मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
बुझाकर त्रिपुरकी रक्षामें नियुक्त करना तथा त्रिपुरकौमुदीका वर्णन
| * अध्याय १३७ * | ४८९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मये विवदमाने तु नर्दमान इवाम्बुदे।<br>बभूवुर्निष्प्रभा दैत्या ग्रहा इन्दूदये यथा॥ ९ | मेघकी भाँति कड़कते हुए मयके इस प्रकार विषाद करनेपर सभी दैत्य उसी प्रकार निस्तेज हो गये, जैसे चन्द्रमाके उदय होनेपर अन्य ग्रह मलिन हो जाते हैं॥ १—९॥ |
| वापीपालास्ततोऽभ्येत्य नभः काल इवाम्बुदाः।<br>मयमाहुर्यमप्रख्यं साञ्जलिप्रग्रहाः स्थिताः॥ १०<br><br>या सामृतरसा गूढा वापी वै निर्मिता त्वया।<br>समाकुलोत्पलवना समीनाकुलपङ्कजा॥ ११<br><br>पीता सा वृषरूपेण केनचिद् दैत्यनायक।<br>वापी सा साम्प्रतं दृष्टा मृतसंज्ञा इवाङ्गना॥ १२<br><br>वापीपालवचः श्रुत्वा मयोऽसौ दानवप्रभुः।<br>कष्टमित्यसकृत् प्रोच्य दितिजानिदमब्रवीत्॥ १३ | इसी समय वर्षाकालीन मेघकी तरह शरीरधारी बावलीके रक्षक दैत्य यमराज-सदृश भयंकर मयके निकट आकर हाथ जोड़कर (अभिवादन करके) खड़े हो गये और इस प्रकार बोले—'दैत्यनायक! आपने अमृतरूपी जलसे भरी हुई जिस गुप्त बावलीका निर्माण किया था, जो नील कमल-वनसे व्याप्त थी तथा जिसमें मछलियाँ और विभिन्न प्रकारके भी कमल भरे हुए थे, उसे वृषभरूपधारी किसी देवताने पी लिया। इस समय वह बावली मूर्च्छित हुई सुन्दरी स्त्रीकी भाँति दीख रही है।' बावलीके रक्षकोंकी बात सुनकर दानवराज मय 'कष्ट है'—ऐसा कई बार कहकर दैत्योंसे इस प्रकार बोला— |
| मया मायाबलकृता वापी पीता त्वियं यदि।<br>विनष्टाः स्म न संदेहस्त्रिपुरं दानवा गतम्॥ १४<br><br>निहतान् निहतान् दैत्यानाजीवयति दैवतैः।<br>पीता वा यदि वा वापी पीता वै पीतवाससा॥ १५<br><br>कोऽन्यो मन्मायया गुप्तां वापीममृततोयिनीम्।<br>पास्यते विष्णुमजितं वर्जयित्वा गदाधरम्॥ १६<br><br>सुगुह्यमपि दैत्यानां नास्त्यस्याविदितं भुवि।<br>यत्र मद्वरकौशल्यं विज्ञानं न वृतं बुधैः॥ १७ | 'दानवो! मेरे द्वारा मायाके बलसे रची हुई बावलीको यदि किसीने पी लिया तो निश्चय समझो कि हमलोग नष्ट हो गये और त्रिपुरको भी गया हुआ ही समझो। हाय! जो देवताओंद्वारा बार-बार मारे गये दैत्योंको जीवन-दान देती थी, वह बावली पी ली गयी! यदि वह सचमुच पी ली गयी तो (निश्चय ही) उसे पीताम्बरधारी विष्णुने ही पीया होगा। भला, गदाधारी अजेय विष्णुको छोड़कर दूसरा कौन ऐसा समर्थ है, जो मेरी मायाद्वारा गुप्त एवं अमृतरूपी जलसे भरी हुई बावलीको पी सकेगा? भूतलपर दैत्योंकी गुप्त-से-गुप्त बात विष्णुसे अज्ञात नहीं है। मेरी वरप्राप्तिकी कुशलता, जिसे विद्वान् लोग नहीं जान सके, विष्णुसे छिपी नहीं है। |
| समोऽयं रुचिरो देशो निर्द्रुमो निर्द्रुमाचलः।<br>नवाम्भःपूरितं कृत्वा बाधन्तेऽस्मान् मरुद्गणाः॥ १८<br><br>ते यूयं यदि मन्यध्वं सागरोपरि धिष्ठिताः।<br>प्रमथानां महावेगं सहामः श्वसनोपमम्॥ १९<br><br>एतेषां च समारम्भास्तस्मिन् सागरसम्प्लवे।<br>निरुत्साहा भविष्यन्ति एतद्रथपथावृताः॥ २० | हमारा यह देश सुन्दर और समतल है। यह वृक्ष और पर्वतसे रहित है। फिर भी मरुद्गण इसे नूतन जलसे परिपूर्ण करके हमलोगोंको बाधा पहुँचा रहे हैं। इसलिये यदि तुमलोगोंको स्वीकार हो तो हमलोग सागरके ऊपर स्थित हो जायँ और वहींसे प्रमथोंके वायुके समान महान् वेगको सहन करें। सागरकी उस बाढ़में इनका सारा उद्योग उत्साहहीन हो जायगा और उस विशाल रथका मार्ग रुक जायगा। |
| युध्यतां निघ्नतां शत्रून् भीतानां च द्रविष्यताम्।<br>सागरोऽम्बरसङ्काशः शरणं नो भविष्यति॥ २१ | इसलिये युद्ध करते समय, शत्रुओंको मारते समय और भयभीत होकर भागते समय हमलोगोंके लिये यह सागर आकाशकी भाँति शरणदाता हो जायगा।' |
| इत्युक्त्वा स मयो दैत्यो दैत्यानामधिपस्तदा।<br>त्रिपुरेण ययौ तूर्णं सागरं सिन्धुबान्धवम्॥ २२ | ऐसा कहकर दैत्यराज मयदानव तुरंत त्रिपुरसहित नदियोंके बन्धुस्वरूप सागरकी ओर प्रस्थित हुआ। फिर |
४९० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| सागरे जलगम्भीर उत्पपात पुरं वरम्।<br>अवतस्थुः पुराण्य्येव गोपुराभरणानि च॥ २३ | तो वह श्रेष्ठ त्रिपुर नामक नगर अगाध जलवाले सागरके ऊपर मँडराने लगा। उसके फाटक और आभूषणादि-सहित तीनों पुर यथास्थान स्थित हो गये॥ १०—२३॥ |
| अपक्रान्ते तु त्रिपुरे त्रिपुरारिस्त्रिलोचनः।<br>पितामहमुवाचेदं वेदवादविशारदम्॥ २४<br>पितामह दृढं भीता भगवन् दानवा हि नः।<br>विपुलं सागरं ते तु दानवाः समुपाश्रिताः॥ २५<br>यत एव हि ते यातास्त्रिपुरेण तु दानवाः।<br>तत एव रथं तूर्णं प्रापयस्व पितामह॥ २६ | इस प्रकार त्रिपुरके दूर हट जानेपर त्रिपुरारि भगवान् शंकरने वेदवादमें निपुण ब्रह्मासे इस प्रकार कहा—'ऐश्वर्यशाली पितामह! दानवगण हमलोगोंसे भलीभाँति डर गये हैं, इसलिये वे भागकर विशाल सागरकी शरणमें चले गये। पितामह! त्रिपुरसहित वे दानव जिस मार्गसे गये हैं, उसी मार्गसे आप शीघ्र ही मेरे रथको वहाँ पहुँचाइये।' |
| सिंहनादं ततः कृत्वा देवा देवरथं च तम्।<br>परिवार्य ययुर्हृष्टाः सायुधाः पश्चिमोदधिम्॥ २७<br>ततोऽमरामरगुरुं परिवार्य भवं हरम्।<br>नर्दयन्तो ययुस्तूर्णं सागरं दानवालयम्॥ २८ | तब आयुधधारी देवगण हर्षपूर्वक सिंहनाद करके और उस देवरथको चारों ओरसे घेरकर पश्चिम सागरकी ओर चल पड़े। तत्पश्चात् देवगण देवश्रेष्ठ भगवान् शंकरको चारों ओरसे घेरकर सिंहनाद करते हुए शीघ्र ही दानवोंके निवासस्थान सागरकी ओर प्रस्थित हुए। |
| अथ चारुपताकभूषितं<br>पटहाडम्बरशङ्खनादितम्।<br>त्रिपुरमभिसमीक्ष्य देवता<br>विविधबला ननदुर्यथा घनाः॥ २९ | वहाँ पहुँचनेपर सुन्दर पताकाओंसे विभूषित तथा ढोल, नगारे और शङ्खके शब्दोंसे निनादित त्रिपुरको देखकर अनेकों सेनाओंसे सम्पन्न देवगण बादलोंकी तरह गर्जना करने लगे। |
| असुरवरपुरेऽपि दारुणो<br>जलधररावमृदङ्गगह्वरः।<br>दनुतनयनिनादमिश्रितः<br>प्रतिनिधिः संक्षुभितार्णवोपमः॥ ३० | उधर असुरश्रेष्ठ मयके पुरमें भी दानवोंके सिंहनादके साथ-साथ मेघ-गर्जनाके सदृश मृदंगोंका भयंकर एवं गम्भीर शब्द हो रहा था, जो क्षुब्ध हुए महासागरकी गर्जनाके समान प्रतीत हो रहा था। |
| अथ भुवनपतिर्गतिः सुराणा-<br>मरिमृगयाम्मददात् सुलब्धबुद्धिः।<br>त्रिदशगणपतिं ह्युवाच शक्रं<br>त्रिपुरगतं सहसा निरीक्ष्य शत्रुम्॥ ३१ | तदनन्तर देवताओंके आश्रयस्थान प्रत्युत्पन्नमति त्रिभुवनपति शंकर शत्रुओंका शिकार करनेके लिये उद्यत हो गये। तब उन्होंने सहसा शत्रुओंको त्रिपुरमें प्रवेश करते देखकर देवताओं और गणोंके सेनानायक इन्द्रसे इस प्रकार कहा— |
| त्रिदशगणपते निशामयैतत्<br>त्रिपुरनिकेतनं दानवाः प्रविष्टाः।<br>यमवरुणकुबेरषण्मुखैस्तत्<br>सह गणपैरपि हन्मि तावदेव॥ ३२<br>विहितपरबलाभिघातभूतं<br>व्रज जलधेस्तु यतः पुराणि तस्थुः।<br>स रथवरगतो भवः समर्थो<br>ह्युदधिमगात् त्रिपुरं पुनर्निहन्तुम्॥ ३३<br>इति परिगणयन्तो दितेः सुता<br>ह्यावतस्थुर्लवणार्णवोपरिष्टात्।<br>अभिभवत् त्रिपुरं सदानवेन्द्रं<br>शरवर्षैर्मुसलैश्च वज्रमिश्रैः॥ ३४ | 'देवताओं और गणेश्वरोंके नायक इन्द्र! आपलोग मेरी यह बात सुनें। दानवलोग अपने निवासस्थान त्रिपुरमें घुस गये हैं, अतः आप यम, वरुण, कुबेर, कार्तिकेय तथा गणेश्वरोंको साथ लेकर इनका संहार करें। तबतक मैं भी इन्हें मार रहा हूँ। आप शत्रुसेनापर प्रहार करते हुए समुद्रके उस स्थानतक बढ़ते चलें, जहाँ तीनों पुर स्थित हैं। यह देखकर जब उन दैत्योंको यह विदित हो जायगा कि सामर्थ्यशाली शंकर उस श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो पुनः त्रिपुरका विनाश करनेके लिये समुद्रतटपर आ गये हैं, तब वे लवणसागरके ऊपर निकल आयेंगे। तब आप वज्रसहित मुसलों एवं बाणोंकी वर्षा करते हुए दानवेन्द्रोंसहित त्रिपुरपर आक्रमण कर दें। |
| * अध्याय १३८ * | ४९१ |
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| अहमपि रथवर्यमास्थितः<br>सुरवरवर्य भवेय पृष्ठतः ।<br>असुरवरवधार्थमुद्यतानां<br>प्रतिविदधामि सुखाय तेऽनघ ॥ ३५<br>इति भववचनप्रचोदितो<br>दशशतनयनवपुः समुद्यतः ।<br>त्रिपुरपुरजिघांसया हरिः<br>प्रविकसिताम्बुजलोचनो ययौ ॥ ३६ | सुरश्रेष्ठ ! उस समय मैं भी इस श्रेष्ठ रथपर बैठा हुआ असुरेन्द्रोंका वध करनेके लिये उद्यत आपलोगोंके पीछे रहूँगा। अनघ ! मैं सर्वथा आपलोगोंके सुखका विधान करता रहूँगा।' इस प्रकार शंकरजीके वचनोंसे प्रेरित होकर एक हजार नेत्रोंवाले इन्द्र, जिनके नेत्र प्रफुल्ल कमलके सदृश सुन्दर थे, त्रिपुरके विनाशकी इच्छासे उद्यत होकर आगे बढ़े ॥ २४—३६ ॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुराक्रमणं नाम सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें त्रिपुराक्रमण नामक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १३७ ॥
एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय
देवताओं और दानवोंमें घमासान युद्ध तथा तारकासुरका वध
| सूत उवाच<br>मघवा तु निहन्तुं तानसुरानमनेश्वरः ।<br>लोकपाला ययुः सर्वे गणपालाश्च सर्वशः ॥ १<br>ईश्वरेणोर्जिताः सर्व उत्पेतुरश्चाम्बरे तदा ।<br>खगतास्तु विरेजुस्ते पक्षवन्त इवाचलाः ॥ २<br>प्रययुस्तत्पुरं हन्तुं शरीरमिव व्याधयः ।<br>शङ्खाडम्बरनिर्घोषैः पणवान् पटहानपि ।<br>नादयन्तः पुरो देवा दृष्टास्त्रिपुरवासिभिः ॥ ३<br>हरः प्राप्त इतीवोक्त्वा बलिनस्ते महासुराः ।<br>आजग्मुः परं क्षोभमत्येयेष्विव सागराः ॥ ४<br>सुरतूर्यरवं श्रुत्वा दानवा भीमदर्शनाः ।<br>निनेदुर्वादयन्तश्च नानावाद्यान्यनेकशः ॥ ५<br>भूयोदीरितवीर्यास्ते परस्परकृतागसः ।<br>पूर्वदेवाश्च देवाश्च सूदयन्तः परस्परम् ॥ ६<br>आक्रोशेऽपि समप्रख्ये तेषां देहनिकृन्तनम् ।<br>प्रवृत्तं युद्धमतुलं प्रहारकृतनिःस्वनम् ॥ ७<br>निष्यतन्त इवादित्याः प्रज्वलन्त इवाग्नयः ।<br>शंसन्त इव नागेन्द्रा भ्रमन्त इव पक्षिणः ।<br>गिरीन्द्रा इव कम्पन्तो गर्जन्त इव तोयदाः ॥ ८ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो ! शंकरजीद्वारा उत्साहित किये जानेपर देवराज इन्द्र, सभी लोकपाल और गणपाल सब ओरसे उन असुरोंका वध करनेके लिये चले और आकाशकी ओर उछल पड़े। आकाशमें पहुँचकर वे पंखधारी पर्वतकी तरह शोभा पाने लगे। तत्पश्चात् वे शङ्ख और डंकेके निर्घोषके साथ-साथ ढोलों और नगाड़ोंको पीटते हुए त्रिपुरका विनाश करनेके लिये उसी प्रकार आगे बढ़े, जैसे व्याधियाँ शरीरको नष्ट कर देती हैं। इतनेमें त्रिपुरवासी दानवोंने देवगणोंको आगे बढ़ते हुए देख लिया। फिर तो वे महाबली असुर 'शंकर (यहाँ भी) आ गये'—ऐसा कहकर प्रलयकालीन सागरोंकी तरह परम क्षुब्ध हो उठे। तब भयंकर रूपधारी दानव देवताओंकी तुरहियोंका शब्द सुनकर नाना प्रकारके बाजे बजाते हुए बारंबार उच्च स्वरसे गर्जना करने लगे। तत्पश्चात् पुनः पराक्रम प्रकट करनेवाले वे दानव और देव परस्पर क्रुद्ध होकर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे। दोनों सेनाओंमें समानरूपसे सिंहनाद हो रहे थे। उनके शरीर कट-कटकर गिर रहे थे। फिर तो प्रहार करनेवालोंकी गर्जनाके साथ-साथ अनुपम युद्ध छिड़ गया। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो अनेकों सूर्य गिर रहे हैं, अग्नयाँ प्रज्वलित हो उठी हैं, विषधर सर्प फुफकार मार रहे हैं, पक्षी आकाशमें चक्कर काट रहे हैं, पर्वत काँप रहे हैं, बादल |
| ४९२ | * मत्स्यपुराण * |
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| जृम्भन्त इव शार्दूलाः प्रवान्त इव वायवः।<br>प्रवृद्धोर्मितरङ्गौघाः क्षुभ्यन्त इव सागराः॥ ९<br>प्रमथाश्च महाशूरा दानवाश्च महाबलाः।<br>युयुधुर्निश्चला भूत्वा वज्रा इव महाचलैः॥ १० | गरज रहे हैं, सिंह जमुहाई ले रहे हैं, भयानक झंझावात चल रहा है और उछलती हुई लहरोंके समूहसे सागर क्षुब्ध हो उठा है। इस प्रकार महान् शूरवीर प्रमथ और महाबली दानव उसी प्रकार डटकर युद्ध कर रहे थे, जैसे महान् पर्वतोंसे टकरानेपर भी वज्र अटल रहता है॥ ९-१०॥ |
| कार्मुकाणां विकृष्टानां बभूवुर्दारुणा रवाः।<br>कालानुगानां मेघानां यथा वियति वायुना॥ ११ | जैसे आकाशमें वायुद्वारा प्रेरित किये जानेपर प्रलयकालीन मेघोंकी गर्जना होती है, उसी तरह खींचे जाते हुए धनुषोंके भीषण शब्द हो रहे थे। |
| आहुश्च युद्धे मा भैषीः क्व यास्यसि मृतो ह्यसि।<br>प्रहराशु स्थितोऽस्म्यत्र एहि दर्शय पौरुषम्॥ १२<br>गृहाण छिन्धि भिन्धीति खाद मारय दारय।<br>इत्यन्योऽन्यमनूच्चार्य प्रययुर्यमसादनम्॥ १३ | युद्धभूमिमें दोनों ओरके वीर परस्पर 'मत डरो, कहाँ भागकर जाओगे, अब तो तुम मरे ही हो, शीघ्र प्रहार करो, मैं यहाँ खड़ा हूँ, आओ और अपना पुरुषार्थ दिखाओ, पकड़ लो, काट डालो, विदीर्ण कर दो, खा लो, मार डालो, फाड़ डालो'—ऐसा शब्द बोल रहे थे और पुनः शान्त होकर यमलोकके पथिक बन जाते थे। |
| खड्गापवर्जिताः केचित् केचिच्छिन्ना परश्वधैः।<br>केचिन्मुद्गरचूर्णांश्च केचिद् बाहुभिराहताः॥ १४<br>पट्टिशैः सूदिताः केचित् केचिच्छूलविदारिताः।<br>दानवाः शरपुष्पाभाः सवना इव पर्वताः।<br>निपतन्त्यर्णवजले भीमनक्रमितिमिङ्गिले॥ १५ | उनमेंसे कुछ वीर तलवारसे काट डाले गये थे, कुछ फरसोंसे छिन्न-भिन्न कर दिये गये थे, कुछ मुद्गरोंकी मारसे चूर्ण-सरीखे हो गये थे, कुछ हाथके चपेटोंसे घायल कर दिये गये, कुछ पट्टिशों (पटों)-के प्रहारसे मार डाले गये और कुछ शूलोंसे विदीर्ण कर दिये गये। सरपतके फूलकी-सी कान्तिवाले दानव वनसहित पर्वतोंकी तरह भयंकर नाक और तिमिंगिलोंसे भरे हुए समुद्रके जलमें गिर रहे थे। |
| व्यसुभिः सुनिबद्धाङ्गैः पतमानैः सुरेतरैः।<br>सम्बभूवार्णवे शब्दः सजलाम्बुदनिःस्वनः॥ १६ | दानवोंके कवच आदिसे भलीभाँति बँधे हुए प्राणरहित शरीरोंके समुद्रमें गिरनेसे सजल जलधरकी गर्जनाके समान शब्द हो रहा था। |
| तेन शब्देन मकरा नक्रास्तिमितिमिङ्गिलाः।<br>मत्ता लोहितगन्धेन क्षोभयन्तो महार्णवम्॥ १७<br>परस्परेण कलहं कुर्वाणा भीममूर्तयः।<br>भ्रमन्ते भक्षयन्तश्च दानवानां च लोहितम्॥ १८ | उस शब्दसे तथा दानवोंके रुधिरकी गन्धसे मतवाले हुए मगर, नाक, तिमि और तिमिंगिल आदि जन्तु महासागरको क्षुब्ध कर रहे थे। वे भयंकर आकारवाले जलजन्तु परस्पर झगड़ते हुए दानवोंका रुधिर पान कर चक्कर काट रहे थे। |
| सरथान् सायुधान् साश्वान् सवस्त्राभरणावृतान्।<br>जग्रसुस्तिमयो दैत्यान् द्रावयन्तो जलेचरान्॥ १९<br>मृधं यथासुराणां च प्रमथानां प्रवर्तते।<br>अम्बरेऽम्भसि च तथा युद्धं चक्रुर्जलेचराः॥ २० | यूथ-के-यूथ मगरमच्छ अन्य जल-जन्तुओंको खदेड़कर रथ, आयुध, अश्व, वस्त्र और आभूषणोंसहित दैत्योंको निगल जाते थे। जिस प्रकार आकाशमें दानवों और प्रमथोंका युद्ध चल रहा था, उसी तरह समुद्रमें जल-जन्तु (शवोंको खानेके लिये) परस्पर लड़ रहे थे॥ ११-२०॥ |
| यथा भ्रमन्ति प्रमथाः सदैत्या-<br> स्तथा भ्रमन्ते तिमयः सनक्राः।<br>यथैव छिन्दन्ति परस्परं तु<br> तथैव क्रन्दन्ति विभिन्नदेहाः॥ २१ | उस समय जैसे आकाशमें प्रमथगण दैत्योंके साथ युद्ध करते हुए चक्कर काट रहे थे, वैसे ही जलमें मगरमच्छ नाकोंके साथ झगड़ते हुए घूम रहे थे। जैसे देवता और दानव परस्पर एक-दूसरेके शरीरको काट रहे थे, वैसे ही मगरमच्छ और नाक भी एक-दूसरेके शरीरको |