राजा ययातिके वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना
| वसुमानुवाच<br>पृच्छाम्यहं वसुमानौषदश्वि-<br>र्यद्यस्ति लोको दिवि मह्यं नरेन्द्र।<br>यद्यन्तरिक्षे प्रथितो महात्मन्<br>क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ॥ १ | वसुमान्ने कहा— नरेन्द्र! मैं उषदश्वका पुत्र हूँ और आपसे पूछ रहा हूँ। यदि स्वर्ग या अन्तरिक्षमें मेरे लिये भी कोई विख्यात लोक हों तो बताइये। महात्मन्! मैं आपको पारलौकिक धर्मका ज्ञाता मानता हूँ ॥ १ ॥ |
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| ययातिरुवाच<br>यदन्तरिक्षं पृथिवी दिशश्च<br>यत्तेजसा तपते भानुमांश्च।<br>लोकास्तावन्तो दिवि संस्थिता वै<br>ते त्वां भवन्तं प्रतिपालयन्ति ॥ २ | ययातिने कहा— राजन्! पृथ्वी, आकाश और दिशाओंके जितने प्रदेशको सूर्यदेव अपनी किरणोंसे तपाते और प्रकाशित करते हैं, उतने लोक तुम्हारे लिये स्वर्गमें स्थित हैं। वे तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं ॥ २ ॥ |
| वसुमानुवाच<br>तांस्ते ददामि पत मा प्रपातं<br>ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु।<br>क्रीणीष्वैनांस्तृणकेनापि राजन्<br>प्रतिग्रहस्ते यदि सम्यक् प्रदुष्टः ॥ ३ | वसुमान् बोले— राजन्! वे सभी लोक मैं आपके लिये देता हूँ, वे सब आपके हो जायँ। धीमन्! यदि आपको प्रतिग्रह लेनेमें दोष दिखायी देता हो तो एक मुट्ठा तिनका मुझे मूल्यके रूपमें देकर मेरे इन सभी लोकोंको आप खरीद लें ॥ ३ ॥ |
| ययातिरुवाच<br>न मिथ्याहं विक्रियं वै स्मरामि<br>मया कृतं शिशुभावेऽपि राजन्।<br>कुर्यां न चैवाकृतपूर्वमन्यै-<br>र्विधित्समानो वसुमन् न साधु ॥ ४ | ययातिने कहा— राजन्! मैंने बचपनमें भी कभी इस प्रकार झूठ-मूठकी खरीद-बिक्री की हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है। जिसे पूर्ववर्ती अन्य महापुरुषोंने नहीं किया, वह कार्य मैं भी नहीं कर सकता हूँ; क्योंकि मैं सत्कर्म करना चाहता हूँ ॥ ४ ॥ |
| * अध्याय ४२ * | १४७ |
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| वसुमानुवाच<br>तांस्त्वं लोकान् प्रतिपद्यस्व राजन्<br>मया दत्तान् यदि नेष्टः क्रयस्ते।<br>नाहं तान् वै प्रतिगन्ता नरेन्द्र<br>सर्वे लोकास्तावका वै भवन्तु॥ ५ | वसुमान् बोले— राजन्! यदि आप खरीदना नहीं चाहते तो मेरे द्वारा स्वतः अर्पण किये हुए पुण्यलोकोंको ग्रहण कीजिये। नरेन्द्र! निश्चय जानिये कि मैं उन लोकोंमें नहीं जाऊँगा। वे सब आपके ही अधिकारमें रहें॥ ५॥ |
| शिबिरुवाच<br>पृच्छामि त्वां शिबिरौशीनरोऽहं<br>ममापि लोका यदि सन्ति तात।<br>यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः<br>क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये॥ ६ | शिबिने कहा— तात! मैं उशीनरका पुत्र शिबि आपसे पूछता हूँ। यदि अन्तरिक्ष या स्वर्गमें मेरे भी पुण्यलोक हों तो बताइये; क्योंकि मैं आपको उक्त धर्मका ज्ञाता मानता हूँ॥ ६॥ |
| ययातिरुवाच<br>न त्वं वाचा हृदयेनापि राजन्<br>परीप्समानो मावमंस्था नरेन्द्र।<br>तेनानन्ता दिवि लोकाः स्थिता वै<br>विद्युद्रूपाः स्वनवन्तो महान्तः॥ ७ | ययाति बोले— नरेन्द्र! जो-जो साधु पुरुष तुमसे कुछ माँगनेके लिये आये, उनका तुमने वाणीसे कौन कहे, मनसे भी अपमान नहीं किया। इस कारण स्वर्गमें तुम्हारे लिये अनन्त लोक विद्यमान हैं जो विद्युत्के समान तेजोमय, भाँति-भाँतिके सुमधुर शब्दोंसे युक्त तथा महान् हैं॥ ७॥ |
| शिबिरुवाच<br>तांस्त्वं लोकान् प्रतिपद्यस्व राजन्<br>मया दत्तान् यदि नेष्टः क्रयस्ते।<br>न चाहं तान् प्रतिपद्येह दत्त्वा<br>यत्र त्वं तात गन्तासि लोके॥ ८ | शिबिने कहा— महाराज! यदि आप खरीदना नहीं चाहते तो मेरे द्वारा स्वयं अर्पण किये हुए पुण्यलोकोंको ग्रहण कीजिये। तात! उन सबको देकर निश्चय ही मैं उन लोकोंमें नहीं जाऊँगा जिन लोकोंमें आप जा रहे होंगे॥ ८॥ |
| ययातिरुवाच<br>यथा त्वमिन्द्रप्रतिमप्रभाव-<br>स्ते चाप्यनन्ता नरदेव लोकाः।<br>तथाद्य लोके न रमेऽन्यदत्ते<br>तस्माच्छिबे नाभिनन्दामि वाचम्॥ ९ | ययाति बोले— नरदेव शिबि! जिस प्रकार तुम इन्द्रके समान प्रभावशाली हो उसी प्रकार तुम्हारे वे लोक भी अनन्त हैं, तथापि दूसरेके दिये हुए लोकमें मैं विहार नहीं कर सकता; इसीलिये तुम्हारे दिये हुएका अभिनन्दन नहीं करता॥ ९॥ |
| अष्टक उवाच<br>न चेदेकैकशो राजँल्लोकान् नः प्रतिनन्दसि।<br>सर्वे प्रदाय ताँल्लोकान् गन्तारो नरकं वयम्॥ १० | अष्टकने कहा— राजन्! यदि आप हममेंसे एक-एकके दिये हुए लोकोंको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण नहीं करते तो हम सब लोग अपने पुण्यलोक आपकी सेवामें समर्पित करके नरक (भूलोक)-में जानेको तैयार हैं॥ १०॥ |
| ययातिरुवाच<br>यदहार्हस्तद् वदध्वं वः सन्तः सत्यादिदर्शिनः।<br>अहं तु नाभिगृह्णामि यत् कृतं न मया पुरा॥ ११<br>अलिप्समानस्य तु मे यदुक्तं<br>न तत्तथास्तीह नरेन्द्रसिंह।<br>अस्य प्रदानस्य यदेव युक्तं<br>तस्यैव चानन्तफलं भविष्यम्॥ १२ | ययाति बोले— मैं जिसके योग्य हूँ, उसीके लिये यत्न करो; क्योंकि साधु पुरुष सत्यका ही अभिनन्दन करते हैं। मैंने पूर्वकालमें जो कर्म नहीं किया, उसे अब भी स्वीकार नहीं कर सकता। नरेन्द्रसिंह! मुझ निर्लोभके प्रति तुमलोगोंने जो कुछ कहा है उसका फल वैसे ही निराशापूर्ण नहीं होगा, अपितु इतने बड़े दानके लिये जो उपयुक्त होगा, वह अनन्त फल तुम लोगोंको अवश्य प्राप्त होगा॥ ११-१२॥ |
| १४८ | * मत्स्यपुराण * |
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| अष्टक उवाच<br>कस्यैते प्रतिदृश्यन्ते रथाः पञ्च हिरण्मयाः।<br>उच्चैः सन्तः प्रकाशन्ते ज्वलन्तोऽग्निशिखा इव॥ १३ | अष्टकने पूछा—आकाशमें ये किसके पाँच सुवर्णमय रथ दिखायी देते हैं, जो आकाशमण्डलमें बड़ी ऊँचाईपर स्थित हैं और अग्नि-शिखाकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं?॥ १३॥ |
| ययातिरुवाच<br>भवतां मम चैवैते रथा भान्ति हिरण्मयाः।<br>आरुह्यैतेषु गन्तव्यं भवद्भिश्च मया सह॥ १४ | ययाति बोले—ये जो स्वर्णमय रथ चमक रहे हैं, सभी मेरे तथा तुमलोगोंके लिये आये हैं। इन्हींपर आरूढ़ होकर तुमलोग मेरे साथ इन्द्र-लोकको चलोगे॥१४॥ |
| अष्टक उवाच<br>आतिष्ठस्व रथं राजन् विक्रमस्व विहायसा।<br>वयमप्यनुयास्यामो यदा कालो भविष्यति॥ १५ | अष्टक बोले—राजन्! आप रथमें बैठिये और आकाशमें ऊपरकी ओर बढ़िये। जब समय होगा तब हम भी आपका अनुसरण करेंगे॥१५॥ |
| ययातिरुवाच<br>सर्वैरिदानीं गन्तव्यं सह स्वर्गो जितो यतः।<br>एष वो विरजाः पन्था दृश्यते देवसद्भगः॥ १६ | ययाति बोले—हम सब लोगोंने साथ-साथ स्वर्गपर विजय पायी है, इसलिये इस समय सबको वहाँ चलना चाहिये। देवलोकका यह रजोहीन सात्त्विक मार्ग हमें स्पष्ट दिखायी दे रहा है॥१६॥ |
| शौनक उवाच<br>तेऽभिरुह्य रथं सर्वे प्रयाता नृपते नृपाः।<br>आक्रमन्तो दिवं भान्ति धर्मेणावृत्य रोदसी॥ १७ | शौनकजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर वे सभी नृपश्रेष्ठ उन दिव्य रथोंपर आरूढ़ हो धर्मके बलसे स्वर्गमें पहुँचनेके लिये चल दिये। उस समय पृथ्वी और आकाशमें उनकी प्रभा व्याप्त हो रही थी॥ १७॥ |
| अष्टक उवाच<br>अहं मन्ये पूर्वमेकोऽभिगन्ता<br>सखा चेन्द्रः सर्वथा मे महात्मा।<br>कस्मादेवं शिबिरौशीनरोऽय-<br>मेकोऽत्ययात् सर्ववेगेन वाहन्॥ १८ | अष्टक बोले—राजन्! महात्मा इन्द्र मेरे बड़े मित्र हैं, अतः मैं तो समझता था कि अकेला मैं ही सबसे पहले उनके पास पहुँचूँगा; परंतु ये उशीनर-पुत्र शिबि अकेले सम्पूर्ण वेगसे हम सबके वाहनोंको लाँघकर आगे बढ़ गये हैं, ऐसा कैसे हुआ?॥१८॥ |
| ययातिरुवाच<br>अददाद् देवयानाय यावद् वित्तमनिन्दितः।<br>उशीनरस्य पुत्रोऽयं तस्माच्छ्रेष्ठो हि वः शिबिः॥ १९<br>दानं शौचं सत्यमथो ह्यहिंसा<br>ह्रीः श्रीस्तितिक्षा समताऽऽनृशंस्यम्।<br>राजन्य्नेतान्यथ सर्वाणि राज्ञि<br>शिबौ स्थितान्यप्रतिमेषु बुद्ध्या।<br>एवं वृत्तं ह्रीनिषेवी बिभर्ति<br>तस्माच्छिबिरभिगन्ता रथेन॥ २० | ययातिने कहा—राजन्! उशीनरके पुत्र शिबिने ब्रह्मलोकके मार्गकी प्राप्तिके लिये अपना सर्वस्व दान कर दिया था, इसलिये ये तुमलोगोंमें श्रेष्ठ हैं। नरेश्वर! दान, पवित्रता, सत्य, अहिंसा, ह्री, श्री, क्षमा, समता और दयालुता—ये सभी अनुपम गुण राजा शिबिमें विद्यमान हैं तथा बुद्धिमें भी उनकी समता करनेवाला कोई नहीं है। राजा शिबि ऐसे सदाचारसम्पन्न और लज्जाशील हैं। (इनमें अभिमानकी मात्रा छू भी नहीं गयी है।) इसीलिये शिबि रथारूढ़ हो हम सबसे आगे बढ़ गये हैं॥१९-२०॥ |
| शौनक उवाच<br>अथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छ-<br>न्मातामहं कौतुकादिन्द्रकल्पम्।<br>पृच्छामि त्वां नृपते ब्रूहि सत्यं<br>कुतश्च कश्चासि कथं त्वमागाः।<br>कृतं त्वया यद्वि न तस्य कर्ता<br>लोके त्वदन्यो ब्राह्मणः क्षत्रियो वा॥ २१ | शौनकजी कहते हैं—शतानीक! तदनन्तर अष्टकने कौतूहलवश इन्द्रतुल्य अपने नाना राजा ययातिसे पुनः प्रश्न किया—'महाराज! मैं आपसे एक बात पूछता हूँ। आप उसे सच-सच बताइये। आप कहाँसे आये हैं, कौन हैं और किसके पुत्र हैं? आपने जो कुछ किया है, उसे करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण इस संसारमें नहीं है'॥२१॥ |
| * अध्याय ४२ * | १४९ |
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| Sanskrit Shloka | Hindi Meaning |
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| ययातिरुवाच<br>ययातिरस्मि नहुषस्य पुत्रः<br>पूरोः पिता सार्वभौमस्त्विहासम्।<br>गुह्यं मन्त्रं मामकेभ्यो ब्रवीमि<br>मातामहो भवतां सुप्रकाशः॥ २२<br>सर्वामिमां पृथिवीं निर्जिगाय<br>ऋद्धां महीमददां ब्राह्मणेभ्यः।<br>मेध्यानश्वान् नैकशस्तान् सुरूपां-<br>स्तदा देवाः पुण्यभाजो भवन्ति॥ २३<br>अदामहं पृथिवीं ब्राह्मणेभ्यः<br>पूर्णांमिमामखिलान्नैः प्रशस्ताम्।<br>गोभिः सुवर्णैश्च धनैश्च मुख्यै-<br>रश्वाः सनागाः शतशस्त्वर्बुदानि॥ २४<br>सत्येन मे द्यौश्च वसुंधरा च<br>तथैवाग्निर्ज्वलते मानुषेषु।<br>न मे वृथा व्याहृतमेव वाक्यं<br>सत्यं हि सन्तः प्रतिपूजयन्ति॥ २५<br>साध्वष्टक प्रब्रवीमीह सत्यं<br>प्रतर्दनं वसुमन्तं शिबिं च।<br>सर्वे देवा मुनयश्च लोकाः<br>सत्येन पूज्या इति मे मनोगतम्॥ २६<br>यो नः स्वर्गजितं सर्वं यथावृत्तं निवेदयेत्।<br>अनसूयुर्द्विजाग्र्येभ्यः स भोजेन्नः सलोकताम्॥ २७ | ययातिने कहा— मैं नहुषका पुत्र और पूरुका पिता राजा ययाति हूँ। मैं इस लोकमें चक्रवर्ती नरेश था। तुम सब लोग मेरे अपने हो, अतः तुमसे गुप्त बात भी खोलकर बतलाये देता हूँ। मैं तुमलोगोंका नाना हूँ। (यद्यपि पहले भी यह बात बता चुका हूँ, तथापि पुनः स्पष्ट कर देता हूँ।) मैंने इस सारी पृथ्वीको जीत लिया था और पुनः इस समृद्धिशालिनी पृथ्वीको ब्राह्मणोंको दान भी कर दिया था। मनुष्य जब एक सौ सुन्दर पवित्र अश्वोंका दान करते हैं तब वे पुण्यात्मा देवता होते हैं। मैंने सब तरहके अन्न, गौ, सुवर्ण तथा उत्तम धनसे परिपूर्ण यह प्रशस्त पृथ्वी ब्राह्मणोंको दान कर दी थी एवं सौ अर्बुद (दस अरब) हाथियोंसहित घोड़ोंका दान भी किया था। सत्यसे ही पृथ्वी और आकाश टिके हुए हैं। इसी प्रकार सत्यसे ही मनुष्य-लोकमें अग्नि प्रज्वलित होती है। मैंने कभी व्यर्थ बात मुँहसे नहीं निकाली है; क्योंकि साधु पुरुष सदा सत्यका ही आदर करते हैं। अष्टक! मैं तुमसे, प्रतर्दनसे, वसुमान्से और शिबिसे भी यहाँ जो कुछ कहता हूँ, वह सब सत्य ही है। मेरे मनका यह विश्वास है कि समस्त लोक, मुनि और देवता सत्यसे ही पूजनीय होते हैं। जो मनुष्य हृदयमें ईर्ष्या न रखकर स्वर्गपर अधिकार करनेवाले हम सब लोगोंके इस वृत्तान्तको यथार्थरूपसे श्रेष्ठ द्विजोंके सामने सुनायेगा, वह हमारे ही समान पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेगा॥ २२—२७॥ |
| शौनक उवाच<br>एवं राजन् स महात्मा ययातिः<br>स्वदौहित्रैस्तारितो मित्रवर्यैः।<br>त्यक्त्वा महीं परमोदारकर्मा<br>स्वर्गं गतः कर्मभिर्व्याप्य पृथ्वीम्॥ २८<br>एवं सर्वं विस्तरतो यथाव-<br>दाख्यातं ते चरितं नाहुषस्य।<br>वंशो यस्य प्रथितः पौरवेयो<br>यस्मिञ्जातस्त्वं मनुजेन्द्रकल्पः॥ २९ | शौनकजी कहते हैं— राजन्! राजा ययाति बड़े महात्मा थे और उनके कर्म अत्यन्त उदार थे। उनके श्रेष्ठ मित्ररूपी दौहित्रोंने उनका उद्धार किया और वे सत्कर्मोंद्वारा सम्पूर्ण भूमण्डलको व्याप्त करके पृथ्वीको छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये। इस प्रकार मैंने तुमसे नहुष-पुत्र राजा ययातिका सारा चरित्र यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक कह सुनाया। यही वंश आगे चलकर पूरुवंशके नामसे विख्यात हुआ, जिसमें तुम मनुष्योंमें इन्द्रके समान उत्पन्न हुए हो॥ २८-२९॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते द्विचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन-विषयक बयालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४२॥
१५० * मत्स्यपुराण *
तैंतालीसवाँ अध्याय
ययाति-वंश-वर्णन, यदुवंशका वृत्तान्त तथा कार्तवीर्य अर्जुनकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>इत्येतच्छौनकाद् राजा शतानीको निशम्य तु।<br>विस्मितः परया प्रीत्या पूर्णचन्द्र इवाबभौ॥ १<br>पूजयामास नृपतिर्विधिवच्चाथ शौनकम्।<br>रत्नैर्गोभिः सुवर्णैश्च वासोभिर्विविधैस्तथा॥ २<br>प्रतिगृह्य ततः सर्वं यद् राज्ञा प्रहितं धनम्।<br>दत्त्वा च ब्राह्मणेभ्यश्च शौनकोऽन्तरधीयत॥ ३ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! राजा शतानीक महर्षि शौनकसे यह सारा वृत्तान्त सुनकर विस्मयाविष्ट हो गये तथा उत्कृष्ट प्रेमके कारण उनका चेहरा पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति खिल उठा। तदनन्तर राजाने अनेक प्रकारके रत्न, गौ, सुवर्ण और वस्त्रोंद्वारा महर्षि शौनककी विधिपूर्वक पूजा की। शौनकजीने राजाद्वारा दिये गये उस सारे धनको ग्रहण करके पुनः उसे ब्राह्मणोंको दान कर दिया और स्वयं वहीं अन्तर्हित हो गये॥ १—३॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>ययातेर्वंशमिच्छामः श्रोतुं विस्तरतो वद।<br>यदुप्रभृतिभिः पुत्रैर्यदा लोके प्रतिष्ठितम्॥ ४ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! अब हमलोग ययातिके वंशका वर्णन सुनना चाहते हैं। जब उनके यदु आदि पुत्र लोकमें प्रतिष्ठित हुए तब फिर आगे चलकर क्या हुआ? इसे विस्तारपूर्वक बतलाइये॥ ४॥ |
| सूत उवाच<br>यदोर्वंशं प्रवक्ष्यामि ज्येष्ठस्योत्तमतेजसः।<br>विस्तरेणानुपूर्व्या च गदतो मे निबोधत॥ ५<br>यदोः पुत्रा बभूवुर्हि पञ्च देवसुतोपमाः।<br>महारथा महेष्वासा नामतस्तान् निबोधत॥ ६<br>सहस्रजिरथो ज्येष्ठः क्रोष्टुर्नीलोऽन्तिको लघुः।<br>सहस्रजेस्तु दायादः शतजिर्नाम पार्थिवः॥ ७<br>शतजेरपि दायादास्त्रयः परमकीर्तयः।<br>हैहयश्च हयश्चैव तथा वेणुहयश्च यः॥ ८<br>हैहयस्य तु दायादो धर्मनेत्रः प्रतिश्रुतः।<br>धर्मनेत्रस्य कुन्तिस्तु संहतस्तस्य चात्मजः॥ ९<br>संहतस्य तु दायादो महिष्मान् नाम पार्थिवः।<br>आसीन्महिष्मतः पुत्रो रुद्रश्रेण्यः प्रतापवान्॥ १०<br>वाराणस्यामभूद् राजा कथितं पूर्वमेव तु।<br>रुद्रश्रेण्यस्य पुत्रोऽभूद् दुर्दमो नाम पार्थिवः॥ ११<br>दुर्दमस्य सुतो धीमान् कनको नाम वीर्यवान्।<br>कनकस्य तु दायादाश्चत्वारो लोकविश्रुताः॥ १२<br>कृतवीर्यः कृताग्निश्च कृतवर्मा तथैव च।<br>कृतौजाश्च चतुर्थोऽभूत् कृतवीर्यात् ततोऽर्जुनः॥ १३ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! अब मैं ययातिके ज्येष्ठ पुत्र परम तेजस्वी यदुके वंशका क्रमसे एवं विस्तारपूर्वक* वर्णन कर रहा हूँ, आपलोग मेरे कथनानुसार उसे ध्यानपूर्वक सुनिये। यदुके पाँच पुत्र हुए जो सभी देवपुत्र-सदृश तेजस्वी, महारथी और महान् धनुर्धर थे। उन्हें नामनिर्देशानुसार यों जानिये—उनमें ज्येष्ठका नाम सहस्रजि था, शेष चारोंका नाम क्रमशः क्रोष्टु, नील, अन्तिक और लघु था। सहस्रजिका पुत्र राजा शतजि हुआ। शतजिके हैहय, हय और वेणुहय नामक परम यशस्वी तीन पुत्र हुए। हैहयका विश्वविख्यात पुत्र धर्मनेत्र हुआ। धर्मनेत्रका पुत्र कुन्ति और उसका पुत्र संहत हुआ। संहतका पुत्र राजा महिष्मान् हुआ। महिष्मान्का पुत्र प्रतापी रुद्रश्रेण्य था, जो वाराणसी नगरीका राजा हुआ। इसका वृत्तान्त पहले ही कहा जा चुका है। रुद्रश्रेण्यका पुत्र दुर्दम नामका राजा हुआ। दुर्दमका पुत्र परम बुद्धिमान् एवं पराक्रमी कनक था। कनकके चार विश्वविख्यात पुत्र हुए, जिनके नाम हैं—कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतवर्मा और चौथा कृतौजा। इनमें कृतवीर्यसे अर्जुनका जन्म हुआ, |
* यह वर्णन भागवत ९। २३। १९ से २४। ६७ तक तथा वायु, ब्रह्माण्ड, विष्णु, मार्कण्डेय आदि पुराणोंमें भी मिलता है।
| * अध्याय ४३ * | १५१ |
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| श्लोक | अर्थ |
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| जातः करसहस्रेण सप्तद्वीपेश्वरो नृपः।<br>वर्षायुतं तपस्तेपे दुष्करं पृथिवीपतिः॥ १४<br><br>दत्तमाराधयामास कार्तवीर्योऽत्रिसम्भवम्।<br>तस्मै दत्ता वरास्तेन चत्वारः पुरुषोत्तमः॥ १५<br><br>पूर्वं बाहुसहस्रं तु स वव्रे राजसत्तमः।<br>अधर्मं चरमाणस्य सद्भिborder/श्चापि निवारणम्॥ १६<br><br>युद्धेन पृथिवीं जित्वा धर्मेणैवानुपालनम्।<br>संग्रामे वर्तमानस्य वधश्चैवाधिकाद् भवेत्॥ १७ | जो सहस्र भुजाधारी (होनेके कारण सहस्रार्जुन नामसे प्रसिद्ध था) तथा सातों द्वीपोंका अधीश्वर था। पुरुषश्रेष्ठ कृतवीर्यनन्दन राजा सहस्रार्जुनने दस हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करते हुए महर्षि अत्रिके पुत्र दत्तात्रेयकी आराधना की। उससे प्रसन्न होकर दत्तात्रेयने उसे चार वर प्रदान किये। उनमें प्रथम वरके रूपमें राजश्रेष्ठ अर्जुनने अपने लिये एक हजार भुजाएँ माँगीं। दूसरे वरसे सत्पुरुषोंके साथ अधर्म करनेवालोंके निवारणका अधिकार माँगा। तीसरे वरसे युद्धद्वारा सारी पृथ्वीको जीतकर धर्मानुसार उसका पालन करना था और चौथा वर यह माँगा कि रणभूमिमें युद्ध करते समय मुझसे अधिक बलवान्के हाथों मेरा वध हो॥ ५—१७॥ |
| तेनेयं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता।<br>समोदधिपरिक्षिप्ता क्षात्रेण विधिना जिता॥ १८<br><br>जज्ञे बाहुसहस्रं वै इच्छतस्तस्य धीमतः।<br>रथो ध्वजश्च सञ्जज्ञे इत्येवमनुशुश्रुमः॥ १९<br><br>दशयज्ञसहस्राणि राज्ञा द्वीपेषु वै तदा।<br>निरर्गलानि वृत्तानि श्रूयन्ते तस्य धीमतः॥ २०<br><br>सर्वे यज्ञा महाराजस्तस्यासन् भूरिदक्षिणाः।<br>सर्वे काञ्चनयूपास्ते सर्वाः काञ्चनवेदिकाः॥ २१<br><br>सर्वे देवैः समं प्राप्तैर्विमानस्थैरलङ्कृताः।<br>गन्धर्वैरप्सरोभिश्च नित्यमेवोपशोभिताः॥ २२<br><br>तस्य यज्ञे जगौ गाथां गन्धर्वो नारदस्तथा।<br>कार्तवीर्यस्य राजर्षेर्महिमानं निरीक्ष्य सः॥ २३<br><br>न नूनं कार्तवीर्यस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवाः।<br>यज्ञैर्दानैस्तपोभिश्च विक्रमेण श्रुतेन च॥ २४<br><br>स हि सप्तसु द्वीपेषु खड्गी चक्री शरासनी।<br>रथी द्वीपान्यनुचरन् योगी पश्यति तस्करान्॥ २५<br><br>पञ्चाशीतिसहस्राणि वर्षाणां स नराधिपः।<br>स सर्वरत्नसम्पूर्णश्चक्रवर्ती बभूव ह॥ २६<br><br>स एव पशुपालोऽभूत् क्षेत्रपालः स एव हि।<br>स एव वृष्ट्या पर्जन्यो योगित्वादर्जुनोऽभवत्॥ २७<br><br>योऽसौ बाहुसहस्रेण ज्याघातकठिनत्वचा।<br>भाति रश्मिसहस्रेण शारदेनैव भास्करः॥ २८ | उस वरदानके प्रभावसे कार्तवीर्य अर्जुनने क्षात्र-धर्मानुसार सातों समुद्रोंसे परिवेष्टित पर्वतोंसहित सातों द्वीपोंकी समग्र पृथ्वीको जीत लिया; क्योंकि उस बुद्धिमान् अर्जुनके इच्छा करते ही एक हजार भुजाएँ निकल आयीं तथा उसी प्रकार रथ और ध्वज भी प्रकट हो गये—ऐसा हमलोगोंके सुननेमें आया है। साथ ही उस बुद्धिमान् अर्जुनके विषयमें यह भी सुना जाता है कि उसने सातों द्वीपोंमें दस सहस्र यज्ञोंका अनुष्ठान निर्विघ्नतापूर्वक सम्पन्न किया था। उस राजराजेश्वरके सभी यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणाएँ बाँटी गयी थीं। उनमें गड़े हुए यूप (यज्ञस्तम्भ) स्वर्णनिर्मित थे। सभी वेदिकाएँ सुवर्णकी बनी हुई थीं। वे सभी यज्ञ अपना-अपना भाग लेनेके लिये आये हुए विमानारूढ़ देवोंद्वारा सुशोभित थे। गन्धर्व और अप्सराएँ भी नित्य आकर उनकी शोभा बढ़ाती थीं। राजर्षि कार्तवीर्यके महत्त्वको देखकर नारदनामक गन्धर्वने उनके यज्ञमें ऐसी गाथा गायी थी—'भावी क्षत्रिय नरेश निश्चय ही यज्ञ, दान, तप, पराक्रम और शास्त्रज्ञानके द्वारा कार्तवीर्यकी समकक्षताको नहीं प्राप्त होंगे।' योगी अर्जुन रथपर आरूढ़ हो हाथमें खड्ग, चक्र और धनुष धारण करके सातों द्वीपोंमें भ्रमण करता हुआ चोरों-डाकुओंपर कड़ी दृष्टि रखता था। राजा अर्जुन पचासी हजार वर्षोंतक भूतलपर शासन करके समस्त रत्नोंसे परिपूर्ण हो चक्रवर्ती सम्राट् बना रहा। राजा अर्जुन ही अपने योगबलसे पशुओंका पालक था, वही खेतोंका भी रक्षक था और वही समयानुसार मेघ बनकर वृष्टि भी करता था। प्रत्यञ्चाके आघातसे कठोर हुई त्वचाओंवाली अपनी सहस्रों भुजाओंसे वह उसी प्रकार शोभा पाता था, जिस प्रकार सहस्रों किरणोंसे युक्त शारदीय सूर्य शोभित होते हैं॥ १८–२८॥ |